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Wednesday, 12 September 2007

घुसपैठ से देश की अखण्डता को खतरा


-डॉ. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

भारत की स्वतंत्रता के उपरान्त से ही जिस प्रकार विभिन्न देशों से लोग यहां आये उनमें से अनेक तो शरणार्थी के रूप में थे और अनेक चोरी छिपे घुसपैठिये थे। इससे भारत में जहां जनसंख्या में असंतुलन उभरा वहीं देश में अनेक प्रकार की समस्याएं खडी हो गईं। गत दस वर्षों में बांग्लादेश से लगभग 2.5 करोड की एक बडी आबादी ने भारत में अवैध रूप से घुसपैठ कर ली है जिससे देश में अनेक सीमावर्ती जिले इन घुसपैठियों के लगभग कब्जे में ही आ गये है। परन्तु सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि देश के तथाकथित गैर साम्प्रदायिक राजनीतिक नेता इन अवैध घुसपैठियों की बांग्लादेश में वापसी के लिए कोई पहल नहीं कर रहे हैं तथा जो राजनेता इनको वापिस भेजने की मांग करते हैं उनको साम्प्रदायिक कह कर गाली दी जाती है ।

अब भारत की एकता व अखण्डता भी खतरे में पडती जा रही है । बढ़ती घुसपैठ व बढती जनसंख्या के असंतुलन से देश की आंतरिक सुरक्षा भी खतरे में पड गई है। देश को बाह्य आक्रमण से बचाने के लिए देश की सम्पूर्ण जनता जाति, बिरादरी, मजहब व पंथ को छोड कर एकजुट हो जाती है लेकिन आंतरिक आक्रमण-घुसपैठ होने से आंतरिक असुरक्षा उत्पन्न हो जाती है जिसको सामान्य जन के साथ-साथ हमारे राजनेता भी गम्भीरता से नहीं लेते है। इससे आतंकवाद को शरण मिल जाती है। बढते आतंकवाद ने अब तक कई लाख लोगों को लील लिया है वहीं अरबों रुपये की राष्ट्र की सम्पत्ति को हानि पहुंची है एवं देशवासी भी एकजुट होकर इस आतंकवाद से लड़ने में स्वयं को तैयार नहीं कर पाते हैं ।

भारत ने स्वतंत्रता के अपने साठ साल के जीवन में पांच प्रमुख युध्द झेले है जिनमें हमारे रणबांकुरों ने दुश्मनों के दांत खट्टे किये है, परन्तु युध्दोपरांत वार्ता की मेज पर दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव व अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीतिक दुष्प्रवृति व मानसिकता के कारण भारत का जीता हुआ युध्द भी सदैव पराजित होता रहा है। लगभग वैसी ही स्थिति बांग्लादेश से हो रही घुसपैठ को लेकर हमारे राजनीतिक दलों की हो रही है। विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने तो भारत में रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की कुल संख्या ही घटा कर 15 से 20 लाख बतायी है जिसे विपक्ष ने लोकसभा में सफेद झूठ बताया है। दिल्ली में ही विभिन्न क्षेत्रों में लगभग पांच लाख से अधिक बांग्लादेशी घुसपैठिए निवास करते हैं। मुम्बई, कोलकाता तथा पश्चिमी बंगाल के विभिन्न हिस्सों में राजनेताओं की कृपा दृष्टि से तीस लाख से अधिक बांग्लादेशी बसे हुए हैं। असम के कई जिलों में इन घुसपैठियों के कारण आबादी में (भारतीय व विदेशी घुसपैठियों के बीच) संतुलन का खतरा पैदा हो गया है। राष्ट्रवादी शक्तियां इन अवैध घुसपैठियों से देश में बढ़ते हुए खतरे को लेकर चिन्तित रहती है। परन्तु पूर्वोत्तर राज्यों के राजनेता एकदम से आंख मूंदे हुए हैं । समूचे भारत में लगभग 2.5 करोड बांग्लादेशी निवास करते हैं जिनके कारण भारत में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक (खाद्यान्न सहित) तानाबाना तहस-नहस हो रहा है। देश की एकता व अखंडता निरन्तर खतरे में पडती जा रही है सो अलग।

यह कई बार साबित हो चुका है कि मुस्लिम आतंकवादी पकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई बांग्लादेश के लोगों व जमीन का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए कर रहे हैं । पाकिस्तान से प्रशिक्षित आंतकवादी बांग्लादेश के रास्ते भारत में प्रवेश कर जाते हैं । बांग्लादेश से भारत में आ रहे बांग्ला घुसपैठिए महज रोजी रोटी के लिए भारत की सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। भारत में पकडे गये आतंकवादियों से खुलासा हुआ है कि उन्होंने बांग्लादेश की कई बार यात्रा की है। हमारे राजनेताओं के दब्बूपन और सत्ता के लिए वोट बैंक की राजनीति ने राष्ट्र को एक गम्भीर खतरे की ओर बढा दिया है।

केन्द्र सरकार की ढिलाई के कारण प्रतिदिन 6,000 बांग्लादेशी घुसपैठिए अवैध रूप से भारत की सर-जमीन पर दाखिल हो जाते हैं। भारतीय सुरक्षा बलों के कुछ भ्रष्ट सिपाहियों व अधिकारियों को मात्र हजार पांच सौ रुपये देकर बांग्लादेशियों को भारत की सीमा में चुपचाप दाखिल करवा दिया जाता है। भारत में घुसे इन अवैध घुसपैठियों को फिर भारतीय राजनेताओं का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त हो जाता है तथा भारत में रहने के लिए आवश्यक सभी प्रपत्र फर्जी रूप से तैयार करवा दिये जाते हैं। अवैध घुसपैठियों के कारण भारत के मूल नागरिकों के काम धन्धे पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा हैं ।

भारत में बांग्लादेश से हो रही अवैध घुसपैठ रोकने के लिए सरकार को दृढ़ इच्छाशक्ति से प्रारम्भ में दो काम करने चाहिए-अवैध रूप से भारत में रहने वालों को वापस खदेडा जाए तथा बांग्लादेश की पूरी सीमा को कंटीले लोहे के तारों से सील किया जाए वरना तो भारत का एक बडा हिस्सा भारत से पृथक हो जायेगा।

सन् 1800 में अफगानिस्तान व ईरान भारत के ही हिस्से थे किन्तु विदेशी आक्रमणकारियों से उत्पन्न हुए आतंक के कारण ही यह हिस्सा भारत से अलग हो गया। कश्मीर में फैलता आतंकवाद व 1960 से शुरू हुआ माओ आतंक भारत की आंतरिक सुरक्षा को भेदने का निरन्तर प्रयास कर रहा है। 21 वीं शताब्दी में विश्व में दो बडे आतंकवादी हमले हुए है। अमेरिका के पैंटागन और वर्ल्ड सेंटर पर हुआ हमला जिसने अमेरिका जैसी महाशक्ति को हिला कर रख दिया और दूसरा हमला विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र भारत की संसद पर किया गया जिससे पाक प्रायोजिक आतंकवाद बेनकाब हुआ । 1971 में हमारे वीर सैनिकों ने अपना खून बहा कर जिस बांग्लादेश का निर्माण किया वही आज भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या बन चुका है।

2.5 करोड से अधिक बांग्लादेशी भारत की संस्कृति, आंतरिक सुरक्षा व रोजगार में सेंध मार रहे हैं वहीं प्रतिदिन 1,50,000 कुंतल खाद्यान्न चट कर जाते है। परन्तु अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण में तल्लीन हमारे राजनेता इस महत्वपूर्ण समस्या को गम्भीरता से नहीं ले रहे है तथा घुसपैठियों से उत्पन्न हुआ रोग अब नासूर बन चुका है जिसका एक बड़ा ऑपरेशन शीघ्र अतिशीघ्र करना आवश्यक हो गया है। जिसमें बांग्लादेश की सीमा पर 100 प्रतिशत तार बंदी शामिल है।(हिन्दुस्थान समाचार)

Tuesday, 11 September 2007

हिन्दी भाषियों की हत्या, अंग्रेजी की गुलामी!

हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) पर देश का हाल यह है- डा. नताशा अरोड़ा

सावन-भादों के इस मौसम में, जब कजरियों की मधुर लहरियां मधुर रस घोलती हैं, एक ऐसा दिवस आता है जो हमारी पहचान से जुड़ा है। अनेकानेक आयोजनों की तैयारी चल रही है, पत्र-पत्रिकाएं विशिष्ट सामग्री चयन में जुट गई हैं। दूसरी ओर इसी शस्य श्यामला भूमि पर अपनी अस्मिता की प्रतीक राष्ट्र भाषा हिन्दी बोलने वालों की हत्या की जा रही है। ऐसा तो उस क्रूर बर्तानवी शासन ने भी नहीं किया था। ऐसा क्यों हो रहा है? जन-जन की भाषा कहलाने वाली हिन्दी को सहेजने में हम कहां राह भटक गए हैं? उत्तर तो खोजने ही होंगे।

इतिहास सदैव मार्गदर्शन करता है। हर देश की अपनी अनेक बोलियां होती हैं। अपने यहां कहावत भी है, 'कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बदले बानी'। फिर भी प्रत्येक देश की अपनी एक भाषा ऐसी होती है जो उसे एक सूत्र में पिरोए रखती है, जो उसका गौरव, मान-सम्मान होती है। बोलियों की माला के रंग-बिरंगे मनके उसके सौंदर्य में चार चांद तभी लगा पाते हैं जब एक भाषा का सूत्र उसे एक साथ पिरो देता है। हिन्दी भाषा वही सूत्र है जिसने राष्ट्र भाषा पद पर आसीन होने में एक लम्बी यात्रा तय की है। आज समय है कि हम यात्रा की चंद भूली-बिसरी यादों को ताजा करें।

किसी भी देश के लिए अपनी ऐसी भाषा की अनिवार्यता होती ही है जो अधिकांश जन बोलते-समझते हों। जो उस देश की संस्कृति की सूचक हो, उसका अंश हो अर्थात् जिसने उसी भूमि पर जन्म लिया हो। अतीत में हमारी ऐसी ही भाषा संस्कृत थी, जिसकी देवनागरी लिपि इस विशाल भूमि की लगभग सभी स्थानीय भाषाओं-बोलियों में स्वीकृत थी, भले ही उसके स्वरूप स्थानीय रंग लिए हुए थे। बीते युग में संस्कृत भाषा की ऐसी स्वीकृति निर्विवाद ही रही, यहां तक कि आज भी सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति की प्राण वायु संस्कृत साहित्य का विपुल भण्डार ही है। सदियों से देश की राजनीतिक उथल-पुथल के विस्तार में जाना हमारा अभीष्ट नहीं है। मात्र इतनी चर्चा पर्याप्त है कि इस उथल-पुथल के लम्बे कालखण्ड में संस्कृत भाषा शनै: शनै: बोलचाल से दूर होकर केवल ग्रंथों व विशिष्ट वर्ग तक सीमित हो गई। इसी संस्कृत से उपजी-इतिहास से खेलती, नए-नए रूप धारण करती हिन्दी भाषा चलन में आ गई। सदियों के मुस्लिम शासन ने भी इसके रूप-रंग को प्रभावित किया-स्वयं वह भी प्रभावित हुआ एवं उसने यह जाना कि इस भूमि पर बने रहने के लिए भाषाई आधार तो पाना ही होगा और इस तरह हिन्दी-उर्दू दो बहनों की तरह पलने-बढ़ने लगीं। इसका लाभ इस्लामी मतांतरणवादी प्रवृत्तियों को भी मिला। यह भारत का दुर्भाग्य ही था कि धीरे-धीरे अशिक्षा का अंधकार गहराता गया, जिसकी काली चादर के नीचे परम्परा के नाम पर कुप्रथाओं व कुरीतियों की विद्रूपताएं पैर पसारती चली गईं। परिणामत: मतांतरण फलता-फूलता रहा।

फिर समय आया एक नए ऐतिहासिक मोड़ का, जब पश्चिम दिशा से ईसाई मिशनरियों ने पूर्व की ओर रुख किया। यूरोप में औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप आए राजनीतिक व आर्थिक बदलाव भी इन मिशनरियों के लिए वरदान साबित हुए। अपने पंथ के प्रचार हेतु सर्वप्रथम उन्हें एक ऐसी भाषा की आवश्यकता पड़ी जिसके माध्यम से एक प्राचीन स्थापित संस्कृति में घुसपैठ की जा सकती थी। औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप छापेखाने खुल चुके थे। तब भारत में इतनी विभिन्नताओं के बीच भी सर्वाधिक बड़े भू-भाग में जानी-समझी जाने वाली जो भाषा उन्हें मिली, वह हिन्दी थी।

हिन्दी भाषा की इसी शक्ति का प्रभाव अन्य क्षेत्रों में भी दिखता है। उन्नीसवीं सदी भारत में समाज सुधार आन्दोलनों की सदी भी रही। यह काल सामाजिक पुनर्जागरण का काल था जब राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, गोपाल कृष्ण गोखले जैसे समाज सुधारकों ने कुरीतियों, अशिक्षा व अंधविश्वासों की दलदल को दलना आरम्भ किया। ये सभी हिन्दीभाषी नहीं थे किन्तु इतना जानते थे कि किसी भी राष्ट्र का चिंतन, किसी भी राष्ट्र का जीवनदर्शन या जीवन जीने की कला व उसकी अपनी विशिष्ट संस्कृति, उसकी अपनी भाषा से ही पुष्पित-पल्लवित होती है। वह जान रहे थे कि समाज सुधार की बातों व भावों को जन सामान्य के हृदय में उतारने के लिए देश की सर्वमान्य भाषा ही सक्षम है, आक्रान्ताओं की भाषा नहीं। भाषा की सरलता, बोधगम्यता व विशाल भू-भाग पर बोलने--समझने वाली भाषा की शक्ति हिन्दी के ही पास है। तब उनके नेतृत्व में अनेक संस्थाओं द्वारा हिन्दी भाषा के माध्यम से वैचारिक आन्दोलनों की नई प्राणवायु भारतीय समाज को प्राप्त हुई। अन्य अहिन्दीभाषी विद्वज्जन यथा-केशव चन्द्र, महादेव गोविन्द रानाडे, बाल गंगाधर तिलक, महर्षि अरविंद, कस्तूरी रंगायंगर, सुब्रह्मण्यम अय्यर आदि भी पीछे न रहे और इन्होंने अपने सद्प्रयासों से हिन्दी का सम्मान स्थापित किया, उसे प्रतिष्ठा दिलवाई।

उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी देश के स्वतंत्रता आन्दोलन का चरमकाल थी। हिन्दी ने एक ओर जहां मिशनरियों को प्रभावित किया, सुधार आन्दोलनों की शक्ति बनी, वहीं उस शक्ति ने स्वतंत्रता आन्दोलन को उसके लक्ष्य तक पहुंचा कर स्वाधीन भारत की नींव भी रखी। इस काल में क्रांतिकारी गतिविधियां तीव्रता पकड़ रही थीं, जिनमें अनेक प्रमुख देशप्रेमी अहिन्दीभाषी क्षेत्रों के भी थे। विशेषकर विनायक दामोदर सावरकर, बाल गंगाधर तिलक, रास बिहारी बोस, विपिन चंद्र पाल, मानवेन्द्र नाथ राय, लाल लाजपत राय, सरदार भगत सिंह, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चन्द्र चाकी, चिदम्बरम् पिल्लै और अब्दुल गनी।

कौन नहीं जानता कि महात्मा गांधी, जो गुजरात में जन्मे थे, हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के सबसे बड़े हिमायती थे। ऐसा नहीं था कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा पद पर आसीन करने का निर्णय यूं ही ले लिया गया था। भारत की तत्कालीन बौध्दिक मनीषा ने अनेकानेक वैचारिक मंथन प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद भली प्रकार विचार करके देश के समग्र हित में हिन्दी को राष्ट्र भाषा पद पर प्रतिष्ठित किया। यही वह सूत्र था जिसने देश को एकता में बांधा, यही वह माध्यम था जिसने अपूर्व प्रेरणा व जागृति उत्पन्न की। इस भाषाई यात्रा में अनेक अहिन्दीभाषी मनीषी सहयोगी बने-सुनीति कुमार, खान अब्दुल गफ्फार खां (सीमांत गांधी), मौलाना आजाद, विनोबा भावे, राजगोपालाचारी, सुचेता कृपलानी, सरोजिनी नायडु, पुलिन बनर्जी, पूर्णिमा बनर्जी, मशरूवाला, डा. जाकिर हुसैन, डा.राधाकृष्णन, न्यायमूर्ति कृष्णास्वामी, न्यायमूर्ति शारदा चरण मित्र आदि। हिन्दी की इस यात्रा के सूत्रधार भली प्रकार जानते थे कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की इन पंक्तियों, 'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल' में कितनी सच्चाई है।

आज हम अपनी स्वतंत्रता की साठवीं वर्षगांठ मना रहे हैं। देश ने इन वर्षों में प्रगति न की हो ऐसा भी नहीं है। किन्तु शर्मनाक बात यह भी है कि स्वतंत्र भारत में भी अंग्रेजी की गुलामी हम नहीं छोड़ पाए हैं। आज भारत का शिक्षित वर्ग अपनी गरिमा को खोकर जिस प्रकार अंग्रेजी के पीछे दौड़ रहा है, वह देखकर पीड़ा होती है। त्रासदी तो यह भी है कि स्वयं हिन्दी भाषी भी हिन्दी का अपमान कर रहे हैं। साठ वर्षों से राष्ट्र भाषा के प्रचार-प्रसार पर करोड़ों रुपए का व्यय तो हो रहा है, वांछित फल नहीं प्राप्त हो रहा, क्योंकि सब कुछ सतही है। (पांचजन्य)

Saturday, 8 September 2007

साम्यवादी चीन के खूनी जबड़ों में फंसे तिब्बत की गुहार- 2


तिब्बत के प्रश्न को सुलझाना ही होगा : इन्द्रेश कुमार

तिब्बत का प्रश्न अब उस मोड़ पर पहुँच गया है जहां यदि हम ठीक ढंग से प्रयास करें तो उसे उसकी निर्णायक परिणति तक पहुँचाया जा सकता है। लेकिन प्रश्न यह है कि भारत सरकार इसमें अपनी भूमिका ठीक ढंग से अदा करती है कि नहीं ? आज इतने सालों के बाद यदि हम तिब्बत आंदोलन पर समग्रता से विचार करें तो इसके तीन पड़ाव स्पष्ट दिखाई देते हैं। 1959 में दलाईलामा तिब्बत से भारत में आए थे। पंडित नेहरू के सुझाव पर दलाईलामा ने कुछ साल चीन के साथ निभाने का प्रयास भी किया क्योंकि चीन ने तिब्बत पर कब्जा तो 1949-50 में ही कर लिया था । 1949 से लेकर 1959 तक का यह 10 साल का कालखंड तिब्बत के इतिहास का विनाशकारी और निराशाजनक कालखंड है। एक शक्तिशाली पड़ोसी देश चीन तिब्बत को निगल रहा था और दुनिया चुपचाप उसे देख रही थी। तिब्बत के गुलाम हो जाने से सबसे ज्यादा नुकसाना भारत को ही होने वाला था लेकिन भारत सरकार केवल चुप नहीं रही बल्कि दलाईलामा को भी चुप रहकर येनकेन प्रकारेण माओ के साथ तालमेल बनाने की सलाह देती रही। पंडित नेहरू को शायद इसमें कुछ अटपटा नहीं लग रहा होगा। क्योंकि वे उस कालखंड में स्वयं भी माओ से तालमेल बिठाने का हर प्रयास कर रहे थे। वैसे इधर जो नए दस्तावेज मिल रहे हैं उनसे ऐसा आभास भी मिलता है कि पंडित नेहरू चीन के खतरे को पहचान तो रहे थे लेकिन उसका सामना करने में वे स्वयं को विवश अनुभव कर रहे थे। उनकी इस विवशता या फिर चीन पर उनके विश्वास ने भारत और तिब्बत दोनों को ही घायल किया। तिब्बत के इतिहास का यह कालखंड यदि श्रीगुरूजी माधवराव सदाशिव गोलवलकर के शब्दों में कहा जाए तो तिब्बत के साथ विश्वासघात का कालखंड है।

दूसरा कालखंड 1959 से शुरू होता है जब दलाईलामा को तिब्बत से भारत में आकर शरण लेनी पड़ी। उनके साथ उनके हजारों अनुयायी भी थे। भारत ने दलाईलामा को शरण तो दी लेकिन किसी प्रकार की भी गतिविधियों की उन्हें अनुमति नहीं दी। 1962 को भरत के इतिहास का भी और तिब्बत के इतिहास का भी टर्निंग प्वाइन्ट कहा जा सकता है। चीन के आक्रमण के कारण भारत का मोह तो उससे टूटा ही साथ ही पंडित नेहरू को इस बात का पता भी चल गयाकि चीन के बारे में दलाई लामा का आकलन सही था और उनका अपना गलत । इसमें एक बात और जोड़नी जरूरी है कि इस संपूर्ण कालखंड में तिब्बत के लोगों को भारतीयों का भरपूर समर्थन प्राप्त होता रहा। देशों के इतिहास में अनेक बार ऐसा कालखंड भी आता है जब लोकतांत्रिक व्यवस्था के बावजूद किसी प्रमुख प्रश्न पर सरकार की राय उत्तरी धु्रव की होती है और जनता की राय दक्षिणी ध्रुव की होती है । भारत के इतिहास में तिब्बत का प्रश्न ऐसा ही प्रश्न कहा जाएगा। लेकिन 1962 के बाद दलाईलामा को भारत सरकार ने कम से कम इस बात की अनुमति तो दे ही दी कि वे भारत में रहकर तिब्बती स्वतंत्रता आंदोलन को चला सकते हैं। चाहे यह अनुमति प्रत्यक्ष रूप से नहीं थी परंतु अप्रत्यक्ष रूप से सरकार को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती सरकार ने एक भरी पूरी सरकार का रूप ही अख्तयार कर लिया था। इस कालखंड में भारत के लगभग तमाम राजनैतिक दलों का तिब्बती स्वतंत्रता आंदोलन को भरतपूर समर्थन मिला। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनसंघ की इसमें अग्रणी भूमिका रही। संघ के उस समय के सरसंघचालक माधवराव सदाशिव गोलवलकर और भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष आचार्य रघुवीर तिब्बत के प्रश्न को देश की विदेश नीति में प्रमुख स्थान पर ले आए थे। समाजवादी भी अपने ढंग से इस प्रश्न को लेकर भारत की जनता के बीच जा रहे थे। राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण का स्मरण यहां करना उचित होगा ।

आपात्स्थिति के बाद ऐसा कालखंड आया जिसमें सरकारों ने एक बार फिर चीन के साथ अच्छे संबंध बनाने के नाम पर बीजिंग में दस्तख देनी शुरू कर दी। इधर दलाईलामा भी भारत सरकार का पूरा समर्थन न मिलते देखकर मध्यमार्ग अपनाने के लिए विवश हुए । अलबत्ता मध्यमार्ग से इतना लाभ अवश्य हो सकता था कि भारत सरकार यदि चाहती तो उसे तिब्बत का खुलकर समर्थन करने का एक अवसर प्राप्त हो गया था। लेकिन दुर्भाग्य से भारत सरकार ने इस अवसर का भी लाभ नहीं उठाया । अलबत्ता उसकी चीन के साथ सामान्य संबंध बनाने की इच्छा जरूर तेज होती गई और यह सब तब हो रहा था जब चीन पहले की तरह पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को घेरने की अपनी कोशिशों में जी-जान से जुटा हुआ था। उसने 1962 में भारत पर आक्रमण भी इसलिए किया था ताकि उसे सबक सिखाया जा सके और नेतृत्व की उसकी इच्छा का उपहास उडाया जा सके। 21वीं शताब्दी में भी चीन उसी रास्ते पर चल रहा है और भारत सरकार एक बार फिर पंडित नेहरू के रास्ते पर ही चल पड़ी है। खुदा का शुक्र है कि अभी तक साऊथ ब्लॉक में हिंदी चीनी भाई -भाई के नारे लगने शुरू नहीं हुए है। इस मरहले पर जार्ज फर्नांडिस ने जब यह कहा था कि चीन हमारा शत्रु नम्बर एक है तो वह असलियत से ही पर्दा उठा रहे थे। पर जो लोग असलियत को ढकना चाहते है उन्होंने जल्दी-जल्दी उस पर फिर पर्दा डालना शुरू कर दिया। परंतु पिछले लगभग 10 सालों से तिब्बत का प्रश्न एक बार फिर देश की मुख्य कार्यसूची में शामिल हो रहा है। भारत-तिब्बत सहयोग मंच इसमें प्रमुख भूमिका निभा रहा है। उसने हाशिये पर चले गए इस प्रश्न को फिर देश की जनता के सम्मुख रखा है और नीति निर्धारकों को तिब्बत के प्रश्न से दाएं-बाएं भागने से रोकने का प्रयास किया है। यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तिब्बत की गुलामी से कैलाश मानसरोवर भी गुलाम हो गया है। कैलाश मानसरोवर करोड़ों हिन्दुओं, सिखों और बौध्दों की श्रध्दा भूमि है। चीन के इतिहास में कैलाश मानसरोवर कहीं नहीं है। जबकि भारत और तिब्बत का इतिहास कैलाश मानसरोवर के बिना अधूरा है । भारत सरकार तिब्बत के प्रश्न को अपनी विदेश नीति का मुख्य मुद्दा बनाना चाहिए। तिब्बत को स्वतंत्र कराना भारत का दायित्व है, क्योंकि तिब्बत उस मूल सांस्कृतिक प्रवाह का अंग हैजिससे भारत भी उत्प्लावित हो रहा है।