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Wednesday 29 August 2007

मदनी अब्दुल नसीर है कांग्रेस और सीपीएम के नये नायक

-डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री का व्यक्तित्व बहुआयामी हैं। वे वरिष्ठ पत्रकार हैं। राजनीतिक विश्लेषक हैं। लेखक हैं। सामाजिक कार्यकर्ता हैं। राष्ट्रवादी आंदोलन के सिपाही हैं। आप तिब्बत की स्वाधीनता के लिए देश भर में अलख जगा रहे हैं। आपकी लेखनी जहां सत्यम् शिवम् सुंदरम् के लिए समर्पित है वहीं छद्म धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े नेताओं-तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं, आतंकवादियों पर कड़ा प्रहार करती है। डा. अग्निहोत्री ने निम्न लेख में बहुत ही कुशलतापूर्वक कांग्रेस-कम्युनिस्ट और आतंकवादियों के गठजोड़ को बेनकाब किया है और इसे देश के लिए खतरनाक बताया है।

कोयम्बटूर की एक विशेष अदालत ने अब्दुल नसीर मदनी को रिहा कर दिया है। उन पर 14 फरवरी 1998 में कोयम्बटूर में हुए बम धमाकों की साजिश का आरोप था। इन धमाकों में 58 लोगों की मौत हो गई थी। आरोप इतने गंभीर थे और मामला इतना संवेदनशील था कि पिछले 9 सालों से जेल में बंद मदनी अनेक अदालतों में जमानत की गुजार लगाते रहे। लेकिन 2005 में सर्वोच्च न्यायालय तक ने उसकी जमानत की अर्जी को खारिज कर दिया था। ऐसा प्राय: कम मामलों में ही होता है लेकिन जब सर्वोच्च न्यायाल भी लंबे अरसे से रिमांड पर ही जेल में रह रहे अपराधी की जमानत याचिका खारिज कर दे तो मान लेना चाहिए आरोप गंभीर भी है और तथ्यपरक भी।

लेकिन मदनी निर्दोष छूट गए है। इससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि इससे पहले भी जेसिका लाल हत्याकांड केस में मनु शर्मा निर्दोष करार दिए गए थे। प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड में संतोष सिंह निर्दोष करार दिए गए थे। यदि मदनी इसी परंपरा मे निर्दोष पाए जाते तो शायद इसको लेकर किसी को आश्चर्य भी न होता लेकिन मदनी के निर्दोष पाए जाने का जो खुलासा केरल सीपीएम के सचिव ने किया है वह चौंकाने वाला है। कन्नूर में संवाददाताओं से मदनी के जेल से छूटने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए सीपीएम के सचिव विजयन ने रहस्योद्धाटन किया कि मदनी की रिहाई केरल और तमिलनाडु में सरकारों के बदलने के कारण ही संभव हो पाई है। इसका अर्थ यह हुआ कि तमिलनाडु सरकार और केरल सरकार ने न्यायालय के निर्णय को प्रभावित किया है। ऐसा नहीं है कि इस देश में राजनैतिक दल और राजनैतिक पुरुष न्यायालय के निर्णय को प्रभावित नहीं करते। मनु शर्मा और संतोष सिंह का किस्सा ऐसा ही है । लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है किसी राजनैतिक दल ने खुलेआम इस बात की घोषणा की हो कि सरकार के बदलने के कारण किसी अपराधी की रिहाई संभव हो पाई है। यह ठीक है कि केरल में कांग्रेस और सीपीएम दोनों ही एक लंबे अरसे से मदनी को छुड़ाने की जुगते बिठा रहे थे। जहां तक कि इन दोनों दलों ने मिलकर मदनी की रिहाई के लिए 2005 में विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव भी पारित किया था। विजयन कहते हैं कि रिमांड पर जेल पर रहने का मदनी का किस्सा करोड़ों में से एक है। लेकिन वे यह नहीं बताते कि विधानसभा द्वारा किसी अपराधी को मुक्त करवाने के लिए प्रस्ताव पारित करने का किस्सा भी करोड़ों में से एक ही है।

यदि इन बातों को गंभीरता से लिया जाए और इसे लेना भी चाहिए क्योंकि सीपीएम पार्टी केरल में राज्य कर रही है और केन्द्र में राज्य करने वालों को ऑक्सीजन मुहैया कर रही है। तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कडगम भी केन्द्र की यूपीए सरकार का हिस्सा है। इसका अर्थ यह हुआ कि मदनी की रिहाई में डीएमके सरकार और केरल की साम्यवादी सरकार ने पर्दे के पीछे से महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। जज को डराया धमकाया होगा ऐसा तो कोई नहीं कह सकता। क्योंकि न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास अभी भी अडिग है। लेकिन अब इतना तो मानना ही पड़ेगा कि डीएम सरकार ने मदनी का केस ही कचहरी में इस ढंग से प्रस्तुत किया होगा कि न्यायाधीश के पास उसको छोड़ने के अलावा और कोई चारा न रहे। कचहरियों में ऐसा पहले भी होता रहा है जब न्यायाधीश ने स्वयं ही कहा कि वे जानते हैं कि छूटने वाला अपराधी पाक साफ नहीं है लेकिन जांच करने वाली एजेंसी यदि उसके खिलाफ सबूत प्रस्तुत नहीं करेगी तो यह काम न्यायपालिका स्वयं तो नहीं कर सकती। तमिलनाडु के अध्यक्ष गणेशन ने ठीक ही कहा है, 'इस निर्णय के लिए न्यायापालिका को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। सरकार ने ही मदनी के खिलाफ कमजोर केस तैयार किया और उसके छूटने का रास्ता साफ कर दिया।

प्रश्न है मदनी केरल की राजनीति में इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए हैं? उसका प्रमुख कारण यह है कि उन्होंने केरल में कट्टरवादी मुस्लिम आतंकवाद को जन्म दिया है। उन्होंने 1980 में इस्लामी संघ की स्थापना की । जब सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया तो उसने उसके स्थान पर पीडीपी नामक राजनैतिक दल की स्थापना कर दी। वह मुसलमानों ने यह विश्वास दिलाने को कामयाब हो गया कि हिन्दुस्तान में दारूल हरब है। यानि उन लोगों का साम्राज्य जो ईश्वर की नजरों में अच्छे लोग नहीं है। इसलिए इस क्षेत्र में दारूल इस्लाम की स्थापना करना हर मोमिन का फर्ज है और यह ऐसा काम है जो उसे अल्लाह ने सौंपा है। इस फर्ज को अदा करने पर हर मोमिन जन्नत नसीब होगी और जन्नत में उसे क्या मिलेगा यह हर मोमिन पहले से ही जानता है। लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं है। इसके लिए हथियार उठाना पड़ता है और दुर्भाग्य से मदनी के कहने पर केरल में मोमिनों न हथियार उठा लिए। मदनी पर आरोप था कि कोयम्बटूर के जिस बम विस्फोट में 58 लोग मारे गए उसको अंजाम देने वाले अलउम्मा के सदर एस.ए. बाशा और उसके अनुयायियों के तार मदनी से जुड़े हुए थे और मदनी ने ही उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था की थी। यह प्रशिक्षण बौध्दिक भी था और हथियारों का भी। जाहिर है दारूल इस्लाम की खोज में मदनी के सैनिक तिरुवनंतपुरम की ओर से तमिल प्रदेश की ओर चल पड़े थे। न्यायालय में मदनी का दोष सिध्द नहीं हो पाया, यह अलग बात है, लेकिन इस पूरे आंदोलन में मदनी ने यह अरसा पहले ही सिध्द कर दिया था कि केरल के मुसलमानों के वोट उसकी झोली में है। वह जिसके पक्ष में चाहेगा उसके पक्ष में यह झोली उलटा सकता है। यह अलग बात है कि बंबों से खेलते खिलाते एक बम विस्फोट में उसकी अपनी एक टांग भी उड़ गई थी। परंतु मदनी जानता है कि भारत में दारूल इस्लाम की स्थापना के लिए खुदा के दरबार में यह भेंट तुच्छ ही मानी जाएगी। इसलिए वह दूसरे नायाब ताहफों की तलाश में रहता है। 1998 में जब केरल सरकार ने मदनी को राज्य में अशांति फैलाने के आरोप में गिरतार कर लिया तो मदनी ने चुनावों में अपनी शक्ति दिखा दी और अगले चुनावों में मुसलमानों के वोट न मिलने कारण कांग्रेस पिट गई। केरल में अब कांग्रेस और सीपीएम दोनों को ही मुसलमानों के वोटों की चिंता है। इसलिए मदनी को रिझाने में लगे हुए हैं। वैसे एक दृष्टि से देखा जाए तो कांग्रेस और सीपीएम मुस्लिम आतंकवादियों को रिझाने का प्रयोग पूरे देश में ही एक सोची समझी रणनीति के तहत कर रही है। कश्मीर से सेना वापिस बुलाई जा रही है। पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने का सांझा साथी घोषित किया जा रहा है। अफजल गुरु को फांसी के फंदे से लगभग उतार ही दिया गया है उसके लिए जम्मू कश्मीर के कांग्रेसी मुख्यमंत्री की भूमिका काबिले गौर है। अलबत्ता मदनी की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उसने स्वयं स्वीकार कर लिया है कि वह मुसलमानों की कट्टरपंथी नीति से जुड़ा रहा है और उससे गल्तियाँ भी हुई है। लेकिन उसे यह नहीं मालूम की उसकी इन गलतियों में 58 लोगों की जान चली गई है। कांग्रेस और सीपीएम के लिए इस देश के नायक अफज़ल गुरु है, सोहराबुद्दीन है, प्रो. गिलानी है और अब अब्दुल नसीर मदनी है। बाकी देश में तो ये दोनों दल यह रणनीति मानवाधिकारों के नीचे चला रहे हैं लेकिन केरल में दोनों ने वह लोक लाज भी त्याग दी है और सीधे-सीधे मदनी के पक्ष में उतर आए हैं। सीपीएम और कांग्रेस की दृष्टि में इस देश के दुश्मन वे सैनिक है, वे सिपाही है और वह जांबाज जनता है जो आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो रही है। जो कहीं बच भी जाते हैं तो वे आतंकवादियों के मानवाधिकार हनन केस में जेल भेज दिए जाते हैं। बन्दे मातरम कहने वाले जेल में है और मदनी जेल से बाहर है। केरल में कांग्रेस और सीपीएम मिलकर मदनी के लिए वंदनबार सजा रहे हैं। उसके आगे कोर्निश कर रहे हैं माथे पर कार्ल मार्क्स का चित्र लगाकर हाथ में लाल झंडा लेकर मदनी के विजयोत्सव में नाच-नाच कर पसीने से सराबोर हो रहे हैं। लेकिन देश के सामने एक बहुत बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या तमिलनाडु की सरकार मदनी को रिहा करने के विशेष न्यायालय के इस निर्णय के खिलाफ अगले न्यायालय में अपील दायर करेगी या नहीं? या फिर वह भी केरल के साम्यवादी और कांग्रेसियों की तरह मदनी के विजयोत्सव में हिजडों की तरह नाच-नाच कर अपनेर् कत्तव्य की इतिश्री मान लेगी। (हिन्दुस्थान समाचार)

3 comments:

Shrish said...

मदनी जैसे गद्दारों का समर्थन करने वाले लोग उससे कम गद्दार नहीं। ऐसे सभी लोगों पर देशद्रोह का मुकद्दमा चलाया जाना चाहिए।

संजय तिवारी said...

ठीक विषय उठाये हैं.

babu123 said...

madni jaise logo ko fansi ki saza deni chahiye