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Thursday, 26 July, 2007

कम्युनिज्म पर जयप्रकाश नारायण के विचार- 6



दुनिया भर के प्रमुख विचारकों ने भारतीय जीवन-दर्शन एवं जीवन-मूल्य, धर्म, साहित्य, संस्कृति एवं आध्यात्मिकता को मनुष्य के उत्कर्ष के लिए सर्वोत्कृष्ट बताया है, लेकिन इसे भारत का दुर्भाग्य कहेंगे कि यहां की माटी पर मुट्ठी भर लोग ऐसे हैं, जो पाश्चात्य विचारधारा का अनुगामी बनते हुए यहां की परंपरा और प्रतीकों का जमकर माखौल उड़ाने में अपने को धन्य समझते है। इस विचारधारा के अनुयायी 'कम्युनिस्ट' कहलाते है। विदेशी चंदे पर पलने वाले और कांग्रेस की जूठन पर अपनी विचारधारा को पोषित करने वाले 'कम्युनिस्टों' की कारस्तानी भारत के लिए चिंता का विषय है। हमारे राष्ट्रीय नायकों ने बहुत पहले कम्युनिस्टों की विचारधारा के प्रति चिंता प्रकट की थी और देशवासियों को सावधान किया था। आज उनकी बात सच साबित होती दिखाई दे रही है। सच में, माक्र्सवाद की सड़ांध से भारत प्रदूषित हो रहा है।

आधुनिक भारत के इतिहास में संपूर्ण क्रांति के उद्धोषक, 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' के प्रतीक, जननायक तथा युगद्रष्टा जयप्रकाश नारायण भारतीय विचारकों तथा चिंतकों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनके विचारों से जनमानस आंदोलित हुआ, जिसके दूरगामी परिणाम हुए। साथ ही वे महान स्वतंत्रता संनानी तथा संगठक भी थे। ब्रिटीश सरकार उन्हें सबसे खतरनाक व्यक्ति मानती थी। मोहम्मद करीम छागला के शब्दों में-'वे भारत में दूसरी आजादी के जनक थे।

सामान्यत: जयप्रकाशजी के विचारों को पांच सोपानों में बांटा जाता है। ये है- कट्टर माक्र्सवादी, समाजवादी, गांधीवादी, सर्वोदयवादी, तथा समग्र क्रांतिकारी।

यद्यपि जयप्रकाश नारायण का माक्र्सवाद के प्रति मोह समाप्त नहीं हुआ, परंतु माक्र्सवाद की अनेक कमियां उनके मन को कचोटने लगी। फलत: वे शनै:-शनै: माक्र्सवाद से दूर होते गए। उसके कई कारण रहे।

पहले, उन्होंने देखा कि भारतीय कम्युनिस्टों का यहां के राष्ट्रीय आंदोलन में कोई योगदान नहीं है। न ही उन्होंने सविनय आंदोलन में कोई योगदान दिया, न ही अगले आंदोलनों में।

दूसरे, यहां की कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्रता की पक्षधर नहीं है, बल्कि सोवियत संघ के निर्देशन में कार्य करती है।

तीसरे, जयप्रकाश नारायण भारतीय कम्युनिस्टों के हिंसात्मक साधनों के पक्षपाती नहीं थे।

चौथे, जयप्रकाश ने अपने निष्कर्षों तथा विश्लेषणों द्वारा स्पष्ट किया कि सोवियत संघ या चीन की सफलताओं का श्रेय साम्यवादियों की क्रांति को नहीं दिया जा सकता। वे रूस की सफलता का कारण प्रथम विश्वयुध्द तथा चीन की सफलता का रहस्य द्वितीय विश्वयुध्द को मानते थे। उनका मत था कि यदि ये युध्द न होते तो इनकी क्रांतियां दबा दी जातीं।

पांचवें, जयप्रकाश नारायण रूस में स्टालिन को भारी भूल मानते थे। उनका मत था कि जर्मनी में हिटलर की ताकत मजबूत होने के लिए स्टालिन तथा अंतरराष्ट्रीय संगठन दोषी हैं।

छठे, उनका मत था कि क्रेमेलिन के निर्देशन में कार्य करने वाले विभिन्न देशों के साम्यवादी गलत मार्ग का अनुसरण करते रहे हैं। इससे उनके अपने देश की उपेक्षा होती रही है।

सातवें, जयप्रकाश नारायण साम्यवादियों से सदैव आशंकित रहते थे तथा उनकी निष्ठा पर संदेह रहता था। 1957 के चुनावों के पश्चात् एक पत्र में अपने साथियों को उन्होंने लिखा कि विश्व के साम्यवादियों ने किस प्रकार माक्र्सवाद को तोड़ा मरोड़ा है।

आठवें, वे रूसी ढंग के सर्वाधिकारी अधिनायकवाद को भारत के लिए अनुचित मानते थे।

"History will soon prone that Communism instead of being the final flowering of human civilisation, was a temporary aberration of the human mind, a brief nightmare to be soon forgotten Communism, as it grew up in Russia and in growing up in china now, rather the darkness of the soul and imprisonment of the mind, colossal violence and injustice. It is not the cold war or the economic war that will spell the ultimate defeat of Communism, it is rather, the working of the human sprit."
-Jay Prakash Narayan

5 comments:

Shrish said...

अच्छा लेख, कम्युनिज्म जैस‌े बेकार स‌िद्धान्त के पैराकारों को शायद इससे कुछ स‌मझ आए।

Sanjeet Tripathi said...

आभार!!

sanjay tiwari said...

शोधपूर्ण लेखन.

Isht Deo Sankrityaayan said...

च-च! कम्युनिज्म से इतना भय! अरे भाई कम से कम कहने के पहले तथ्यों की पड़ताल तो कर ली होती. राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के आंदोलन का थोडा इतिहास तो जान लिया होता. अगर जे पी मैंने पढा न होता तो यकीन मानिए मेरे पास कोई चारा न होता सिवा यह मानने के कि जे पी भी संघ के स्वयम सेवकों की तरह पढना-लिखना बुरा मानते थे.

anjani said...

are bhai sankrityayan,communist bewakoofo ki parhai likhai kaisi hai yah janane ki jaroorat nahi hai.lenin aur marx ke pichhlagguon ne jo gul khilaye hain uski mishal kewal deshdroh se di ja sakti hai.1942 ke bharat chodo andolan ka itihas padh lijiye.m.n roy angrejo se 13000 rupaya har mahine deshdroh ki keemat le rahe the.