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Tuesday, 26 August, 2008

भाजपा की विचारधारा-पंचनिष्ठाएं


लेखक- प्रो ओमप्रकाश कोहली

भारतीय जनता पार्टी आज देश की प्रमुख विपक्षी राजनीतिक पार्टी हैं। सात प्रांतों में भाजपा की स्वयं के बूते एवं 5 राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकारें है। 6 अप्रैल, 1980 को स्थापित इस दल ने अल्प समय में ही देशवासियों के बीच अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। पहले, भाजपा के विरोधी इसे ब्राह्मण और बनियों की पार्टी बताते थे लेकिन आज भाजपा के ही सर्वाधिक दलित-आदिवासी कार्यकर्ता सांसद-विधायक निर्वाचित है। इसी तरह पहले, विरोधी भाजपा को उत्तर भारत की पार्टी बताते थे और कहते थे यह कभी भी अखिल भारतीय पार्टी नहीं बन सकती है। वर्तमान में भाजपा ने दक्षिण भारत में भी अपना परचम फहरा दिया है। भाजपा में ऐसा क्या है, जो यह जन-जन की पार्टी बन गई हैं, बता रहे है भाजपा संसदीय दल कार्यालय के सचिव प्रो। ओमप्रकाश कोहली। पूर्व सांसद श्री कोहली दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। निम्न लेख को हम यहां पांच भागों में प्रकाशित करेंगे। प्रस्तुत है पहला भाग-

भारतीय जनता पार्टी और पूर्ववर्ती जनसंघ अन्य राजनैतिक दलों से अपनी अलग पहचान रखते हैं। यह पहचान राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता के प्रति उनके आग्रह के कारण है। जहां साधारणतया अन्य राजनैतिक दलों का उद्देश्य राजसत्ता प्राप्त करना है, वहीं भारतीय जनता पार्टी सत्ता को वृहत उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन मानती है। वह वृहत् उद्देश्य है सामाजिक और राष्ट्रीय पुनर्रचना। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जो स्वप्न देखा गया था वह अभी अधूरा पड़ा है। अधूरे सपने को पूरा करना भारतीय जनता पार्टी अपना उद्देश्य मानती है। सामाजिक- राष्ट्रीय पुनर्रचना के उद्देश्य की पूर्ति तभी संभव है जब पार्टी उच्च निष्ठाओं, सिध्दान्तों और आग्रहों को लेकर चले।


भारतीय जनता पार्टी के कार्य की प्रेरणा पार्टी संविधान में उल्लिखित पंच निष्ठाएं हैं:



राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता
लोकतंत्र
गांधीवादी दृष्टिकोण पर आधारित
समतामूलक समाज की स्थापना
सकारात्मक पंथनिरपेक्षता
मूल्य आधारित राजनीति
राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता
भारत जैसे विशाल और विविधतायुक्त देश को बांधाने वाले तत्‍व क्या हैं? क्या एक शासन सत्ता देश को एक सूत्र में बांध सकती हैं?क्या संपूर्ण देश में एक संविधान और शासन होना एकता की गारंटी हो सकती है? क्या सुस्पष्ट भौगोलिक सीमाओं में बंधा होना अथवा भौगोलिक इकाई होना एकता की गारंटी हो सकती है? ये तत्व राष्ट्र की एकता के पोषक या सहायक तो हो सकते हैं राष्ट्रीय एकता के मूल अधिष्ठान नहीं हो सकते। मूल अधिष्ठान तो इस विविधातायुक्त देश में रहने वाले जन की प्रकृति चिति, या जीवन-पध्दति है जिसे आमतौर पर संस्कृति कहा जाता है। दीनदयाल उपाध्‍याय जी का कथन है कि 'व्यक्ति की भांति राष्ट्र की भी अपनी आत्मा होती है। उस आत्मा के अस्तित्व के कारण ही सारा राष्ट्र एकात्म बनता है। राष्ट्र की उस आत्मा को हमारे शास्त्रकारों ने ''चिति'' कहा है। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक ''चिति'' होती है। ''चिति'' ही राष्ट्रीयता का चिह्न है। इसी ''चिति'' के कारण प्रत्येक राष्ट्र की संस्कृति को भिन्न व्यक्तित्व प्राप्त होता है। साहित्य, कला, धर्म, भाषा, सब इसी ''चिति'' की अभिव्यक्तियां हैं।' जाति, पंथ, भाषा आदि की विविधता होते हुए भी समान संस्कृति विविधतायुक्त भारत को एक सूत्र में बांधाने वाला तत्‍व है। भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रवाद की कल्पना न कोरी राजनीतिक कल्पना है, न संवैधानिक कल्पना, न भौगोलिक कल्पना यह सांस्कृतिक कल्पना है। इस कल्पना पर आधारित राष्ट्रवाद ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। भारतीय जनता पार्टी के कार्य के विभिन्न आयाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरणा ग्रहण करते हैं।

देश में ऐसी बहुत सी शक्तियां है जिनकी मान्यता उक्त मान्यता से भिन्न है। वे मानते हैं कि भारत बहुसंस्कृतियों वाला देश है, इसलिए यह बहुराष्ट्रीयताओं का देश है। कांग्रेस के कुछ तत्तवों और वामपंथी तत्वों के ऐसे ही विचार है। भारतीय जनता पार्टी को यह विचार सर्वथा अस्वीकार्य है।


हम इस वास्तविकता की उपेक्षा नहीं कर सकते कि द्विराष्ट्रवाद की संकल्पना ने देश का विभाजन किया। जिन्ना, मुसलिम लीग और उसके अनुयायियों की यह मान्यता थी कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग सभ्यताएं हैं और इसलिए ये दोनों समुदाय अलग-अलग राष्ट्र हैं। केवल एक भौगोलिक इकाई का हिस्सा होने मात्र से वे एक राष्ट्र नहीं हो जाते। इसमें से द्विराष्ट्र - हिन्दू राष्ट्र - मुस्लिम राष्ट्र - का विचार बल पकड़ता गया। परिणाम हुआ देश का विभाजन। देश के विभाजन ने हिन्दू-मुसलिम समस्या का समाधान नहीं किया। द्विराष्ट्रवादी या बहुराष्ट्रवादी सोच स्वतंत्रता के बाद भी जारी है जो बार-बार मुस्लिम तुष्टीकरण, अल्पसंख्यकवाद और वोट बैंक की राजनीति के रूप में प्रतिबिंबित होती है। भारतीय जनता पार्टी इस सोच का बराबर विरोध करती है और अपनी सोच को आग्रहपूर्वक स्थापित करती है कि भारत एक संस्कृति वाला एक राष्ट्र है जिसमें जाति, पंथ, भाषा आदि बहुविधा विविधता दिखायी पड़ती है।

कभी-कभी राष्ट्र और राज्य दोंनों का पर्यायवाची रूप में प्रयोग किया जाता है। यह सही नहीं है। राज्य एक राजनैतिक संकल्पना है और राष्ट्र सांस्कृतिक संकल्पना है। राज्य नहीं है तो भी राष्ट्र का अस्तित्‍व हो सकता है। लंबे समय तक यहूदी दुनिया के अलग-अलग देशों में बिखरे हुए थे और उनका अपना राज्य नहीं था । तो क्या यह माना जाये कि यहूदी राष्ट्रीयता नाम की कोई चीज़ थी ही नहीं। यहूदी राष्ट्रीयता की यह भावना ही आगे चलकर उनके राज्य इज़रायल के रूप में मूर्त हुई। यदि किसी जन या मानव समुदाय से उसका राज्य छिन जाये, वह किसी विदेशी सत्ता के अधीन हो जाये तो इससे उस समुदाय की राष्ट्रीयता नष्ट नहीं हो जाती। वह भावना के रूप में समुदाय के लोगों को बराबर सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती रहती है।


इतिहास में ऐसे दृष्टांत भी मिलते हैं जब विभिन्न राष्ट्रीयताओं वाले मानव समुदायों को एक राज्य सत्ता के अंतर्गत बांधने का प्रयत्न किया गया। इससे एक राज्य तो अस्तित्तव में आ गया, पर समान राष्ट्रीयता के अभाव में आगे चलकर विखंडित हो गया। सोवियत संघ इसका उदाहरण है। सोवियत संघ के अंतर्गत अनेक राष्ट्रीयता वाले मानव समुदाय या इकाइयां सम्मिलित की गई थी किन्तु समान राष्ट्रीयता या समान संस्कृति के अभाव में वे एक नहीं रह पाये।

भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रहित को पार्टी हित से ऊपर रखती है। राष्ट्रहित को क्षति पहुंचाने वाली प्रवृत्तियों के विरूध्द भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता आंदोलन किया है। ऐसी प्रवृत्तियां जो राष्ट्र की एकता को कमज़ोर करती है, विभाजनकारी है, राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, राष्ट्र के स्वाभिमान को कमज़ोर करती हैं और राष्ट्र की अस्मिता तथा उसके प्रतीकों, मानदंडों और चिन्हों के प्रति उपेक्षा का भाव रखती हैं, भाजपा उन्‍हें निर्मूल करने के लिए बराबर आंदोलन करती रही है। आंदोलन के विषय बदलते रहे हैं लेकिन उनके पीछे प्रेरणा या दृष्टि बराबर राष्ट्रहित पोषण की रही है। फिर चाहे आंदोलन का विषय कश्मीर की अखंडता हो, बेरूवाड़ी का हस्तांतरण हो, वंदे मातरम् गान या सरस्वती वंदना के विरोध की मानसिकता हो, अयोध्‍या में राम मंदिर का निर्माण हो, समान नागरिक संहिता हो, आतंकवाद हो, नक्सलवाद हो, अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण हो, वोट की राजनीति हो, जातिवाद की विभाजनकारी प्रवृत्ति हो या ऐसे ही अन्य अनेक विषय हों। राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की प्रेरणा से ही जनसंघ या भाजपा इन विषयों पर आंदोलन में प्रवृत्त हुए। ऐसे तत्तव और प्रवृत्तियां जो हमारी एकता को चुनौती देती हैं, भारतीय जनता पार्टी के आंदोलन के प्रिय विषय रहे हैं। बहुराष्ट्रवाद की सोच, क्षेत्रवाद, जातिवाद, अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण, माओवाद, नक्सलवाद, इस्लामी कट्टरवाद, राष्ट्रीय सम्प्रभुता को चुनौती, देश पर चीन का आक्रमण, पाकिस्तानी आक्रमण, बांग्लादेशी घुसपैठ आदि समय-समय पर सार्वजनिक क्षितिज पर उभरने वाले विषयों पर भाजपा के लाखों-लाख कार्यकर्ताओं ने आंदोलन किया और राष्ट्रहित के रक्षण और संवर्धन के लिए अनुकरणीय त्याग किया। राष्ट्र के लिए क्या हितकर और वांछनीय है और क्या अहितकर और अवांछनीय है यह विवेक भाजपा नेतृत्व अपने कार्यकर्ताओं में सदैव जागृत करता रहता है।


भारतीय जनता पार्टी जिस समान संस्कृति को राष्ट्रीयता का अधिष्‍ठान मानती है उसे हिन्दुत्व, भारतीयता और इंडियननैस किसी भी नाम से जाना जा सकता है। राष्ट्रीयता का यह बोध ही हिन्दुत्व है, यही भारतीयता है और यही हमारी जीवन पध्दति है।

राष्ट्रीय दृष्टिकोण को मजबूत करने के लिए राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण आवश्यक है। जो कुछ है वह राष्ट्र का है, मेरा नहीं। 'राष्ट्राय स्वाहा, राष्ट्राय इद्म न मम्।'


सांस्कृतिक समानता राष्ट्रीय एकता का आधारभूत तत्‍व होता है। एकता के अन्य पोषक तत्व हैं : भौगोलिक सान्निध्‍य, समान अतीत, भाषायी समानता, आध्‍यात्मिक एकता। ये सभी तत्‍व मिलकर किसी मानव समुदाय का एक राष्ट्र बनाते हैं। आतंरिक रूप से धर्म, भाषा, जाति जैसे विभाजक तत्वों के सक्रिय रहते हुए भी मानव समुदायों को उक्त तत्‍व एकरूपता प्रदान करते हैं। राजनैतिक समुदायों को एकता प्रदान करने वाली भावना उसकी राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद है। राष्ट्रवाद ही राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय सम्मान, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा, राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय सम्प्रभुता का स्रोत हैं।

राष्ट्रीयता की भावना को मज़बूत करने में समान इतिहास एक पोषक तत्‍व होता है। समान परम्पराएं मानव समुदाय को एक राष्ट्र का रूप देती हैं। समान विचारों एवं अनुभूतियों से युक्त होकर एक निश्चित भूभाग में रहने वाला मानव समुदाय राष्ट्र के रूप में ढलता है। राष्ट्र एक ऐसा मानव समुदाय है जिसकी एक स्वतंत्र राजनैतिक इकाई होना वांछित होने पर भी अनिवार्य नहीं है। राष्ट्र की अपनी पहचान होती है। इसे राष्ट्र की चिति या अस्मिता कहते हैं। भारतीय संस्कृति की पहचान उसके आध्‍यात्मिक रूझान के कारण है। आध्‍यात्मिकता हमारी चिति का वैशिष्टय हैं। राष्ट्रीयता वह भावनात्मक बंधान है जो किसी मानव समुदाय को एक जन में रूपातंरित करता हैं।


संक्षेप में, भारतीय जनता पार्टी एक देश, एक जन और एक संस्कृति की अवधारणा में अविचल विश्वास रखने वाला राजनीतिक दल है। जब कभी राष्ट्रीय हित को क्षति पहुंचती है तो भाजपा स्वाभाविक रूप में उद्वेलित होती है और राष्ट्रीय हित को क्षति पहुंचाने वाले तत्‍वों का प्रबल विरोध करती है।

भारतीय जनता पार्टी यह मानती है कि हमारी एक राष्ट्रीय जीवन पध्दति है जो न केवल अक्षुण्ण रहनी चाहिए बल्कि उसका सतत् पोषण और संवर्धन होते रहना चाहिए। हमारे सभी कार्यकलापों का उद्देश्य राष्ट्र का संरक्षण, कल्याण और अभ्युदय है। हमारी सीमाएं सुरक्षित रहनी चाहिए, क्षेत्रीय एकता बनी रहनी चाहिए और हमें अपनी ऐतिहासिक परम्पराओं और विरासत का स्वाभिमान रहना चाहिए। ये सब बातें राष्ट्रीय हित की अवधारणा का अंग है।

2 comments:

Anonymous said...

जैसे भाजपा देश की प्रमुख पार्टी है, उसी तरह आप देश के फटोली ब्लॉगर हैं। धुत्त...धुत्त...दुत्त...दुत्त

Anonymous said...

बहुत बढिया ! सैद्धांतिक तौर पर बातें बिल्कुल ठीक हैं । लेकिन इस्लाम एक अध्यात्मिक पंथ नही रहा वह तो साउदी अरेबिया के साम्राज्यवादी हितो का औजार बन गया, वैसे ही ईसाईयत भी बिलायतीओं और अमेरिकीओं का हीत साधक साधन बन कर रह गया है । एक हिन्दु जो मन मा सर्वदा सर्व-धर्म समभाव रखता है, वह अपने अच्छेपन के कारण परेशानियो से घिर गया है । हिन्दुत्व को संगठीत धर्म बनाया जाए तो ईसकी अच्छाइया समाप्त होने का डर है, अगर संगठीत स्वरुप न दे तो प्रचारवादी पंथो से सुरक्षित रहना कठीन है । माननीय दिनदयाल उपाध्याय जी की विचार परम्परा को आगे बढाने की जरुरत है – हमारी कठिनाईयो का ईलाज जरुर निकलेगा । दक्षिण एसिया के लोग फिर से शांती और भाईचारे के साथ रह सकेंगे । फिर जम्बुद्वीप – आर्यावर्त – अखण्ड भारत विश्व शक्ति के रुप मे उभरेगा ।