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Friday, 10 October, 2008

क्‍या सेकुलरिज्‍म का अर्थ केवल हिंदू विरोध है!

फोटो- इंडियन एक्‍सप्रेस (4 अक्‍टूबर, 2008) से साभार

तारापीठ मंदिर में पूजा-अर्चना करते माकपा नेता सुभाष चक्रवर्ती

साम्यवाद के प्रवर्तक कार्ल मार्क्‍स ने बड़े जोर देकर कहा था, 'धर्म लोगों के लिए अफीम के समान है (Religion as the opium of the people)। लेकिन मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में बहुत सारे कामरेड घुटन महसूस कर रहे हैं और उन पर धर्म का नशा सिर चढ़कर बोलने लगा है।

पिछले दिनों कन्नूर (केरल) से माकपा सांसद केपी अब्दुल्लाकुट्टी हज यात्रा पर गए। जब बात फैली तो सफाई दी कि अकादमिक वजहों से गए थे।
मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का कोई भी नेता केपी अब्दुल्लाकुट्टी के हज यात्रा के खिलाफ बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। वहीं जब पश्चिम बंगाल के खेल व परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती तारापीठ मंदिर गए तो पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने तो यहां तक कह दिया, 'सुभाष चक्रवर्ती पागल हैं।'
मगर यह सफेद झूठ था क्योंकि उन्होंने उमरा भी कराया था। अकादमिक वजहों से जाने वाला उमरा जैसा धार्मिक कर्मकांड नहीं कराएगा। हाल ही में कुट्टी एक नाड़ी ज्योतिषी से मिलने गए थे। नाड़ी ज्योतिषी केरल की ज्योतिष शास्त्र की विधा है जिसे काफी कारगर माना जाता है। तब एक पत्रकार ने व्यंग किया था कि शायद अब्दुल्ला कुट्टी ज्योतिष से यह जानने गए थे कि भारत में कम्युनिस्ट क्रांति का योग है या नहीं। वैसे जब उनसे जवाब-तलब किया गया तो उन्होंने किसी से कहा कि वे कौतुहलवश चले गए थे। किसी से कहा कि उन्हें अपनी जन्म तिथि मालूम नहीं है, उसका पता लगाने गए थे।

केरल विधानसभा में माकपा के दो विधायकों ने ईश्वर के नाम पर शपथ ली थी। कोच्चि में माकपा की बैठक में अनोखा नजारा देखने को मिला। मौलवी ने नमाज की अजान दी तो धर्मविरोधी माकपा की बैठक में मध्यांतर की घोषणा कर दी गई। मुसलिम कार्यकर्ता बाहर निकले। उन्हें रोजा तोड़ने के लिए पार्टी की तरफ से नाश्ता परोसा गया। यह बैठक वहां के रिजेंट होटल हाल में हो रही थी।

लेकिन मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का कोई भी नेता केपी अब्दुल्लाकुट्टी के खिलाफ बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। वहीं, याद करिए जब सन् 2006 में वरिष्ठ माकपा नेता और पश्चिम बंगाल के खेल व परिवहन मंत्री सुभाष चक्रवर्ती ने बीरभूम जिले के मशहूर तारापीठ मंदिर में पूजा-अर्चना की और मंदिर से बाहर आकर कहा,'मैं पहले हिन्दू हूं, फिर ब्राह्मण और तब कम्युनिस्ट' तब इस घटना के बाद, हिन्दू धार्म के विरुध्द हमेशा षडयंत्र रचने वाली भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) के अन्दर खलबली मच गई। माकपा के कई नेता सुभाष चक्रवर्ती के विरुध्द आवाज बुलंद करने लगे। राज्य सचिवालय के मंत्री और वाममोर्चा के अध्‍यक्ष बिमान बोस ने कहा कि पार्टी सचिवालय में इस पर विचार किया जाएगा। सबसे तीव्र प्रतिक्रिया दी पार्टी के वरिष्ठ नेता व पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने। उन्होंने तो यहां तक कह दिया, 'सुभाष चक्रवर्ती पागल हैं।' इसके प्रत्युत्तर में सुभाष ने सटीक जवाब दिया और सबको निरुत्तार करते हुए उन्होंने वामपंथियों से अनेक सवालों के जवाब मांगे। उन्होंने कहा कि जब मुसलमानों के धार्मिक स्थल अजमेर शरीफ की दरगाह पर गया या सिक्खों के गुरूद्वारे में गया, तब कोई आपत्ति क्यों नहीं की गई? उन्होंने यह भी पूछा कि जब पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु इस्राइल गए थे और वहां के धार्मिक स्थलों पर गए तब वामपंथियों ने क्यों आपत्ति प्रगट नहीं की।
संदर्भ- सतीश पेणडेकर की रिपोर्ट, जनसत्‍ता



AMERICA CALLING: Prakash Karat

Publication:Economic Times Mumbai

THE Communists here may be compulsive critics of George Bush but when it comes to holidaying, US is a preferred destination.


THE Communists here may be compulsive critics of George Bush but when it comes to holidaying, US is a preferred destination.
CPM general secretary Prakash Karat, who spares no opportunity to lash out at the ‘Great Satan,’ is now chilling out in the Unites States.

To be fair to Mr Karat, he is not the first Indian revolutionary to vacation in the US. Former chief minister of West Bengal Jyoti Basu had to write that he was a Communist when he filled in his visa application for the US when he visited over a decade ago. However, the US has done away with that column in its application forms, which now do not seek details about the applicant’s political affiliations.

Mr Karat’s politburo colleague, Buddhadeb Bhattacharjee, was planning a visit to the US. But for past several months, problems have been raining for the Bengal chief minister, demanding his presence in the state.


To be fair to Mr Karat, he is not the first Indian revolutionary to vacation in the US. Former chief minister of West Bengal Jyoti Basu had to write that he was a Communist when he filled in his visa application for the US when he visited over a decade ago.
This forced a cancellation of the “advance team’s” visit as well. This team was supposed to be led by state commerce minister Nirupam Sen. Mr Karat and his wife Brinda Karat, who is also in the US, are understood to be visiting some relatives. Ms Karat had made a trip to the US last year for the launch of Shonali Bose’s film Amuin which the Marxist leader has a role. Incidentally, the parliamentary committee on women’s bill, of which Ms Karat is a member, is having its crucial meetings in New Delhi.

The CPM general secretary, who is learnt to have left for the US a day after the Manmohan Singh government announced the hike in fuel prices, is expected to return two days ahead of the meeting of the UPA-Left panel on the nuclear deal on June 18. The meeting is likely to witness the US-loathing Left rejecting the government’s plea to allow it to wrap up the India-specific safeguards agreement with the IAEA.

Soon after prices of petrol, diesel and LPG were increased, Left parties issued a statement criticising the government for the move and announcing a weeklong agitation. The CPM has been holding the US largely responsible for the global price rise situation and has not missed any opportunity to accuse the UPA government of succumbing to US pressure. The Left had protested president George Bush’s India visit, joint naval exercises and India’s vote against Iran.

http://epaper.timesofindia.com/Repository/ml.asp?Ref=RVRNLzIwMDgvMDYvMTEjQXIwMDIwMw==&Mode=HTML&Locale=english-skin-custom

6 comments:

अनुनाद सिंह said...

हिन्दु-विरोध भी मुस्लिम एवं ईसाइयों का तुष्टीकरण करके वोट-बैंक बनाने का एक हथियार है।

विचार-मंथन said...

मार्क्सवादियों का हमेशा से ही दोहरा चरित्र रहा हैं. इनके लिए मुस्लिम साम्प्रदायिकता नाम की कोई चीज नहीं होती. भारत में हिंदू विरोध ही मार्क्सवादियों के अस्तित्व का आधार हैं.

फ़िरदौस ख़ान said...

क्या अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म ढहाना ही राष्ट्रवाद है...?

Suresh Chiplunkar said...

इन लोगों का चरित्र और आचरण तो पहले से ही दोहरा है, जैसे इन्हें हिन्दुओं में सिर्फ़ बुराईयाँ ही दिखाई देती हैं वैसे ही अमेरिका में भी ये सब कुछ बुरा ही देखते हैं, लेकिन छुट्टियाँ बिताने वहीं जाते हैं और अपने बच्चों को पढ़ने भी वहीं भेजते हैं…

Shekhawat said...

वाम पंथियों का तो कोई चरित्र ही नही जिस पर चर्चा की जाय | रही बात इनके धर्मनिरपेक्षता की जब हिंदू विरोध से ही ये अल्प संख्यक खुश हो जाते है तो इनको और क्या चाहिए |

फिरदोश जी आपका यह सोचना किअल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म ढहाना ही राष्ट्रवाद है. ग़लत है लेकिन इन नेताओं द्वारा सिर्फ़ हिंदू विरोध से भी तो आपका या देश का भला नही होने वाला |

sunil suyal said...

मुझे मुशीरुल हसन की इस जेहाद समर्थक कोम की मानसिकता पर तरस आता है की जिसे असला-हथियार लिए आतंकी तो निर्दोष नजर आते है ,और इक पुलिस अफसर की शहादत नाटक लगती है!मै हर प्रकार से न्याय का पक्षधर हू! परन्तु जब मुशीरुल हसन जेसे लोगो को उडीसा ,महाराष्ट्र ,गुजरात के माहोल पर दुःख प्रकट करते,और आतंकियों के पक्ष मै धन इकठा करते देखता हू तो इनकी भूमिका से चाह कर भी स्वयम को आश्वस्त नहीं कर पाता..........!