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Wednesday 27 August 2008

भाजपा की विचारधारा-पंचनिष्ठाएं भाग-2


भारतीय जनता पार्टी के कार्य की प्रेरणा पार्टी संविधान में उल्लिखित पंचनिष्ठाएं हैं:

राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता
लोकतंत्र
गांधीवादी दृष्टिकोण पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना
सकारात्मक पंथनिरपेक्षता
मूल्य आधारित राजनीति
लोकतंत्र
हमारे संविधान ने राजसत्ता के संचालन के लिए लोकतांत्रिक पध्दति स्वीकार की है। लोकतंत्र मतदाता की इच्छा का आदर करने वाला तन्त्र है। भिन्न भिन्न देशों में यद्यपि निर्वाचन की भिन्न भिन्न पद्धतियों का प्रचलन है, किन्तु उन सबमें समान तत्व है लोक की सामूहिक इच्छा के आधार पर सरकार का चुना जाना। भाजपा लोकतांत्रिक व्यवस्था में निष्ठा रखती है, तानाशाही को अस्वीकार करती है और सत्ता के विकेन्द्रीकरण के पक्ष में है।

लोकतंत्र के प्रति भाजपा की निष्ठा पार्टी के त्रिवार्षिक संगठनात्मक चुनाव में अभिव्यक्त हुई है। पार्टी के कार्यकर्ता स्थानीय समिति से लेकर राष्ट्रीय अधयक्ष तक का चुनाव करते हैं। हर तीन वर्ष के बाद विभिन्न इकाइयों- स्थानीय समिति से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के अधयक्ष बदल जाते हैं। संगठन की पुनर्रचना या नवीकरण होता है।

भाजपा ने समय-समय पर तानाशाही का और लोकतन्त्र को कमज़ोर करने वाली प्रवृत्तियों का विरोध किया है। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की और सब प्रकार की स्वतंत्रताओं को स्थगित कर दिया तो भारतीय जनसंघ ने लोकतन्त्र की पुन:स्थापना के लिए संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाई। कांग्रेस ने निर्वाचित राज्य सरकारों को गिराने के लिए जब-जब राज्यपाल के पद का दुरूपयोग किया, हमने उसका कड़ा प्रतिकार किया है।

लोकतंत्र जनादेश पर आधारित राज्य व्यवस्था है। संसद और विधान मंडल, स्वतन्त्र प्रैस, स्वतन्त्र न्यायपालिका, स्वायत्ता निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाएं लोकतन्त्र के सुचारू संचालन के लिए ज़रूरी है। कांग्रेस ने समय-समय पर इन लोकतान्त्रिक संस्थाओं पर अंकुश लगाने का प्रयत्न किया है और इनका अवमूल्यन किया है। भाजपा ने ऐसे सभी प्रसंगों में लोकतान्त्रिक संस्थाओं के सुदृढ़ीकरण के लिए आवाज़ उठाई है।

लोकतन्त्र में असहमति का सम्मान किया जाता है। सत्तापक्ष बहुमत में होने पर भी विपक्ष के विचारों का सम्मान करता है। विपक्ष के लिए भी रचनात्मक भूमिका निभाना ज़रूरी है। लोकतन्त्र में प्रतिशोध, टकराव और असहिष्णुता के लिए स्थान नहीं है। नीतिभेद रहते हुए भी दलों के बीच सहिष्णुता लोकतन्त्र को पुष्ट करती है।

निष्पक्ष चुनाव लोकतन्त्र का महत्वपूर्ण तत्तव है। बाहुबल और धानबल का इस्तेमाल कर जनादेश को हाइजैक कर लेना लोकतन्त्र को कमज़ोर करता है। दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में बाहुबल, अपराधीकरण और पैसे का प्रभाव बढ़ने से लोकतन्त्र विकृत हो गया है।

जाति और पंथ आधारित राजनीति लोकतन्त्र को कमज़ोर करने वाली प्रवृत्ति है। कांग्रेस और कुछ अन्य राजनीतिक दलों ने जाति आधारित और साम्प्रदायिक राजनीति का अनुसरण कर सामाजिक विभाजन को तीव्र किया है। वोट बैंक की राजनीति के चलते सामाजिक और राष्ट्रीय एकता कमज़ोर हुई है। भाजपा ने इन दलों की नकारात्मक प्रवृत्तियों को बराबर बेनकाब किया है।

लोकतंत्र के लिए लोकशिक्षण और लोक संस्कार का बहुत महत्व है। राजनीतिक दलों का यह कर्तव्य है कि वे लोक शिक्षण और लोक संस्कार द्वारा ऐसे लोकमत का पुरस्कार करें जिसकी नींव पर टिका लोकतंत्र स्वस्थ और मज़बूत हो सके। श्री दीनदयाल उपाध्‍याय ने स्वस्थ लोकतंत्र के लिए लोक शिक्षण को बहुत महत्व दिया है।

राजसत्ता और अर्थसत्ता के विकेन्द्रीकरण के बिना आम आदमी को सच्चे लोकतंत्र की अनुभूति नही हो सकती। सत्ता का केन्द्रीकरण लोकतंत्र की प्रकृति से मेल नहीं खाता। नीचे की इकाइयों को अधिक अधिकार देकर प्रभावी करना होगा। भारतीय जनसंघ और भाजपा ने पंचायती राज को मज़बूत बनाने का आग्रह रखा है। गांधी जी की ग्राम स्वराज्य की कल्पना भी राजसत्ता के विकेन्द्रीकरण पर आधारित है। क्रमश:

3 comments:

सत्याजीतप्रकाश said...

भाजपा से अपेक्षा होगी कि वह तुष्टिकरण के लिए एक भी कदम न उठाए, जो काम करे देश के समग्र विकास के लिए करे, धारा-370 हटाए और समान नागरिक संहिता लागू करे.

Anonymous said...

लोकतंत्र है कहां, यहां तो अल्पसंख्यको के तुष्टिकरण के लिए बहुसंख्यकों का गला दबाया जा रहा है । लोकतंत्र को बन्धक बना लिया विदेशी चर्च द्वारा निवेषित मिडिया ने । जब तक राष्ट्रहित का चिंतन करने वाली मिडीया देश मे फलेगी फुलेगी नही तब तक लोग सुसुचित नही हो पाएगें । और तब तक सही मायने मे लोकतंत्र प्रभावी न हो पाएगा ।

Suresh Chandra Gupta said...

@हमारे संविधान ने राजसत्ता के संचालन के लिए लोकतांत्रिक पध्दति स्वीकार की है। लोकतंत्र मतदाता की इच्छा का आदर करने वाला तन्त्र है।

आप 'राजसत्ता' शब्द क्यों प्रयोग करते हैं? लोकतंत्र में यह शब्द प्रयोग करना लोकतंत्र को राजतन्त्र में बदलने जैसा है. जब हम राजतंत्र की बात करते हैं तब अवसर मिलने पर हम एक ऐसे तंत्र की स्थापना का ही तो प्रयत्न करेंगे जो हमें राज करने में सहायता दे. यह सोच लोकतंत्र की भावना के ख़िलाफ़ है.

क्या आज लोकतंत्र में मतदाता की इच्छा का आदर किया जा रहा है? जो आज हो रहा है लोक सभा में और बाहर, क्या वह मतदाता की इच्छा है? मतदाता ने जिसे चुनाव में अस्वीकृत कर दिया, वह व्यक्ति आज गृहमंत्री बना बैठा है. क्या यह मतदाता की इच्छा थी? क्या यह मतदाता का अपमान नहीं है.

आज राजनीतिबाजों और उनके दलों ने लोकतंत्र को इतना दूषित कर दिया है कि साँस लेना भी दूभर हो गया है. आम आदमी पर तरफ़ से प्रहार हो रहे हैं. आम आदमी छटपटा रहा है और नेता वोट की घटिया राजनीति कर रहे हैं. चुनाव में ख़ुद हैं पर मतदाताओं को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर रहे हैं. नफरत का जहर ऐसा फैला दिया है की आम आदमी ख़ुद को ही काटने लगा है. किसे वोट दें, यह सवाल आज आम आदमी को परेशान कर रहा है. कोई भी तो नहीं है जिस पर वह विश्वासकर सके.