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Friday, 18 July, 2008

प्रगतिशील मार्क्‍स से अपना पिंड छुड़ाना चाहते है- निर्मल वर्मा

सुप्रसिध्द साहित्यकार श्री निर्मल वर्मा से श्री शंकर शरण की बातचीत

प्रश्न- धर्म और निरपेक्षता पर आपके विचारों की सेक्यूलर, वामपंथी बुध्दिजीवियों ने बड़ी आलोचना की है। आपने धर्म को रिलीजन का पर्याय न कहकर अधर्म के विपरीत वाली भारतीय मान्यता के रूप में विचार करने का आग्रह किया। आप कुछ स्पष्ट करेंगे?

उत्तर- आज प्रश्न यह नहीं है कि राजनीति को धर्मावलम्बी होना चाहिए या धर्मनिरपेक्ष। दोनों संज्ञाएं खण्डित मानसिकता का बोध कराती हैं। प्रश्न यह पूछना चाहिए कि धर्म तो क्या धर्म? धर्मनिरपेक्षता तो किस धर्म के प्रति निरपेक्षता? हमारे सेक्यूलर लोग पश्चिम की भोंडी नकल में भारतीय सभ्यता बोध की विशिष्ट धर्म भावना को तिरस्कृत कर अपना अज्ञान ही प्रदर्शित करते हैं। दु:ख की बात यह है कि जो काम 19वीं सदी के ईसाई मिशनरी यहां नहीं कर सके, वह हमारे धर्मनिरपेक्षियों ने कर दिखाया। हमारे धर्म बोध के प्रति हिकारत पैदा करके। यह एक भयंकर घटना है। भारतीय संस्कृति की दृष्टि स्वयं ही बहुलवादी रही है, जो सेक्युलरिस्टों की दृष्टि से बहुत भिन्न है। ये भारतीय एकता को केवल अनेकता में देखते है। अनेकता के भीतर जो एकनिष्ठ बोध है, उसे अनदेखा कर देते हैं। ये सेक्यूलर फण्डामेण्टलिज्म है, जो धार्मिक फण्डामेण्टलिज्म से भी बुरा है। क्योंकि यह बुध्दिवाद की आड़ में अन्धविश्वासी कट्टरता पैदा करता है। इसी का विकृत रूप सनकी, स्वार्थपरक मूल्यहीनता है जो चारों तरफ दिख रही है। इसे धर्मनिरपेक्षता ने पैदा किया है, जो सांस्कृतिक मूल्यों से रिक्त और परम्पराशून्य है। साम्प्रदायिक असहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षी मूल्यहीनता दोनों ही उस भौतिक परजीवी जीवन शैली से पैदा हुए हैं जो पिछले पचास वर्ष से भारत में अपनायी गयी। इसे समझने की जरूरत है।

प्रश्न- सोवियत संघ के विघटन के बाद हमारे देश में प्रगतिशील संगठनों ने अपने रिकार्ड की कोई समीक्षा नहीं की। इस चुप्पी को क्या समझे?

उत्तर- मार्क्‍स ने कभी कम्युनिज्म को यूरोप का प्रेत कहा था। आज कम्युनिज्म के लिए स्वयं इतिहास ही एक प्रेत बन गया है। इसीलिए प्रगतिशील उससे अपना पिंड छुड़ाना चाहते है।

प्रश्न- मगर क्या कारण है कि इतनी बड़ी उथल-पुथल का कोई असर दिखाई नहीं देता?

उत्तर- इसका एक सीधा जवाब यह है कि जब एक चीज आपको एक तरह का सहारा, या सुरक्षा देती रहे तो वह कितनी ही खोखली क्यों न हो जाए, आप उसे हटाना नहीं चाहते। प्रगतिवादी भी अपनी अस्मिता को खतरे में नहीं डालना चाहते। वे यह नहीं चाहते कि अपने समूचे जीवन की विचारधारा का पुनर्मूल्यांकन करने का जोखिम उठाए, जिसके कारण उन्हें किसी और रास्ते पर जाने का जोखिम उठाना पड़े।
(साभार : संसार में निर्मल वर्मा, संपादक- गगन गिल, नोट-यह साक्षात्कार 15 अप्रैल, 2001 को हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुआ था।)

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