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Thursday, 11 December, 2008

भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम द्विराष्ट्रवाद

लेखक- डॉ0 महेशचन्द्र शर्मा

भारत विभाजन की दुर्घटना तो 1947 में हुई लेकिन इस दुर्घटना के मूल में तथाकथित हिन्दू-मुस्लिम द्वैत है।
हिन्दू यह सम्प्रदायवाची नहीं वरन् राष्ट्रवादी शब्द है। मजहबांरित भारतीयों को जब अहिन्दू के रूप में परिभाषित किया गया तब इन मजहबों के समानान्तरण हिन्दू शब्द का प्रयोग होने लगा लेकिन हिन्दू नाम का इस देश में कोई सम्प्रदाय नहीं है। सभी भारतीय सम्प्रदाय हिन्दू समाज के अंग हैं, मजहबांरित भारतीयों को भी हिन्दू समाज का वैसा ही अंग होना चाहिये जैसे सभी भारतीय साम्प्रदायों को मानने वाले लोग हैं। दुर्भाग्य से इस राष्ट्रीय एकात्मता के विचार को सम्प्रदायिकता का नाम दिया जाता है। इसे मुस्लिम-ईसाई विरोधी हिन्दू साम्राज्यवाद बताया जाता है। यह एक अशास्त्रीय एवं राष्ट्रविघातक प्रस्थापना है।
इस द्वैत का समुचित भाष्य अभी तक नहीं हो सका है। क्या यह राष्ट्रीय द्वैत है, यह उपासना पध्दति का द्वैत है, यह माजहबिक द्वैत है या यह सांस्कृतिक और सामाजिक द्वैत है? क्या यह तथाकथित द्वैत एक नैसर्गिक वास्तविकता है, क्या यह द्वैत तथ्यात्मक वास्तविकता है या यह द्वैत एक कृत्रिम राजनैतिक दुरभिसंधि है?

जिन्होंने भारत में मुसलमानों को पृथक राष्ट्रीयता माना उन्होंने द्वि-राष्ट्रवाद अवधारणा प्रस्तुत की। यह एक अवैज्ञानिक विचार है। यदि मजहबों से राष्ट्रीयता बनती तो भारत में तथा विश्व में कहीं भी राष्ट्र संज्ञा का विकास ही नहीं हो पाता। साम्राज्यवादी अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग के द्वारा इसे प्रस्तुत एवं पोषित करवाया लेकिन सौभाग्य से भारत में कोई भी इस अवधारणा का समर्थक नहीं है। राष्ट्रीयता तत्तवत: भू-सांस्कृतिक अवधारणा है। सांस्कृतिक रूप से मुसलमान भारतीय जीवन पध्दति एवं संस्कृति से पृथक नहीं है। राष्ट्रीय संदर्भ में यह द्वैत एक अवास्तविकता है।

सम्प्रदाय के संदर्भ में यहां कुछ मूलभूत विचारों को समझना जरूरी है। भारत में सम्प्रदाय एक प्रवाही तत्व है, यहां सिमेटिक या सामी सम्प्रदायों के समान संस्थाबध्द सम्प्रदाय नहीं हुआ करते न ही यहां सम्प्रदायांतरण (कनवर्जन) की कोई संस्थाबध्द परंपरा है। सम्प्रदायाधारित संस्थाबध्द मतान्तरण के लिए विदेशी तत्व है। भारत में सदैव ही विविध मत पंथ रहे हैं। यदि पंथों के हिसाब से भारतीय समाज की बहुलता का अध्‍ययन किया जाये तो यहां दो चार नहीं वरन् सैकड़ों सम्प्रदाय होंगे। विविध सम्प्रदायों के गुरूओं अथवा मसीहाओं की संख्या भी सैकड़ों हजारों में होगी। अत: मुस्लिम एक सम्प्रदाय तथा बाकी सब भारतीय दूसरा सम्प्रदाय, इस प्रकार का द्वैत स्थापित करना भी नितांत बचकानी प्रक्रिया है। सामी तरीके की नहीं वरन् भारतीय प्रकार की कुछ संस्थाबध्द सम्प्रदायों की मलिका भी भारत में है। भारत को तथाकथित हिन्दू व मुसलमान नाम के दो सम्प्रदायों में बांटना किसी भी प्रकार तर्कसंगत नहीं है। सामी मजहबों में भी ईसाई बड़ी संख्या में रहते हैं, थोड़े ही क्यों न हों यहूदी व पारसी भी भारत में रहते हैं, तो क्या ईसाई, पारसी, यहूदी ये अलग-अलग राष्ट्रीयतायें हैं?

मुस्लिम, ईसाई, यहूदी व पारसी वे मजहब हैं जो भारत के बाहर से आये हैं, सम्प्रदायों के संदर्भ में स्वागतशील भारत ने इनका स्वागत किया था। ऐतिहासिक कारणों से अनेक भारतीयों ने मतांतरण कर इस्लाम व ईसाइयत को अपने मजहब के रूप में स्वीकार कर लिया, परिणामत: जो मतांतरित नहीं हुये उन सभी भारतीयों को एक सम्प्रदाय कहना, एक तथ्यात्मक भूल है। जो भारतीय मजहबांतरित नहीं हुये वे हिन्दू मजहब के धारक हैं तथा जो मजहबांतरित हो गये वे मुसलमान या ईसाई हैं, यह नितांत ही गलत समाजशास्त्रीय विभाजन है। वे भारतीय जो मजहबांतरित हो गये वे अल्पसंख्यक हैं तथा जो मजहबांतरित नहीं हुये वे बहुसंख्यक हैं, यह विभाजन भी न केवल गलत है वरन् दुर्भाग्यपूर्ण भी है। हर प्रकार से हिन्दू व मुसलमान के नाम का द्वैत अवास्तविक है तथा गलत अवधारणाओं पर टिका है। यह द्वैत ही मुस्लिम पृथकतावाद का पिता है, जिसने कृत्रिम रूप से देश को बंटवाया तथा आज भी वह पृथकतावाद देश में साम्प्रदायिक विद्वेष के रूप में विद्यमान है।

वास्तव में हिन्दू यह सम्प्रदायवाची नहीं वरन् राष्ट्रवादी शब्द है। मजहबांरित भारतीयों को जब अहिन्दू के रूप में परिभाषित किया गया तब इन मजहबों के समानान्तरण हिन्दू शब्द का प्रयोग होने लगा लेकिन हिन्दू नाम का इस देश में कोई सम्प्रदाय नहीं है। सभी भारतीय सम्प्रदाय हिन्दू समाज के अंग हैं, मजहबांरित भारतीयों को भी हिन्दू समाज का वैसा ही अंग होना चाहिये जैसे सभी भारतीय साम्प्रदायों को मानने वाले लोग हैं। दुर्भाग्य से इस राष्ट्रीय एकात्मता के विचार को सम्प्रदायिकता का नाम दिया जाता है। इसे मुस्लिम-ईसाई विरोधी हिन्दू साम्राज्यवाद बताया जाता है। यह एक अशास्त्रीय एवं राष्ट्रविघातक प्रस्थापना है। जब तक भारत में इस प्रस्थापना का सम्मान रहेगा, विभाजनवादी विद्वेष एवं पृथकतावाद यहां पलता रहेगा। मुस्लिम पृथकतावाद को इसी प्रस्थापना ने पोषित किया तथा भारत का विभाजन करवाया। आज भी यही प्रस्थापना पृथकतावादी सम्प्रदायवाद को परिपोषित कर रही है।

इस प्रस्थापना को भारत में सेक्युलरिज्म कहा जाता है। जो अल्पसंख्यकों की रक्षा के नाम पर साम्प्रदायिकता का पोषण करती है। भारतीय संस्कृति की विशेषता है कि वह समाज को सदैव आलोकित करती रहती है। भारत के सभी सम्प्रदाय आपस में गुंथे हुये हैं। उनमें भारत ने पृथकतावाद नहीं पनपने दिया। ऐसा नहीं है कि भारत के विविधा सम्प्रदायों में कभी कटुता नहीं आई, लेकिन भारत के सांस्कृतिक महापुरूषों ने उन्हें समन्वय की राह दी, पृथकता का पोषण नहीं किया, वरन् विविधाता के सम्मान का सृजन किया। परिणामत: सभी सम्प्रदाय भारत की सर्वव्यापी संस्कृति के अंग बने। इस्लाम का भी समुचित भारतीयकरण हुआ था, लेकिन साम्राज्यवादियों ने उसे पृथक्करण की तरफ धाकेला तथा पाश्चात्य शिक्षित भारतीयों के भोले मन ने उसे सेक्युलरिज्म का अवधारणात्मक बाना पहना दिया। परिणामत: सनातनी हिन्दू हो सकता है, जैनी हिन्दू हो सकता है, सिक्ख भी हिन्दू हो सकता है, शैव, शाक्त एवं वैष्णव भी हिन्दू हो सकते हैं, लेकिन यदि मुसलमान व ईसाई भी हिन्दू हो जायेंगे तो उनके पृथक अस्तित्व का क्या होगा, इससे तो सेक्युलरवाद का समापन हो जायेगा। अत: सेक्युलरवाद की रक्षा के लिए आवश्यक है कि पृथकतावादी साम्प्रदायिकता जिन्दा रहे तथा एकात्मवादी राष्ट्रीयता को बहुमतवाद या बहुमतीय सम्प्रदाय की साम्राज्यवादिता कहा जाये।

इन स्थापनाओं ने राष्ट्रीयता के संदर्भ में हमें सम्भ्रमित किया। अत: हमने द्वि-राष्ट्रवाद का विरोध करते हुए भी विभाजत द्वि-राष्ट्र को स्वीकार कर लिया। साम्प्रदायिकता के विरोध के नाम पर हम साम्प्रदायिक पृथकतावाद का पोषण करते हैं, राष्ट्रीय एकात्मता को बहुमतवाद कहते हैं। राष्ट्रवाद की तुलना हम पाश्चात्य फासीवाद व नाजीवाद से करते हैं। हिन्दू-मुसलमान के अतार्किक द्वैत को स्वीकार करते हैं। इस अतार्किक द्वैत की स्थापना के कारण सैंकड़ों भारतीय सम्प्रदायों की अस्मिता को ही नकारते हैं तथा मजहबांतरित सामी-धर्मियों की पृथकता को रेखांकित करते हैं। राष्ट्रीय संस्कृति के आह्वान से उन्हें विमुख करते हैं।

इन स्थापनाओं का निश्चित परिणाम होगा पुन: भारत विभाजन की यत्र-तत्र मांग उठेगी। कश्मीर में हम इसी पृथकतावाद को भोग रहे हैं। प्रासंगिक रूप से इस विषय पर दीनदयालजी के दो संदर्भों को हमें स्मरण करना चाहिये। प्रथम संदर्भ 1951 में जनसंघ के प्रथम अधिवेशन में उन्होंने प्रस्ताव रखा था, जिसमें उन्होंने आह्वान किया है:
''हिन्दू समाज का राष्ट्र के प्रति कर्त्तव्य है कि भारतीय जनजीवन के तथा अपने उन अंगों के भारतीयकरण का महान कार्य अपने हाथ में ले जो विदेशियों द्वारा स्वदेशपराभिमुख तथा प्रेरणा के लिये विदेशाभिमुख बना दिया गया है। हिन्दू समाज को चाहिए कि उन्हें स्नेहपूर्वक आत्मसात कर ले। केवल इसी प्रकार साम्प्रदायिकता का अंत हो सकता है और राष्ट्र का एकीकरण तथा दृढ़ता निष्पन्न हो सकती है।''

द्वितीय संदर्भ है जब उन्होंने विभाजित भारत के द्वि-राष्ट्रों के महासंघ निर्माण के लिये डा0 राम मनोहर लोहिया के साथ साझा वक्तव्य दिया :
''हमारा मत है कि हिन्दुस्तान की पृथकता कृत्रिम है। दोनों सरकारों के संबंध बिगड़ने का एक कारण उनकी टूटी दृष्टि व टूटी-फूटी बातचीत है। हम चाहते हैं कि दोनों सरकारें टुकड़े-टुकड़े में बातचीत न करके खुले मन से बात करें। इसमें समस्याओं का निराकरण हो सकेगा और पारस्परिक सद्भावना पैदा होकर ''हिन्द पाक महासंघ'' किसी न किसी रूप में बनने का क्रम शुरू हो सकेगा।''

हमारी भू-सांस्कृतिक राष्ट्रीयता का अधिष्ठान अखंड भारत है। भारत-पाक व बांग्लादेश के परिसंघ के रूप में उसे स्वीकार किया जा सकता है। भारत की पृथकतावादी साम्प्रदायिकता की पूंजीभूत सम्प्रभुता का नाम है पाकिस्तान और बांग्लादेश। भू-सांस्कृतिक राष्ट्रीयता में इन्हें विगलित करने की शक्ति है। भारत के मुसलमान भारत की राष्ट्रीयता अर्थात हिन्दुत्व के अभिन्न अंग हैं क्योंकि हिन्दुत्व एक मजहब निरपेक्ष संज्ञा है।

हिन्दू के अधिष्ठान पर भारत में थियोक्रेटिक स्टेट की स्थापना की बात अज्ञानमूलक है क्योंकि हिन्दुत्व के पास मुस्लिम या ईसाई के समान कोई पांथिक पुस्तक नहीं है, न कोई एक मसीहा तथा पैगम्बर। अत: भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही भारतीय एकात्मता को प्रतिबिम्बित करने वाला समाजशास्त्रीय सत्य है। हमें इसका साक्षात्कार करना चाहिये।
(लेखक प्रसिध्द चिंतक हैं एवं पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर गहन शोध कर चुके हैं)

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