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Wednesday 3 December 2008

राष्ट्र को जोड़ने का मंत्र है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद- राजनाथ सिंह

इसमें किसी को संदेह नहीं हो सकता कि भारत एक राष्ट्र के रूप में सदियों पहले विकसित हुआ था। प्राचीन काल में भारत की एक राष्ट्र के रूप में मान्यता थी।
'राष्ट्र' और 'राज्य' शब्द के अन्तर को पहचानने में भारी भूल हो गयी। अंग्रेजी के शब्द 'नेशन' का अनुवाद हिन्दी में राष्ट्र कर दिया गया जबकि 'राष्ट्र' एक विशुध्द सांस्कृतिक अवधारणा है। 'राज्य की सीमाओं को लांघ कर उत्तर के हिमालय से लेकर दक्षिण के सागर तट तक 'राष्ट्र' की भावना सदियों पहले विकसित हुई। हमारा वैचारिक दृष्टिकोण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत हैं। इस देश की एकता विद्रोहियों के बार-बार अतिक्रमण के बावजूद कभी केन्द्रित नहीं हुई। वह इस कारण संभव हो सका, क्योंकि इस देश में राजनीतिक एकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एकता थी। भारत पूरे संसार में एक मात्र भू-सांस्कृतिक राष्ट्र है। जिन देशों की एकता राजनैतिक कारणों से थी, वे बिखर कर अलग-अलग हो गये।
मध्‍यकाल में भी भारत की एक राष्ट्र के रूप में पहचान बनी रही। परन्तु अंग्रेजों ने यहां आने के बाद भारत की एक राष्ट्र के रूप में पहचान को धुंधला करने का प्रयास किया। उनके इतिहासकारों ने कहा ''भारत एक राष्ट्र कभी नहीं था। अंग्रेजों के आने के पश्चात् वह एक राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है। अंग्रेजों द्वारा दी गयी शिक्षा के प्रभाव में आकर कुछ भारतीयों ने भी यह कहना शुरू किया कि ''भारत देश एक राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है।''

यहां पर उनसे 'राष्ट्र' और 'राज्य' शब्द के अन्तर को पहचानने में भारी भूल हो गयी। अंग्रेजी के शब्द 'नेशन' का अनुवाद हिन्दी में राष्ट्र कर दिया गया जबकि 'राष्ट्र' एक विशुध्द सांस्कृतिक अवधारणा है। 'राज्य की सीमाओं को लांघ कर उत्तर के हिमालय से लेकर दक्षिण के सागर तट तक 'राष्ट्र' की भावना सदियों पहले विकसित हुई। हमारा वैचारिक दृष्टिकोण सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत हैं। इस देश की एकता विद्रोहियों के बार-बार अतिक्रमण के बावजूद कभी केन्द्रित नहीं हुई। वह इस कारण संभव हो सका, क्योंकि इस देश में राजनीतिक एकता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एकता थी। भारत पूरे संसार में एक मात्र भू-सांस्कृतिक राष्ट्र है। जिन देशों की एकता राजनैतिक कारणों से थी, वे बिखर कर अलग-अलग हो गये।

इस राष्ट्रीय भावना का हजारों वर्ष पहले भारत की धरती पर अंकुरण हुआ।
भारतीय राजनीति की भावी दिशा तय करने में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो चली है। भारतीय अस्मिता उसकी संस्कृति से जुड़ी है और इस तथ्य को आत्मसात किये बिना विश्व बिरादरी में भारत की अपनी पहचान नहीं हो सकती। आयातित मूल्य, आयातित विचार इन सबसे भारत का कल्याण नहीं हो सकता क्योंकि विकास का मजबूत ढांचा देश की भूमि से जुड़ने पर ही खड़ा हो सकता है। यह जुड़ाव वहां की संस्कृति ही दे सकती है। तब बनेगा गांधीजी और दीनदयालजी के सपनों का भारत और तभी आयेगा 'राम राज्य'।
यही कारण था जब भगवान राम को चौदह वर्ष का वनवास मिला तो उन्होंने अयोध्‍या के आसपास के जंगलों में वास करने की अपेक्षा उत्तर से सूदूर दक्षिण तक की यात्रा करके भारत की एकता का संदेश दिया। इसी तरह भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ। उन्होंने अपना राज्य गुजरात में द्वारका में स्थापित किया और महाभारत के युध्द में कुरूक्षेत्र की समरभूमि पर गीता का उपदेश दिया। ऐसे भगवान कृष्ण की रथ यात्रा पूर्व में जगन्नाथ पुरी में होती है और दक्षिण में तिरूमाला की पहाड़ियों पर भगवान व्यंकटेश के रूप में पूजा जाता है।

भगवान राम और कृष्ण इस देश के प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में निवास करते हैं और वे हमारी 'राष्ट्रीय' चेतना के दो प्रतीक हैं। इसी तरह भगवान शिव की आराधना दक्षिण में रामेश्वरम् से लेकर उत्तर में काशी तक होती है। पूरे भारत में बनी राष्ट्रीय चेतना की पहचान कर केरल में जन्में जगद्गुरु शंकराचार्य ने भारत के चार कोनों पर चार धामों की स्थापना कर भारतीय राष्ट्रीय चेतना को आकार देने का प्रयास किया। कहने का आशय यह है कि मात्र भगवान श्री श्रीकृष्ण का स्मरण करने से हम अपने आप में पूरे भारत के साथ जुड़ जाते हैं। इसी तरह मर्यादा पुरुषोत्ताम श्री राम का जीवन चरित्र प्रमुखता से उनका 14 वर्षों का वनवास क्षेत्र हमारी सांस्कृतिक एकता का परिचायक है।

कश्मीर घाटी में श्रीनगर के पास एक मंदिर है जिसे 'शंकराचार्य' के नाम से वहां के लोग जानते हैं। यदि भारत एक सांस्कृतिक इकाई नहीं थी तो शंकराचार्य को केरल से आगे निकल कर कश्मीर घाटी तक जाने की क्या आवश्यकता थी? कारण स्पष्ट है कि उत्तर से लेकर दक्षिण तक उन्हें एक ही चेतना दिखाई पड़ी जिसे हम भारतीयता, राष्ट्रीयता या हिन्दुत्व कोई भी नाम दे सकते हैं।

भारत की धमनियों में एक अदृश्य चेतना बहती है और वह चेतना इतनी प्रेरक है कि जहां बड़े से बड़ा व्यक्ति भी लाख प्रयत्नों और बड़ी विनतियों के बाद कुछ हजारों या अधिक से अधिक कुछ लाख व्यक्तियों को एकत्रित कर पाता है। वहीं दूसरी ओर बिना किसी प्रयास के कुम्भ मेले में करोड़ों लोग भारत के कोन-कोने से पहुंचते थे। कहीं कोई निमंत्रण-पत्र नहीं छपा, कहीं किसी ने हाथ नहीं जोड़े। फिर भी करोड़ों व्यक्तियों का एकत्रीकरण हो गया। यही है भारत के राष्ट्र होने की पहचान और उनकी चेतना। आशय यह है कि भारत ही अकेला राष्ट्र है जो अपनी अमूल्य सनातन सांस्कृतिक परम्पराओं के कारण ही एकसूत्र में बंधा हुआ है।

इस चेतना को कोई कैसे भुला सकता है, और अपनी जड़ों को काट कर भला कोई समाज कैसे जीवित रह सकता है? भारत की संस्कृति जिन मूल्यों और आदर्शों की वकालत करती है वे दुनिया के ऊंचे मानदण्ड है। पश्चिमी उदाहरण, पश्चिमी सोच और पश्चिमी ढांचे से भारत की भलाई नहीं हो सकती। किसी भी देश के विकास के पीछे जरूरी है वहां की धारती से निकले विचारों पर खड़ा हुआ एक मजबूत ढांचे का अस्तित्तव।

हम भारतीय विचारों और अवधारणाओं के अनुरूप राजनीति करने का प्रयास करते हैं। स्वतंत्र भारत में भाजपा को छोड़कर भारतीय मूल्यों और आदर्शों के उच्च मानदण्डों की राजनीति करने वाला और कोई राजनीतिक दल नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है कि भाजपा भारत की मिट्टी से उपजा, भारतीय लोगों द्वारा स्थापित और भारतीय मान्यताओं को मानने वाला दल है।

जबकि प्रमुख विरोधी दल कांग्रेस का जन्म ही एक विदेशी ए.ओ. ह्यूम के हाथों हुआ था और उसका नेतृत्व फिर विदेशी मूल के हाथों में हैं। रही बात वामपंथी दलों की तो उनके विचार और प्रेरणास्रोत सब आयातित हैं। रूस में बारिश होने पर भारत में छतरी तानने वाले वामपंथी ही यह कहने का दुस्साहस कर सकते हैं कि 'धर्म एक अफीम है।'

दुनिया के बाकी देशों की स्थिति पर विचार करने के बजाय यदि भारत का ही विचार किया जाये तो हम पायेंगे कि 'धर्म गुरु' कहलाने वाले भारत की नस-नस में ही धर्म है। धर्म 'रिलीजन' जैसा संकुचित नहीं है जैसा वामपंथी या अन्य पश्चिमी विचारक समझते हैं। अब भारतीय धर्म और संस्कृति को गाली देने वाले रूस और चीन में तो सुने जा सकते हैं मगर भारत में उनकी दाल नहीं गलने वाली। वामपंथ का सिकुड़ता जनाधार इसी बात का परिचायक है। कांग्रेस के साथ भी सबसे बड़ी समस्या यही है कि पश्चिमी विचारों को ही वह अपना समझती है और उसी रंग ढंग से ढली है, जबकि भारतीय जनता पार्टी हमेशा से कहती चली आई है कि हम इस देश के राष्ट्रीय सांस्कृतिक मूल्यों के वाहक हैं। हमारे प्रत्येक नेता और कार्यकर्ता की यही अन्त:प्रेरणा है।

राष्ट्र एक भावात्मक 'स्वरूप' है। रूप नहीं। रूप बाहर-बाहर होता है। स्वरूप आन्तरिक चेतना है। बाहर-बाहर यह देश भूमि, जनता और राज्य व्यवस्था का योग है। लेकिन आन्तरिक रूप में यह एक दिव्य चेतना है। चेतना का यह साक्षात्कार युगों-युगों से सामूहिक चिन्तन का फल है। इसे ही हम भारत में अपनी संस्कृति कहते हैं। यहां जीव, आत्मा, चिति और विराट का साक्षात हुआ है। धर्म यहां बंधनकारी नहीं है। सारे पंथ अनुशासन देते हैं। भारत का धर्म आत्म अनुशासन देता है। यह बांधता नहीं मुक्त करता है। ऋग्वेद से उपनिषद, महाभारत और रामायण तक यही धारा चली। गौतम बुध्द और आदि शंकराचार्य ने अपनी-अपनी बोली सत्य तत्तव ही बताया। पं. दीनदयाल उपाध्‍यायजी ने राजनीति में पहली बार कोई सर्वांगपूर्ण दर्शन को राजनीति का अधिष्ठान बनाया जिसे आगे चलकर उन्होंने एकात्मवाद के रूप में सभी के समक्ष रखा। 'एकात्म मानववाद' पूरी तौर पर भारतीय संस्कृति पर आधारित है। अब हमें यहां संस्कृति को समझना होगा।

संस्कृति का अर्थ होता है सम्यक कृति। सम्पूर्ण जीवन कर्म का सत्य, शिव और सौंदर्य ही हमारी संस्कृति है। प्राचीन परम्परा का 'संस्कार' शब्द ही सामूहिक कर्म के रूप में भारतीय संस्कृति है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारतीय राष्ट्रीय जीवन मूल्यों का समुच्चय है। सम्पूर्ण सत्य, सम्पूर्ण शिव और सम्पूर्ण सुन्दर इसमें खिलता हैं। यह वोट की राजनीति का खेल नहीं है। इसमें गांधीवादी समाजवाद शामिल है। इसमें भारत के आदर्श रामराज्य की अवधारणा है। यह मजहबी राज्य की कल्पना से पृथक स्वाभाविक लोकतांत्रिक अवधारणा है। यह किसी के विरूध्द नहीं है। सबके साथ है। सब इसमें समाहित हैं।

कभी-कभी देश और राज्य को राष्ट्र के स्थान पर व्यवहार करते देखा गया है परन्तु यह उचित व्यवहार नहीं है। देश दिशा से आकृत है। वह भौगोलिक सीमाओं से निर्दिष्ट है। राष्ट्र एक भावनात्मक शक्ति है। वो प्रेरणा का स्रोत है और युग-युग से मानव के मर्मस्थल में टिका हुआ है। वह सुप्त होकर भी जागृत हैं। इसका एक ही कारण है कि एक राष्ट्र के हृदय में संस्कृति की अमर आत्मा का निवास है। देश की सीमा घटती-बढ़ती है परन्तु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का कभी क्षरण नहीं होता। वह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर है और विराट से विराटतर है और जन-जन के जीवन में श्रध्दा और निष्ठा के रूप में सदा सर्वदा वर्तमान है। काल और देश को सीमाएं तो प्रभावित नहीं कर सकती है।

राष्ट्र की पहचान तभी होती है जब इतिहास में कोई सुखदायी या दुखदायी घटना होती है। हल्दीघाटी की लड़ाई हो या प्लासी का युध्द। राष्ट्र को क्या पीड़ा थी और पीड़ा को किसने झेला, यह कहने की आवश्यकता नहीं है। हल्दीघाटी में आज भी जाने से हम क्या अनुभव करते हैं वह तो वही राष्ट्रभक्त कह सकता है जो इस ऐतिहासिक आघात की सहन पीड़ा को स्वयं पी गया है। घास की रोटियां खानी पड़ी, बच्चे बिलखते रहें, परन्तु उन रोटियों का इतिहास स्वर्ण अक्षरों में लिखा है, उसे मिटाने की शक्ति प्रचण्ड महाकाल में नहीं है। ठीक उसके विपरीत मानसिंह का भी महल है जिसके अपवित्र और अभिशप्त दीवारों की सिसकियों से सारा वातावरण विवादमय बना हुआ है। आप स्वयं समझ सकते हैं कि कौन कार्य राष्ट्रीय है और कौन अराष्ट्रीय है।

भारतीय संस्कृति के सर्वोच्च आदर्शों में से एक है ''एकं सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति'' यानि सत्य तो एक ही परन्तु विद्वान उसे भिन्न-भिन्न तरह से कहते हैं। इसलिए भारतीय विचारों में कभी दुराग्रह नहीं रहा है कि हम ही सही हैं। इस देश में सदियों से माना जाता है कि ''यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे'' अर्थात् जो पिण्ड में है वहीं ब्रह्माण्ड में है, जो आत्मा में है वही परमात्मा में है और जो तेरे में है वहीं मेरे में है। ऐसी है भारत की उदात्त संस्कृति। यही भारतीय संस्कृति आगे बढ़ कर कहती है ''वसुधैव कुटुम्बकम्'' यानि पूरा विश्व एक परिवार सरीखा है। इसलिए भारत ने कभी भी देशों को जीतने के प्रयास नहीं किये क्योंकि हमारा संदेश विश्व बन्धुत्व का रहा है।

ऐसे उदात्त और ऊंचे आदर्शों से ओत-प्रोत भारतीय संस्कृति पर गर्व करने के बजाय उसे 'संकुचित दृष्टिकोण' कहने का कार्य विरोधी राजनीतिज्ञ करते रहे हैं। इसके पीछे उनके निहित स्वार्थों के साथ उनका संकुचित दृष्टिकोण और तोड़ने वाली राजनीतिक विचारधारा है। यही कारण है जब हम राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विचारधाारा की बात करते हैं तो उन्हें लगता है कि हम जोड़ने के बजाय तोड़ने की बात करते हैं। उन्हें सम्भवत: इसका ज्ञान नहीं है कि संस्कृति का स्वरूप ही 'सम्यक' हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने सच ही लिखा है कि 'जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी'। इसलिए भारतीय संस्कृति और राष्ट्र की बात करने पर वामपंथी को विभाजन दिखाई पड़े तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

राजनीति का स्वरूप जल की भांति होता है जो व्यक्ति या संगठन के अनुरूप ही आकार लेती है। जब भगवान राम ने राजनीति का सहारा लिया तो वह 'भक्ति' हो गयी जब श्रीकृष्ण ने उसे अपनाया तो वह 'युक्ति' हो गयी और जब सुभाष बोस ने उसे अपनाया तो वह 'शक्ति' बन गयी। भारतीय जनता पार्टी पंडित दीन दयाल उपाधयाय के 'एकात्म मानववाद' और भारत की राष्ट्र एवं संस्कृति से ओत-प्रोत विचारों पर आधारित राजनीति का सहारा लेकर उसे 'मुक्ति' का स्वरूप देना चाहती है। जबकि कांग्रेस और वामपंथियों की राजनीति का स्वरूप 'विपत्ति' और 'सम्पत्ति' से जुड़ा हुआ है।

भारतीय राजनीति की भावी दिशा तय करने में राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो चली है। भारतीय अस्मिता उसकी संस्कृति से जुड़ी है और इस तथ्य को आत्मसात किये बिना विश्व बिरादरी में भारत की अपनी पहचान नहीं हो सकती। आयातित मूल्य, आयातित विचार इन सबसे भारत का कल्याण नहीं हो सकता क्योंकि विकास का मजबूत ढांचा देश की भूमि से जुड़ने पर ही खड़ा हो सकता है। यह जुड़ाव वहां की संस्कृति ही दे सकती है। तब बनेगा गांधीजी और दीनदयालजी के सपनों का भारत और तभी आयेगा 'राम राज्य'।
(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय अध्‍यक्ष है और भारत सरकार के कृषि मंत्री रहे हैं)

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