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Tuesday, 4 December, 2007

नंदीग्राम पर ऐसे कब्जा जमाया माकपा ने

भाड़े के सिपाहियों, अपराधियों के हाथों में थी माकपाई सेना की कमान।

माकपा ने नंदीग्राम पर फिर से कब्जा कर लिया है। पार्टी का दावा है कि तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाली भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति (बीयूपीसी) का गढ़ रहे इस इलाके के तकरीबन सभी गांवों पर कई किलोमीटर लंबा जुलूस निकालकर उसने अपन झंडा गाड़ दिया है। यह संभव हुआ है माकपा की निजी सेना के जरिए।

एक हफ्ते तक चले ऑपरेशन को सफल बनाने के लिए ते-तर्रार निजी सेना बनाई गई। कैसी हे यह निजी सेना? डीएनए-भास्कर ने यह पता लगाने के लिए नंदीग्राम के लोगों, पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से बात की।

दुर्गापूजा के बाद हुई प्लानिंग: पिछले माह दुर्गा पूजा महोत्सव खत्म होने के तत्काल बाद माकपा का शीर्ष नेतृत्व कार्यकर्ताओं के भारी दबाव में आ गया था। कार्यकर्ता हाथ से निकल चुके नंदीग्राम पर फिर से कब्जा करना चाहते थे। स्थानीय नेताओं को आशंका थी कि नंदीग्राम के हाथ से निकल जाने पर अगले साल होने वाले पंचायत चुनावों में इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा। माकपा के बड़े नेता कोई बड़ा प्रशासनिक कदम नहीं उठाना चाहते थे, क्योंकि पिछली बार नंदीग्राम में पुलिस तैनात करने के बाद फायरिंग में 14 लोगों की मौत हो गई थी। ऐसे में विकल्प के तौर पर तय किया गया कि नंदीग्राम से संबंधा रखने वाले राज्य के एक मंत्री और एक सांसद को पार्टी मुख्यालय बुलाया जाए।

थोड़े समय में ही सेना तैयार: 'केशपुर लाइन' के आधार पर समूचे ऑपरेशन का बड़ा आक्रामक ब्लूप्रिंट तैयार किया गया। 29 अक्टूबर से 3 नवंबर तक के संक्षिप्त समय में ही माकपा ने निजी सेना खड़ी कर दी। वॉर रूम का प्रबंधान पूर्वी मिदनापुर के पार्टी जिला अधयक्ष अशोक गुरिया ने संभाला। उनके साथ थ, नंदीग्राम में छह जनवरी का अपनी जान गंवाने वाले पार्टी नेता शंकर सामंत के भाई नव कुमार सामंत। यह तय हुआ कि पार्टी कार्यकर्ता इस सेना के पैदल सिपाही होंगे और बाहरी लोग पहले हमला बोलेंगे।

कुख्यात अपराधियों से सजी सेना: कार्यकर्ताओं के काडर पडोस के गरबेटा और चन्द्रकोण से लाए गए। प्लाटून को कुख्यात और स्थानीय अपराधियों से सजाया गया। तपन घोष और सुकुर अली जैसे भूमिगत नेताओं की विशेषज्ञता का लाभ लिया गया। घोष और अली छोटा अंगारिया में तृणमूल कार्यकर्ताओं को जलाने के मामले में सीबीआई के मोस्ट वांटेड अपराधी हैं।

गोला-बारूद का प्रबंध: पड़ोस के बांकुडा जिले के ओंडा और राजपुर तथा बिहार-झारखंड से भी काडर बुलवाए गए। टी को पड़ोसी राज्यों से हथियार व गोला-बारूद नंदीग्राम तक पहुंचाने का जिम्मा सौंपा गया।

'पुलिस कुछ न करें': चार नवंबर को माकपा मुख्यालय ने निजी सेना को हरी झंडी दिखा दी। नंदीग्राम थाने का खास निर्देश दिए गए कि वह किसी भी हालत में पुलिस न भेजे। पांच नवंबर को पूर्वी मिदनापुर के एसपी ने ऑन रिकार्ड कहा कि उन्हें सुरक्षाबल नंदीग्राम भेजने के निर्देश नहीं हैं।

...और शुरू हुआ अभियान: छह नवंबर को सेना की एक टुकड़ी ने नंदीग्राम की ओर कूच किया। तलपट्टी नहर की टेखाली पुलिया पार कर उसने भांगबेरा में विरोधियों पर फायरिंग शुरू की लेकिन यह तो महज एक दिखावा था। बड़ी टुकड़ी नहर पार कर गरचकबेरिया और सतेंगोबरी की तरह बढ़ गई। यह बड़ी सेना विरोधिायों पर भारी पड़ी और गांव के गांव सेना के कब्जे में आते चले गए। विरोधियों और उनके समर्थकों को माकपा सेना ने बंधक बना लिया।

आठ नवंबर को सेना भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के मजबूत गढ़ सोनाचूरा की ओर बढ़ने को तैयार थी। कहीं से कोई विरोधा नहीं था। क्यों? क्योंकि सेना के साथ सबसे आगे बंधक चल रहे थे, उनके पीछे माकपा काडर और फिर स्वचालित हथियारों से लैस सेना के 'सिपाही'। खुद के लोगों को बंधक बना देख बीयूपीसी के दस्तों ने गोली चलाने की हिम्मत नहीं की। अंतत: 10 नवम्बर को नंदीग्राम फिर से माकपा के कब्जे में आ चुका था। (साभार: दैनिक भास्कर)

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