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Wednesday 3 October 2007

नन्दीग्राम चाहता है, बुध्ददेव को फांसी हो : मेधा पाटेकर



नन्दीग्राम की क्या हालत है, बाहर से इसका अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। मैं इससे पहले भी वहां गई थी। मैंने वहां के लोगों का संकल्प, संघर्ष की मानसिकता देखी थी। लेकिन इस बार जो देखा, उसकी किस घटना से तुलना करूं, यह मेरी सोच से बाहर है। नन्दीग्राम मैं देख आई। जिलाशासक, अनूप अग्रवाल की भाषा और सीपीएम के नेताओं की भाषा हूबहू एक जैसी! नहीं, यह सोच से बाहर है। इससे पहले जॉर्ज बुश ने जो तर्क देकर, इराक में फौजों को घुसाया था, वही भाषा राज्य प्रशासन की जुबान पर भी गूंज रही है। ये वही लोग हैं, जो बुश के पुतले जलाते हैं। हाल में जो घटनाएं घटीं, अगर वे सब न घटी होतीं, तो सीपीएम के भ्रष्टाचार और तानाशाही का मुखौटा या नकाब कभी भी नहीं दिख सकता। मेरे साथ थे डी थंकप्पन, बी डी शर्मा, जी एन साइंबाबा की तरह सर्वभारतीय जन-आंदोलन के कर्मचारीगण! उन लोगों ने यह सब अपनी आंखों से देखा। मैं चाहती हूं कि नन्दीग्राम की वास्तविक तस्वीर अपने समस्त देशवासियों के सामने पेश करूं।

उस दिन पुलिस और सीपीएम के कैडर एक साथ घुस आए थे। उस वक्त गांव की महिलाएं गौरांग का नाम-जाप कर रही थीं। और मुस्लिम लोग कुरान-पाठ कर रहे थे। किसी भी हाल में वहां संघर्ष की स्थिति नहीं थी। पुलिस और सीपीएम कैडरों ने इन्हीं निहत्थे लोगों पर हमला बोल दिया। हम सबने सोनाचूड़ा समेत कई गांवों का चक्कर लगाया। नन्दीग्राम प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, जिला अस्पताल से होते हुए, हम कलकत्ता स्थित एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती घायल लोगों से मिले और उन लोगों से बातचीत की। गोकुल नगर के अधिकारी मुहल्ले की महिलाओं के साथ, पुलिस ने 14 तारीख को ही दर्ुव्यवहार किया था। 16 तारीख को, जिस वक्त इलाके के मर्द घर पर नहीं थे, उन लोगों की गैर मौजूदगी में सीपीएम कैडरों की फौज औैर पुलिस एक साथ गांव में घुस आई और औरतों के साथ बलात्कार किया। जैसे साम्प्रदायिक दंगे-फसाद में सबसे पहले औरतें ही बर्बरता का शिकार होती हैं, जैसे महिलाओें की इज्जत लूटकर, हमलावर प्राथमिक जय अर्जित करते हैं, नन्दीग्राम में भी उसी तरह की पाशविक-लीला का प्रदर्शन हुआ। 'विकास की दस्यु-फौज' के हाथों, आक्रांत, बलात्कार की शिकार महिलाएं, तमलुक के अस्पताल में भर्ती थीं। हम सब उन औरतों से मिले। उन लोगों की प्राथमिक डाक्टरी जांच किए बिना ही, डॉक्टरों ने फैसला दे दिया कि बलात्कार हुआ ही नहीं। जाहिर है, ये डॉक्टर काफी दबाव में थे।

नन्दीग्राम में बहुतेरे लोग अभी तक लापता हैं, हालांकि राज्य सरकार इसे दबा जाने की कोशिश कर रही है। पश्चिम बंगाल शायद इससे भी एक कदम आगे बढ़ गया है और इसने एक नया तरीका ईजाद किया है। मैंने सुना कि यहां इनसान को कत्ल करके, उसका पेट चीरकर पानी में डुबा देते हैं। नतीजा यह होता है कि लाश जल के ऊपर नहीं आती। तालपट्टी नहर में ऐसे कितने ही लोगों को मारकर, उनका पेट चीरकर बहा दिया गया, इसका हिसाब शायद किसी भी दिन नहीं लगाया जा सकेगा। एक बच्ची को चीरकर, उसके दो टुकड़े कर दिए गए। इसकी तो कल्पना तक नहीं की जा सकती। शुरुआती जांच करके, हमने ऐसे 16 लोगों के नामों का पता लगाया है। देवव्रत खांडा, सुजित माइती, अनिमेष अधिकारी समेत वे तमाम लोग कहां हैं? इसका जवाब कौन देगा? जो लोग जिंदा बच गए, उन लोगों की हालत भी बयान-बाहर है। राधा रानी नामक एक महिला की योनि में रॉड घुसेड़कर उसे चीर दिया गया है। बलात्कार की शिकार, अधमरी इन लोगों को अस्पताल नामक नर्क में आखिर क्यों फेंक रखा गया है? राज्य सरकार को तो बहुत पहले ही चाहिए था कि इन लोगों को कलकत्ता लाकर, किसी अस्पताल में उन लोगों का इलाज कराते। आज जब लिखने बैठी हूं तो उन घटनाओं की याद आते ही आंखें भर आई हैं। पश्चिम बंगाल के माननीय राज्यपाल से मेरा यही निवेदन है कि आप संवेदनशील व्यक्ति हैं। वे उन लोगों के उध्दार की तत्काल व्यवस्था करें। राज्य सरकार पर अब हमें भरोसा नहीं रहा। सिविल सोसायटी की मदद से इस त्राण-बंटन का इन्तजाम करना भी जरूरी है। हम सबने आपस में चन्दा करके सामूहिक कैंटीन खोलने के लिए 11 हजार रुपए जमा किए हैं। लेकिन जितने पैसों की जरूरत है, उसकी तुलना में ये रुपए काफी कम है। इस बार जब नन्दीग्राम गई, तो वहां के लोगों ने एक और मांग पेश की। जिन माताओं की गोद सूनी हो गई है, उन लोगों ने मांग पेश की-खूनी बुध्ददेव को फांसी दी जाए। मैं खुद मृत्युदंड के विरुध्द हूं। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस ढंग से धनंजय को फांसी दी गई थी, बलात्कार और कत्ल के अपराध में, उसी तरह इसी किस्म के अपराध में मुजरिम, बुध्ददेव को भी फांसी की सजा होनी चाहिए। उन लोगों का बयान था कि धनंजय चूंकि गरीब था, इसलिए उसको फांसी दे दी गई और बुध्ददेव में चूंकि क्षमता है, इसलिए उन्हें सजा नहीं मिलेगी? मैं उनकी बातों का कोई जवाब नहीं दे पाई।

सीबीआई की जांच जैसे चल रही है, चले। इसके साथ हमारी मांग है कि विचार-विभागीय जांच भी शुरू की जाए। आगामी सोमवार से ही हम लोग दिल्ली के जन्तर-मन्तर में अनशन पर बैठ रहे हैं। हम लोग नन्दीग्राम, सिंगुर के आन्दोलन से हरगिज पीछे नहीं हटेंगे। मुझे लगता है कि वाम-फ्रंट की मीटिंग द्वारा की गई घोषणा नन्दीग्राम के लोगों की आंशिक विजय है। नन्दीग्राम अब किसी दिन भी केमिकल हलचल नजर नहीं आएगी, राज्य सरकार को यह घोषणा करनी होगी। सिंगूर से भी अपने पंजे हटाने होंगे। सिंगूर के लोगों को उनके खेत-खलिहान लौटाने होंगे। सीपीएम, समूचे भारत में सेज के बारे में आन्दोलन करती हुई घूम रही है। इस पश्चिम बंगाल में वह आंदोलन कहां है? यह तो एक ही पार्टी की दोमुंही नीति है। हमने सभी वामपंथी बुध्दिजीवी लोगों के सामने सीपीएम की इस दोमुंही नीति को दिखाया है। बहुत से लोग इस पार्टी का असली चेहरा पहचान गए हैं। लेकिन अभी और लोगों को भी उनका असली चेहरा पहचानना बेहद जरूरी है।


(हिन्दी रूपान्तर : सुशील गुप्ता, साभार : वर्तिका)

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