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Monday, 3 December, 2007

बंगाल के वामपंथी किस राह पर? : संतोष कुमार मधुप

यूं तो भारत में वामपंथ हमेशा से दिशाहीन और अपनी प्रकृति के प्रतिकूल रहा है लेकिन वामपंथ और वामपंथियों की वर्तमान दशा को देख कर पुराने वामपंथी जरूर चिंतित और चकित होंगे। इस देश में वामपंथ कभी भी सर्वमान्य न था और न कभी हो पाएगा। जिन गिने चुने इलाकों में उनका प्रभाव था वो भी अब खत्म होने के कगार पर है। पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहाँ पिछले तीन दशकों से वामपंथियों का शासन है। इसका ये मतलब कतई नहीं है कि यहाँ की जनता उन्हें पसन्द करती है या उनके सिध्दांत यहाँ बहुत लोकप्रिय है। मुमकिन है दो दशक पहले यह स्थिति रही हो। लेकिन यदि पिछले दस-बीस सालों की बात करें तो बंगाल में ना तो वे लोकप्रिय हैं और ना ही आम आदमी पर उनका विशेष प्रभाव है। यहाँ है तो सिर्फ उनका आतंक और भय। अक्सर लोगों को कौतूहल होता है कि बंगाल की जनता माकपा और उसके सहयोगी दलों को उनकी किस खूबी के कारण 30 सालों से समर्थन देती आ रही हैं। सच तो यह है कि जनता समर्थन देती नहीं बल्कि उनसे समर्थन लिया जाता है- जबरन, भय दिखा कर, बम और गोलिया चला कर। यहाँ के वामपंथी शासक हर फन में माहिर हैं। पुलिस प्रशासन का अपने हक में इस्तेमाल करना, सरकारी धन से वोट खरीदना, विपक्ष को विखंडित रखना यह सब इन्हें बखूबी आता है। पुलिस का जितना बेजा इस्तेमाल बंगाल में होता है, देश के किसी और राज्य में शायद ही होता हो। अब तक राज्य की जनता इनके जुल्मों सितम खामोशी से सहती रही, लेकिन सिंगूर और नन्दीग्राम की घटना ने उन्हें झकझोङ कर रख दिया। अब वे वामपंथी सरकार से वगावत करने को तैयार नजर आ रहे हैं। जनाक्रोश का जो चरमोत्कर्ष इस वक्त यहाँ देखने को मिल रहा है उससे मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य की सांसे हलक में फँसी हुई है। वाम मोर्चे के चेयरमेन विमान बसु की घबराहट छुपाए नहीं छुप रही। माकपा के सहयोगी दल अपना दामन बचाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं और सारा दोष माकपा के सर डाल रहे हैं। वामपंथी खेमे में हर तरफ अफरातफरी और बौखलाहट साफ नजर आ रही है।

इस बौखलाहट में ये लोग ऐसी गलतियां कर रहे हैं जो ना सिर्फ उनके लिए बल्कि प. बंगाल में वामपंथ के भविष्य के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता है। मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य को ही लें। जिस नंदीग्राम में हर सवेरा खूनी जंग की सौगात लेकर आता है वहाँ वे नया सूरज उदित होने की बात करते हैं। जिस तरह पाकिस्तान कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को जायज ठहराने की नापाक कोशिश करता रहता है ठीक उसी तरह बुध्ददेव और विमान नन्दीग्राम में माकपा समर्थकों द्वारा फैलाए जा रहे आतंक को उचित ठहराने का दुस्साहस तक कर चुके हैं।

नन्दीग्राम को लेकर राज्य में माकपा की जो फजीहत हो रही है वह किसी से छुपी नहीं है। राज्यपाल की ओर से केन्द्र को जो रिपोर्ट भेजी गई है उसमे साफ कहा गया है कि राज्य में कानून व्यवस्था की हालत खस्ता है। उधर उच्च न्यायालय ने भी राज्य में कानून व्यवस्था की बदहाली के लिए सीधे तौर पर राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। स्वयं प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह भी नन्दीग्राम की स्थिति पर अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं। जहाँ तक मीडिया का सवाल है तो वो काफी पहले से ही सरकार के खलाफ मुखर है। इन सब बातों ने राज्य के माकपा नेतृत्व को इस कदर हिला कर रख दिया है कि वे विक्षिप्तों जैसी हरकतें करने लगे हैं। माकपा नेता विमान बसु और विनय कोंगर ने जिस भाषा में उच्च न्यायालय के न्यायधीश और राज्यपाल की आलोचना की है वह उनके मानसिक दिवालियेपन का ही परिचायक है। उन्हें ना तो न्यायपालिका की मर्यादा की चिन्ता है और ना ही राज्यपाल पद की गरिमा का भान है। न्यायधीशों का वेतन बढाने की बात करने वाले विमान बाबू को शायद यह भी पता नहीं राज्य के हजारों सरकारी कर्मचारियों को महीनो इन्तजार के बाद वेतन मिलता है।

दूसरी ओर बुध्ददेव बाबू राज्य में माकपा की काली करतूतों को जनता तक पहुँचाने वाले संवाद माध्यमों से बेहद खफा हैं। पिछले दिनो उन्होंने भरे पत्रकार सम्मेलन में एक बांग्ला दैनिक के प्रतिनिधि को संबोधित कर अपनी खीझ कुछ यूँ जाहिर की - आपका अखबार पिछले 11 महीनो से नन्दीग्राम के बारे में गलत और भ्रामक खबरें छाप कर लोगों को हिंसा के लिए उकसा रहा है। कोई दूसरी सरकार होती तो आपके अखबार को प्रतिबंधित कर दिया जाता। हम कीचङ में हाथ डाल कर अपने हाथ गंदे नहीं करना चाहते..........। खुद को कवि और साहित्यकार समझने वाले मुख्यमंत्री के मुँह से इस कदर तुच्छ शब्दों वाली टिप्पणी सुन कर मीडिया के साथ साथ संपूर्ण बुध्दिजीवी वर्ग आहत हुआ। ये अलग बात है कि अगले ही दिन उस दैनिक के संपादक ने बुध्ददेव बाबू के बयान की तीखी आलोचना करते हुए जब उन्हें दैनिक के खिलाफ कार्रवाई करने की खुली चुनौती दी तो उनकी बोलती बंद हो गई।

ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिनसे कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि बंगाल के वामपंथी नेता अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं। बंगाल में वामपंथियों की इस कदर बौखलाहट कहीं उनके पतन का संकेत तो नहीं? अपनी जङों को तो ये खुद ही खोखला कर चुके हैं, अब जो कुछ सूखी-अधसूखी डालियाँ बची हैं वे भी जनाक्रोश के इस तूफान में टूट कर बिखर सकती हैं।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

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