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Saturday 27 September 2008

मार्क्‍सवाद और किसान

लेखक- बनवारी

यह केवल संयोग नहीं है कि सिंगूर के मामले में पश्चिम बंगाल की मार्क्‍सवादी सरकार किसानों के बजाय एक औद्योगिक घराने का पक्ष ले रही है। पश्चिम बंगाल का उद्योगीकरण किसानों के हितों को चोट पहुंचाए बिना भी हो सकता है। लेकिन मार्क्‍सवादी विचारधारा में किसानों की कोई खास हैसियत नहीं है।

सिंगूर के मामले में पश्चिम बंगाल की मार्क्‍सवादी सरकार किसानों के बजाय एक औद्योगिक घराने का पक्ष ले रही है। पश्चिम बंगाल का उद्योगीकरण किसानों के हितों को चोट पहुंचाए बिना भी हो सकता है। लेकिन मार्क्‍सवादी विचारधारा में किसानों की कोई खास हैसियत नहीं है।
इसलिए किसानों और किसान परिवारों से निकले छोटे उद्योग-धंधे चला रहे लोगों के बल पर पिछले तीस साल से सत्ता में पहुंचती रही वाम मोर्चा सरकार नंदीग्राम और सिंगूर दोनों जगह उन्हें अनदेखा कर सकी। उसके लिए नंदीग्राम और सिंगूर दोनों जगह अपनी कृषिभूमि के अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसान राज्य की प्रगति के शत्रु हैं। पूरे आंदोलन के दौरान उसे किसानों के अधिकारों की सुध नहीं आई, वह ममता बनर्जी के राजनीतिक उभार को लेकर चिंतित रही।
अगर ममता बनर्जी न होतीं तो सशस्त्र स्थानीय मार्क्‍सवादी काडर वहीं गति करता जो वर्ग शत्रुओं की की जाती है। नंदीग्राम में तो उसने एक हद तक यह कर ही दिया था।
अगर ममता बनर्जी न होतीं तो सशस्त्र स्थानीय मार्क्‍सवादी काडर वहीं गति करता जो वर्ग शत्रुओं की की जाती है। नंदीग्राम में तो उसने एक हद तक यह कर ही दिया था, जिससे विचलित होकर राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी को हिंसा के खिलाफ बयान देना पड़ा। उसी दिन से वे राज्य के मार्क्‍सवादियों की आंख की किरकिरी बन गए थे।

मार्क्‍सवादियों के इस व्यवहार से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। मार्क्‍सवाद और पूंजीवाद दोनों का ही जन्म यूरोपीय समाज को शीघ्रतापूर्वक औद्योगिक समाज में बदलने के लिए हुआ था। इस उद्देश्य के लिए पूंजीवादी पूंजी और उसके स्वामियों की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण मानते थे और मार्क्‍सवादी मजदूरों को संगठित करके सर्वहारा की तानाशाही स्थापित करने की वकालत करते रहे। उनके इस उद्देश्य में किसानों की भूमिका उद्योगीकरण के लिए साधन जुटाने वाले वर्ग से अधिक नहीं थी। पूंजीवादी व्यवस्था में तो बाजार के अप्रत्यक्ष नियंत्रण द्वारा उनका शोषण हुआ होगा, मार्क्‍सवादियों ने उनके साथ जो किया उनके वर्णन लोमहर्षक हैं।
स्तालिन के शासनकाल में सोवियत रूस के उद्योगीकरण के लिए 'सरप्लस' जुटाने का काम लाखों किसानों को क्रांति विरोधी बताते हुए मौत के घाट उतार कर या गुलाग श्रम शिविरों में सड़ने के लिए भेज कर किया गया था। 1932 में यूक्रेन के अकाल में ही पचास लाख लोगों को मर जाने दिया था, जबकि सरकार के गोदामों में अनाज भरा पड़ा था।
स्तालिन के शासनकाल में सोवियत रूस के उद्योगीकरण के लिए 'सरप्लस' जुटाने का काम लाखों किसानों को क्रांति विरोधी बताते हुए मौत के घाट उतार कर या गुलाग श्रम शिविरों में सड़ने के लिए भेज कर किया गया था। 1932 में यूक्रेन के अकाल में ही पचास लाख लोगों को मर जाने दिया था, जबकि सरकार के गोदामों में अनाज भरा पड़ा था।

लेकिन मार्क्‍सवादी इतिहासकारों को अपने सिध्दांतों और अपनी सबसे पहले स्थापित हुई क्रांतिकारी व्यवस्था के चेहरे पर यह कोई दाग नहीं लगता। क्योंकि उनकी प्रगति की कहानी में यह एक छोटा-सा अंधेरा कोना भर है। शायद रूस के लोगों को अपने उस इतिहास पर कुछ ग्लानि रही भी हो, भारत के मार्क्‍सवाद तो आज भी अपने आपको स्तालिनवादी कहने और कहलवाने में गौरव ही महसूस करते हैं। हालांकि अब वे रूस को अंतरराष्ट्रीय मार्क्‍सवाद के नेता का दर्जा नहीं देते क्योंकि उनकी निगाह में स्तालिन के रास्ते से हटकर रूस संशोधनवादी हो गया है। मार्क्‍सवादियों के नए आदर्श चीन का भी किसानों के बारे में कोई बहुत बेहतर दृष्टिकोण नहीं है। चीन ने कल तक ग्रामीण क्षेत्रों से लोगों के शहरों में आकर बसने पर सख्त पाबंदी लगाई हुई थी और चोरी-छिपे ऐसा करने वालों का सख्ती से दमन किया जाता रहा। ऐसा दुनिया के किसी और देश में शायद ही संभव हो सकता हो।

मार्क्‍सवादी रणनीति में जहां मजदूर न हों वहां वर्ग संघर्ष चलाने के लिए किसानों की भूमिका है। इसलिए पश्चिम बंगाल के लगभग खेतिहर समाज में राजसत्ता प्राप्त करने और बनाए रखने के लिए उन्हें किसानों का सहारा लेना पड़ा। पश्चिम बंगाल के मार्क्‍सवादियों को और भी सुविधा रही क्योंकि उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सरकारों से उपजने वाले असंतोष का लाभ उठाकर सत्ता मिल गई। 1977 में मिली इस सत्ता को उन्होंने फिर हाथ से नहीं निकलने दिया। पंचायतों पर कब्जे के द्वारा उन्होंने सरकारी साधनों से अपनी पार्टी का एक ऐसा अर्ध्दसैनिक काडर खड़ा कर दिया जो कांग्रेस या तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के लिए देहाती इलाकों को अगम बनाए रहता है। इस अर्ध्दसैनिक काडर की छवि नंदीग्राम में सबको अच्छी तरह दिखाई दे गई थी। यहां तक कि लंबे समय से मार्क्‍सवादी काडर के अभ्यस्त स्थानीय पुलिस और प्रशासन को भी उनके खिलाफ मुंह खोलना पड़ा था।

फिर भी इसे उपलब्धि ही माना जाना चाहिए कि पश्चिम बंगाल की मार्क्‍सवादी पार्टी वहां के खेतिहर समाज पर इतने लंबे समय तक अपना प्रभाव और नियंत्रण बनाए रखने में सफल रही है। राज्य में जब मार्क्‍सवादी सत्ता में आए थे तो भूमि सुधारों की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, जिसका श्रेय उनसे पहले की कांग्रेस सरकारों को जाता है। लेकिन बटाईदारों के अधिकार स्पष्ट नहीं थे, जिनकी पश्चिम बंगाल में बहुत बड़ी संख्या है। मार्क्‍सवादी पार्टी ने इसे अपनी क्रांतिकारी राजनीति का आधार बनाते हुए बटाईदारों को स्थायी कानूनी अधिकार दिलवा दिए। इसे ही बरगा ऑपरेशन कहा जाता है। क्या यह दिलचस्प बात नहीं है कि बटाई के पुश्तैनी अधिकार पर बटाईदार को हटाया नहीं जा सकता, पर राज्य सरकार पुश्तैनी भू स्वामियों को जब चाहे उनकी कृषि भूमि का अधिग्रहण करके बेदखल कर सकती है। अपनी पुश्तैनी भूमि पर बेचारे किसानों को कोई अनुलंघनीय अधिकार नहीं है।

बुध्ददेव भट्टाचार्य का यह कहना गलत नहीं है कि पश्चिम बंगाल में उद्योगीकरण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। उसके बिना पश्चिम बंगाल दूसरे राज्यों से पिछड़ जाएगा। पर क्या वाम मोर्चा सरकार किसानों को बलि का बकड़ा बनाए बिना उद्योगों के लिए जमीन की व्यवस्था नहीं कर सकती? अपने औद्योगीकरण के दौर में पर्यावरण का व्यापक विनाश कर चुके यूरोपीय समाज को अब पर्यावरण की इतनी चिंता है कि उसने दुनिया भर में कानून बनवा दिए हैं कि घोषित वनभूमि को हाथ नहीं लगाया जा सकता। आज हमारे देश में भी ऐसे कानून हैं कि किसी उद्योग के लिए वनभूमि को छुआ नहीं नहीं जा सकता। कृषिभूमि को भी इसी तरह का दर्जा क्यों न मिले? भारत में तो सदा यही मर्यादा थी। देश में अन्न की कमी और किसानों की बदहाली को देखते हुए यह मर्यादा फिर से क्यों नहीं बनाई जा सकती?

आज का समय अधिकारों का समय है। देश में मार्क्‍सवादियों, समाजवादियों और उदारवादियों ने मिलकर ऐसे कानून बनवा दिए हैं कि हमारे राज्यतंत्र और उद्योग तंत्र में एक बार नौकरी पाए व्यक्ति को आसानी से नहीं निकाला जा सकता। ऐसा कानून किसानों की भू संपत्ति के लिए क्यों नहीं है कि उनकी इच्छा के बिना राज्य भी उनकी भूमि अधिग्रहीत नहीं कर सकता?

यूरोप-अमेरिका के उदारवाद में किसानों की कोई जगह भले न रही हो, एशियाई समाजों में उनके महत्त्व को कभी कम करके नहीं आंका गया। यूरोप-अमेरिका के बाद दुनिया का सबसे अधिक औद्योगिक देश जापान है। वहां आबादी का घनत्व अधिक होने के कारण जमीन की किल्लत और भी अधिक है। जापानी लंबे समय तक टोकियो के अपने व्यस्ततम हवाई अड्डे का विस्तार इसलिए नहीं कर पाए कि किसान उसके लिए जमीन देने को तैयार नहीं थे और वहां के कानूनों में राज्य को किसानों की जमीन जबरन अधिग्रहीत करने का अधिकार नहीं है। पर यह किसानों की ही बात नहीं है। एक ठेठ परंपरागत एशियाई देश होने के नाते जापान में हर व्यक्ति का अपने परिवार, गांव, उद्योग, राज्यतंत्र और राजनीतिक मंडल से अटूट संबंध होता है। आप जिस कंपनी में नौकरी करते हैं, आजीवन उससे निकाले नहीं जाते। अगर आप स्वेच्छा से नौकरी छोड़कर चले गए तो नई कंपनी में आपको वह सम्मान नहीं मिल सकता और न फिर पुरानी कंपनी में आप लौट सकते हैं। जापान के बड़े-बड़े प्रोफेसर भी इसीलिए अपना देश छोड़कर यूरोपीय और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में जाने से कतराते हैं।

मार्क्‍सवाद को इतिहास की सार्वदेशिक और सार्वकालिक व्याख्या मानने वाले मार्क्‍सवादियों को एशियाई समाजों की विशेषताएं समझने की फुरसत कहां है। यूरोपीय होने के नाते वरिष्ठ मार्क्‍सवादी नृशास्त्री मोरिस गोडेलियर यह कह सके कि कार्ल मार्क्‍स ने अपनी स्थापनाएं जिन जानकारियों के आधार पर की थीं वे सब गलत सिध्द हो चुकी हैं।
मार्क्‍सवाद को इतिहास की सार्वदेशिक और सार्वकालिक व्याख्या मानने वाले मार्क्‍सवादियों को एशियाई समाजों की विशेषताएं समझने की फुरसत कहां है। यूरोपीय होने के नाते वरिष्ठ मार्क्‍सवादी नृशास्त्री मोरिस गोडेलियर यह कह सके कि कार्ल मार्क्‍स ने अपनी स्थापनाएं जिन जानकारियों के आधार पर की थीं वे सब गलत सिध्द हो चुकी हैं।
लेकिन भारत के मार्क्‍सवादी तो यूरोप के ऐतिहासिक अनुभव के अधकचरे ज्ञान के आधार पर गढ़े गए मार्क्‍सवादी सिध्दांतों के अनुरूप भारत के इतिहास की व्याख्या करते रहते हैं और ईसाई मिशनरियों से उधार ली गई कार्ल मार्क्‍स की इस भाषा को दोहराते रहते हैं कि पिछड़ा भारतीय समाज जड़ता और अंधेरे में पड़ा हुआ था और उसे उसमें से निकालने के लिए ब्रिटीश साम्राज्यवाद आवश्यक था।
अपनी अंध वैचारिकता में अक्सर मार्क्‍सवादियों ने आत्म-गौरव की वह सामान्य भावना भी भुला दी जो हर समाज में सहज ही होती है और वे भारत के इतिहास की निंदाजनक व्याख्या करते रहे।
अपनी अंध वैचारिकता में अक्सर मार्क्‍सवादियों ने आत्म-गौरव की वह सामान्य भावना भी भुला दी जो हर समाज में सहज ही होती है और वे भारत के इतिहास की निंदाजनक व्याख्या करते रहे।

इस वैचारिक मुर्च्‍छा में बेचारे सिंगूर के किसानों की उन्हें क्या चिंता हो सकती है! जब ममता बनर्जी का आंदोलन बढ़ा और अनिच्छुक किसानों को उनसे अधिग्रहीत की गई चार सौ एकड़ जमीन लौटाने की मांग जोर पकड़ने लगी तो बुध्ददेव भट्टाचार्य ने कहा कि जो जमीन अधिग्रहीत कर ली गई है वह कानूनन लौटाई नहीं जा सकती। उन्होंने यह नहीं कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून गलत है, उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी की मांग गैरकानूनी है। राहुल बजाज उनसे एक कदम आगे बढ़ गए और कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून अंग्रेजों के जमाने का है, उससे उद्योगपतियों को दिक्कतें आ रही हैं इसलिए उसे बदला जाए। दोनों में शायद ही किसी को पता हो कि 1894 के अंग्रेजों द्वारा बनाए गए भूमि अधिग्रहण कानून की पृष्ठिभूमि क्या है।

राजसत्ता हाथ में आने के बाद अंग्रेजों ने पाया कि भारत में राज्य को यूरोप की तरह सभी भौतिक साधनों पर स्वामित्व प्राप्त नहीं है। राजा भूमि का स्वामी नहीं, रक्षक है और इस नाते उसे अपने उपयोग के लिए किसानों की जमीन बिना उनकी सहमति के अधिग्रहीत करने का अधिकार नहीं है, भले वह अधिग्रहण कितने ही कल्याणकारी उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो। चकित अंग्रेजों ने जब भूमि के पट्टों की भाषा देखना शुरू किया तो उन्हें समझ में आया कि भारत में सभी भूमि देवभूमि है। उदाहरण के लिए जगन्नाथ क्षेत्र में भगवान जगन्नाथ भूमि के स्वामी हैं। भूमि जोतने के कारण किसान को ही उस भूमि पर व्यावहारिक स्वामित्व की रक्षा करना है। अंग्रेज इस व्यवस्था को चलने नहीं दे सकते थे, सो उन्होंने सारे अधिकार राज्य को दे दिए।

वर्ष 1997 में केरल सरकार बनाम भास्करन पिल्लै के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अगर किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भूमि का अधिग्रहण किया गया है तो वह उद्देश्य पूरा होने के बाद बची जमीन को उसके मूल स्वामी को वापस नहीं दिया जा सकता, राज्य उसका उपयोग किसी और सार्वजनिक उद्देश्य के लिए कर सकता है। 2005 में फिर सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा ही निर्णय दिया। इस तरह के भूमि अधिग्रहण कानून को किसानों के हक में बदलने के बजाय हमारे मार्क्‍सवादी नेता उसकी ओट लेने की कोशिश कर रहे हैं। यह दुर्भाग्य की बात है कि सिंगूर विवाद को माकपा ही नहीं, सभी पार्टियां एक स्थानीय राजनीतिक समस्या के रूप में देख रही हैं। हमारा शैक्षिक, बौध्दिक और राजनीतिक वर्ग यूरोपीय विचारों की ऐसी मुर्च्‍छा में है कि वह भूमि अधिग्रहण के व्यापक परिणामों को नहीं देख पा रहा। जबकि किसानों के साथ-साथ सबके जीवनयापन के स्थायी साधनों के अधिकार की बात उठाई जानी चाहिए।
(जनसत्ता से साभार)

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