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Tuesday, 23 September, 2008

भाजपा की विचारधारा- पंचनिष्‍ठा, भाग-4



लेखक- प्रो ओमप्रकाश कोहली

भारतीय जनता पार्टी आज देश की प्रमुख विपक्षी राजनीतिक पार्टी हैं। सात प्रांतों में भाजपा की स्वयं के बूते एवं 5 राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकारें है। 6 अप्रैल, 1980 को स्थापित इस दल ने अल्प समय में ही देशवासियों के बीच अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। पहले, भाजपा के विरोधी इसे ब्राह्मण और बनियों की पार्टी बताते थे लेकिन आज भाजपा के ही सर्वाधिक दलित-आदिवासी कार्यकर्ता सांसद-विधायक निर्वाचित है। इसी तरह पहले, विरोधी भाजपा को उत्तर भारत की पार्टी बताते थे और कहते थे यह कभी भी अखिल भारतीय पार्टी नहीं बन सकती है। वर्तमान में भाजपा ने दक्षिण भारत में भी अपना परचम फहरा दिया है। भाजपा में ऐसा क्या है, जो यह जन-जन की पार्टी बन गई हैं, बता रहे है भाजपा संसदीय दल कार्यालय के सचिव प्रो ओमप्रकाश कोहली। पूर्व सांसद श्री कोहली दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। निम्न लेख को हम यहां पांच भागों में प्रकाशित कर रहे हैं। प्रस्तुत है चौथा भाग-


सकारात्मक पंथनिरपेक्षता
भारत बहुधार्मिक-बहुपांथिक देश है। इसमें विविध विश्वासों और आस्थाओं वाले लोग रहते है। उपासना पध्दतियों की बहुलता है। ऐसे समाज को धार्मिक उदारता का दृष्टिकोण अपनाकर ही एक रखा जा सकता है। धार्मिक उदारता पंथनिरपेक्षता या सेकुलरिज्म का आधारभूत तत्व है। लेकिन सेकुलरिज्म शब्द के अर्थ को लेकर विभ्रम व्याप्त है।

सेकुलरिज्म की एक व्याख्या धर्म के विरोध के रूप में की जाती है। यह व्याख्या लौकिकता को स्वीकार करती है और आध्‍यात्मिकता का निषेध करती है। ईश्वरीय सत्ता या अव्यक्त सत्ता को नकार कर लौकिक सत्ता और मानव सत्ता का स्वीकार सेकुलरिज्म माना जाता है। धर्म के अस्वीकार वाली सेकुलरिज्म की कल्पना भाजपा को स्वीकार नहीं।

यूरोप में चर्च और राज्य के बीच टकराव में से सेकुलरवाद का उद्भव हुआ। राज्य ने चर्च द्वारा लौकिक या पार्थिव मामलों में दखल के विरूध्द आवाज़ उठाई। इसलिए सेकुलरवाद का अर्थ हुआ राज्य की धर्मनिरपेक्षता। इसके विपरीत भारत में धर्म को कर्तव्य या नीति के रूप में स्वीकार किया गया और इसे जीवन के सभी अंगों के लिए ग्राहय माना गया, यहां तक कि राज्य के लिए भी। भारत की सोच धर्मनिरपेक्ष राज्य की नहीं धर्माधारित राज्य की रही है।

यूरोप में चर्च और राज्य के बीच टकराव में से सेकुलरवाद का उद्भव हुआ। राज्य ने चर्च द्वारा लौकिक या पार्थिव मामलों में दखल के विरूध्द आवाज़ उठाई। इसलिए सेकुलरवाद का अर्थ हुआ राज्य की धर्मनिरपेक्षता। इसके विपरीत भारत में धर्म को कर्तव्य या नीति के रूप में स्वीकार किया गया और इसे जीवन के सभी अंगों के लिए ग्राहय माना गया, यहां तक कि राज्य के लिए भी। भारत की सोच धर्मनिरपेक्ष राज्य की नहीं धर्माधारित राज्य की रही है।
सेकुलरिज्म की एक अन्य व्याख्या धर्म के मामले में राज्य की तटस्थता के रूप में की जाती है। राज्य का कोई धर्म नहीं होना चाहिए, राज्य को धार्मिक मामलों से स्वयं को अलग रखना चाहिए, इत्यादि। सेकुलरिज्म की एक अन्य व्याख्या यह है कि राज्य सभी धर्मों से समान व्यवहार करे, राज्य की दृष्टि में सभी धर्म समान हों और राज्य विभिन्न धार्मिक समुदायों में भेदभाव न करे।

हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति स्वभाव से ही पंथनिरपेक्ष है। इसमें विविध धर्माचरणों, विश्वासों और उपासना पध्दतियों का स्वीकार है। एक ईश्वर को पाने के, उस तक पहुंचने के मार्ग भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, ईश्वर की उपासना के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं। एक ही तत्व को विद्वान् भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं-- एकं सद्विप्रा बहुध वदन्ति'। भारतीय संस्कृति के इस धार्मिक उदारवाद के स्वभाव का ही परिणाम है कि भारत पंथनिरपेक्ष राष्ट्र है। यहां धार्मिक मामलों में न भेदभाव किया जाता रहा है और नहीं धार्मिक आधार पर किसी धार्मिक समुदाय का उत्पीड़न।

किन्तु सेकुलरिज्म के राजनीतिक इस्तेमाल ने इसका रूप विकृत कर दिया है। सेकुलरिज्म के नाम पर वोट की राजनीति का चलन बढ़ता गया है। इसके लिए मुख्यत: कांग्रेस पार्टी का एक वर्ग, कम्युनिस्ट और कुछ अन्य हिन्दू विरोधी ताकतें जिम्मेदार हैं। इनका सकुलरिज्म हिन्दू विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण मात्र है। मुस्लिम वोट पर नज़र रखने वाले राजनीतिक दलों और राजनेताओं के लिए हिन्दू विरोध ही धर्मनिरपेक्षता है, फिर वे हिन्दू विरोध में चाहे किसी भी सीमा तक क्यों न बह जाएं। हमारे देश में ऐसे तत्व भी हैं, जिन्हें वंदे मातरम् गाना या सरस्वती वंदना करना धर्मनिरपेक्षता के आदर्श का उल्लंघन लगता है। ये ताकतें इस्लामी कट्टरवाद को अनदेखा कर देती हैं, बहुसंख्यक हिन्दू समाज के अधिकारों की उपेक्षा करती है, अल्पसंख्यक समाज के विशेषाधिकारों का समर्थन करती हैं और इस प्रकार समाज को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में विभाजित कर देती हैं। इन्हें सिर्फ हिन्दू साम्प्रदायिकता ही दिखायी पड़ती है, मुस्लिम साम्प्रदायिकता के प्रति ये आखें बंद किए रहते हैं।
हमारे देश में ऐसे तत्व भी हैं, जिन्हें वंदे मातरम् गाना या सरस्वती वंदना करना धर्मनिरपेक्षता के आदर्श का उल्लंघन लगता है। ये ताकतें इस्लामी कट्टरवाद को अनदेखा कर देती हैं, बहुसंख्यक हिन्दू समाज के अधिकारों की उपेक्षा करती है, अल्पसंख्यक समाज के विशेषाधिकारों का समर्थन करती हैं और इस प्रकार समाज को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक में विभाजित कर देती हैं। इन्हें सिर्फ हिन्दू साम्प्रदायिकता ही दिखायी पड़ती है, मुस्लिम साम्प्रदायिकता के प्रति ये आखें बंद किए रहते हैं।
सेकुलरिज्म का लबादा ओढ़े ये छद्म सेकुलरिस्ट घोर साम्प्रदायिक हैं। कश्मीर की अखंडता का प्रश्न हो या बंगलादेशी घुसपैठ और इस्लामी आतंकवाद, ये ऐसे राष्ट्रीय हित और सुरक्षा के प्रश्नों को भी साम्प्रदायिकता के चश्मे से ही देखते हैं। इनकी धर्मनिरपेक्षता छद्म धर्मनिरपेक्षता है, सत्ता प्राप्ति का शार्टकट है। ये ताकतें हिन्दू भावनाओं को आहत करने का कोई मौका नहीं चूकती। हिन्दू धर्म, लोकाचार तथा हिन्दू धर्म से सम्बन्धित किसी भी मान्यता या विश्वास को साम्प्रदायिक घोषित कर देती हैं। इन तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों की धर्मनिरपेक्षता का धार्मिक सहिष्णुता से कोई वास्ता नहीं। ये घोर असहिष्णु हैं।

भारतीय जनता पार्टी जिस सेकुलरिज्म में निष्ठा रखती है उसमें पंथीय राजतन्त्र या थियोक्रेसी के लिए कोई स्थान नहीं है। भाजपा की सेकुलरिज्म की कल्पना का अर्थ हैं सभी धर्मों का आदर, सभी को न्याय, तुष्टीकरण किसी का नहीं। भाजपा की यह मान्यता भारत के प्राचीन चिन्तन और परम्परा पर आधारित है।

2 comments:

रंजन said...

विचार और व्यवहार में कितना फर्क है....

अच्छे विचार होना आसान है पर उन्हे व्यवहार में लाना कठिन..

Suresh Chandra Gupta said...

धर्म-निरपेक्षता कहें या पंथ-निरपेक्षता, क्या फर्क पड़ता है? बात है हमारा अंतर्सोच क्या है, हम विचारों और कर्म में उसे किस प्रकार व्यवहार में लाते हैं. बहुत से राजनीतिबाज और राजनितिक दल बात धर्म-निरपेक्षता की करते हैं पर व्यवहार उस के उलट करते हैं. धर्म-निरपेक्षता को वोट बटोरने के टूल के रूप में प्रयोग करते हैं. धर्म-निरपेक्षता क नाम पर नफरत फैलाते हैं. इस लिए अब यह जरूरी हो गया है कि राजनीति में इस शब्द का प्रयोग निषेध कर दिया जाय.

हिंदू धर्म सब धर्मों का आदर करने की शिक्षा देता है. लोगों के व्यवहार में सब धर्मों का आदर होना चाहिए. बात करने की जरूरत नहीं है, व्यवहार से पता चलना चाहिए.