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Friday 7 September 2007

लाल झंडे के नीचे दमन की दास्तान: आलोक मेहता



कामरेडों के चंगुल में फंसकर पश्चिम बंगाल की हालत बदतर हो चुकी है। कामरेडों ने पश्चिम बंगाल को हसियां-हथौड़ा से पीट-पीटकर लहु-लुहान कर दिया है। कभी भारत के लिए प्रकाशस्तंभ का कार्य करनेवाले पश्चिम बंगाल की दुर्दशा जगजाहिर है। सिंगूर और ननदीग्राम ने कामरेडों के किसान-मजदूर विरोधी चेहरे को उजागर कर दिया है। गुरू रवींद्रनाथ टैगोर, प्रख्यात क्रांतिकारी अरविंद घोष, हिंदुत्व के महानायक स्वामी विवेकानंद का पश्चिम बंगाल आज कामरेडों से मुक्ति के लिए तड़प रहा है।

प्रतिष्ठित साप्ताहिक पत्रिका 'आउटलुक' के सुप्रसिध्द संपादक श्री आलोक मेहता ने हाल ही में कोलकाता प्रवास किया। उन्होंने अपने अनुभवों को 'आउटलुक(17 सितंबर, 2007) में 'प्रसंगवश:' स्तंभ में प्रस्तुत किया है। माकपा शासित पश्चिम बंगाल की जर्जर हालत पर उन्होंने क्षोभ व्यक्त करते हुए लिखा है बंगाल की धरती और वहां के लोग धन्य हैं जो यह सब सहते हुए मौन हैं। हम यह लेख यहां प्रकाशित कर रहे हैं-

कभी कल्पना नहीं की थी कि ओम प्रकाश चौटाला, नरेन्द्र मोदी और लालू प्रसाद यादव शासित राज्यों से अधिक भय पश्चिम बंगाल के कम्युनिस्ट राज में हो सकता है। पिछले सप्ताहांत कोलकाता की यात्रा के दौरान राज्य की बदतर स्थिति तथा स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर अंकुश की दर्दनाक बातें सुनकर आश्चर्य हुआ। फिर दमन की दास्तान सुनाने वाले प्राध्यापक, लेखक, पत्रकार, प्रगतिशील विचारों वाले, गैर कांग्रेसी, गैर भाजपाई, गैर ममताई हैं इसीलिए उनके तथ्यों को पूर्वाग्रही नहीं कहा जा सकता। उनके आक्रोश की पुष्टि बांग्ला भाषा के एक स्थानीय टी.वी. चैनल पर प्रसारित हो रही रिपोर्ट से हुई। रिपोर्ट के अनुसार कोलकाता महानगर सीमा क्षेत्र की एक बाहरी बस्ती के स्कूल में प्रिसिपल ने 'मिड डे मील' योजना के तहत बच्चों को भोजन देने के लिए सरकार की ओर से नियुक्त महिला कर्मचारी को इस आधार पर वापस भेज दिया कि वह अल्पसंख्यक समुदाय की है तथा उसके हाथ का बना खाना बच्चे कैसे खाएंगे। प्रगतिशील वामपंथी सरकार के अधिकारियों ने प्रिंसिपल पर कार्रवाई के बजाय उस महिला को अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र के स्कूल में तैनात करवा दिया। यदि यही घटना गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश के भाजपा शासित राज्यों में हो गई होती तो हमारे जैसे कथित प्रगतिशील पत्रकार ही नहीं, केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन के नेता तथा तथा दिल्ली में बैठकर राजनीति करने वाले अंग्रेजीदां कामरेड संसद को सिर पर उठा लेते। बंगाल में होने वाली घटनाओं पर लीपापोती आसान है अथवा पहली बार मिले प्रगतिशील लेखक-प्राध्यापक के अनुसार बंगाल में दमन का भंडाफोड़ करने की हिम्मत पत्रकार-लेखक नहीं जुटा सकते। यदि कोई कोशिश करता है तो कामरेड समर्थकों के पास उन्हें सबक सिखाने के पर्याप्त इंतजाम हैं।

मैंने अपने ढंग से थोड़ी छानबीन की कोशिश की तो सरकारी रिकार्ड से भी पश्चिम बंगाल के प्रगतिशील राज की पोल खोलने वाले तथ्य सामने आए। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते के मुद्दे पर केंद्र सरकार के खंभे हिलाकर संयुक्त सेनाभ्यास के विरूध्द सड़कों पर जुलुस निकालने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां अब गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी के मुद्दों पर आंदोलन नहीं छेड़ रही हैं। केंद्र की सरकार उनकी कृपा पर आश्रित है तथा उसी सरकार के राष्ट्रीय मानवाधिकर आयोग ने केवल एक महिने पहले पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार से इस बात का जवाब मांगा है कि चाय-बागानों में बढ़ रही बेरोजगारी के कारण केवल एक वर्ष में 750 श्रमिकों की मौत की घटनाएं हुई हैं। राज्य सरकार से पूछा गया है कि चाय-बागानों के बंद होने से बेरोजगार हुए लोगों को राहत देने के लिए कदम क्यों नहां उठाए गए।

हमारी प्रगतिशील सरकार के योजना आयोग की उदारवादी नीतियों की आलोचना हम अपने स्तंभों, खबरों में करते रहे है और हमारे वामपंथी कामरेडों को योजना आयोग के नीति-निर्धारकों के पूंजीवादी रवैये से नाराजगी रहती है। लेकिन उसी योजना आयोग द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण से कम्युनिस्ट राज की पोल भी खुली है। कुछ अर्से पहले किए गए इस अध्ययन के अनुसार पश्चिम बंगाल में 32 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे वाली है और उसमें 10 प्रतिशत को तो राशन की सरकारी दुकानों से भी मुट्ठी भर अनाज नहीं मिल पाता। सब जानते हैं कि बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों में चावल मुख्य भोजन है तथा एक व्यक्ति को औसतन करीब 550 ग्राम चावल प्रतिदिन यानी महीने में 16 किलो 500 ग्राम मिलना चाहिए। बेरोजगारी और गरीबी के शिकार लोग अपने परिवार के लिए इतने चावल का इंतजाम भी नहीं कर सकते हैं। कम से कम 4,612 गांवों में गरीब परिवार सड़क पर सड़ा-गला खाना खाकर बीमारी तथा मौत के शिकार होते हैं। खाने की बात दूर रही, चाय-बगान बंद होने पर प्रबंधकों की ओर से दिए जाने वाले पीने के पानी की टोटियां भी बंद हो जाती हैं। यदि मां-बाप किसी तरह मजदूरी ढूंढते हैं तो उनके बच्चों का स्कूल जाना बंद हो जाता है औ वे भी मजदूरी ढूंढते हैं या मां-बाप के काम में हाथ बंटाते हैं। ऐसे गरीब लोगों पर कम्युनिस्ट पार्टियों का नियंत्रण आसान होता है। उन्हें भेड़-बकरियों की तरह 'मतदान केन्द्रों' पर बटन दबाने भेजा जा सकता है। आखिरकार, सिंगुर में ग्रामीणों का विद्रोह ममता नहीं करवा सकती थीं। सिंगुर-नन्दीग्राम में तो कम्युनिस्ट मंत्री तक घुसने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।

एक और दिलचस्प बात। दिल्ली में हमारे प्रगतिशील कामरेड वर्षों से भोपाल गैस कांड को लेकर अमेरिकी कंपनी तथा वहां के शासकों की निर्ममता के विरूध्द आग उगलते रहे हैं। लेकिन भोपाल गैस कांड के लिए दोषी यूनियन कार्बाइड की मातृ संस्था बहुराष्ट्रीय अमेरिकी कंपनी डाऊ केमिकल्स को हल्दिया-नंदीग्राम में केमिकल कारखाना लगाने के लिए बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार न्यौता दे रही है। भोपाल गैस कांड के पीड़ितों का एक प्रतिनिधिमंडल दो महीने पहले कोलकाल भी पहुंचा, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। यह कैसा मजाक और दोहरा मानदंड है। आप भोपाल गैस कांड के लिए दोषी प्रबंधकों तथा पीड़ितों को मुआवजा न देने वाले लोगों को दंडित करवाने के बजाय उनकी आरती उतारने के लिए बेताब हैं। चीन तो दूर है, कोलकाता के बहादुर कामरेडों को लाल सलाम।

गरीबों, मजदूरों, किसानों और सिर पर मैला ढोने वालों की स्थिति अन्य राज्यों की तरह होने पर कम्युनिस्ट मित्र सारा दोष केन्द्र की निकम्मी सरकारों को देते हों लेकिन कोलकाता का शिक्षित वर्ग भी तो प्रताड़ित और दुखी है। प्रमुख सड़कों की हालत खस्ता है, ठेकेदारों-अफसरों और नेताओं के कमीशन दिल्ली से कम नहीं, ज्यादा है। पूंजीवाद या मार्क्सवाद का अंतर पढ़ा सकने वाले विश्वविद्यालय में कुछ विषयों में छात्रों को पढ़ाने पर मात्र 150 रूपये का भुगतान होता है। औसतन महीने में चार बार बुलाए जाने पर एम.ए., पीएच.डी किए व्यक्ति को 600 रूपये का भुगतान होता है। इतने पैसों में तो कोलकाता या मुजफ्फरपुर में अशिक्षित ड्राइवर नहीं मिल सकता। घर में काम करने वाली नौकरानी इससे अधिक पैसा कमा लेती है।

प्रगतिशील कम्युनिस्ट शासित कोलकाता में 50 प्रतिशत से अधिक आबादी हिंदी भाषी उत्तार भारतीयों की है, लेकिन उनकी स्थिति किसी रंगभेदी-नस्लभेदी देश के दूसरी श्रेणी के नागरिकों की तरह है। उनके दुख-सुख की कोई चिंता नहीं है। राज्य सरकार की हिन्दी अकादमी लगभग 11 वर्षों से पुनर्गठित नहीं होने से ठप पड़ी है। हां, चीन और वियतनाम से आने वाले गैर अंग्रेजी भाषियों की आरती उतारने, स्वागत द्वार बनवाने इत्यादि पर लाखों रूपया खर्च करके उन्हें सेल्यूट करते हुए कामरेड़ों को गौरव का अनुभव होता है। बंगाल की धरती और वहां के लोग धन्य हैं जो यह सब सहते हुए मौन हैं। (साभार: आउटलुक)

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