Saturday, May 10, 2008

प्रथम नहीं था 1857 का स्वाधीनता संग्राम


-शिवकुमार गोयल


सन् 1857 ई. के स्वातन्त्र्य समर की 150वीं जयन्ती देश भर में मनाई जा रही है। अंग्रेजों के विरुध्द स्‍वधर्म एवं स्वराज्य के लिए यह सबसे बड़ा सुनियोजित संघर्ष था, इसमें कोई शक नहीं है। परन्तु इसे भारत का 'प्रथम' स्वातन्त्र्य समर कहना एक प्रकार से उन सभी संघर्षों को नकारने जैसा होगा, जो स्वतंत्रता के लिए लड़े गए थे। हमारे योध्दाओं ने सिकन्दर, मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, मोहम्मद गोरी, इब्राहीम लोदी, बाबर जैसे आक्रमणकारियों से संघर्ष किए थे। चन्द्रगुप्त-चाणक्य, शकारि विक्रमादित्य, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविन्दसिंह, बन्दा बैरागी, छत्रसाल, कृष्णदेवराय आदि असंख्य वीरों के स्‍वाधीनता संग्राम को क्या हमारे इतिहास के स्वतंत्रता संग्राम में स्थान नहीं मिलना चाहिए? जिस किसी ने अपने देश से बाहरी शत्रु को हटाने के लिए संघर्ष किया, वह स्वाभाविक ही हमारे स्वातन्त्र्य संग्राम का हिस्सा है।

हिन्दुस्थान पर पहला आक्रमण ई. पूर्व 326 में ग्रीक सेना के साथ सिकन्दर ने किया और पोरस को पराजित कर यहां अपना राज जमा लिया। किन्तु कुछ ही समय में वविभिन्‍न हिन्दू सम्राटों की कड़ी टक्कर से घबरा कर वह लहूलुहान होकर अपने देश लौट गया। सिकन्दर के सेनापति सेल्युकस ने भी ई. पूर्व 305 में पंजाब पर आक्रमण कर अपना राज्य जमा लिया। सम्राट चन्द्रगुप्त ने आचार्य चाणक्य की कूटनीति के बल पर सेल्युकस पर आक्रमण कर उसे आत्मसमर्पण को बाधय करके पूरे प्रदेश को स्‍वाधीनता कराया। सेल्युकस को अपनी पुत्री का विवाह भी चन्द्रगुप्त से करना पड़ा।

शकों का आक्रमण एवं पराभव
आगे चलकर शकों ने भारत पर आक्रमण कर काफी बड़े भू-भाग को अपने कब्जे में ले लिया पर इनके विरुध्द भी भारतीय वीरों की तलवार उठी एवं दक्षिण भारत के हिन्दू सम्राटों ने उनसे जमकर टक्कर ली। गौतमी पुत्र शतकर्णी, पुलगामी शालिवाहन ने अपने शौर्य का सिक्का जमाया। कनिष्ट ने मालवा, गुजरात, सौराष्ट्र और सिन्‍धु-क्षेत्रों को शकों से मुक्ति दिलाई। समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शक-यूचियों की सत्ता को पूरी तरह धवस्त करने में सफलता प्राप्त की।

सन् 500 ई. के लगभग हूणों ने गांधाार देश पर आक्रमण कर कब्जा जमाया। सम्राट कुमारगुप्त के पुत्र स्कन्दगुप्त ने हूणों पर आक्रमण कर उन्हें हराया। अन्त में प्रतापी सेनापति यशोवर्धान ने हूणों को खदेड़ते हुए मुल्तान के पास कोरूर के निकट युध्द में उनकी सेना को पराजित किया था।


मोहम्मद बिन कासिम से संघर्ष
ईस्वीं 711 में अरब के सेनापति मोहम्मद बिन कासिम ने 50 हजार की सेना के साथ सिंध प्रान्त पर हमला करके देवल नामक बन्दरगाह को कब्जे में कर लिया। सिन्धा के राजा दाहिर ने कड़ा मुकाबला किया पर कुछ मुस्लिम सैनिकों की गद्दारी के कारण कासिम की सेना जीत गई- दाहिर ने संघर्ष करते हुए बलिदान दिया। कासिम को बाद में निरन्तर चुनौतियां मिलीं एवं अन्त में चित्तौड़ के महापराक्रमी बप्पा रावल के नेतृत्व में राजपूत वीरों ने सिन्धा पर विजय प्राप्त कर उसे कासिम के चंगुल से मुक्त कराया।

ईस्वीं सन् 1001 में दुर्दान्त मजहबी उन्मादी मोहम्मद गजनवी हिन्दुस्थान को जीतकर उसे 'दारूल इस्लाम' बनाने का सपना लेकर आया। सम्राट जयपाल ने पंजाब पर आक्रमण के दौरान उससे डटकर संघर्ष किया पर पराजित हुए एवं आत्मोत्सर्ग करना पड़ा। जयपाल का पुत्र अनंगपाल भी स्‍वाधीनता हेतु निरन्तर संघर्षरत रहा। महमूद ने थानेश्वर तथा मथुरा पर आक्रमण कर अपार धन-सम्पदा लूटी और फिर लौट गया। पुन: 1026 ई. में सोमनाथ पर आक्रमण किया एवं शिवलिंग को तोड़कर अपार सम्पदा लूट कर ले गया। इस काल में चप्पे-चप्पे पर संघर्ष हुआ।

गजनी के बाद गोरी 1191 ई. में गोरी ने दूसरी बार आक्रमण किया। पहले गुजरात आक्रमण में उसे जान बचाकर भागना पड़ा था। पानीपत के तलावड़ी स्थान पर पृथ्वीराज चौहान से उसे जबरदस्त शिकस्त मिली। गोरी पकड़ा गया पर पृथ्वीराज ने उसे दया कर छोड़ दिया एवं अपने देश लौट जाने दिया। अन्त में 1193 ई. में थानेश्वर में हुए युध्द में पृथ्वीराज पराजित हुए एवं बन्दी बनाकर ले जाए गए। उनकी आंखें फोड़ दी गईं पर चन्द्रबरदाई की चतुराई से वह तीर के करिश्मे के बहाने शब्दबेदी बाण से गोरी को मारने में सफल हुआ।

इसके बाद चौदहवीं सदी के आरम्भ में सुल्तान कुतुबुद्दीन, अलाउद्दीन खिलजी फिर मोहम्मद बिन तुगलक एवं फिरोजशाह तुगलक ने उत्पात मचाया। तुगलक की 1388 ई. में मृत्यु के बाद समरकन्द का कुख्यात तैमूरलंग हिन्दुस्थान पर चढ़ आया। राणा कुंभा एवं राणा सांगा ने इन मुस्लिम आक्रान्ताओं के विरुध्द लगातार संघर्ष जारी रखा। इसके बाद इब्राहिम लोदी के साथ भी लम्बा संघर्ष चला।

तुर्क बाबर एवं उसके वंशज
तुर्क रक्त के बाबर ने, जो उस समय अफगानिस्तान का शासक था, लाहौर के सूबेदार दौलतखान के निमंत्रण पर राणा सांगा का दमन करने हेतु हिन्दुस्थान में 1526 में प्रवेश किया। पानीपत में हुई लड़ाई में राणा सांगा एवं इब्राहीम लोदी दोनों की संयुक्त फौज एक साथ थी परन्तु लोदी मारा गया एवं राणा सांगा को भी चित्तौड़ लौट जाना पड़ा।


1530 में बाबर की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र हुमायूं बादशाह बना। हुमायूं का 1556 ई. में अचानक इंतकाल हो गया। उसका पुत्र अकबर 13 वर्ष की उम्र में ही उसका उत्‍तराधिकारी बना। उसके राज्य का संचालन उसका सम्बंधाी एवं मुख्य वजीर बैरहाम खां करता था। पानीपत के पास बैरहाम खां एवं हेमू की सेनाओं की बीच युध्द हुआ। हेमू जीत रहा था पर अचानक उसकी आंख में तीर लगा और वह घायल होकर हाथी से गिर गया। हिन्दू सेना में खलबली मच गई। घायल हेमू का बैरहाम खां ने सिर काट लिया एवं हिन्दुओं की जीत हार में बदल गई। अकबर का आगे विरोधा जारी रहा पर वह मेवाड़ को छोड़कर अन्य राजपूत राजाओं को दबाने या अपने साथ मिलाने में सफल रहा।

अकबर के बाद जहांगीर, फिर औरंगजेब के साथ हिन्दुओं का संघर्ष सर्वविदित है। गुरु तेगबहादुर एवं भाई मतिदास के बलिदान इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं।


गुरु गोविन्दसिंह जी ने मुगलों के बढ़ते अत्याचारों को रोकने हेतु 'खालसा पंथ' की स्थापना की। उनके चारों पुत्रों का बलिदान हुआ, वे भी आजीवन संघर्षरत रहे। अद्भुत कहानी है इन बलिदानियों की और इसी के बल पर आज हिन्दू समाज जीवित है वरना इस्लाम की आंधी कितने देशों एवं कितने समाजों को निगल गई। इनके संघर्षों को यदि हम स्वतंत्रता संघर्ष नहीं कहेंगे तो किसे कहेंगे?

विजयनगर का हिन्दू साम्राज्य
दक्षिण भारत के विजयनगर के पराक्रमी राजा कृष्णदेवराय (1509 से 1537) ने विदेशी-विधार्मी आक्रमणकारियों से अपने देश की पावन भूमि को मुक्त कराने के लिए सतत संघर्ष किया। बीजापुर के आदिलशाह के साथ हुए युध्द में उसने मुस्लिम सेना को कड़ी मात दी। राजा कृष्णदेवराय प्रबल पराक्रमी के साथ-साथ हिन्दू धार्माभिमानी तथा आदर्श शासक थे। 1537 में महाराज कृष्णदेवराय का देहान्त हुआ। उनके बाद आगे चलकर विजयनगर राज्य का शासन राजा रामराय के हाथों में आया। राजा रामराय ने भी सन् 1554 में अहमदनगर के निजाम शाह तथा गोलकुंडा के कुतुबशाह की प्रार्थना पर उनके शत्रु बीजापुर के आदिलशाह पर आक्रमण कर मुसलमान सेना के छक्के छुड़ाये।

सन् 1739 में नादिरशाह अटक पार करके दिल्ली तक जा पहुंचा। पूर्ववर्ती मुस्लिम बादशाहों की तरह नादिरशाह ने हिंदुओं की हत्याएं एवं, लूटमार कराई। मराठा सरदार बाजीराव ने सेना को बलशाली बनाया तथा घोषणा भी की कि दिल्ली के तख्त पर किसी भी विदेशी-विधार्मी के वर्चस्व को सहन नहीं किया जाएगा। मराठा सेना की शक्ति का पता चलते ही नादिरशाह को दिल्ली का तख्त छोड़कर भागने को विवश होना पड़ा था।

अहमदशाह अब्दाली ने सन् 1749 में हिन्दुस्थान पर दूसरा आक्रमण किया। इधार वीर मराठों के तत्कालीन पेशवा नाना साहब ने मल्हारराव होल्कर और जयाजीराव सिन्धिाया को पठानों के सपने चकनाचूर करने का आदेश दिया। 20 मार्च, 1751 को यमुना पार कर उत्तर प्रदेश के कादरगंज में पठान-रूहेलों की सेना पर मराठों ने आक्रमण कर उन्हें पराजित कर भागने को विवश कर दिया।

1757 में पुन: नाना साहब पेशवा ने अपने भाई रघुनाथ राव पेशवा के नेतृत्व में मल्हारराव होल्कर को विशाल सेना के साथ अब्दाली की क्रूर व विधवंसक सेना से टक्कर लेने भेजा। मराठों के इस सतत संघर्ष अभियान ने अब्दाली क सपने चकनाचूर कर डाले। अन्त में उसे काबुल भागने को विवश होना पड़ा।


सन् 1627 में जन्मे शिवाजी महाराज ने क्रूरतम व उन्मादी औरंगजेब को अपने युध्दकौशल तथा छापामार कार्यवाही से नाकों चने चबाने में सफलता प्राप्त की थी। छत्रपति शिवाजी ने मुस्लिम सुल्तानों से दक्षिण के अनेक दुर्ग जीते। छत्रपति शिवाजी तथा अनेक मराठा राष्ट्रभक्तों ने विदेशी-विधर्मीमुसलमानों से हिन्दुस्थान की भूमि को मुक्त कराने के लिए जो संघर्ष किए वे 'भारतीय स्‍वाधीनता संग्राम' के इतिहास के स्‍वर्णिम पृष्ठ हैं। वीर छत्रसाल, महाराणा रणजीत सिंह तथा ऐसे असंख्य अग्रणी राष्ट्रभक्त हमारे देश के दो हजार वर्ष से अधिक के स्‍वाधीनता संग्राम के अप्रतिम राष्ट्रनायक हैं, जिन्हें कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता। 1857 की 150वीं जयंती पर इन सभी वीरों को नमन!

Sunday, March 2, 2008

छात्रों को मुख्यधारा से अलग करने का षडयंत्र

संप्रग सरकार की हिंदू विरोधी भावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। जो काम मुगलों और अंग्रेजों ने नहीं किया उसे सोनिया गांधी की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार अंजाम दे रही है। एक ओर सरकार शिक्षा में अल्पसंख्यकवाद को पुरस्कृत करने में जुटी हुई है तो वहीं दूसरी ओर हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ करने से बाज नहीं आ रही है।

ज्ञात हो कि दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक कला(बीए) इतिहास ऑनर्स(द्वितीय वर्ष) वर्ष के पाठयक्रम में शामिल 'एनशिएंट कल्चर इन इंडिया' पुस्तक में भगवान राम तथा रामायण से संबंधित तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है, इसके चलते करोड़ों हिंदुओं की भावनाएं आहत हुई हैं। इस आपत्तिजनक अंशों को हटाने की मांग को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद छात्रों के बीच जागरण अभियान चला रही है। इसी क्रम में गत 25 फरवरी को विद्यार्थी परिषद के बैनर तले छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष के समक्ष अपने विचार रखने पहुंचे तो उन्होंने छात्रों की बात सुनने से इंकार कर दिया। इससे उत्तेजित होकर छात्र विभागाध्यक्ष के खिलाफ नारे लगाने लगे। विश्वविद्यालय प्रशासन के इशारे पर पुलिस ने छात्रों के साथ बदसलूकी की और विद्यार्थी परिषद के तीन कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया।

दिल्ली विश्वविद्यालय में स्नातक कला(बीए) इतिहास ऑनर्स (द्वितीय वर्ष) के पाठयक्रम में शामिल 'एनशिएंट कल्चर इन इंडिया' पुस्तक में विद्यार्थियों को जो पढ़ाया जा रहा है, उससे किसी भी देशभक्त का खून खौल उठेगा-

-रावण और मंदोदरी की कोई संतान नहीं थी। दोनों ने शिवजी की पूजा की। शिवजी ने उन्हें पुत्र प्राप्ति के लिए आम खाने को दिया। गलती से सारा आम रावण ने खा लिया और उसे गर्भ ठहर गया। बड़ी स्वच्छंदता से रावण के नौ मास के गर्भधारण की व्यथा का वर्णन किया गया है।

-दु:ख से बेचैन रावण ने छींक मारी और सीता का जन्म हुआ। सीता रावण की पुत्री थी। उसने उसे जनकपुरी के खेत में त्याग दिया।

-हिन्दुओं की मति भ्रमित करने के लिए कहा गया कि हनुमान छुटभैया एक छोटा सा बंदर था। हनुमान की अवमानना करते हुए लिखा गया है कि वह एक कामुक व्यक्ति था वह लंका के शयनकक्षाओं में झांकता रहता था और वह स्त्रियों और पुरूषों को आमोद-प्रमोद करते बेशर्मी से देखता फिरता था।

-रावण का वध राम से नहीं लक्ष्मण से हुआ।

-रावण और लक्ष्मण ने सीता के साथ व्यभिचार किया।


और स्नातक कला(प्रथम वर्ष) में पढ़ाया जा रहा है-

-ऋग्वेद में कहा गया है कि स्त्रियों का स्थान शूद्रों तथा कुत्तों के समान है।
-स्त्रियों को वेद पढ़ने पढ़ाने का कोई भी अधिकार नहीं था और न ही वह धार्मिक क्रिया-कर्म कर सकती थी।
-अथर्ववेद में महिलाओं को केवल संतान उत्पन्न का साधन माना जाता था।
-लड़कियां उनके लिए अभिशाप थीं।
- स्त्रियां एक वस्तु समझी जाती थी उन्हें खरीदा तथा बेचा जा सकता था।
-वेदों के अर्थों का अनर्थ कर महिलाओं को घृणा की दृष्टि से दिखलाया गया है।

केंद्र सरकार के साढ़े तीन वर्ष के कार्यकाल के दौरान लिए गये निर्णयों पर नजर डालने यह स्पष्ट हो जाता है कि हिंदुओं को अपमानित करना ही इस सरकार का प्रमुख कार्य है। सरकार ने पहले रामसेतु के मुद्दे पर गलत हलफनामा पेश कर कहा था कि भगवान राम का अस्तित्व ही नहीं है। डेनमार्क में पैगम्बर मोहम्मद के कार्टून पर भारत सरकार ने अधिकृत रूप से चिंता और खेद जताया लेकिन जिस एम.एफ. हुसैन ने मां सीता और भारतमाता के अश्लील चित्र बनाए, उस पर कोई बयान तक नहीं दिया। राम के अस्तित्व पर सवाल खड़ा करने वाले रामद्रोही ही नहीं वरन राष्ट्रद्रोही है। दरअसल, यह मार्क्‍स-मैकाले के मानस मस्तिष्कों का कमाल है। जो राष्ट्रविरोधी कचड़ा उनके दिमाग में होता है वही विभिन्न माध्यमों से वे बाहर अभिव्यक्त करते रहते हैं। कभी पेंटिंग बनाकर, लेख लिखकर, पाठयक्रमों में गलत तथ्य समाहित कर। वे जानते है कि विदेशी विचारधारा भारत में तभी प्रबल हो सकता है जब नौजवानों में राष्ट्रनायकों के प्रति हीन भावना उत्पन्न हो जाए। किसी को भी किसी भी धर्म का अपमान करने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिये। देश के छात्र-नौजवान किसी भी हालत में राष्ट्रनायकों का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे।

Sunday, February 24, 2008

क्या यह आर्थिक मॉडल वास्तव में भारतीय है?

लेखक- एस. गुरूमूर्ति

इस लेख के शीर्षक-प्रश्न के उत्तर की पुष्टि व्यावहारिक प्रमाणों व वैचारिक तर्कों दोनों से देनी होगी और देनी भी पड़ेगी। व्यावहारिक प्रमाणों के बिना आर्थिक मसलों पर दार्शनिक विवेचना विवादित तो होगी ही साथ ही तुच्छ भी समझी जाएगी। इसलिए व्यावहारिक बहस पहले। लेकिन बहस शुरू करने से पहले एक चेतावनी! मामला जटिल है, अतएव सामान्यतया, तमाम आंकड़े व विस्तृत विश्लेषण की जरूरत होगी। खासतौर पर इस प्रश्न की मानक प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग है, जैसा कि लेख की मांग (चर्चा करने की) है। लेकिन यह कोई शोध लेख नहीं है, जहां भारी-भरकम आंकड़ों की जरूरत होगी। अपेक्षाकृत इस संक्षिप्त लेख का उद्देश्य महज दो महत्वपूर्ण 'व्यावहारिक आंकड़े' के जरिए उत्तर देना है। इसलिए यह लेख दो अति सांकेतिक लेकिन ठोस व अविवादित तथ्यों पर आधाारित हैं। पहला, क्या यहां के आर्थिक प्रतिरूप में कुछ खास है, जो भारतीय है और वह ऐसे पश्चिमी सामाजिक-आर्थिक मॉडल से भिन्न है, जिसे बतौर 'वैश्विक' स्वीकृति मिल रही है और सभी के लिए फायदेमंद बताया जा रहा है?

सर्वप्रथम, भारत में निवेश व बचत की गुणवत्ता को लेते हैं। इस समय घरेलू बचत भारत की सकल राष्ट्रीय आय की 32 प्रतिशत से ज्यादा है और ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस साल यह 34 फीसदी को छू लेगी। इस तरह हमारा देश उन देशों में शामिल है, जहां बचत दर सर्वोच्च है। भारत की संपूर्ण बचत में पारिवारिक बचत का हिस्सा 80 प्रतिशत है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय आर्थिक परिदृश्य में परिवार संस्था का कितना दखल है। लेकिन बचत की राशि से ज्यादा बचत की प्रकृति महत्वपूर्ण है, जो समाज के भौतिक जीवन के नजरिए को स्पष्ट रेखांकित करती है। समस्त बचत का 98 प्रतिशत हिस्सा सुरक्षित बचत है, जो फिक्स्ड रेट सेविंग जैसे- भविष्य निधि व बैंक जमा के रूप में हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि अति प्रचारित स्टाक मार्केट ने भारत की बचत को कितना आकर्षित किया है? महज 2 प्रतिशत। जो इस बात का संकेत है कि देश के बहुत ही कम परिवारों का जुड़ाव स्टॉक मार्केट से है। जबकि अन्य देशों की स्थिति बिल्कुल विपरीत है। एक अनुमान के मुताबिक 55 प्रतिशत अमेरिकी परिवारों का संबंधा स्टॉक मार्केट से है। इससे बहुत कम परिवार जर्मनी में (अमेरिकी तुलना में आधे) में स्टॉक मार्केट से जुड़े हुए हैं। जहां तक जापान की बात है, वहां अमेरिका की तुलना में एक तिहाई परिवारों का संबंघ स्टॉक मार्केट से हैं।

इसका क्या अर्थ है? बिल्कुल साधारण, पैसे के मामले में समाज उतना रिस्क नहीं लेता। कुछ समाज ज्यादा रिस्क लेते हैं और कुछ समाज उससे कम। उनकी तुलना में भारतीय 'नो-रिस्क' की कैटेगरी में आते हैं। इसका एक यह भी अर्थ है कि भारत में जोखिम पूंजी (रिस्क कैपिटल) का निर्माण नहीं होता। बहुत से लोग इसे अल्प विकसित 'स्टॉक मार्केट' व परंपरागत तथा रूढ़िगत सामाजिक सोच के रूप में भी उध्दृत करते हैं, जिसे सुधारवादी दूर करना चाहते हैं। दरअसल, ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों में निवेश से भारतीयों के कतराने का संबंध देश में नीति-निर्माण से है। लेकिन क्या जोखिम पूंजी का अल्प निर्माण एक कमी है, जैसा की बहुत से लोग सोचते हैं? इस प्रश्न का जवाब तलाशने से पहले हमें दूसरे प्रश्न के उत्तर देने की जरूरत है। क्यों अमेरिकन अपनी बचत को स्टॉक मार्केट में लगाने का जोखिम लेते हैं, जबकि भारतीय ऐसा नहीं करते?

अमेरिकी समाज में भारी उपभोग के चलते अमेरिकन का झुकाव बचत की तरफ कम है। उपभोग को बढ़ाने के लिए ब्याज दर लगातार एक जैसी बनी (कम स्तर पर) हुई है। पहले से ही कम बचत पर ज्यादा लाभ कमाने की जोखिम लेने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है और दबाव भी डाला जाता है। सरकार की सामाजिक सुरक्षा द्वारा भी अमेरिकियों को ज्यादा उपभोग व कम बचत करने का प्रोत्साहन मिलता है। जब व्यक्ति एक बार आश्वस्त हो जाता है कि रिटायर के बाद उसकी देखरेख सरकार करेगी, या बीमार होने पर उसका इलाज होगा, या उसके बेरोजगार बेटे, बेटी विधावा पत्नी या वृध्द मां-बाप की देखरेख सरकार करेगी, तो स्वाभाविक तौर पर बचत की तरफ उसका झुकाव कम होगा। यदि कोई बचत भी करता है, तो वह स्टॉक मार्केट या अन्य जोखिम भरे क्षेत्रों में निवेश करने का जोखिम लेता है। पश्चिमी देश व अमेरिका में परिवारिक दायित्व राष्ट्रीयकृत हैं। यही वजह है कि वहां पारिवारिक बचत काफी कम है यहां तक कि 'निगेटिव' है। आधाुनिकता के दवाब मसलन- तलाक, सम-लैंगिक विवाह, फेमिनिज्म और सम-लैंगिकता के कारण परंपरागत परिवारों की संख्या काफी कम है। आधो से अधिक परिवार 'सिंगल पैरेंट्स फैमिली' हैं और ज्यादातर परिवार उधार व क्रेडिट कार्ड पर जी रहे हैं। अमेरिका में समस्त क्रेडिट कार्डों की संख्या वहां की वयस्क आबादी की चार गुना है, जिसके फलस्वरूप जो भी बचत होती है उसका बड़ा हिस्सा जोखिम भरे स्टॉक मार्केट में चला जाता है। यही वजह है कि ज्यादा परिवार स्टॉक मार्केट से जुड़े हैं। इस प्रकार अमेरिकी स्टाक मार्केट का रोजाना सूचकांक अमेरिका के आर्थिक स्वास्थ्य को दर्शाता है। इसके अलावा यहां की 'मासिक खुदरा ब्रिकी' आंकड़े अमेरिका के खपत स्तर को बताते हैं। लेकिन जो देखने में आ रहा है वह यह कि अमेरिका की सामाजिक सुरक्षा अमेरिकी सरकार को दिवालिया बना रही है। यही नहीं, अमेरिकियों में बचत को असंगत बनाने में इसकी प्रमुख भूमिका है। इस तरह अति सक्रिय और बहु-व्यापक स्टाक मार्केट 'सामाजिक सुरक्षा दायित्वों' की उपज है, जिसकी जिम्मेदारी राज्य ने परिवार से लेकर राष्ट्रीयकृत कर दिया है।

यहां स्थिति पूर्णतया अलग है। भारतीय परिवार सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद लेते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर ज्यादातर परिवार अपने बुजुर्गों, बेरोजगार बेटे, बेटियों आदि की देखरेख करते हैं। यह किसी आर्थिक दवाबवष नहीं, बल्कि पारिवारिक, सांस्कृतिक व धार्मिक कर्तव्य के कारण है। इस अर्थ में भारत विश्व की सबसे बड़ी निजीकृत अर्थव्यवस्था है, क्योंकि यहां पश्चिम का सबसे बड़ा लोक दायित्व- यहां की जीवन शैली में रची-बसी संस्कृति के कारण-परिवार यानी निजी हाथों में है, वह भी बिना किसी कानून या सरकारी आदेशों के। खास तौर पर अमेरिका पिछले कई सालों से अपनी कई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को निजीकरण करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन वह ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि वहां भारतीय समाज जैसा कोई पारिवारिक सिस्टम नहीं है, जो इन दायित्वों का निर्वाह कर सके। यदि यहां कोई राज्य सहाय्यित सामाजिक सुरक्षा है, तो वह केवल सरकारी कर्मचारियों की पेंशन योजना है। लेकिन यह केवल सीमित योजना है, बहु-व्यापक नहीं। भारतीय परिवारों की अधिकांश बचत सावधि योजनाओं या सुरक्षित प्रतिभूतियों में निवेश होती है। अतएव भारतीय स्टॉक मार्केट न तो भारतीय समाज की समृध्दि दर्शाते हैं और न ही वे भारतीय निवेशकों के विश्वास को प्रदर्शित करते हैं, जैसा कि पश्चिमी देश के स्टॉक मार्केट करते हैं। हालांकि यह (भारतीय स्टॉक मार्केट) पश्चिमी निवेशकों के विश्वास को दर्शा सकता है। लेकिन स्टॉक मार्केट की जो महत्ता अमेरिकी या अन्य देशों में है, वैसी ही महत्ता हमारे आर्थिक विचारकों, लेखकों व अन्य लोगों द्वारा भारतीय स्टॉक मार्केट को देना कुछ और नहीं बल्कि साफ बरगलाने की कोशिश है।

स्टॉक मार्केट में सामान्य भारतीय की अरूचि को देखते हुए वर्तमान वित्तमंत्री ने बार-बार भारतीय निवेशकों से आग्रह किया कि वे बैंकों के बजाय शेयर बाजार में पैसा लगाएं, लेकिन भारतीय परिवारों ने इस एक्सपर्ट सलाह पर गौर नहीं किया। वहीं, भारतीय परिवार आधुनिक आर्थिक विचारकों की राय के विपरीत, सोना पर ज्यादा विश्वास करते हैं, न टीसीएस या इंफोसिस जैसी कंपनियों के शेयरों पर। वे विश्व के समस्त स्वर्ण उत्पादन का एक तिहाई हिस्सा खरीदते हैं, जिसकी कीमत उनके द्वारा खरीदे गए स्टॉक की कीमत से कहीं ज्यादा है। पश्चिमी आर्थिक विचारक तथा यहां पर उनकी कार्बन कॉपी, सोने की खरीद को उपभोग व शान-शौकत की वस्तु मानते हैं। लेकिन सामान्य भारतीय, चाहे पढ़ा-लिखा हो या अशिक्षित हो, इसे विश्वसनीय निवेश मानता है। साथ ही वे इसे आभूषण के तौर पर इसे इस्तेमाल भी कर लेते हैं। वे यह जानते हैं कि दलाल स्ट्रीट में खरीदे गए शेयर उनके शरीर की शोभा नहीं बढ़ा सकते हैं और वे यह भी समझते हैं कि सोने ही एक मात्र निवेश है, जिसका मूल्य नहीं गिरता। आर्थिक विश्लेषक इसे निवेश का प्राचीन मॉडल कर कह आलोचना कर सकते हैं। सोने के प्रति ललक के कारण टिकाऊ व गैर टिकाऊ वस्तुओं के प्रति झुकाव कम होता है। आखिरकार, सुरक्षित बचत, कम उपभोग और सोने की ललक के क्या संकेत हैं। इन सभी को यदि समेकित रूप से देखें तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था की स्त्रीगत विशेषता है। हां, भारतीय अर्थव्यवस्था का यह अनाक्रमक आयाम, इसकी पारिवारिक विशिष्टता व भारतीय परिवार की खूबियों के कारण से है, जिन पर महिलाओं का अत्यधिक दबदबा है। इस प्रकार, भारतीय आर्थिक मॉडल का प्रथम अंग 'परिवार' है।

दूसरा महत्वपूर्ण सांकेतिक सांख्यकीय आंकड़ा, हालांकि यह पूर्णतया आर्थिक नहीं है, लेकिन इसका राजनैतिक अर्थशास्त्र पर गहरा असर है, वह यह है कि 2004 के अंत तक भारत में गांवों की संख्या लगभग 7 लाख थी, लेकिन पुलिस स्टेशन की संख्या केवल 12,404 ही थी। फिर भी यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक यहां पर संसार में सबसे कम अपराधा हैं। कुछ गुमराह लोग तर्क देते हैं अभिलिखित अपराधा इसलिए कम हैं, क्योंकि अपराधों का पता नहीं चलता और उनकी रिपोर्ट नहीं प्राप्त होती।

दरअसल, पुलिस की कम जरूरत की असली वजह भारतीय समाज की विशिष्टता है। भारतीय समाज अविश्वसनीय रूप से जटिल है। यदि हम संसार को एक तरफ रख दें और भारतीय समाज का दूसरी तरफ, तब भी भारतीय समाज ज्यादा जटिल दिखाई पड़ेगा, क्योंकि भारतीय समाज तमाम समुदायों, संप्रदायों, अनेकों देवी-देवता, विभिन्न भाषाएं, रीति-रिवाज से ओत-प्रोत है। फिर भी हम एक राष्ट्र व एक राज्य है और हमारी अर्थव्यवस्था भी एक है। क्योंकि, उदाहरण के तौर पर, हम लोग करोड़ों देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, लेकिन भारतीय देवता आपस में झगड़ते नहीं हैं। नतीजतन, करोड़ों देवी-देवताओं के पुजारी आपस में उनके नाम पर संघर्ष नहीं करते। आखिर इस विशाल व अति जटिल परंपरागत समाज का (संपूर्ण मानवता का छठां हिस्सा) आधुनिक भारतीय संवैधानिक व आर्थिक व्यवस्था में क्या भूमिका है? इसका उत्तर विशिष्ट भारतीय आर्थिक मॉडल के अस्तित्व का पूर्ण संकेत दे देगा।

पश्चिमी की अवधारणा के नजरिए से देखें तो भारत स्वशासित ज्यादा है, बजाय राज्य द्वारा शासित होने के। स्वशासित होने की योग्यता का विकास भारतीय परपंरा व रीति-रिवाजों के तहत विकसित अनुशासन की वजह से है, जो भारत के परिवार व समाज को शासित करती है। भारत की विविधाता इसमें मदद करती है और अनुशासन के परंपरागत नियमों को बरकरार रखने की क्षमता को मजबूत करती है। दरअसल, यहां ग्रामीण समुदाय की भूमिका (यहां तक की जाति व्यवस्था की भूमिका भी, जिसे कई कारणों से तुच्छ प्रमाणित किया गया, जिसकी चर्चा हम लेख के अंत में करेंगे) पुनर्विचार की मांग करती है। इस लेख का मत है कि जातिगत चुनावी राजनीति के घालमेल के कारण सामाजिक-राजनीतिक मोर्चा पर काफी भ्रम हुआ। स्वदेशी अकादमी परिषद् द्वारा कराए गए एक पांच साला सर्वेक्षण से (जिसमें 30 से अधिक समुदाय आधारित औद्योगिक समूह शामिल हैं) यह तथ्य उजागर हुआ कि यूपी, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिनाडु के औद्योगिक संकुल के विकास में स्थानीय जातियों की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। गौरतलब है कि इन स्थानीय जातियों जिसमें अगड़ी और पिछड़ी जातियां शामिल हैं। आगरा व कानुपर में अनुसूचित जातियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

इन औद्योगिक संकुलों का विकास सामुदायिक प्रतियोगिता व आपसी सहयोग के मिलेजुले प्रभाव के कारण हुआ, जिसे 19वीं शताब्दी में एमाइल दरखाइम ने सोशल कैपिटल कहा और 21वीं शताब्दी में फ्रांसिस फुकुयामा भी इस बात को अनेकों बार दुहराया। ये संकुल इस बात के प्रमाण हैं कि समुदाय और जातियां भारत की सोशल कैपीटल हो सकती है, जैसा कि स्वामीनाथन अंकलेश्वर अय्यर ने एकोनॉमिक टाइम्स ( वर्ष 2000) में लिखे अपने लेखों से स्पष्ट किया है। एकोनॉमिक पावर हाउस के रूप में जाति की अवधारणा पर जोर गुरूचरण दास ने अपनी पुस्तक 'इंडिया अनबाउंडेड' में भी किया है।

स्वदेशी एकेडमी कौंसिल द्वारा किए अधययन यह पता चलता है कि जहां राजनीतिक वर्गों द्वारा समुदाय व जातियों को राजनीति में हिस्सेदारी के बदले राज्य समर्थित लाभ (State-conferred benifits) के लिए प्रेरित किया गया, वहां वे वोट बैंक के रूप में परिवर्तित हो गए और राज्य पर उनकी निर्भरता बढ़ गई। जब वे वोट बैंक के रूप में परिवर्तित हो गए और राज्य पर उनकी निर्भरता बढी, तब विकास के स्थान पर उनकी अवनति हुई। वहीं दूसरी तरफ स्वदेशी एकेडमी कौंसिल ने अपने अधययन में पाया कि जो समुदाय या जातियां अपने व्यवसाय व उद्योग में लगी रहीं, उनका विकास तेजी से हुआ। बाद में चलकर इन जातियों व समुदायों ने राजनीतिक मामलों में भी जमकर हिस्सेदारी ली। आखिर इन महत्वपूर्ण विषयों पर वस्तुपरक अधययन क्यों नहीं हो रहे है? इसका जवाब इतिहास की ओर इशारा करता है। दरअसल, इसका कारण बौध्दिक सुस्ती और वर्तमान राजनीतिक व बौध्दिक रूप से तथाकथित सही के खिलाफ अलग राय रखने की बौध्दिक हिचकिचाहट है।

आइए हम भारतीय समाज व इसकी परंपरा (जिसमें जातियां भी शामिल हैं) के खिलाफ कल्पित बातों के इतिहास पर नजर डालते हैं। यदि हम पश्चिमी समाज से इसकी तुलना करें तो भारतीय समाज का बाह्य रूप अराजकतापूर्ण है। चर्चिल ने कहा था कि यदि भारत में लोकतंत्र लाने का प्रयास किया जाता है तो वह अराजकता में बदल जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यदि वे कुछ दिन और जिंदा रहते तो उन्हें अपनी बातों को वापस लेना ही पड़ता। 1950 के दौरान भारत में अमेरिकी राजदूत केनिथ गालब्रेथ ने उपहासपूर्ण ढंग से भारत को Functioning anarchy कहा था, जिसको उन्होंने हाल ही में इस तरह संशोधित किया कि मेरा मतलब यह था कि भारतीय राज्य पर निर्भर नहीं थे और यह भारतीय समाज की ताकत थी, जो भारत को विकास की प्रक्रिया पर ले गई। भारतीय समाज का बाह्य रूप विश्व के प्रमुख लोगों को धोखे में क्यों रखता है कि वे सत्य से परे जाकर अपने विचार देते हैं।

इसका कारण यह है कि भारतीय समाज काफी हद तक संबंधों पर आधारित समाज है (एमाइल दरखाइम) और बहुत कम हद तक समझौते पर आधारित समाज (रूसो)। लेकिन भारत का संविधानवाद जो पूर्णतया एंग्लो-सैक्सन अनुभवों व ऐसे राजनीतिक तथा आर्थिक बहसों पर आधारित है, जो भारत की मूल विशेषता की अनदेखी करता है। आपसी संबंधों पर निर्भर रहने के कारण भारतवासी की सामूहिक रूप से सामाजिक समझौते द्वारा निर्मित राज्य पर निर्भरता कम है। वे परिवार, जाति व ग्राम्य स्तर के तमाम अंगों पर ज्यादा निर्भर हैं।

ये सब कुछ वे ही तत्तव हैं, जो संबंधों पर आधारित समाज में मिलते हैं और जिन पर एमाइल दरखाइम जैसे जर्मन परंपरावादियों से लेकर फ्रांसिस फुकुयामा जैसे आधुनिक विचारकों ने चर्चा की है। अति आधुनिक लोगों के उपहास (इन लोगों द्वारा नैतिक-सामाजिक निगरानी) के बावजूद बहुसंख्यक भारतीय-परिवार, जाति और समुदाय की निगरानी से लाभान्वित हैं। इसलिए उन्हें राज्य द्वारा निगरानी की कम जरूरत पड़ती है। यही वजह है कि यहां पुलिस थानों की संख्या कम है। एक चीज निश्चित है। मनुष्य को निगरानी की जरूरत पड़ती है। मसला यह है कि इस मामले में परिवार, माता-पिता या समाज ज्यादा बेहतर है या पुलिस थाने का पुलिस इंस्पेक्टर। इससे राज्य को राहत मिलती है, लेकिन इससे राजनीतिक वर्ग का स्व-निर्भर व स्वशासित समाज के साथ असहज महसूस करना स्वाभाविक है, क्योंकि वे राजनीतिक वर्ग पर निर्भर नहीं रहेंगे। स्वशासित व स्वप्रबंधान की शक्ति कहां से आती है? चर्चिल व गालब्रेथ को भारत की मुख्य विशेषता को न समझ पाने के लिए माफ किया जा सकता है, लेकिन भारत के 'अंग्रेजीदां' को कैसे माफ किया जा सकता है, जो न केवल भूल करते हैं, बल्कि भारत के मूल तत्तव को समस्या कहकर उपहास उड़ाते हैं?

यह हमें भारत की सामाजिक-आर्थिक या स्वदेशी के विस्तृत दार्शनिक आधार की ओर ले जाती है। महात्मा गांधी ने कहा था कि स्वदेशी सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विचारों का मिश्रण है। पंडित दीन दयाल ने कहा कि 'यह एकात्म संकल्पना है, जिसे ठीक ही गांधीजी ने पहले ही बहुत स्पष्ट भाषा में कहा है। इन दो महात्माओं ने जो कहा है उसका सार तत्तव यह है: सामाजिक अर्थशास्त्र-व्यक्तिगत, सामूहिक व व्यक्ति को प्रभावित करने वाले उन आदर्शों के बीच का संतुलन है, जो व्यक्तिवाद की वकालत नहीं करते। जैसा कि पूंजीवादी व मार्क्सवादी आर्थिक विचारों में मिलता है।

भारत के वर्तमान इतिहासकार व आर्थिक विचारक जो भारत की सामाजिक आर्थिक समस्या की जड़ भारत की परंपरा को मानते हैं, वे दरअसल, जर्मन दार्शनिक मैक्स वेबर की पुस्तक 'द् सोशियोलॉजी ऑफ इकोनामिक्स' से प्रेरणा लेते हैं। वेबेरियन का मत है कि आधुनिक पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था, प्रोटेस्टेंट ईसाई मत की देन है, जिसने व्यक्तिवाद को जन्म दिया, ईसाई जगत में पुनर्जागरण को प्रोत्साहित किया और स्वतंत्र सोच को विकसित किया। 'कांन्टे्र सोशल मॉडल' को उध्दृत करते हुए पिछली शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश में वेबर ने भी स्वीकार किया था कि हिन्दू और बौध्द (भारत और चीन पढ़े) कर्म और पुर्नजन्म में विश्वास और भारत में जाति व्यवस्था के कड़ापन के कारण प्रोटेस्टेंट समाज की तरह विकास नहीं कर सकते। फलस्वरूप, समस्त भारतीय सामाजिक विचार व आर्थिक सिध्दांत इस संकल्पना से उत्पन्न हुए कि जब तक भारत के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को धवस्त नहीं किया जाएगा, तब तक भारत का विकास व आधुनिकीकरण नहीं हो सकता। इस तरह भारतीय सामाजिक सुधारकों, सामाजिक-आर्थिक चिंतकों खास तौर पर माक्र्सवादी व समाजवादी विचारकों ने भारतीय व्यवस्था को निरपेक्ष, व्यक्तिवादी बनाने तथा समुदाय, ग्राम्य व्यवस्था को तोड़ने पर जोर दिया। साथ ही, बड़े पैमाने पर गांवों से पलायन कर शहरों में बसने के लिए (शहरीकरण) प्रेरित किया और समेकित रूप से इसे आधुनिकता का पर्याय माना गया।

भारतीय समाज पर वेबर के विचार पूंजीवादी दृष्टिकोण पर आधारित हैं, जबकि बेबर से लगभग 70 साल पहले अपने लेखों में कार्ल माक्र्स ने भारतीय समाज की सामाजिक नजरिए से व्याख्या की (न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून में 25 जून 1853 को प्रकाशित)। साधारण शब्दों में कार्ल मार्क्स के विचार ये हैं: ग्राम्य अर्थतंत्र या भारत के गणतंत्र पूंजीवादी व्यवस्था की तुलना में कम शोषणकारी हैं। वे भारत की शक्ति भी हैं और उनकी कमजोरी भी। माक्र्स के शब्दों में, 'सभी गृह युध्द, आक्रमण, क्रांतियां, विजय व अकाल अत्यधिक जटिल व विधवंसकारी तो दिखाई पड़ते हैं, लेकिन इनका असर सतह से नीचे नहीं हुआ। इंग्लैंड ने समस्त भारतीय सामाजिक ढांचे को तोड़ दिया, वह भी बिना किसी पुनर्संरचना के संकेत के, जो अभी भी नजर नहीं आते।' लेकिन वे कहते हैं, 'उन्होंने (ब्रिटिश) स्थानीय उद्योग को चौपट करते हुए स्थानीय समुदाय को भंगकर इसे (भारत) नष्ट कर दिया और स्थानीय समाज की सभी उत्कृष्ट व उन्नत चीजों को खत्म कर दिया।' साथ ही, वह यह भी कहते हैं, 'इंग्लैंड, सच्चे अर्थों में, हिंदोस्तान में एक सामाजिक क्रांति ला रहा है, लेकिन वह केवल अपने स्वार्थी हितों के कारण..।' मार्क्स इस विधवंस को सही ठहराते हैं और कहते हैं कि इस तरह की विधवंस की जरूरत है, क्योंकि भारत का स्थिर ग्राम्य समाज, क्रांति के मूल तत्तवों को अपनाने की इजाजत नहीं देता और क्रांति के बिना, जैसा कि मार्क्स का विश्वास है, मानवता के सपने पूरे नहीं होंगे। आखिर में मार्क्स ने कहा कि इंग्लैंड का यह अपराधा इतिहास का वह छिपा औजार है जो क्रांति लाने में सहायक होगा। जर्मन कवि गोथे को उध्दृत करते हुए यहां तक कहा कि ब्रिटिश द्वारा विनाश स्वागतयोग्य है, क्योंकि यह सुखद है। (गोथे- ' Should this touture then torment us, since it bring us greater pleasure. ')

वेबेरियन व मार्क्स की दोनों विचारधाराएं, प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियन सामाजिक मॉडल की समानांतर उत्पाद हैं। यदि इसे धार्मिक संदर्भ में देखें तो यह चर्च के खिलाफ एक विद्रोह था, जो व्यक्तिवाद का हिमायती था। दोनों का विश्वास था कि भारतीय समाज व इसकी पंरपरा को तोड़ना चाहिए और इसी विखंडन को आधुनिकता के रूप में प्रेषित किया। कुल मिलकार पूंजीवादी व माक्र्सवादियों का यह कहना है कि भारतीय ग्राम्य-समुदाय मॉडल को नष्ट किया जाना चाहिए, ताकि वेबर की बाजार आधारित अर्थव्यवस्था व पूंजीवाद तथा माक्र्स की सामाजिक क्रांति का रास्ता खुल सके। जब तक ग्राम्य-समुदाय व्यवस्था जीवित है-जो आज भी जीवित है- तब तक भारत में न तो पूंजीवादी और न ही साम्यवादी मॉडल स्वीकार है। क्योंकि भारत में जाति, समुदाय और समाज को नष्ट कर व्यक्तियों को झुंड के रूप में नहीं बदला जा सकता।

वहीं दूसरी तरफ, पूंजीवादी और साम्यवादी दोनों ने सामाजिक ढांचे को नष्ट कर दिय&#