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Saturday, 20 October, 2007

अफीम की मारी माकपा

-सतीश पेडणेकर

मार्क्स ने कहा था-धर्म जनता की अफीम है इसलिए कम्युनिस्टों ने सोवियत संघ और चीन में धर्म का सफाया करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन भारत लोकतांत्रिक और धार्मिक स्वतंत्रता देने वाला देश है और कम्युनिस्ट यहां सत्ता में भी नहीं है इसलिए वे लोगों को इस अफीम का सेवन करने से जबरन रोक नहीं सकते। पार्टी के कामरेडों पर नियंत्रण जरूर लगाते है। लेकिन जबसे धार्मिक कामरेडों की तादाद बढ़ रही है तब से मार्क्सवादी पार्टी के सामने समस्या है कि अपने कामरेडों को धर्म नामक अफीम का सेवन करने दे या नहीं। या फिर किस ब्रांड की अफीम का सेवन करने दे और किस ब्रांड की नहीं। कम से कम देवताओं की भूमि कहलाने वाले केरल में माकपा की दुविधा खुलकर सामने आ रही है।

इन दिनों केरल के एक स्वर्गीय कामरेड की आत्मा को लेकर मार्क्सवादी पार्टी और ईसाइयों में ठन गई है। माकपा के विधायक मथाई चाको की मृत्यु पिछले साल कैंसर से हुई। हाल ही में उनकी स्मृति में आयोजित एक सभा में केरल माकपा के सचिव पिनराई विजयन ने थामरासेरी के बिशप की कड़ी खिंचाई की क्योंकि उन्होंने बयान दिया था कि मथाई चाको ने कोच्चि में मृत्युशैया पर अंतिम प्रार्थना कराना स्वीकार किया था। ईसाइयों में मृत्युशैया पर अंतिम प्रार्थना कराने का चलन है।

एक दिन बाद केरल की कैथोलिक बिशप कांफ्रेस ने विजयन के बयान की कड़ी निंदा की। इसके बाद दोनों पक्ष एक दूसरे से माफी मांगने की अपील कर रहे हैं। माकपा नेताओं का कहना है कि बिशप झूठ बोलने के लिए माफी मांगें क्योंकि मथाई चाको जैसा सच्चा कम्युनिस्ट अंतिम प्रार्थना स्वीकार कर ही नहीं सकता। बिशप प्रार्थना करने गए तब चाको बेहोश थे।

इसके साथ केरल में मार्क्सवादियों और ईसाइयों के बीच पिछले काफी समय से चल रहा संघर्ष और तेज हो गया है। पिछले कुछ समय से अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़े वर्गों को आरक्षण को लेकर दोनों में ठनी हुई है। ईसाई नेता तो कई बार यहां तक कह चुके है कि माकपा सरकार ने कदम वापस नहीं लिया तो वे 1956 की तरह कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाएंगे। तब आंदोलन के बाद देश की पहली कम्युनिस्ट सरकार को भंग कर दिया गया था। इस आंदोलन में ईसाई संगठनों ने बढ-चढकर हिस्सा लिया था।

ईसाई माकपा और उसकी सरकार से बुरी तरह नाराज हैं। इस नाराजगी के दूर होने के आसार नहीं हैं इसलिए माकपा मुसलिमों को अपनी तरफ आकर्षित करने की भरसक कोशिश कर रही है। इसलिए हाल ही में कोच्चि में माकपा की बैठक में अनोखा नजारा देखने को मिला। मौलवी ने नमाज की अजान दी तो धर्मविरोधी माकपा की बैठक में मध्यांतर की घोषणा कर दी गई। मुसलिम कार्यकर्ता बाहर निकले। उन्हें रोजा तोड़ने के लिए पार्टी की तरफ से नाश्ता परोसा गया। यह बैठक वहां के रिजेंट होटल हाल में हो रही थी।

इसे माकपा की मुसलिमों को रिझाने की कोशिशों का हिस्सा माना जा रहा है। केरल में मुसलिम लीग कांग्रेस वाले गठबंधन के साथ है। माकपा उसकी जड़े काटने की कोशिश कर रही है। एक तरफ वह मुसलिमों में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है वहीं पीपुल्स डैमोक्रेटिक फ्रंट, इंडियन नेशनल लीग, जमाते इस्लामी जैसे वाम मोर्चा समर्थक मुसलिम संगठनों के जरिए लीग को चुनौती दे रही है।

यूं तो माकपा का सदस्य होने के लिए नास्तिक होना जरूरी नहीं मगर पार्टी सदस्यों से नास्तिक होने की उम्मीद भी करती है इसलिए जब भी कभी किसी माकपा नेता के धार्मिक कृत्य की बात सामने आती है तो विवाद होता है। पश्चिम बंगाल में मंत्री सुभाष चक्रवर्ती एक बार काली मंदिर के दर्शन करने गए थे तो पार्टी ने उनकी खिंचाई की थी।

पिछले दिनों माकपा के दो विधायकों ने ईश्वर के नाम पर शपथ ली थी तब केरल इकाई के सचिव विजयन ने कार्यकर्ताओं को मार्क्सवादी लेनिनवादी सिध्दांतों से भटकने के खिलाफ चेतावनी दी थी और क्रांतिकारी राह छोड़कर धर्म की तरफ बढ़ने के खिलाफ आगाह किया था। राजनीतिक हलकों में यही माना जा रहा है कि माकपा अपने धार्मिक कामरेडों को लेकर दुविधा में है और कोई स्पष्ट नीति नहीं बना पा रही है। (साभार: जनसत्ता, 18 अक्टूबर,2007)

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