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Saturday, 13 December, 2008

राष्‍ट्रीय एकता का मुख्य आधार हमारी संस्कृति

लेखक- बलबीर पुंज

हिंदुत्व की सही परिभाषा और उस के विस्तृत अर्थ को यदि एक बार समझ लिया जाए तो कई भ्रांतियां खत्म हो जाएंगी।
यदि पंथनिरपेक्षता भारत की आत्मा है, तो हिंदू राष्ट्र इसकी काया हैं। देश के जिस भाग में भी हिंदू विचार पध्दति का क्षय हुआ, वहां पंथनिरपेक्ष व्यवस्था की भी उतनी ही क्षति हुई। देश की एकता का मुख्य आधार हमारी संस्कृति है। इसलिए हमारे देश के राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संज्ञा ही दी जा सकती है।
संस्कृत की निम्न दो पंक्तियों में वीर सावरकर ने हिन्दुत्व का निचोड़ संसार के सामने रखा है-
आसिंधु सिंधु पर्यंता यस्य भारतभूमिका:।
पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृत:॥

प्रत्येक वह जो सिंधु से समुद्र तक फैली भारतभूमि को साधिकार अपनी पितृभूमि एवं पुण्यभूमि मानता है, वह हिंदू है। 'पितृभू' और 'पुण्यभू' शब्दों के विशिष्ट अर्थ हैं। पितृभू का अर्थ है- अपने पूर्वजों की कर्मभूमि और पुण्यभूमि का अर्थ है - जो जिस दर्शन को मानते हैं, उस दर्शन का प्रतिपादन करने वाले दार्शनिकों के कार्य, निवास एवं संस्कृति द्वारा पवित्र बनी भूमि।

इस चिंतन पर सर्वोच्च न्यायालय की भी मुहर लगी हैं। संविधान निर्माताओं ने भी हिंदू धर्म को पूजा पध्दति नहीं माना बल्कि उसे जीवनशैली माना। इसलिए धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों की गारंटी देते हुए अनुच्छेद 25 में स्पष्ट कर दिया गया कि खंड (2) के उपखंड (ख) में हिंदू के अंतर्गत सिख, जैन अथवा बौध्द मत सम्मिलित हैं। कमिश्नर संपत्ति कर मद्रास एवं अन्य बनाम स्व. आर. श्रीधारन एल. आर. (1976) सप्ली एस. जी. आर. 478 में संविधान पीठ ने निर्णय दिया था कि ''हिंदू अपने में भिन्न-भिन्न प्रकार के विश्वास, श्रध्दा बिंदुओं और पूजा-पध्दतियों को संजोए हुए है। शास्त्री यज्ञ पुरूषदास एवं अन्य बनाम मूलदास भद्रदास एवं अन्य (ए. आई. आर. 1966 ए. जी. 1119) में मुख्य न्यायाधाीश ने भी माना था कि सिंधु नदी के तट पर विकसित सभ्यता से प्रारंभ हुआ समाज हिंदू है न कि पूजा पध्दति।

1977 में पांच न्यायाधीशों की एक खंडपीठ जिसमें न्यायमूर्ति एम. एच. बेग और आर. एस. सरकारिया शामिल थे, ने पुन: हिंदुत्व को परिभाषित किया। एनसाइक्लोपीडिया ऑफ ब्रिटानिका से उध्दरण लेते हुए खंडपीठ ने कहा '' हिंदुत्व किसी भी पूजा-पध्दति को स्वीकारने या नकारने की बजाय सभी मान्यताओं व पूजा-पध्दतियों को अंगीकार करती है।'' खंडपीठ ने आगे यह भी कहा कि एक हिंदू चाहे वह किसी भी जाति या मजहब को मानने वाला क्यों न हो, अपनी रूचि से किसी भी पूजा-पध्दति को अपना सकता है। इस तरह हिंदुत्व एक सभ्यता और विभिन्न धर्मों का समुच्चय है, जहां कोई एक संस्थापक या पैगंबर नहीं है। ईसाई या इस्लाम मजहब कबूल कर लेने के बावजूद उस व्यक्ति विशेष की पहचान एक हिंदू के रूप में बनी रहती है। अदालत के अनुसार हिंदू इस देश में रहने वालों के लिए प्रयुक्त होता है, चाहे वे किसी भी मजहब या संप्रदाय से जुड़े क्यों न हों। यह हमारी पहचान है।

डा. इस्माइल फारूखी एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य 1994 (6) एस. सी. सी. पृ. 360 (अयोधया का मुकदमा) में न्यायमूर्ति भरूचा और न्यायमूर्ति अहमदी ने कहा - '' सामान्यत: हिंदुत्व एक जीवन दर्शन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। यह सहिष्णु है। इस्लाम, ईसाई, पारसी, यहूदी, बौध्द, जैन, सिख आदि मत के लोग इसीलिए इस देश में संरक्षण प्राप्त कर सके।'' महात्मा गांधी ने भी 'हिंदू धर्म' नामक पुस्तक के पृष्ठ 34 पर लिखा है- हिंदुत्व ही हमारी राष्ट्रीयता का आधार था।

हिंदू दर्शन में अनंत काल से विचार-विमर्श और श्रेष्ठ चिंतन के आदान-प्रदान की दीर्घ परंपरा रही है। यदि वेदों पर भी कोई तर्कसंगत वाद-विवाद उठता है और कोई नया मान्य पंथ उभरता है तो निस्संदेह हिंदू दर्शन में उसे स्थान मिलता है। यदि ऐसा नहीं होता तो वेदों के साथ साम्य नहीं रखने वाली बौध्द, जैन आदि धाराएं पल्लवित होने से पहले ही सूख जातीं। अनिश्वर व अज्ञेयवादी बौध्द मत के प्रवर्तक बुध्द को भी हमने ईश्वर के अवतार रूप में ही पूजा। यही नहीं, जब भारत की धरती पर ईसाई, यहूदी, पारसी और प्रारंभ के मुसलमान आए तो हिंदू सभ्यता ने बांह फैलाकर उनका स्वागत किया। महाभारत में उल्लेख है: ''अद्रोह सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा। अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्म सनातन:॥ समस्त प्राणियों के प्रति मन, वाणी और कर्म से द्रोह भाव नहीं रखना, सबके प्रति अनुग्रह, सबके प्रति उदारता; सनातन धर्म का यही संदेश है।

हिंदू संस्कृति अत्यंत प्राचीन है और अपने मूल्यों के कारण सतत् बनी हुई है। इसी उदार भाव के कारण हिंदू संस्कृति भौगोलिक सीमाओं में कैद न होकर चंहुओर फैली। आज कई देशों के लोक व्यवहारों में और उनके साहित्य में हिंदू संस्कृति के चिन्ह मिलते हैं। 1919 में प्रकाशित 'पीपुल्स ऑफ फिलीपाइन्स' नामक पुस्तक में प्रो. क्रोवर ने लिखा है, ''फिलीपाइन के धार्मिक लोगों के विचार, रीति-रिवाज, नाम, शब्द, कला, कौशल आदि पर भारतीय प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। अमेरिका के प्राचीन निवासी रेड इंडियन के जीवन और उनकी प्राचीन संस्कृति के अधययन से अब कई पाश्चात्य विद्वान भी स्वीकार करने लगे हैं कि यहां किसी समय भारतीय संस्कृति का जोर था। इनके बीच अग्नि संस्कार, सूर्योपासना प्रचलित था। दक्षिण अमेरिका में कई जगह शिवलिंग भी मिले हैं। स्याम देश में हिंदू संस्कृति की छाप अनूठी है। बिना किसी दबाव या प्रभाव के हिंदू संस्कृति का ओज आज भी व्यापक है। तभी आज भी दुनिया भर से लोग आध्‍यात्मिक शांति की तलाश में भारत आते हैं।''

हिंदुत्व हमारी राष्ट्रीयता का आधार है। राष्ट्र किसी भौगोलिक सीमा का नाम नहीं, बल्कि संस्कृति सूचक एक विशेष शब्द है। राष्ट्र कोई भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भूगोल पर आधारित भावनात्मक इकाई है। जैसे प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति, उसके आचार-विचार भिन्न होते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक राष्ट्र की प्रकृति भी भिन्न होती है। यही उसका वैशिष्टय है। हमारे देश की विशिष्टता हमारी सनातन संस्कृति है। हमारे राष्ट्र जीवन की मूल प्रकृति आध्‍यात्मिक होते हुए भी हमने जीवन के अन्य पक्षों को गौण नहीं माना। मूल प्रकृति में बदलाव आने से विकृतियां आनी स्वाभाविक हैं। अतीत काल में हमारी अनंत भौतिक समृध्दि से आकृष्ट होकर ही हमारे यहां कई विदेशी आक्रमणकारी आए, वहीं हमारी वृत्तियां धार्म, आधयात्मिक या परमात्म चिंतन में ही लगी रहीं। हमारी चेतना व्यष्टि से समष्टि की ओर प्रवाहित होती रही। यही हिंदू राष्ट्र की अमरता का स्रोत है।

जब से हम परतंत्र हुए, हमारी हिंदू चेतना निर्बल होती चली गई। आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू के काल में भी हिंदू राष्ट्रवाद हाशिए पर ही रहा। मैकाले-मार्क्‍स के मानसपुत्रों ने हिंदू शब्द का प्रयोग एक गाली के रूप में किया। वोटों के लिए जमकर तुष्टिकरण की नीति को खूब पोषित किया गया। एक तरफ मुसलमानों में कट्टरपंथी तत्तवों को प्रोत्साहित किया गया, वहीं हिंदू समाज में जातियों को जातियों के विरोधा में खड़ा कर हिंदू समाज को बांटने और कमजोर करने का प्रयास भी हुआ।

जैसा कि मैंने ऊपर कहा राष्ट्र जीवन की मूल प्रकृति में बदलाव आने से विकृतियां अवश्यंभावी हैं। अल्पसंख्यकवाद और अन्य संकीर्ण मनोवृत्तियों के कारण क्षेत्रीयता व जातीयता जैसी विकृतियां बढ़ीं और राष्ट्रवाद तिरोहित हो गया। 1980 के आखिर में शुरू हुए अयोध्‍या आंदोलन से हिंदू राष्ट्रवाद की भावना पुनर्जीवित हुई। हिंदुत्व दर्शन में आस्था रखने वाली भारतीय जनता पार्टी को इसीलिए 1998 में सत्ता की कमान थमाई गई। गुजरात की जनता ने दुबारा यह संदेश दिया कि जो इस देश की मुख्य धारा के साथ है, वही उनके साथ चल सकता है। सदियों से हम सखा भाव से सबको आत्मसात करते आए हैं। ''समानशीलव्यसनेषु सख्यम्'' - साथ रहने से लोगों में सख्य भाव उत्पन्न हो जाता है किंतु दुखद पहलू यह है कि देश के कथित हितैषी समाज के लोग द्रोह भाव पाले रखने के लिए लगातार जुटे रहते हैं।

छद्म पंथनिरपेक्षी व उन्हें पोषित करने वाले मार्क्‍सवादी राष्ट्र और राज्य शब्द को पर्यायवाची ठहराते हुए राष्ट्रवाद के उभार को गलत अर्थ देने की कोशिश कर रहे हैं। भारत में राष्ट्र की अवधारणा अत्यंत प्राचीन है। अथर्ववेद में कहा है - ''सानो भूमि: त्विर्षि बलं राष्ट्रे दयातूत्तमे'' (इस राष्ट्र में तेज एवं बल को धारण कर हमारी मातृभूमि वृध्दि करे)। प्राचीन काल से यह मंत्र देश में गुंजायमान है - राष्ट्राय स्वाहा.......इदं राष्ट्राय, इदं न मम्। हम पृथ्वी को मां के रूप में पूजते आए हैं - माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:। स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी दयानंद ने भी हिंदुत्व की ही कल्पना की थी। महर्षि अरविंद भी इसी विचारधारा को प्रतिपादित करते हैं। ''हमारे राष्ट्रवाद का अर्थ सनातन धर्म है। सनातन धर्म के साथ हिंदू राष्ट्र का जन्म हुआ। यह इसी के साथ पल्लवित-पुष्पित हुआ। जब सनातन धार्म का क्षय होता है तो राष्ट्र का भी क्षय होता है।'' भारत सनातन से हिंदू राष्ट्र है और हिंदू राष्ट्र में किसी एक मजहब या पंथ की अवधारणा कभी नहीं की गई। विचारों की विविधता हिंदुत्व का आधार है। भारत में कभी भी पंथ पर आधारित राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती। जब हम भारत में पंथ पर आधारित राज्य की कल्पना का त्याग करते हैं, तो उसका एकमात्र कारण यह है कि भारत एक जीवंत व परंपरागत रूप से हिंदू राष्ट्र है। यदि भारत के इतिहास का अवलोकन करें तो हम पाएंगे कि मुसलमानों के काल को छोड़ दें तो भारत में धर्मनिष्ठ राजा तो बहुत हुए, परंतु पंथ पर आधारित राज्य कभी नहीं रहा। इसका एकमात्र अपवाद सम्राट अशोक थे, जिन्होंने कलिंग के युध्द के बाद बौध्द धार्म स्वीकार कर लिया और फिर इस मत को राज्य धर्म घोषित करके राज्य के संसाधानों से इसका प्रचार किया।

भारत एक हिंदू राष्ट्र है तभी वह आज एक पंथनिरपेक्ष राज्य है। यदि ऐसा नहीं होता तो 1947 में जब देश का एक भाग मजहबी आधार पर अलग हुआ और अपने को इस्लामिक राज्य घोषित किया तब यह बहुत स्वाभाविक होता कि शेष भारत अपने को हिंदू राज्य के रूप में घोषित कर लेता। न तो ऐसा हुआ और न ऐसा होना संभव था क्योंकि खंडित भारत एक हिंदू बाहुल्य वाला हिस्सा था। हिंदुत्व एक जीवन पध्दति है, जिसमें बहुलतावादी व बहुपंथीय संस्कृति का समावेश है। इसीलिए हिंदू उपासना में किसी एक ईश्वरवाद की बजाए कोटि-कोटि देवी-देवताओं को मान्यता मिली हुई है।

मजहबी राज्य की कल्पना इस्लाम, ईसाई और साम्यवाद में ही संभव है। मैं साम्यवाद को भी एक किस्म का असहिष्णु मजहब मानता हूं, क्योंकि इस सिध्दांत को मानने वाले मानव के कल्याण के लिए केवल कार्ल मार्क्‍स-फ्रेडरिक एंजिल्स द्वारा रचित 'दास कैपिटल' को ही एकमात्र विकल्प मानते हैं। विनोबा भावे भी यहूदी, ईसाई व इस्लाम को ''ही वाद'' और भारतीय संस्कृति को ''भी वाद'' बताते हैं। 'ही वाद' अपने पंथ को ही एकमात्र सच्चा पंथ मानता है। जबकि सनातन धर्म हमें ''आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:'' सब दिशाओं से शुभ ज्ञान के लिए अपने को खुला रखने का संदेश देता है। इसलिए हमारी यह भूमि इतनी पवित्र मानी जाती है और हम उसे माता के रूप में पूजते हैं। वैदिक ऋषि को भी इस श्रेष्ठता का भान था। तभी तो वेदों में कहा गया: ''जनं विभ्रति बहुधा विवचस, नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्'' - अनेक भाषाओं को बोलने वाले, अनेक पंथों का अनुसरण करने वाले जनों को हमारी धारती धारण करती है।

अस्तु यह कहा जा सकता है कि यदि पंथनिरपेक्षता भारत की आत्मा है, तो हिंदू राष्ट्र इसकी काया हैं। देश के जिस भाग में भी हिंदू विचार पध्दति का क्षय हुआ, वहां पंथनिरपेक्ष व्यवस्था की भी उतनी ही क्षति हुई। देश की एकता का मुख्य आधार हमारी संस्कृति है। इसलिए हमारे देश के राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संज्ञा ही दी जा सकती है।
(लेखक प्रसिध्द स्तंभकार है)

1 comment:

विवेक सिंह said...

सही कहा आपने .