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Thursday 13 September 2007

करात का रहस्य : इंडिया टुडे

इस बार के इंडिया टुडे( 19 सितंबर, 2007) में इंडिया टुडे से जुडे श्री एस. प्रसन्नाराजन ने माकपा के महासचिव प्रकाश कारत पर केन्द्रित लेख लिखा है जिसे हम यहां प्रकाशित कर रहे है-

भारतीय वामपंथी ऐसे शत्रु का हौवा खड़ा कर रहे हैं जो उनकी विचारधारा जितना ही नकली है।

यह दास कैपिटल के नाम से मशहूर कहानी से भी अनूठा कथा है और यह साम्यवादी मिथकशास्त्र के सबसे अनूठे सोवियत में घट रही है। जब-जब सभ्य समाज की सीमाओं की चर्चा छिड़ती है, भारतीय लोकतंत्र का हवाला बड़ी शाबासी के साथ दिया जाता है। आज उसी भारतभूमि पर इस विचारधारा को मानने वाले अंतिम योध्दा सड़कों पर उतर आए हैं और आश्चर्यजनक बात है कि ये लोग यह सब राष्ट्रहित के नाम पर कर रहे हैं। समाजवाद नाम से जाने गए विज्ञान का अध्ययन करने वालों को इसमें विडंबना की ही मृत्यु नजर आएगी। लेकिन यह तो भारतीय कहानी है और इसके नायक पुरातत्व के नमूने कॉमरेड है। भारतीय कम्युनिस्ट और राष्ट्रहित- क्या इससे भी अटपटी बात कोई हो सकती है।

जरा गौर करें कि कौन इस 'राष्ट्रीय' स्वतंत्रता अभियान की अगुआई कर रहा है। ऐसे लोगों के पास जो तर्क हैं उनकी जीत हमें 'ज्युशे' के नए संस्करण में पहुंचा देगी और इस प्रकार की आत्मनिर्भरता हमें उत्तर कोरिया जैसे अलग-थलग पड़े, अपने आप में मगन देश जैसा बनाकर छोड़ेगी। भारतीय कम्युनिस्टों के महामहिम श्री प्रकाश कारत, जिनके भजन मीडिया के कुछ 'मूर्तिपूजक' किस्म के लोग दिन-रात गा रहे हैं, इस कथा के महानायक हैं। इस किस्म के मीडिया वालों की नजरों में भारत के दूसरे नंबर के सबसे महत्वपूर्ण राजनेता करात गुस्साए हुए राष्ट्रवादी की भूमिका में हैं।

भला हो परमाणु समझौते का कि आखिरकार हमारी किस्मत खुली और हमें कॉमरेड राष्ट्रवादी के दर्शन आखिर हो ही गए। अगर हम उनकी जंग खाई शब्दाबली को थोड़ी देर के लिए नजरअंदाज कर दें तो करात का राष्ट्रवाद (या राष्ट्रहित की उनकी अवधारणा) उतना ही आत्ममोह से ग्रस्त करने वाला है, जितनी उनकी विचारधारा। इतना तो तय है कि भारतीय कम्युनिस्टों ने राष्ट्र को कब का गंवा दिया है। उनके सांसदों की गिनती में न पड़े। हां, अगर राष्ट्र से उनका तात्पर्य प. बंगाल और केरल के देहाती क्षेत्रों के कुछ सोवियतों से है तो बात और है। वे वर्ग और जाति का युध्द भी हार चुके। भारत ने उनकी अवज्ञा कर दी। ट्रॉफी की तरह जीते दो राज्यों में भी शासक दल सूबाई व्यवस्था मात्र है, ऐसी व्यवस्था जो डरा-धमकाकर चलाई जाती है। फिर भी दिल्ली के एकेजी भवन में विराजमान अध्यक्ष के दिलो-दिमाग पर हरदम राष्ट्र की फिक्र चीन से प्रोत्साहित है। उनकी बादशाहत में 'चीनी विशेषता वाले समाजवाद' को चरम राष्ट्रवाद माना जाता है। वहां ऐसे पूंजीवाद का बोलबाला है जो समाजवाद का लबादा ओढ़े है और लेनिनवादी कारागारों के बूते चल रहा है। वहां माओ के महान ग्रंथ केवल समृतिचिन्हों की दुकानों के बेस्टसेलर हैं और वहां के लोग बिग माक्र्स के बदले बिग मैक यानी महा-मॅकडोनल्ड बर्गर के बड़े उपभोक्ता हैं। दिवंगत नेता देंग ने सीमित अमेरिकावाद (यानी पूंजी का स्वागत और लोकतंत्र पर रोक) से चीन में खुले बाजार को खड़ा कर राष्ट्रहित को साधा, हालांकि कम्युनिस्ट व्यवस्था की कालकोठरियां भी साथ-साथ पनपती रहीं। व्यावहारिक रूप से करात का राष्ट्रवाद ह्यूगो शावेज जैसा है। वेनेजुएला के राजनीतिक करतबबाज शावेज 21 वीं सदी के कास्त्रो बनना चाहते हैं और उन्होंने अमेरिका विरोध को राष्ट्रवाद की धुरी बनाया है। उन्होंने इसी से अपना कॅरिअर बना लिया है। करात अपना अमेरिका विरोध प्रदर्शन ऐसे देश में कर रहे हैं जिसे उन्होंने जीता नहीं है। उन्होंने किताब और नारे हासिल किए है या यूं कहे कि उधार ले लिए हैं, उनके पास बनाने या गंवाने के लिए कोई साम्राज्य नहीं है। वैसे, उन्हें राजनीतिक वैश्यावृत्ति के विशेषाधिकारों को भोगने में मजा आता है, यानी ऐसे अधिकार जिनके साथ कोई जवाबदेही नहीं होती। उन अधिकारों के मजे लेने के लिए उन्हें ऐसे शत्रु की जरूरत है जिसे निरक्षर और भयभीत अल्पसंख्यक मुहल्लों में घुमाया जा सके। उनके पास अमेरिका विरोध का वाद है, हालांकि इस वाद को भारत समेत विश्व के सभ्य समाज ने कब का खारिज कर दिया है। (हां, इतना जरूर है कि सबसे पैने तर्क वाले अमेरिका विरोधी अपनी बात अमेरिकी लहजे में ही कहते है)। देश की सुरक्षा की बात करते हुए भी भारतीय कम्युनिस्ट एक ऐसे शत्रु की छवि सामने रखता है जो उसकी विचारधारा की तरह ही नकली है। हो सकता है कि दूसरे शत्रु (जो सचमुच शत्रु हों और सामने हों) उसके मतलब के नहीं। तथाकथित सांप्रदायिकतावादियों, जातिवादियों और पूंजीवादियों ने मिलकर भारत को एक ऐसा राष्ट्र बना दिया है जो कम्युनिस्टों की पहुंच से परे हो गया है। उन शत्रुओं ने युध्द जीत लिया है और राष्ट्र को भी। ऐसे में बौखलाए क्रांतिकारियों के पास अमेरिका विरोध ही अंतिम नारा रह गया है। इसी बौखलाहट को ध्यान में रखकर करात को समझा जा सकता है।

भारतीय कम्युनिस्टों के ख्वाबों का भारत करात जैसे कॉमरेडों के भारत से काफी अलग है। राष्ट्रहित को तभी बेहतर साधा जा सकता है जब भारतीय कम्युनिस्ट उस असत्य से खुद को मुक्त कर लें जिसे इतिहास ने कब का ठुकरा दिया।

1 comment:

संजय बेंगाणी said...

यह भी बताते जाओ, कितने वामपंथियों के बच्चे अमेरीका में पढ़ रहे है? :)