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Friday, 23 November, 2007

मार्क्सवाद की असलियत

-हृदयनारायण दीक्षित

पश्चिम बंगाल अशांत है। आपातकाल जैसी स्थिति है। नंदीग्राम में चीत्कार है। मा‌र्क्सवादी इस गांव को भारत का अंग नहीं मानते। उन्होंने केंद्रीय रिजर्व बल को भी गांवों तक जाने से रोका है।

मा‌र्क्सवाद और मानवता का संघर्ष पुराना है। मा‌र्क्सवादी वर्ग शत्रु के सफाए के विश्वासी हैं। वैसे मा‌र्क्स और एंगेल्स की दृष्टि में किसान वर्ग शत्रु नहीं थे। दोनों ने जर्मनी के किसान संघर्ष की प्रशंसा की थी। मा‌र्क्स ने 1844 में किसान विद्रोह को जर्मन इतिहास का सबसे बड़ा परिवर्तनवादी युद्ध बताया था। मा‌र्क्स के अनुसार धर्म अफीम है। जर्मन किसान विद्रोह भी धार्मिक आस्था के कारण असफल हुआ। किसान और मजदूर किसी भी राष्ट्र के श्रमशील स्तंभ होते हैं। मा‌र्क्स दोनों को मिलाकर जनवादी क्रांति के पक्षधर थे। चीन में माओ ने किसान लामबंदी के जरिए ही क्रांति की थी।

लेकिन भारत के मा‌र्क्सवादी और माओवादी किसान विरोधी हैं। माओवादियों से लड़ना आसान है। वे राज्य व्यवस्था और कानून के दायरे में हैं। लेकिन मा‌र्क्सवादी केंद्र सरकार की संजीवनी हैं। पश्चिम बंगाल में वे स्वयं सरकार है। यहां पुलिस और माकपा कार्यकर्ता की अलग पहचान नहीं है। वे पुलिस संरक्षण में कत्ल करते हैं, पुलिस उनके संरक्षण में हिंसा करती है। दुनिया की सारी संस्कृतियां और सभ्यताएं मनुष्य केंद्रित हैं। मनुष्य जीवन की कीमत पर कोई भी सभ्यता, राज व्यवस्था या विचारधारा नहीं चलती। हिंसा हर हाल में घृणित है, लेकिन मार्क्सवादी हिंसा को निंदनीय नहीं मानते। पश्चिम बंगाल में बदले की कार्रवाई जारी है।

मार्क्स पूंजीवाद को शत्रु मानते थे, किसान-मजदूर को अपनी लड़ाई का प्रमुख सैनिक मानते थे। माकपा सरकार ने किसानों की खेती छीनकर उद्योगपति को दी है। हालात ये हैं कि किसान धरना-प्रदर्शन के जरिए अपनी मांगें रखने के लिए भी स्वतंत्र नहीं हैं। किसानों की लोकतांत्रिक कार्रवाई का समर्थन करने वाली पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद ममता बनर्जी भी माकपा के निशाने पर हैं। राज्यपाल ने चिंता व्यक्त की सो वे भी माकपा के निशाने पर हैं। यहां मानवाधिकार आयोग ठेंगे पर है। मा‌र्क्सवाद मानवाधिकार नहीं मानता। केंद्रीय संसदीय मंत्री भी रो रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस के एक कार्यकर्ता के परिवार की सुरक्षा के लिए डीजीपी से आग्रह किया। बावजूद इसके उसका घर तहस-नहस हुआ। घरवाले अपहृत हुए। मारे-पीटे गए। पश्चिम बंगाल के बुद्धिजीवियों ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया। उनकी भी पिटाई हुई।

मा‌र्क्स विचारधारा बुद्धिजीवियों को पूंजीपतियों का पिछलग्गू मानती है। मा‌र्क्सवाद की कलई खुल गई। जनवाद की खोल में छुपा पूंजीवाद प्रकट हो गया। सत्ता के क्रूर आचरण से वाम विचार की असलियत सामने आई। मार्क्सवादी इतिहासकार, आलोचक और कथित चिंतक हलकान हैं। फिल्मकार अपर्णा सेन ने वाम नैतिक श्रेष्ठता पर सवाल उठाते हुए किसान उत्पीड़न को तानाशाही बताया है। कांग्रेस अपनी सरकार की चिंता में है, लेकिन प्रतिपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी और भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मा‌र्क्सवादी हिंसा पर सीधा हमला किया है। इतिहासकार सुमित सरकार की टिप्पणी है कि उनका सिर शर्म से झुक गया है। पश्चिम बंगाल सरकार के हिस्सेदार घटक दल भी खासे नाराज हैं। मंत्री त्यागपत्र की धमकी दे रहे हैं। बावजूद इसके माकपा आक्रामक है। माकपा महासचिव प्रकाश करात ने राज्य सरकार व माकपा कार्यकर्ताओं की कार्रवाई को जायज ठहराया है। भारत के संघीय ढांचे पर प्रश्नचिह्न है। कानून एवं व्यवस्था राज्यों का मसला है, लेकिन पश्चिम बंगाल में सरकार का राजनीतिक तंत्र स्वयं ही कानून एवं व्यवस्था पर हमलावर है। पुलिस लाचार है। पश्चिम बंगाल में पुलिस का कामरेडीकरण हुआ है। सत्ताधारी दल द्वारा की जाने वाली हिंसा को रोकने का कोई तंत्र नहीं है। स्थानीय पुलिस सरकारी निर्देश मानने को बाध्य है। अन्य राज्यों में भी ऐसी ही स्थितियां अक्सर आती हैं। उत्तर प्रदेश के मऊ में तीन वर्ष पहले हुए भीषण दंगों में ऐसी ही भयावह परिस्थिति थी। पुलिस अधिकारियों के सामने हिंसा थी, आगजनी थी। अनेक पुलिसजनों ने मीडिया के सामने बताया कि वे मजबूर थे। सभी राज्य भारतीय राष्ट्र-राज्य के अंगभूत घटक हैं। राज्य संप्रभु नहीं हैं। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में केंद्र असली शासक नहीं है। किसी भी शासन का मुख्य काम जनसुरक्षा और कानून एवं व्यवस्था है। भारत में यह काम राज्यों के पास है, लेकिन तमाम राज्यों के क्षत्रप अपने-अपने क्षेत्रों के अत्याचारी जमींदार जैसा आचरण करते हैं। वे राज्यों को राष्ट्र से पृथक सत्ता बनाते हैं। केंद्र कार्रवाई नहीं करता।

पश्चिम बंगाल की सरकार अपने संवैधानिक कर्तव्य निर्वहन में असफल हो गई है। ममता बनर्जी के अनुसार सैकड़ों हत्याएं हुई हैं। प्रकाश करात के अनुसार 28 माकपाई मारे गए हैं। स्थिति आइने की तरह साफ है। राज्य का संवैधानिक तंत्र ध्वस्त हो गया है, लेकिन सरकार बर्खास्तगी के लिए राजनीतिक अनुकूलता और इच्छाशक्ति चाहिए। मनमोहन सिंह सरकार वाम दलों के बगैर अल्पमत में है। वाम दल अपने समर्थन की कीमत हर माह वसूल करते हैं। वे सरकार हिलाते हैं, गिराने की स्थिति में लाते हैं। कांग्रेस रिरियाती है, उनकी बातें मानती है। वे अल्पकालिक जीवनदान देते है। विद्वान प्रधानमंत्री भी मजबूर हैं। पश्चिम बंगाल में वाम दलों का शासन है। पश्चिम बंगाल भी भारत का हिस्सा है। यह वाम दलों की निजी जागीर नहीं है, लेकिन केंद्र उनसे डरता है। सरकार बर्खास्तगी लायक है। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते बर्खास्तगी असंभव है। तब क्षेत्रीय आपातकाल क्यों नहीं लागू किया जाता। संविधान के अनुच्छेद 352 में व्यवस्था है कि युद्ध या वाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण यदि भारत या उसके राज्य के किसी हिस्से की सुरक्षा संकट में है तो राष्ट्रपति संपूर्ण भारत या उसके राज्य क्षेत्र के ऐसे भाग के संबंध में आपातकाल की उद्घोषणा करेंगे। बेशक ऐसी उद्घोषणा भी संसद में अनुमोदन के लिए आएगी। सशस्त्र विद्रोह की बात वे स्वयं स्वीकार कर चुके हैं। ऐसी आपात उद्घोषणा के जरिए केंद्र स्वयं सारी प्रशासनिक कार्रवाइयों के संचालन में निर्देश देने का अधिकारी होगा। आखिरकार केंद्र ऐसा साहस क्यों नहीं जुटाता। जाहिर है कि कांग्रेस और वाम दलों के बीच एक-दूसरे के अपराध न देखने का समझौता है।

पश्चिम बंगाल की हिंसा, अराजकता ने कई वैचारिक सवाल भी उठाए हैं। मसलन क्या मार्क्सवाद का अंत हो गया। कहीं नंदीग्राम का पूंजीवादपोषक किसानहंता फैसला भी मा‌र्क्सवादियों की ऐतिहासिक भूल ही तो नहीं है। मा‌र्क्सवादी छोटी-मोटी गलतियां नहीं करते। वे ऐतिहासिक भूल ही करते हैं। अम‌र्त्य सेन ने उपजाऊ कृषि भूमि उद्योगों को देने की नीति का विरोध किया है। क्या मा‌र्क्सवादी गरीब किसानों को मारकर कोई नई जनक्रांति लाने की तैयारी में हैं। या परमाणु करार को सिर्फ अमेरिकी होने के कारण ही बेजा बताने वाले वामपंथी अमेरिकी भूमंडलीकरण की गिरफ्त में हैं या सारी दुनिया से खारिज मा‌र्क्सवादी खोटा सिक्का भारत में भी खोटे सिक्के के रूप में पहचान लिया गया है। भारत में मा‌र्क्सवाद यों भी नहीं चलता, पश्चिम बंगाल में भी हंसिया और हथौड़ा हिंसा के जरिए ही शासन करता है। मा‌र्क्सवादी इतिहासकार बताएं कि नंदीग्राम की शव यात्राएं मा‌र्क्सवाद की भी शव यात्राएं क्यों नहीं हैं। (लेखक वरिष्ठ भाजपा नेता व उप्र सरकार के पूर्व मंत्री हैं)

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