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Saturday, 20 September, 2008

भाजपा की विचारधारा- पंचनिष्‍ठा, भाग-3


लेखक- प्रो ओमप्रकाश कोहली


भारतीय जनता पार्टी आज देश की प्रमुख विपक्षी राजनीतिक पार्टी हैं। सात प्रांतों
में भाजपा की स्वयं के बूते एवं 5 राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकारें है। 6
अप्रैल, 1980 को स्थापित इस दल ने अल्प समय में ही देशवासियों के बीच अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। पहले, भाजपा के विरोधी इसे ब्राह्मण और बनियों की पार्टी बताते थे लेकिन आज भाजपा के ही सर्वाधिक दलित-आदिवासी कार्यकर्ता सांसद-विधायक निर्वाचित है। इसी तरह पहले, विरोधी भाजपा को उत्तर भारत की पार्टी बताते थे और कहते थे यह कभी भी अखिल भारतीय पार्टी नहीं बन सकती है। वर्तमान में भाजपा ने दक्षिण भारत में भी अपना परचम फहरा दिया है। भाजपा में ऐसा क्या है, जो यह जन-जन की पार्टी बन गई हैं, बता रहे है भाजपा संसदीय दल कार्यालय के सचिव प्रो ओमप्रकाश कोहली। पूर्व सांसद श्री कोहली दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। निम्न लेख को हम यहां पांच भागों में प्रकाशित कर रहे हैं। प्रस्तुत है तीसरा भाग-


भारतीय जनता पार्टी के कार्य की प्रेरणा पार्टी संविधान में उल्लिखित पंच निष्ठाएं हैं:

राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता
लोकतंत्र
गांधीवादी दृष्टिकोण पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना
सकारात्मक पंथनिरपेक्षता
मूल्य आधारित राजनीति


समतामूलक समाज की स्थापना
विश्व के विभिन्न चिन्तकों ने ऐसे समाज की स्थापना का विचार किया है जो शोषणमुक्त हो, और जिसमें मानव-मानव के बीच समानता हो। भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से ही ऐसे समाज की कामना करती आई है जिसमें सभी सुखी हों, रोगमुक्त एवं स्वस्थ हो, सबका कल्याण हो। समतामूलक समाज की स्थापना की दो दृष्टियां रही हैं- आध्‍यात्मिक और भौतिक।
गांधीजी के सामाजिक-आर्थिक दर्शन और दीनदयालजी के एकात्ममानववाद से प्राप्त दृष्टि के कारण ही भाजपा सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के विकेन्द्रीकरण में विश्वास रखती है।
आध्‍यात्मिक दृष्टि सभी प्राणियों में, जड़ चेतन में एक परमसत्ता की विद्यमानता को स्वीकार करती है - 'सर्वं खलु इदं ब्रह्मं,' फिर मानव-मानव में अन्तर क्यों? भोग की अधिकता ही विषमता और शोषण का कारण बनती है। संयम का आचरण कर हम विषमता और शोषण को मिटा सकते है अथवा कम कर सकते हैं। गांधीजी ने इच्छाओं और आवश्यकताओं के बहुलीकरण का विरोध किया है। उपनिषद् ने संयमित और मर्यादित भोग को आदर्श जीवन का लक्षण माना है। त्याग भावना के बिना मर्यादित भोग सम्भव नहीं। उपनिषद त्यागपूर्वक भोग की सलाह देते हैं-- त्यक्तेन भुंजीथ:।

शोषणमुक्त समतायुक्त समाज की स्थापना मानव समाज के समक्ष निरन्तर एक चुनौती रही है। मार्क्‍स और उनके अनुयायियों ने निजी सम्पत्ति को शोषण और विषमता का कारण बताया और इसका उपचार बताया सम्पत्ति पर से निजी स्वामित्व की समाप्ति और उस पर राज्य का स्वामित्व। मान लिया गया कि उत्पादन के साधनों पर राज्य का स्वामित्व होने से व्यक्ति के हाथ में पूंजी का संचय नहीं होगा और शोषण भी नहीं हो सकेगा। इस व्यवस्था में राजशक्ति द्वारा कठोर दमनकारी उपायों का अवलम्बन लिया गया। सारी शक्तियां राज्य के हाथ में केन्द्रित होने से राज्य क्रूर, निर्मम और दमनकारी हो गया। इस व्यवस्था ने व्यक्ति का पूर्ण तिरस्कार किया।
पूंजीवाद ने व्यक्ति द्वारा अमर्यादित उत्पादन, संचयन और उपभोग के सिध्दान्त को स्वीकार किया। परिणाम हुआ व्यक्ति द्वारा आत्यान्तिक उपभोग और उसमें से जन्मी विषमता, शोषणकारी व्यवस्था और साम्राज्यवाद। इसी की प्रतिक्रिया में मार्क्‍सवाद का आविर्भाव हुआ था जिसने व्यक्ति की स्वायत्त सत्ता को पूर्णत: नकार दिया था और राज्य को सर्वसत्ता का अधिष्ठान बनाकर सर्वसत्तात्मक राज्य व्यवस्था को जन्म दिया था। यह व्यवस्था भी पूंजीवादी व्यवस्था के समान ही उत्पीड़नकारी सिध्द हुई।
उधर इसकी पूर्ववर्ती व्यवस्था पूंजीवाद ने व्यक्ति द्वारा अमर्यादित उत्पादन, संचयन और उपभोग के सिध्दान्त को स्वीकार किया। परिणाम हुआ व्यक्ति द्वारा आत्यान्तिक उपभोग और उसमें से जन्मी विषमता, शोषणकारी व्यवस्था और साम्राज्यवाद। इसी की प्रतिक्रिया में मार्क्‍सवाद का आविर्भाव हुआ था जिसने व्यक्ति की स्वायत्त सत्ता को पूर्णत: नकार दिया था और राज्य को सर्वसत्ता का अधिष्ठान बनाकर सर्वसत्तात्मक राज्य व्यवस्था को जन्म दिया था। यह व्यवस्था भी पूंजीवादी व्यवस्था के समान ही उत्पीड़नकारी सिध्द हुई।

गांधीजी भी मानव समाज में व्याप्त शोषण को मिटाकर समतामूलक समाज के निर्माण के लिए प्रयत्नशील थे। उन्होंने व्यक्ति के स्वायत्त व्यक्तित्व को नहीं नकारा लेकिन व्यक्ति की चेतना के उन्नयन और समाजीकरण पर बल दिया जिसका अर्थ है व्यक्ति का सामाजिक दायित्वबोध। व्यक्ति जिस समाज में रहता है उसके प्रति उसका नैतिक कर्तव्य या दायित्व है। इसे ममत्व भी कह सकते हैं। यही आत्मविस्तार है। मां अपनी संतान के कल्याण के प्रति जिस भावना से प्रेरित होती है वह भावना ममता कहलाती है। सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़े, दलित, शोषित, अस्पृश्य और वंचित-निर्धन समाज बन्‍धुओं के प्रति गांधीजी ने इसी ममता भावना को उद्दीप्त करने का प्रयत्न किया। गरीब की ऑंखों से ऑंसू पोंछना उनकी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की प्रेरणा बनी। उन्होंने दरिद्र में नारायण के दर्शन किए और दलितोध्दार और दरिद्रोध्दार को ईश्वरीय कार्य माना। गांधीजी की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था करूणा, प्रेम, नैतिकता, धार्मिकता, ईश्वरीय भावना पर आधारित है। उन्होंने नर सेवा को नारायण सेवा माना।

गांधीजी ने ट्रस्टीशिप के सिध्दान्त पर ज़ोर दिया, जिसका अर्थ वास्तव में अपने लिए मर्यादित उपभोग और शेष सम्पत्ति का समाजहित के लिए उपयोग था। इसमें व्यक्ति के सम्पत्ति के उपार्जन पर कोई सीमा या रोक नहीं, लेकिन उपार्जित सम्पत्ति के अपने लिए उपभोग पर रोक की व्यवस्था थी। यह रोक किसी वाह्य शक्ति द्वारा, राजसत्ता द्वारा लागू न होकर व्यक्ति की अन्त:प्रेरणा, नैतिक चेतना, सामाजिक दायित्व बोध द्वारा लागू होगी, ऐसी विचार गांधीजी ने रखा। गाँधीजी के सामाजिक-आर्थिक चिन्तन का अधिष्ठान भारतीय संस्कृति का मूलाधार अध्‍यात्मवाद ही है।

श्री दीनदयालजी ने जिस एकात्ममानववाद के दर्शन का प्रतिपादन किया और जिसे भाजपा ने अपने संगठन के दर्शन के रूप में स्वीकार किया वह व्यक्ति और समाज को परस्पर विरोधी सत्ता नहीं बल्कि अन्योन्याश्रित सत्ता मानता है। वस्तुत: पूंजीवाद और समाजवाद के एकांगी समाजदर्शन से मानव कल्याण होता न देखकर श्री दीनदयालजी ने एकात्ममानववाद के रूप में ऐसे समग्र दर्शन का प्रतिपादन किया जो मानव का समग्र विचार करता है, उसके शरीर, मन, बुध्दि और आत्मा सभी पक्षों का समावेश करता है। यह दर्शन व्यक्ति, परिवार, समाज और मानवता को एक दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि अन्योन्याश्रित और पूरक मानता है। यह दर्शन संघर्ष और टकराव पर आधारित नहीं है, परस्पर पूरकता पर आधारित है। इसकी मूल दृष्टि आत्मविस्तार की आध्‍यात्मिक दृष्टि है। व्यक्ति और समष्टि एक ही चेतना से व्याप्त है। 'आत्मवत् सर्वभूतेषु य: पश्यति स: पण्डित:।' जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में मनु से कहलवाया है:
हम अन्य न और कुटुम्बी
हम केवल एक हमीं हैं
तुम सब मेरे अवयव हो
इसमें कुछ भी न कमी है।

यह समरसता की दृष्टि है, एकरूपता की दृष्टि है, अविच्छिन्नता की दृष्टि है, अभेद और एकात्म की दृष्टि है।

एकात्ममानववाद दर्शन का मूल तत्व है समरसता।
भाजपा ने सामाजिक प्रश्नों के प्रति समरसता का दृष्टिकोण अपनाया है। यह दृष्टिकोण भाजपा कार्यकर्ताओं को समाज के सभी वर्गो को, सभी जातियों को, सभी पंथों को और विशेष रूप से वंचित, दलित और अस्पृश्य कहे जाने वाले तथा वनवासी बन्धुओं के प्रति आत्मीयता और ममत्व का भाव रखने, उनकी सेवा और कल्याण में प्रवृत्त होने और अन्त्योदय के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित करता है।
भाजपा ने सामाजिक प्रश्नों के प्रति समरसता का दृष्टिकोण अपनाया है। यह दृष्टिकोण भाजपा कार्यकर्ताओं को समाज के सभी वर्गो को, सभी जातियों को, सभी पंथों को और विशेष रूप से वंचित, दलित और अस्पृश्य कहे जाने वाले तथा वनवासी बन्धुओं के प्रति आत्मीयता और ममत्व का भाव रखने, उनकी सेवा और कल्याण में प्रवृत्त होने और अन्त्योदय के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित करता है। यही दृष्टिकोण भाजपा को समाज के कमज़ोर वर्गो के प्रति बन्धुभाव, ममत्वभाव अपनाने और उनके कल्याण के लिए रचनात्मक कार्यो, सेवा कार्यो में, प्रवृत्त होने की प्रेरणा देता है।

गांधीजी के सामाजिक-आर्थिक दर्शन और दीनदयालजी के एकात्ममानववाद से प्राप्त दृष्टि के कारण ही भाजपा सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के विकेन्द्रीकरण में विश्वास रखती है। पंचायती राज को सुदृढ़ करना, विकास के केन्द्र में गांव को और कमज़ोर वर्गो को रखना और केन्द्र-राज्यों की संघीय व्यवस्था को सुदृढ़ करना इसी निष्ठा की अभिव्यक्तियां हैं। यह निष्ठा सामाजिक सौहार्द और सद्भावना को प्रेरित करने वाली और असमानता तथा शोषण मिटाने वाली है।

2 comments:

dhiru singh said...

कौन सी बी जे पी कौन सी विचारधारा की बात करते है . ओम प्रकाश कोहली जी की क्या हैसियत है बी जे पी मैं आकलन करे .चरण वंदना ही कसोटी है तरक्की की . और kya

Suresh Chandra Gupta said...

मेरे विचार में ट्रस्टीशिप के सिध्दान्त के पालन से समाज में समानता लाई जा सकती है. इस के आदर्श हैं श्री भरत, जिन्होनें श्री राम के प्रतिनिधि के रूप में अयोध्या का संचालन किया. वन में राम जैसे रहते थे, भरत भी वैसे ही रहते थे. राम के राज्य में तो सीता जी को बन में जाना पड़ा पर भरत के राज्य संचालन के दौरान कोई अन्याय नहीं हुआ.