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Saturday, 7 February 2009

क्या पोप को भी अब भारत रत्न मिलेगा ?- डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

भारत सरकार पिछले कई सालों से 26 जनवरी के दिन महत्वपूर्ण व्यक्तियों को सम्मान प्रदान करती है। यह सम्मान पद्म भूषण, पद्म विभूषण और पद्मश्री के नाम से दिया जाता है और जिसको आशातीत सम्मान देना है उसे कई बार भारत रत्न की उपाधि भी प्रदान की जाती है। सम्मान देने की यह परम्परा अंग्रेजों के वक्त में शुरू हुई थी लेकिन उन्होंने सम्मान देने के लिए उपाधियों के नाम अलग-अलग रखे हुए थे। सबसे बड़ी उपाधि तो सर की होती थी और जिसको यह उपाधि मिल जाती थी वह ब्रिटिश शासन का सूर्य कभी न डूबे ऐसी प्रार्थना दिन रात शुरू कर देता था। ऐसे किस्से भी हुए जब प्रार्थना करते-करते भगत को सचमुच का ज्ञान हो गया तो वह सर की उपाधि ब्रिटिश सरकार को वापिस कर गया। दूसरी उपाधियां राय बहादुर और राय साहिब की होती थी। जाहिर है यह उपाधियां उन लोगों को दी जाती थी जो ब्रिटिश शासन के साथ मिलकर भारतीयों का दमन करते थे और समय के अनुसार शासन की सलामती के लिए सरकार को सहयोग भी देते थे। शायद यही कारण था कि सरकार जिनको राय बहादुर और राय साहब बनाती थी, सामान्य जनता टोडी बच्चा हाय-हाय, के नारे लगाकर गलियों में उनको बेपर्दा करते थे।

ऐसा नहीं कि भारत सरकार ने यह पहली बार किया हो। न ही यह पुरस्कार अनजाने में और बिना किसी योजना के दिया गया इक्का दुक्का पुरस्कार है। वास्तव में चर्च को शह देने के लिए और मतातंरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार की सोची समझी लम्बी योजना की एक कड़ी है। यही कारण था कि कुछ साल पहले आस्ट्रेलिया की एक नागरिक श्रीमति ग्लेडेस स्टेन्स को भी पद्मश्री से सोनिया गांधी की सरकार ने सम्मानित किया था। आस्ट्रेलिया की यह नागरिक कुछ साल पहले हिन्दुस्तान में रही थी और उसके पति ग्राहम स्टेन्स उड़ीसा के जन-जाति समाज को मतातंरण के द्वारा इसाई बनाने के आपराधिक कर्म में जुटे हुए थे। इसी के चलते उड़ीसा के क्रुध्द जन-जाति समाज की एक भीड़ ने उन्हें जला दिया था। श्रीमती स्टेन्स उसके बाद आस्ट्रेलिया चली गई। भारत सरकार ने उनको पद्मश्री से सम्मानित किया। अब कोई भला मानुस पूछ सकता है कि श्रीमती स्टेन्स का किसी भी क्षेत्र में भारत को क्या योगदान है। लेकिन चर्च का दबाव था कि इसे पद्मश्री से सम्मानित किया जाये।

सरकार बदली तो जाहिर है उपाधियां भी बदल गई। इसके साथ ही उपाधि देने की कसौटी भी बदल गई। अब सरकार क्योंकि जनता की हो गई थी इसलिए नई उपाधियां भी उन्हीं लोगों को मिलने लगी जिन्होंने जन-कल्याण के लिए किसी न किसी क्षेत्र में बेहतर कार्य किया हो। परन्तु इतिहास बड़ा निर्मम है। वह बार-बार अपने को दोहराता रहता है। धीरे-धीरे इन उपाधियों की कसौटी जन-कल्याण से हटकर उसी मानसिकता में पहुंच गई जिससे गोरी सरकार उपाधियां बांटती थी। जाहिर है उपाधि देने के उद्देश्य भी बदल गये। शायद इसलिए जब किसी को उपाधि मिलती है तो नाम पढ़ कर आम आदमी की प्रतिक्रिया होती है, कम्बख्त बड़ा जुगाडू निकला। कहीं न कहीं से टांका भिड़ा ही दिया। यही कारण रहा होगा कि मोरार जी देसाई प्रधानमन्त्री बने थे तब ऐसा भी विचार होने लगा था कि इन उपाधियों का देना बंद कर दिया जाये। उपाधियां बंद तो नहीं हो सकी अलबत्ता बाद में यह फैसला जरूर हुआ कि इन उपाधियों को अपने नाम के आगे तमगे की तरह इस्तेमाल न किया जाये। परन्तु जिन उस्तादों ने मेहनत से उपाधि ली हो यदि वह उसका उपयोग नाम के आगे नहीं करेंगे तो उसका फायदा क्या?

अबकी बार निर्मला जोशी को सोनिया गांधी की सरकार ने पद्म विभूषण से नवाजा है। निर्मला जोशी नेपाली मूल की है और सुश्री टेरेसा के आंदोलन की अध्यक्षा है। सुश्री टेरेसा युगोस्लाविया की रहने वाली थी। लेकिन मतान्तरण के आंदोलन को बढ़ाने के लिए वह काफी अर्सा पहले भारत में ही आ गई थी। यहां आकर उन्होंने अनाथ बच्चों के लिए आश्रम खोले लेकिन इस बात का ध्यान रखा कि जो अनाथ बच्चे उनके अनाथ आश्रम में आ जाये उनकी सेवा करने से पहले उनके गले में यीशु मसीह के ताबीज लटका दिये जायें। वह सेवा भी करती थी लेकिन सेवा उसका ध्येय नहीं था, ध्येय की पूर्ति के लिए एक माध्यम था। सुश्री टेरेसा को यूरोप ने उसकी इन्ही मतातंरण सम्बन्धी गतिविधियों के कारण उसको नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया था। नोबेल पुरस्कार का लाभ यह रहा कि जो लोग सुश्री टेरेसा द्वारा मतातंरण आंदोलन व उसमें विदेशी शक्तियों के हाथ की जांच की मांग कर रहे थे, वे इस पुरस्कार के भारी भरकम पद से ही इतने भयभीत हो गए कि उन्होंने भी टेरेसा स्तुति ज्ञान प्रारम्भ कर दिया। टेरेसा मिथकों और प्रतीकों के महत्व को जानती थी, इसलिए उसने अपना आश्रम कोलकाता में काली मन्दिर के बिल्कुल पास ही खोला। लेकिन अब टेरेसा तो रही नहीं। नश्वर शरीर है। आखिर कभी न कभी तो नष्ट होगा ही। निर्मला जोशी उसी टेरेसा की वारिस है। अब यह आंदोलन क्या कर रहा है और इसको कहां से पैसा मिल रहा है। इसने मत परिवर्तन विधेयक के बावजूद अनेक स्थानों पर लोगों का मतातंरण कैसे करवाया है। इन सभी प्रश्नों पर हल्ला हो रहा था और जांच की मांग भी उठ रही थी। निर्मला जोशी मतातंरण के उस आंदोलन की अगुवा है जो सुरक्षात्मक शैली नहीं अपनाता बल्कि आक्रामक मुद्रा में ही रहता है। यही कारण है कि पिछले दिनों जब चर्च ने उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी की हत्या करवा दी और उसके बाद चर्च ने उड़ीसा के लोगों पर ही हिंसा फैलाने का आरोप लगाना शुरू कर दिया तो निर्मला जोशी आरोप लगाने वालों की कतार में सबसे आगे दिखाई दे रही थी। अतंतः उसे इसका पुरस्कार तो मिलना ही था क्योंकि भारत सरकार इस समय खुद सारी लाज, हया त्याग कर दृढ़ता से चर्च के आपराधिक कृत्यों के साथ खड़ी है। इसलिए निर्मला जोशी को भारत सरकार ने इस बार का पद्म विभूषण देकर उन लोगों को चेतावनी दी है जो भारत वर्ष में चर्च द्वारा विदेशी शक्तियों की सहायता से चलाए जा रहे मतातंरण आंदोलन का विरोध कर रहे हैं।

ऐसा नहीं कि भारत सरकार ने यह पहली बार किया हो। न ही यह पुरस्कार अनजाने में और बिना किसी योजना के दिया गया इक्का दुक्का पुरस्कार है। वास्तव में चर्च को शह देने के लिए और मतातंरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार की सोची समझी लम्बी योजना की एक कड़ी है। यही कारण था कि कुछ साल पहले आस्ट्रेलिया की एक नागरिक श्रीमति ग्लेडेस स्टेन्स को भी पद्मश्री से सोनिया गांधी की सरकार ने सम्मानित किया था। आस्ट्रेलिया की यह नागरिक कुछ साल पहले हिन्दुस्तान में रही थी और उसके पति ग्राहम स्टेन्स उड़ीसा के जन-जाति समाज को मतातंरण के द्वारा इसाई बनाने के आपराधिक कर्म में जुटे हुए थे। इसी के चलते उड़ीसा के क्रुध्द जन-जाति समाज की एक भीड़ ने उन्हें जला दिया था। श्रीमती स्टेन्स उसके बाद आस्ट्रेलिया चली गई। भारत सरकार ने उनको पद्मश्री से सम्मानित किया। अब कोई भला मानुस पूछ सकता है कि श्रीमती स्टेन्स का किसी भी क्षेत्र में भारत को क्या योगदान है। लेकिन चर्च का दबाव था कि इसे पद्मश्री से सम्मानित किया जाये। चर्च को इसका यह लाभ रहता है कि जन-जाति समाज में इन भारी भरकम उपाधियों के कारण चर्च का आंतक बना रहता है। और उसी आंतक के वातावरण में चर्च मतातंरण का आंदोलन सफलतापूर्वक चलाता है। फिर प्रशासन के छोटे अधिकारियों की हिम्मत नहीं होती कि चर्च के आपराधिक कृत्यों को किसी भी प्रकार रोका जाये।

इसी प्रकार कुछ साल पहले कोटा के अब्राहम थॉमस को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था। अब्राहम थॉमस राजस्थान के कोटा में इमानुएल मिशन के नाम से मतातंरण का बहुत बड़ा अड्डा चलाता है। देश के दूसरे हिस्सों से भी गरीब व असहाय बच्चों का मतातंरण किया जाता था। उस अड्डे पर भारत विरोधी साहित्य की बिक्री होती थी। विदेशों से बहुत सा पैसा इस अड्डे के नाम पर आता था। जब स्थानीय लोगों का विरोध अत्यंत उग्र हुआ और वहां कुछ आन्ध्रप्रदेश के छोटे बच्चों को मुक्त करवाया गया तो सरकार को अब्राहम थॉमस पर कानूनी कार्यवाही करनी पड़ी। वह अनेक महीनों जेल में बंद रहा और सरकार ने उस अड्डे की सम्पति की जांच के आदेश दिए। ऐसा अपराधी अब्राहम थॉमस भी भारत सरकार द्वारा दी गई पदम श्री की उपाधि को माथे पर ताज की तरह इस्तेमाल करके लोगों को डराता फिरता था।

जाहिर है कि यह सारी योजना उसी षडयंत्र का हिस्सा है जिसके अन्तर्गत चर्च को बढ़ावा देकर भारत की अस्मिता को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। चर्च और उसका मतातंरण आंदोलन इसमें अग्रणी भूमिका में दिखाई देते हैं। जब से सोनिया गांधी के हाथों में भारत की सत्ता के सूत्र आ गये हैं तब से चर्च का साहस और अपराध दोनों ही बढ़ गये हैं। निर्मला जोशी को पद्म श्री इसी योजना का हिस्सा है। आश्चर्य नहीं करना चाहिए यदि कल उड़ीसा के सांसद राधा कांत नायक और ऑल इंडिया क्रिश्चियन काऊंसिल के अध्यक्ष जॉन दयाल को अगली 26 जनवरी के दिन पर भारत सरकार विभूषण से सम्मानित कर दें। उड़ीसा पुलिस के सूत्रों के अनुसार कांग्रेस के सांसद राधा कांत नायक पर स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के सूत्रधार होने का संदेह व्यक्त किया जा रहा है। जॉन दयाल, राधा कांत नायक मतातंरण आंदोलन के दाहिने हाथ हैं। राधा कांत नायक उड़ीसा में उस वर्ल्ड विजन संस्था के अध्यक्ष है जो भारत में मतातंरण का आंदोलन तो चलाती ही है साथ ही जिसे अमेरिका की खुफिया संस्था सी.आई.ए. की फ्रंट ऑर्गेनाईजेशन माना जाता है। अब क्योकि राधा कांत नायक स्वामी जी की हत्या के आरोपों से घिरे हुए हैं तो उन्हें अभय दान देने का एक ही तरीका है कि उन्हें भी पदम श्री से सम्मानित कर दिया जाये। जो चर्च के मतातंरण आंदोलन के भीतरी गलियारों से परिचित हैं वे जानते है वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा अंसभव नहीं है।

कुछ साल पहले वेटिकन के राजा पोप दिल्ली आये थे। दिल्ली में उन्होंने बाकायदा प्रैस कान्फ्रैंस करके घोषणा की थी कि चर्च की आगे की रणनीति 21वीं शताब्दी में भारत को मतातंरित कर लेने की है। क्योंकि पिछले 2000 सालों में चर्च ने यूरोप व अफ्रीका को सफलतापूर्वक मतातंरित कर लिया है। सोनिया गांधी और उनके दरबारियों के लिए तो यही भारत की सबसे बड़ी सेवा होगी। वे पोप तो अल्लाह मियां को प्यारे हो चुके है लेकिन उनकी गद्दी पर अब जो पोप बैठे हैं, हो सकता है भारत सरकार उनको भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित कर दें क्योंकि सुश्री टेरेसा की वारिस निर्मला जोशी को सम्मानित करके उसने परम्परा तो बना ही दी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या अब सम्मान एक बार फिर राय बहादुर और राय साहिबों की श्रेणी में आ जायेंगे। क्या भारत के लोगों को इन सूचियों में से एक बार फिर टोडी बच्चो की तलाश करनी होगी ? (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

Thursday, 18 September 2008

अमेरिका के साथ परमाणु संधि को लेकर हो रहा नाटक - डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

भारत और अमेरिका के बीच परमाणु संधि को लेकर पिछले लंबे अरसे से एक नाटक खेला जा रहा है। यह परमाणु संधि अमेरिका के हितों की पूर्ति करते है, इसमें कोई संशय नहीं है। परन्तु सोनिया और मनमोहन सिंह दोनों मिलकर इस देश को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह समझौता भारत के हक में है। इसके लिए संसद में तथ्यों को छिपाकर जितना कुछ कहा जा सकता है। उतना कहा लेकिन कहने से बात बनती न देखकर कुछ सांसदों को नकद नारायण भी दिया गया, जिसकी जांच अभी तक चल रही है। शिब्बू शोरेन से मुख्यमंत्री पद का वायदा किया गया था। उसकी पूर्ति कर दी गई है। कई बदमाश जो जेल में बंद थे और सजा भुगत रहे थे। जिसको न्युट्रॉन, प्रोटोन की बात तो दूर परमाणु के बारे में कुछ ज्ञात नहीं है। वो परमाणु संधि के पक्ष में धड़ल्ले से बोलते देखे गए।
सरकार जीत गई लेकिन सोनिया-मनमोहन सिंह की जोड़ी इतना तो जानती ही है कि संसद में जीत के बावजूद भी जनता में उसकी पराजय हुई है और जनता इस बात को अच्छी तरह जानती है कि सोनिया गांधी के नियंत्रण वाली सरकार यूरोप और अमेरिका के हितों की रक्षा के लिए भारत के पूरे परमाणु कार्यक्रम को अमेरिका के पास गिरवी रखने जा रही है। इसलिए अमेरिका के साथ मिलकर इन दोनों ने नाटक का दूसरा हिस्सा बियाना में प्रारंभ किया।
सरकार जीत गई लेकिन सोनिया-मनमोहन सिंह की जोड़ी इतना तो जानती ही है कि संसद में जीत के बावजूद भी जनता में उसकी पराजय हुई है और जनता इस बात को अच्छी तरह जानती है कि सोनिया गांधी के नियंत्रण वाली सरकार यूरोप और अमेरिका के हितों की रक्षा के लिए भारत के पूरे परमाणु कार्यक्रम को अमेरिका के पास गिरवी रखने जा रही है। इसलिए अमेरिका के साथ मिलकर इन दोनों ने नाटक का दूसरा हिस्सा बियाना में प्रारंभ किया।

45 देशों का परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह है। इस समूह में इस बात का निर्णय होना था कि भारत को परमाणु व्यापार की छूट दी जाए या नहीं। यह छूट 34 वर्ष पहले तब लगी थी जब 1974 में इन्दिरागांधी की नेतृत्व में भारत ने परमाणु विस्फोट किया था। अब यह जरूरी था कि परमाणु आपूर्ति समूह सभी पात्र देश ऐसा व्यवहार करे और भारत को यह छूट देने का डटकर विरोध करें। जितने जोर से यह विरोध करेंगे मीडिया उतनी ही तेजी से उसका ऑंखों देखा हाल प्रसारित करता रहेगा। धीरे-धीरे इन नटों के व्यवहार से ऐसा वातावरण बन जाएगा। मानो सभी देश अमेरिका और भारत के इस परमाणु समझौते का विरोध कर रहे हैं तो जाहिर है कि भारत की जनता को लगेगा कि यह समझौता भारत के हितों में है इसीलिए चीन, आस्ट्रिया, न्यूजीलैण्ड और न जाने कितने लैण्ड इसका विरोध कर रहे हैं। यदि यह विरोध समाप्त हो जाता है और परमाणु आपूर्ति समूह के देश भारत को परमाणु व्यापार करने की छूट दे देते है तो इसका अर्थ होगा कि भारत की जीत हुई है और विश्व जनमत भारत के आगे झुक गया है। जाहिर है कि इसका सारा श्रेय सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को दिया जाएगा। इसका अर्थ यह हुआ कि जो लोग परमाणु समझौते का विरोध कर रहे थे वे भारत के हितों के खिलाफ थेऔर जो लोग इसका समर्थन कर रहे थे। वे भारत के हितों की रक्षा कर रहे थे। अमेरिका और मनमोहन सिंह ने बड़ी खूबसूरती से इस नाटक की स्क्रिप्ट तैयार की और परमाणु आपूर्ति समूह के हाथों में थमा दी। फिर यह ड्रामा कई दिन चला। जिस पात्र को बोलने के लिए जो डायलॉग दिए गए थे वे ईमानदारी से उन्हें बोलता रहा। लेकिन इस कथा का अंत सभी जानते थे। जैसे दस दिन चलने वाली रामलीला को लोग उत्सुकता से देखते भी रहते हैं। पात्रों के संवादों पर हस्ते भी हैं और रोते भी हैं लेकिन उन्हें कथा का अंत पहले से ही मालूम होता है। इस कथा का अंत भी निश्चित था क्योंकि कथा का सूत्रधार अमेरिका था। धीरे-धीरे नाटक का पटाक्षेप होने लगा और जो पात्र 4 दिन पहले अंगद की तरह अपने पांव फटकार रहे थे। वे भी नए पथ्य में जाने लगे कथा का अंत मनमोहन सिंह भी जानते थे बुश भी जानते थे और सोनिया गांधी को तो इस पूरे नाटक में भर्ती ही इसलिए किया गया था कि वे संकट के इस काल में भारत के सत्ता सूत्रों पर बरकरार रहे। जैसे ही नाटक का अंत हुआ तो पूरा मीडिया तालियां बजाने लगा भारत की जीत हुई है। भारत की जीत हुई है। ये तालियां टीवी चैनलों पर भी देखी जा सकती है। प्रिंट मीडिया पर भी और सोनिया गांधी के घर के आगे तो नृत्य करने वालों का जमावड़ा है। भारतीय परंपरा में मिरासी मनोरंजन करने के काम आते हैं नीति निर्धारण करने के लिए नहीं इन तालियों से लोगों को यह भ्रम नहीं हो सकता कि ये समझौता भारत के हित में है। क्योंकि जब यह नाटक चल ही रहा था तो घर के एक भेदी ने भांडा फोड़ कर दिया। बुश का अमेरिकी संसदों के नाम लिखा वह पत्र जगजाहिर हो गया जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा है कि यदि भारत परमाणु विस्फोट करता है तो यह समझौता टूट जाएगा। अमेरिका को इस बात की दाद देनी चाहिए कि यह चिट्ठी जाहिर होने के बाद उसने उसे छिपाने की कोशिश नहीं की बल्कि यह कहा कि यह चिट्ठी कोई बड़ा रहस्य नहीं है इसमें जो भी लिखा गया है वह अमेरिका ने भारत सरकार को पहले ही बता दिया था इसका अर्थ यह हुआ कि जब मनमोहन सिंह संसद में दम ठोककर यह कह रहे थे कि अमेरिका ने ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है और भारत भविष्य में अपने सामरिक हितों के लिए परमाणु विस्फोट करने के लिए स्वतंत्र है तो वह जानते थे कि वे झूठ बोल रहे हैं। दुर्भाग्य से जब भारत अपनी सामरिक स्थिति को लेकर संकट में घिरा हुआ है तो उसके सत्ता सूत्र एक ऐसी इतावली महिला के हाथ में है जिन्होंने भारत के हितों को व्हाईट हाऊस के पास गिरवी रख दिया है।
यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि भारत भविष्य में परमाणु विस्फोट करता है तो यह जरूरी नहीं है कि अमेरिका समझौता रद्द करने तक ही सीमित रहे वह देश के अंदर भी आ सकता है वह ईराक में आ चुका है, अफगानिस्तान के भीतर है और पाकिस्तान की सीमाओं का अतिक्रमण कर चुका है। उसका कहना है कि वह सबकुछ आतंकवाद की समाप्ति के लिए कर रहा है और आतंकवाद कहा है इसका निर्णय भी वह स्वयं ही करता है।
यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि भारत भविष्य में परमाणु विस्फोट करता है तो यह जरूरी नहीं है कि अमेरिका समझौता रद्द करने तक ही सीमित रहे वह देश के अंदर भी आ सकता है वह ईराक में आ चुका है, अफगानिस्तान के भीतर है और पाकिस्तान की सीमाओं का अतिक्रमण कर चुका है। उसका कहना है कि वह सबकुछ आतंकवाद की समाप्ति के लिए कर रहा है और आतंकवाद कहा है इसका निर्णय भी वह स्वयं ही करता है। जब भारत भविष्य में परमाणु विस्फोट करेगा तो अमेरिका को उसका यह कदम आतंकवाद की ओर बढ़ता हुआ दिखाई नहीं देगा। इस बात की क्या गारंटी है? अपने इन्हीं षडयंत्रों को छिपाने के लिए और भारत की जनता को गफलत में रखने के लिए श्रीमती सानिया मायनो और जॉर्ज बुश को बियाना में इतना लंबा नाटक करना पड़ा पर भारत के लोगों को भविष्य में पर्दे की पीछे छिपे रहस्य को देख लेने की क्षमता विकसित करनी होगी। (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

Friday, 22 August 2008

जम्मू प्रांत के लोग भारत की लड़ाई लड़ रहे है : डा0 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

जम्मू प्रांत में लोगों का गुस्सा शांत होने को नहीं आ रहा। सोनिया गांधी की सरकार ने वहां सेना भी तैनात कर दी है और सेना ने शहर के सभी नाकों को सील कर दिया है। परन्तु जम्मू प्रांत के लोग उफनती हुई तवी नदी को तैर करके भी जम्मू पहुंच रहे हैं। पुंछ, उधमपुर, रियासी, डोडा और कठुआ सभी शहरों में लोग स्वत: ही सरकार के विरोध में निकले हुए हैं। दिल्ली में बैठे शतुरमुर्गी सेकुलरिस्ट गला फाड-फाडकर चिल्ला रहे हैं। जम्मू प्रांत में हिन्दू मुसलमानों के खिलाफ हो रहे हैं। लेकिन जम्मू के पहाड़ों पर जम्मू की घाटियों में जम्मू की सड़कों पर जम्मू प्रांत के सभी हिन्दू और मुसलमान इकट्ठे होकर राज्यपाल एन0एन0बोहरा को बर्खास्त करने और बाबा अमरनाथ धाम को दी गई जमीन बहाल करने के नारे लगाते हैं तो दिल्ली में मुसलमानों की राजनीति करने वाले सेकुलरवादियों का मुँह पिचक जाता है। ऐसे पिचके हुए गालों वाले राजनीतिज्ञों का एक 'कट्ठ' पिछले दिनों दिल्ली में हुआ था। स्वर सभी का एक ही था कि जम्मू के लोगों को लगाम लगाई जाए क्योंकि इससे कश्मीर का मुसलमान नाराज होता है। कश्मीर का मुसलमान नाराज होता है या नहीं होता यह तथ्य और बहस का विषय हो सकता है। लेकिन कश्मीर में आतंकवादी गिरोह, हुर्रियत कांफ्रेस, लश्कर-ए-तौयबा, दुख तराने मिल्लत, मुफ्ती मोहम्मद सैय्यद और मेहबूबा मु्फ्ती (बाप-बेटी की यह जोड़ी), शेख अब्दुल्ला के वारिस और गुलाम नबी आजाद के आका जरूर नाराज होते हैं। बहुत मुमकिन है पाकिस्तान भी नाराज होता हो। कश्मीर घाटी में प्रदर्शन भी हो रहे हैं और जम्मू प्रांत में भी प्रदर्शन हो रहे हैं दोनों प्रदर्शनों में एक ही अंतर है। घाटी में प्रदर्शनकारियों के हाथ में पाकिस्तान का झंडा है और मुँह पर पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा है और जहां तक भारतीय सेना का सवाल है उसके लिए इन अलगाववादी आतंकवादी प्रदर्शनकारियों की तनी हुई मुठ्ठियों और क्रुध्द चेहरों से एक ही भाव निकलता है भारतीयों कुत्तों वापिस जाओ। जबकि जम्मू प्रांत में लोगों के हाथ में तिरंगा झंडा है। घोष का स्वर भारत माता की जय है और भारतीय सेना का हाथ हिला-हिलाकर स्वागत करने की परंपरा है। जम्मू के लोग मर रहे हैं लेकिन मरते-मरते भी भारत माता की जय बोल रहे हैं। कश्मीर में तथाकथित राजनैतिक दल और अलगाववादी आतंकवादी समूह (दोनों के बीच का अंतर अब धीरे-धीरे मिटता जा रहा है।) भारत सरकार की मेहमान बाजी का लुत्फ भी उठाते है और घाटी में पाकिस्तान की ओर मुँह करके अपनी आस्था का प्रकटीकरण भी करते हैं।

दिल्ली में बैठकर जो जम्मू कश्मीर के विशेषज्ञ बने हुए है। जिन्हें न डोगरी भाषा आती है, न लद्दाखी भाषा आती है और न ही कश्मीरी भाषा आती है। उनके पास अंग्रेज मालिकों द्वारा सिखाए गए कश्मीर समस्या के समाधान के फार्मूले हैं। वे आज 2008 में भी अपने उन्हीं गोरे महाप्रभुओं के फार्मूले लागू कर रहे हैं। दिल्ली के इन मालिकों को एक साधारण तथ्य समझ नहीं आता कि जम्मू कश्मीर भी भारत का ही हिस्सा है। वह भी उसी प्रकार लोकतांत्रिक व्यवस्था से परिचालित है। जिस प्रकार देश का कोई अन्य प्रांत हरियाणा, पंजाब या गुजरात। लेकिन पं0 नेहरू खुद कश्मीरी थे और उनके मित्र शेख अब्दुल्ला तो अपने आपको शेर-ए-कश्मीर कहते थे। इन दोनों का शायद यह मानना था कि राज्य में कश्मीरियों की जनसंख्या चाहे थोड़ी है लेकिन व्यवस्था ऐसी करनी चाहिए कि लोकतंत्र का पर्दा भी बना रहे और राज केवल कश्मीरियों का ही सुनिश्चित कर दिया जाए। इसीलिए कश्मीर प्रांत में कम जनसंख्या होते हुए भी विधानसभा की ज्यादा सीटें हैं। और कश्मीर प्रांत में ज्यादा जनसंख्या होते हुए भी विधानसभा की सीटें कम है। अभी देशभर में सभी राज्यों की विधानसभाओं के लिए पुन: परिसीमन हुआ ताकि विधानसभा की सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर किया जा सके। लेकिन भारत सरकार ने अलगाववादियों और आतंकवादियों की मांग के आगे झुकते हुए जम्मू कश्मीर में विधानसभा की सीटों का परिसीमन नहीं किया। क्योंकि यदि परिसीमन हो जाता तो राज्य पर अल्पसंख्यक कश्मीरियों का प्रभुत्व समाप्त हो जाता।

दरअसल जम्मू कश्मीर में यह लड़ाई लोकतंत्र की लड़ाई है। पिछले छ: दशकों से जम्मू प्रांत के लोगों के भीतर जमा हुआ लावा ज्वालामुखी बनकर फटा है। अमरनाथ धाम को दी गई जमीन तो एक माध्यम बना है वास्तव में यह 60 सालों से जम्मू प्रांत के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ युध्द है। यह लड़ाई कश्मीरियों के खिलाफ भी नहीं है। बल्कि यह लड़ाई उन अलगाववादी और आतंकवादी के खिलाफ है जिन्होंने कुछ अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों के बल पर भारत को बंधक बनाकर रखा है। अजीब संयोग है जो लड़ाई भारत सरकार को लड़नी चाहिए थी वह लड़ाई जम्मू प्रांत के लोग लड़ रहे है और भारत सरकार की पुलिस उन पर गोलियां चला रही है। उमर अब्दुल्ला एक इंच भी जमीन नहीं देने की बात कह रहे हैं और कुछ टीवी चैनल उनके इस भाषण को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर रहे हैं लेकिन उमर शायद यह नहीं जानते कि उनकी उम्र के हजारों को गुणा से भी अधिक पुराना बाबा अमरनाथ का धाम है । कश्मीर बाबा अमरनाथ का है कश्मीर नन्द ऋषि का है कश्मीर ललेश्वरी का है। कश्मीर उन सूफी संतों का है जो कश्मीर की घाटियों में प्रेम के गीत गुंजाते थे ये कश्मीर अब्दुल्लाओं का नहीं है और न ही गिलानियों का है और न ही सैय्यदों का है। कुछ अंग्रेजी का अखबार और उसी प्रकार के विद्वान जम्मू प्रांत के लोगों का घुड़का रहे हैं कि उनके इस आंदोलन से कश्मीर में प्रतिक्रिया हो सकती है। लेकिन वे ये बात भूल जाते हैं कि जम्मू में जो हो रहा है वह दरअसल कश्मीर में हो रही अलगावादी घटनाओं की प्रतिक्रिया ही है। ऐसे मौके पर अकलमंद इंसान तो इस प्रकार की विषैली क्रिया को रोकने की कोशिश करता है ताकि प्रतिक्रिया न हो किंतु दुर्भाग्य से यह तथाकथित विशेषज्ञ क्रिया करने वालों को तो रोक नहीं सकते या उनके आगे अपना नपुंसकतावादी दर्शन बांचते हैं। इनकी सारी विद्वता जम्मू में हो रही प्रतिक्रिया दबाने में खर्च हो रही है। गुजरात में जब कभी कुछ होता है तो यही विद्वान चिल्लाते हैं कि इनमें आतंकवादियों का दोष है क्योंकि यह आतंकवादी घटनाएं तो गोधरा काण्ड के दंगों की प्रतिक्रिया है। लेकिन वही विद्वान जम्मू को श्रीनगर में जो कुछ हो रहा है उसकी प्रतिक्रिया नहीं मानते और यदि मान भी रहे हैं तो दोष प्रतिक्रिया करने वाले पर ही थोप रहे हैं। कुछ तथाकथित कश्मीर विशेषज्ञ तो घबराकर इससे भी आगे चले गए। उन्होंने यह रोना शुरू कर दिया कि यह सारा पंगा ही पूर्व राज्यपाल एस.के. सिन्हा का खड़ा किया हुआ है। न सिन्हा अमरनाथधाम को जमीन देते और न ही यह सारा विवाद शुरू होता । इनको शायद यह नहीं पता कि कश्मीर में पिछले 30 सालों से जो हो रहा है। उसका अमरनाथ से कोई लेना देना नहीं है। अमरनाथधाम को दी गई जमीन तो एक बहाना है। असली निशाना कहां है? इसका खुलासा उमर अब्दुल्ला ने किया है। जम्मू प्रांत के लोग भारत की लड़ाई लड़ रहे हैं उनकी पीठ थपथपाने की जरूरत है न कि पीठ में गोली मारने की।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

Saturday, 19 January 2008

रंगनाथ मिश्रा आयोग के पीछे का राजनैतिक षडयंत्र

लेखक: डा0 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

भारत सरकार भारतीय मजहबों को त्याग कर ईसाई और मुसलमान समाज में चले गए व्यक्तियों की जाति तलाशने के काम में जुटी हुई है। लेकिन समस्या यह है कि इस देश में जोर जबरदस्ती या लालच से भारतीय या हिन्दू समाज के लोगों को इस्लामी समाज के घेरे में लाने की कवायद काफी लंबे अरसे से हो रही है। इसकी शुरूआत मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमणों के पहले ही शुरू हो गई थी। ये लगभग सातवीं-आठवीं शताब्दी की घटनाएं हैं। उसके बाद लोदी, खिलजी, गुलाम, तुगलक और मुगल जैसी अनेक इस्लामी सल्तनतें इस देश में स्थापित हुईं और हिन्दू समाज से इस्लामी समाज की होर जाने का सिलसिला भी चलता रहा। इस्लामी समाज में जाति व्यवस्था नहीं है। इसलिए पंथ परिवर्तन के बाद उनकी जाति इस्लामी समाज में ही विलीन हो गई। यही प्रक्रिया बाद में भारत में पुर्तगाल, डच और अंग्रेजों के आने के बाद ईसाई समाज की स्थापना में हुई। हिन्दू समाज या भारतीय समाज के लोग ईसाई समाज में भी जाने लगे और वहां भी जाति व्यवस्था न होने के कारण उनकी पूर्व जाति ईसाई समाज में ही विलीन हो गई। यह तेरह शताब्दियों की कथा है और 13 शताब्दियों से निरंतर चल रही है।

21वीं शताब्दी में भारत सरकार भारतीय पंथ छोड़कर ईसाई या मुस्लिम समाज में चले गये लोगों की जाति की तलाश कर रही है। आठवीं शताब्दी में मुसलमान बन गए भारतीयों या हिन्दुओं को शायद अब अपनी उस जाति का पता भी नहीं होगा क्योंकि व्यवहार में वह लुप्त हो गई थी। परंतु भारत सरकार उनका पता लगाने के हठ पर अड़ी हुई है और यह हठ भी बड़ा अजीब है। सरकार उनकी जाति का पता लगाकर उनको सरकारी नौकरियों में और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण देने के लिए अड़ी हुई है और आश्चर्य की बात है कि जिन मौलवियों ने और पादरियों ने, इमामों ने और बिशपों ने कभी यह घोषणा की थी कि हमारे समाज में कोई जाति नहीं है। अब वही पादरी और बिशप अपने समाज में जाति तलाश रहे हैं और इतना ही नहीं, जाति है- इसके हठ पर भी अड़े हुए हैं।

इस पूरी रणनीति में सोनिया गांधी के नेतृत्व में भारत सरकार इमामों और बिशपों के साथ खड़ी हो गई हैं। उसने इसी रणनीति के अंतर्गत उडीसा के एक सज्जन रंगनाथ मिश्र, जो कभी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्यन्यायाधीश भी रह चुके हैं और बाद में कांग्रेस की कृपा से 6 साल राज्यसभा का सुख भी भोग चुके हैं, की अगुवाई में आयोग की स्थापना कर दी और जैसा कि आशंका थी आयोग ने भारत सरकार की मंशा के अनुरूप ही यह सिफारिश कर दी है कि भारतीय पंथों को त्यागकर इस्लामी या ईसाई समाज में गए लोगों को भी अनुसूचित जातियों के भारतीयों के समान ही आरक्षण मिलना चाहिए।

ऊपर से देखने पर यह लगता है कि ईसाई अथवा इस्लामी समाज की सारी कवायद सरकारी नौकरियों में कुछ चंद स्थान पाने की है या फिर कुछ शिक्षा संस्थानों में कुछ छात्रों के भर्ती हो जाने की है। लेकिन ऊपर से यह षडयंत्र जितना सतही दिखाई देता है भीतर से उतना ही गहरा है। यह एक प्रकार से भारत की राज्यसत्ता पर कब्जा करने के लिए ईसाई और इस्लामी समाज द्वारा रची गई संयुक्त रणनीति है। जिसका संचालन पर्दे के पीछे से सोनिया गांधी और उसके अदृश्य आका कर रहे लगते हैं। मुद्दा अत्यंत स्पष्ट है। एक बार यदि सिध्दांत रूप में इस बात को स्वीकार कर लिया जाता है कि ईसाई अथवा इस्लामी समाज में भी जातियां हैं और उन जातियों में से भी कुछ को अनुसूचित श्रेणी में स्वीकार किया जाता है तो आगे सत्ता पर कब्जा करने के रास्ते अपने आप खुलते जाएंगे। रिकार्ड के लिए रंगनाथ मिश्रा ने पहला अवरोध तो हटा ही दिया है। आयोग ने ईसाई और मुस्लिम समाज में अनुसूचित जातियों की कल्पना को यथार्थ मान लेने का आग्रह किया है।

भारतीय संविधान में, संसद में और प्रदेशों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों के लिए स्थान आरक्षित किए हैं। यदि ईसाई और मुस्लिम समाज में भी अनुसूचित जातियों की उपस्थिति को स्वीकार कर लिया जाता है तो जाहिर है कि दलित श्रेणियों के लिए आरक्षित लोकसभा और विधानसभा की इन सीटों पर ईसाई या मुसलमान पंथ के लोग भी चुनाव लड़ सकेंगे। ईसाई और मुस्लिम समाज को इससे दोहरा लाभ होगा। वे साधारण सीटों पर तो चुनाव लड़ ही सकेंगे इसके साथ ही वे आरक्षित सीटों पर भी चुनाव लड़ेंगे और जैसी भारत में राजनैतिक कारणों से मौलवी और पादरी की एकजुटता दिखाई दे रही है उसमें यह भी संभव है कि भविष्य में ये दोनों मिलकर एक रणनीति के अनुसार चुनाव लड़ें। केरल जैसे प्रदेश में जहां ईसाइयों और मुसलमानों की संख्या पर्याप्त है वहां इन पंथों के लोगों को यदि अनुसूचित जाति का लाभ भी दिया जाता है तो स्वाभाविक है कि यह मिलकर केरल में सत्ता संभालने की स्थिति में आ सकते हैं । ऐसा प्रयोग कमोवेश असम और पश्चिमी बंगाल में भी किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड भी इस प्रयोग के अनोखे परिणाम दे सकता है। जिन शक्तियों ने अब जब सोनिया गांधी को केन्द्र में स्थापित कर दिया है वही शक्तियां राज्यों में इस्लामी और ईसाई पंथियों को सत्ता केन्द्रों तक पहुंचाने में जुटी हैं। रंगनाथ मिश्र आयोग उसी लंबे षडयंत्र की पहली कड़ी है। यदि इसको प्रारंभ में ही न तोड़ा गया तो भविष्य में इसके भयावह परिणाम निकल सकते हैं।

इसका एक और साइडइफेक्ट भी होगा। भारतीय समाज की दलित जातियों में इससे निराशा उत्पन्न होगी। आज तक उन्होंने इन विदेशी पंथों का जिस साहस और उत्साह से सामना किया है। उसमें निश्चय ही गिरावट आएगी। यह ध्यान रखना होगा कि मुस्लिम आक्रांताओं के खिलाफ जो व्यापक संघर्ष हुए उनमें ज्यादा योगदान इन्हीं तथाकथित दलित जातियों का रहा है। इतने प्रलोभनों और भय के बावजूद दलित जातियों ने अपनी परंपरा और विरासत को नहीं त्यागा। वे व्यापक हिन्दू समाज के भीतर रहकर ही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती रही। संकट की इन घड़ियों में इन तथाकथित दलित जातियों के जो बंधु अपनी बिरादरी छोड़कर ईसाई समाज या मुस्लिम समाज में चले गए उन्हें बिरादरी ने हिकारत की नजर से ही देखा। मध्यकालीन युग में तो उनका सामाजिक बहिष्कार भी हुआ। लेकिन दुर्भाग्य से सरकार अब उन लोगों के साथ खड़ी नजर आ रही है जो संघर्ष काल में और संकट काल में अपनी बिरादरी को छोड़ गए थे।

जो संकट में और मुस्लिम आक्रांताओं के काल में और पादरियों के युग में भी अटल खड़े रहे उनके हितों पर सरकार कुठाराघात कर रही है। इससे संकट काल में लड़ने का भारतीय समाज का संकल्प टूटेगा और वह हतोत्साहित होगा। इसमें सोनिया गांधी को ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि शायद सोनिया गांधी की भारत में स्थापना ही उस संकल्प को तोड़ने के लिए हुई है जिसके बलबूते भारत आक्रमणों की इन अनेक शताब्दियों को सफलता पूर्वक झेल चुका है। परंतु पंडित रंगनाथ मिश्र को क्या कहा जाए?दुर्भाग्य से भारतीय इतिहास में रंगनाथ मिश्रों की भी परंपरा रही है। (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

Saturday, 5 January 2008

विदेशी भाषा और भारतीय भाषाओं के मीडिया की प्राथमिकताएं

लेखक : डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

भारत में मीडिया की दो समांतर धाराएं प्रत्यक्ष दिखाई देती हैं। एक धारा है विदेशी भाषा के मीडिया की और दूसरी धारा है भारतीय भाषाओं के मीडिया की। भारत में विदेशी भाषा का मीडिया मुख्य तौर पर अंग्रेजी भाषा तक ही सीमित है। पुदुच्चेरी और में फ्रांसीसी भाषा का भी थोड़ा बहुत मीडिया है और गोआ दमन दीव में पुर्तगाली भाषा की कुछ पत्र-पत्रिकाएं भी निकलती हैं। गोवा से प्रकाशित पुर्तगाली दैनिक 'ओ हेराल्डो' पिछले कुछ दिनों से अब अंग्रेजी में भी प्रकाशित होने लगा है। भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता में सभी भारतीय भाषाओं की शमूलियत है।

पिछले दिनों की तीन घटनाओं को आधार बनाकर विदेशी भाषा के मीडिया और भारतीय भाषा के मीडिया की प्राथमिकताओं का विश्लेषण किया जाना आवश्यक है। ये तीन घटनाएं हैं गुजरात के विधानसभा चुनाव, रामसेतु आंदोलन, विशेषकर 30 दिसंबर को दिल्ली में रामेश्वरम रामसेतु रक्षा मंच की ओर से की गई विशाल राष्ट्रीय महासभा और उड़ीसा के कंधमाल जिला में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी महाराज पर क्रिसमस के दिन ईसाई संगठनों द्वारा किया गया घातक आक्रमण। इन तीनों घटनाओं का मीडिया में विवरण जिस प्रकार छपा या छप रहा है वह अपने आप में विदेशी भाषा के मीडिया और भारतीय भाषा के मीडिया की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करता है। गुजरात के विधानसभा के चुनावों की घटना और उड़ीसा में स्वामी जी पर आक्रमण की घटना का विश्लेषण दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी एवं गुजरात/उड़ीसा से प्रकाशित गुजराती और उड़िया भाषा के समाचार पत्रों में प्रकाशित विवरण को आधार बनाया गया है। जबकि रामसेतु की विशाल राष्ट्रीय सभा के लिए दिल्ली से ही प्रकाशित अंग्रेजी और हिन्दी भाषा के समाचार पत्रों को आधार बनाया गया है। दिल्ली में तीन प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्रों टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस के हिन्दी संस्करण भी नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान और जनसत्ता के नाम से निकलते हैं। ये समाचार पत्र ज्यादातर अंग्रेजी संस्करणों के अनुवाद पर ही आधारित है और अपने मूल अंग्रेजी अखबार की रसगंध को हिन्दी भाषा में परोसने को दोयम दर्जे का प्रयास है। इसलिए इन तीनों हिन्दी अखबारों का शुमार उनके अंग्रेजी संस्करणों में ही कर लिया है। अलग से उन्हें भारतीय भाषा के मीडिया में शामिल नहीं किया गया है।

सबसे पहले गुजरात के विधानसभा के चुनावों की घटना का विश्लेषण करें। उस काल के दो महीने के निम्न चार अंग्रेजी अखबारों, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस और दि हिन्दू को विश्लेषण के लिए प्रयुक्त किया जाएगा और इसी प्रकार गुजरात से प्रकाशित गुजराती भाषा के अखबारों-संदेश, गुजरात समाचार, दिव्य भास्कर, जय हिन्द और प्रभात को आधार बनाया गया है। उस विश्लेषण के आधार पर निम्न निष्कर्ष सहज ही स्पष्ट दिखाई देते हैं। इस विश्लेषण में अंग्रेजी और गुजराती के उपरोक्त समाचार पत्रों में प्रकाशित संपादक के नाम पत्रों को भी शामिल किया गया है।
निष्कर्ष :- अंग्रेजी भाषा के उपरोक्त समाचार पत्रों के आधार पर
1. नरेन्द्र मोदी घोर सांप्रदायिक व्यक्ति है।
2. वे गुजरात में मुसलमानों का विरोध करते हैं।
3. गुजरात में सरकार द्वारा मुसलमानों को प्रताड़ित किया जा रहा है और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक माना जा रहा है।
4. सोहराबुद्दीन की पुलिस मुठभेड़ में मृत्यु राज्य सरकार द्वारा किया गया एक कत्ल ही है।
5. मोदी की दृष्टि में मुसलमान आतंकवादी है जबकि ऐसा नहीं है।
6. मोदी गुजरात को हिन्दू और मुस्लिम के आधार पर बांट रहे हैं।
7. मोदी हिन्दुत्व का एजेंडा लागू कर रहे हैं।
8. नरेन्द्र मोदी जनजातिय क्षेत्रों में चर्च और इस्लाम का कार्य दूभर कर रहे हैं।
9. नरेन्द्र मोदी तानाशाह है।
10. नरेन्द्र मोदी अफजल गुरु और सोहराबुद्दीन का प्रश्न उठाकर मुसलमानों को अन्यायपूर्ण ढंग से बदनाम कर रहे हैं।

इसके विपरीत गुजराती भाषा के मीडिया के आधार पर निम्न निष्कर्ष सहज ही निकलते हैं।
1. नरेन्द्र मोदी ने गुजरात से आतंकवाद को समाप्त किया है।
2. नरेन्द्र मोदी के सख्त प्रशासन के कारण ही आतंकवादी गुजरात में घुसने और कोई घटना करने से घबराते हैं।
3. सोहराबुद्दीन की घटना के बाद दूसरे आतंकवादी गुजरात में कोई वारदात करने से डरने लगे।
4. तथाकथित सेकुलर पार्टियां मुसलमानों और आतंकवादियों को शह भी देती हैं और वोट की खातिर उनका तुष्टिकरण भी करती है। लेकिन मोदी वोट की खातिर किसी का तुष्टिकरण नहीं करते।
5. आतंकवाद से मुकाबला सख्ती से किया जा सकता है तुष्टिकरण से नहीं। गुजरात इस विषय में राह दिखा रहा है।
6. अफजल गुरू को फांसी न देकर कांग्रेस और सीपीएम मुसलमानों को राष्ट्रीय हितों को दरकिनार करते हुए भी प्रसन्न करने की कोशिश कर रही है।

इन दोनों निष्कर्षों के अवलोकन से प्रश्न उठता है कि एक ही घटना पर विदेशी भाषा का मीडिया और भारतीय भाषाओं का मीडिया लगभग परस्पर विरोधी खेमे में ही खड़ा क्याें दिखाई देता है? ऐसा क्यों है कि सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ की घटना को लेकर गुजराती भाषा के अखबार और अंग्रेजी भाषा के अखबार अलग प्रकार से करते हैंघ् इसका मुख्य कारण विभिन्न मुद्दों और विभिन्न स्थितियों को लेकर अंग्रेजी मीडिया की मानसिकता जिस धरातल पर अवस्थित है वह गुजराती भाषा के मीडिया से या फिर भारतीय भाषा के मीडिया से बिल्कुल अलग है। एक बात और भी ध्यान में रखनी चाहिए कि भारतीय भाषाओं के मीडिया और विदेशी भाषाओं के मीडिया के पाठक वर्ग भी लगभग अलग-अलग ही है। भारतीय भाषाओं के मीडिया का पाठक आम आदमी है जिसमें खबर की भूख दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। विदेशी भाषा के मीडिया का वर्ग खास आदमी है, उसकी संख्या सीमित है परंतु उसका प्रभाव ज्यादा है। विभिन्न मुद्दों से संबंधित अवधारणाओं के स्तर पर भी ये दोनों पाठक वर्ग काफी अलग-अलग है। उदाहरण के लिए सांप्रदायिकता को लेकर इन दोनों वर्गों की अवधारणा में जमीन आसमान का फर्क है। विदेशी भाषा के मीडिया का पाठक वर्ग ऐसी जगहों पर रहता है जहां आदमी-आदमी के बीच संपर्क भी कम है और संबंधों के स्तर पर एक और औपचारिकता बनी रहती है। इन स्थानों पर भीड़ कम है स्थान ज्यादा है। एक खुलापन भी है। आपसी संपर्क और संबंध न्यूनतम स्तर पर ही विद्यमान है। इसलिए इस वर्ग के लिए सांप्रदायिकता किताबों में पढ़ा हुआ शब्द है जिसको उसके समग्र रूप में देखपाना इनके लिए संभव ही नहीं है। यदि और ढंग से कहें तो कहा जा सकता है यह पाठक वृंद गांधीनगर का पाठक वृंद है। इसके विपरीत भारतीय भाषाओं के अथवा गुजराती भाषाओं के मीडिया का पाठक वृंद ठेठ अहमदाबाद में रहता है। उसके लिए सांप्रदायिकता महज कागज पर छपा हुआ शब्द नहीं है बल्कि नित्यप्रति के परस्पर व्यवहार और अनुभव के भीतर से उपजा और निर्मित एक यथार्थ है। उस यथार्थ में सोहराबुद्दीन नित्यप्रति मूर्त रूप में घूमता है। अफजल गुरू भी घूमता है। उनकी ऑंखें घूरती हैं और कर्म भय पैदा करते हैं। इस सांप्रदायिकता के बीच में से ही उसे नित्यप्रति गुजरना है। इसलिए उससे वह बच भी नहीं सकता। ये नित्यप्रति की संकरी गलियां हैं। जहां सांप्रदायिकता से नित्य-नित्य मुठभेड़ होती है। इन पाठकों का क्रोध इस बात से उपजता है। यह सांप्रदायिक चेहरा कभी हाजी मस्तान के रूप में प्रकट होता है, कभी दाऊद अब्राहिम के रूप में प्रकट होता है, कभी सोहराबुद्दीन के रूप में प्रकट होता है और कभी अफजल गुरू के रूप में प्रकट होता है। कभी यह तस्लीमुद्दीन बनकर आता है और कभी ईश्रतजहां बनकर रात्रि के अंधकार में निशाचरों की तरह घूमता है। राज्यसत्ता इन निशाचरों से वोट की खातिर हाथ मिला लेती है। आम आदमी का यह पाठक वर्ग इस मिलते हुए हाथ को देखता भी है और उससे सहमता भी है। आम आदमी का इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि सोहराबुद्दीन को किसने मारा और कैसे मारा? उसके मरने की खबर पर वह राहत महसूस करता है जैसे गली-मोहल्ले में घूमता हुआ कोई पागल कुत्ता मरता है तो लोग खुश होते हैं कि जीवन सुरक्षित हो गया है। लेकिन जब जीवजंतुओं के प्रति करूणा की वकालत करने वाला कोई संगठन पागल कुत्ते को मारने के खिलाफ अभियान चला दे तो स्वभाविक है यह पाठक वृंद अभियान चलाने वालों की ओर आश्चर्य भरी नजरों से ही देखेगा। विदेशी भाषा के मीडिया और भारतीय भाषाओं के मीडिया की प्राथमिकताओं और दृष्टिकोण के अलग होने का रहस्य भी यही है। दूर से बैठकर पागल कुत्ते के प्रति करूणा की मांग करना एक बात है और उस कुत्ते के साथ रहते हुए एक दिन उसे मरा हुआ देखकर भयमुक्त होने के एहसास से प्रसन्न होना दूसरी बात है। अंग्रेजी भाषा का मीडिया इस देश में घट रही घटनाओं को दूर बैठकर केवल द्रष्टा के रूप में देखता है और भारतीय भाषाओं का मीडिया उन स्थितियों को भोक्ता के रूप में देखता है। इसका कारण भी स्पष्ट है। पहले मीडिया का पाठक केवल द्रष्टा है और दूसरे मीडिया का पाठक स्वयं भोक्ता है।

रामसेतु बचाने के लिए दिल्ली में विशाल राष्ट्रीय महासभा-दूसरी घटना 30 दिसंबर 2007 को दिल्ली के स्वर्णजयंती पार्क में रामसेतु को बचाने के लिए की गई विशाल राष्ट्रीय महासभा है। इस सभा में देश के प्रत्येक हिस्से से लाखों लोगों ने शिरकत की। लद्दाख से लेकर अरूणाचल प्रदेश तक के लोग आए थे। केरल से लेकर पंजाब तक से लोग स्वयं अपना किराया खर्च कर इस राष्ट्रीय सभा में भागीदारी करने के लिए आए थे। हजारों दिल्लीवासी भक्तिभाव से इन रामभक्तों के लिए भोजन तैयार करने में लगे हुए थे। अनेक मोहल्लों में रामभक्तों को रोक-रोक कर लोग आग्रहपूर्वक फल खाने को दे रहे थे। इस पूरे घटनाक्रम की रपट विदेशी भाषा के मीडिया और भारतीय भाषा के मीडिया में बिल्कुल ही अलग-अलग प्रकार से हुई। टाइम्स ऑफ इंडिया की रपट इस प्रकार की थी कि लाखों लोगों के आ जाने से दिल्लीवासियों को बहुत कष्ट हुआ, सड़कों पर जाम लग गया और लोग रविवार का आनंद नहीं मना सके। दिल्ली शोर शराबे को माहौल में डूब गई। परिवहन व्यवस्था में अफरा-तफरी मच गई। टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक करोड़ की आबादी वाले दिल्ली प्रदेश में से किसी एक महिला से इस राष्ट्रीय सभा के बारे में पूछा भी। उसने कहा कि मैं हर रविवार को मेट्रो से अपनी बहन को मिलने के लिए शाहदरा जाती हूँ लेकिन इस अव्यवस्था के कारण नहीं जा सकी। रपट का स्वर कुछ ऐसा था कि इस महिला के अपनी बहन से न मिल पाने के कारण इस राष्ट्रीय महा सभा ने बड़ा ही अहित किया है। एक अन्य अंग्रेजी अखबार ने मानो एक बहुत बड़ा रहस्योद्धाटन किया। एक सज्जन ट्रेन पकड़ने के लिए आए थे। टिकट लेना उनकी आदत में शुमार नहीं था। वे टीटी को कुछ पैसे देकर सुखपूर्वक यात्रा करूँगा यह सोच कर चले थे। लेकिन रामसेतु पर हो रही इस राष्ट्रीय सभा में भाग लेने वालों की भीड़ के कारण टीटी इन सज्जन की सहायता नहीं कर सके। अंग्रेजी अखबार के अनुसार इस राष्ट्रीय सभा के कारण जनता को हो रहे कष्ट की यह पराकाष्ठा है।

इसके विपरीत दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी भाषा के समाचार पत्रों पंजाब केसरी और दैनिक जागरण की रपट का स्वर बिल्कुल भिन्न था। इनके अनुसार इस राष्ट्रीय सभा से सारी दिल्ली राममय हुई। रामभक्तों का स्वागत करने के लिए उमड़ पड़े हजारों दिल्लीवासी। दिल्ली में जगह-जगह उनका स्वागत हो रहा था और लोग उनके ठहरने और भोजन की व्यवस्था में संलग्न थे। दिल्ली की भारतीय भाषाओं के अखबारों ने तो कई दिन पहले से ही खबरें देनी शुरू कर दी थी कि इस राष्ट्रीय सभा में भाग लेने के लिए आ रहे रामभक्तों का स्वागत करने के लिए दिल्ली के लोग किस प्रकार की तैयारियाँ कर रहे हैं।

इन दोनों रपटों को पढ़ने के बाद प्रश्न पैदा होता है कि क्या कारण है एक ही घटना पर रपट देते हुए मीडिया का एक वर्ग कहता है कि इससे दिल्ली के लोग प्रसन्न हो रहे हैं और दूसरा वर्ग कहता है कि इससे दिल्ली के लोगों का कष्ट बढ़ रहा है। इसका कारण भी उसी मानसिकता में खोजना होगा जो विदेशी भाषा के मीडिया और भारतीय भाषा के मीडिया के पाठक वर्ग को अलग-अलग करती है। विदेशी भाषा के मीडिया का पाठक वर्ग नई कालोनियों में है। डिफे न्स कालोनी, डीएलएफ कालोनी में है, अंसल प्लाजा में है, टीडीआई में है और सरकारी बाबुओं में है। (बाबुओं से हमारा अभिप्राय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों से है।) जैसा कि ऊपर हमने संकेत किया है कि दोनों वर्गों की अवधारणाओं में स्पष्ट ही अंतर है। एक वर्ग ऐसा है जो प्रात: काल ब्रह्ममुहर्त में समीप के मंदिर में हो रही आरती को सुनकर प्रसन्न होता है और दूसरा वर्ग ऐसा है जो उसी आरती को सुनकर नाक भौं सिकोड़ता है कि इससे सुबह की नींद में खलल पड़ता है। यह वही वर्ग है जो रामजन्मभूमि पर मंदिर बनाने को नकार कर वहां एकता के लिए पार्क बनाने का सुझाव देता है। लेकिन वह यह नहीं जानता कि पार्क से उपजी एकता एक ही खुरचन में खत्म हो जाती है । आरती से उपजी एकता लंबे अरसे तक चलती है। अंग्रेजी अखबारों और भारतीय भाषाओं के अखबारों द्वारा इस राष्ट्रीय महा सभा पर की गई रपट उनकी प्राथमिकता भी निश्चित करती है। अंग्रेजी मीडिया के लिए भारतीयता से जुड़ी चीजें और क्रियाकलाप अंग्रेजों द्वारा स्थापित सभ्यता और जीवन पध्दति में खलल पैदा करती है।

उड़ीसा के कंधमाल की घटना-उड़ीसा के कंधमाल में क्रिसमस की पूर्व संध्या पर स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी महाराज पर 24 दिसंबर को ईसाई संगठनों ने घातक आक्रमण कर दिया। स्वामी जी घायल हुए और उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। स्वभाविक ही उड़ीसा के लोगों में इस पर प्रतिक्रिया हुई। उन्होंने 4 घंटे का शांतिपूर्ण बंद रखा। गुस्से में आए कुछ लोगों ने चर्च की कुछ झोपड़ियां भी जला दीं। इन झोपड़ियों पर सलीव का निशान भी लगा हुआ था। इसलिए इनको चर्च का जलाना कहा गया। ब्राह्मणी गांव में ईसाइयों ने दो सौ लोगों के घर जला दिए। इस घटना की रपट अंग्रेजी मीडिया और उड़िया भाषा के मीडिया में बिल्कुल अलग-अलग प्रकार से आनी प्रारंभ हुई और अभी तक आ रही है। दिल्ली में स्थित लगभग विदेशी भाषा का समग्र मीडिया (एक आध अपवाद को छोड़कर) की रपट का मुख्य स्वर निम्न प्रकार से सारणीबध्द किया जा सकता है।

1. उड़ीसा में ईसाइयों पर अत्याचार हो रहे हैं। उनके घरों को जलाया जा रहा है और चर्च फूंके जा रहे हैं।
2. सरकार ईसाइयों की रक्षा करने में बुरी तरह असफल रही है।

इसके विपरीत उड़ीसा के उड़िया भाषी समाचार पत्रों यथा-संवाद, समाज, धरित्री, प्रजातंत्र, अमरी कथा, उड़ीसा भास्कर, पर्यवेक्षक इत्यादि में कंधमाल की घटना को लेकर जो रपटें छप रही है उनका मुख्य स्वर निम्न प्रकार से है।
1. ईसाई मिशनरियां व्यापक स्तर पर उड़ीसा के जनजातीय लोगों के घरों को जला रही है। लोगों को धमकाया जा रहा है।
2. मंदिरों में तोड़फोड़ की जा रही है ।
3. सरकार उड़ीसा के लोगों की ईसाई मिशनरियों के आक्रमणों से रक्षा नहीं कर पा रही।
4. ईसाई मिशनरियों के इशारे पर एक सांसद इन आक्रमणों को भड़का रहा है।
5. माओवादी और चर्च उड़ीसा के लोगों पर आक्रमण करने में आपस में मिल गए हैं।
6. जनजाति के लोगों पर आधुनिक हथियारों से आक्रमण किये जा रहे हैं।

विदेशी भाषा के मीडिया की प्राथमिकताएं और भारतीय भाषाओं के मीडिया की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए जब किसी मंदिर में लोग भजन कीर्तन के लिए एकत्रित होते हैं तो भारतीय भाषा के मीडिया के लिए यह भक्ति का ज्वार उमडना है लेकिन अंग्रेजी मीडिया के लिए यह शोर शराबा और सामान्य जीवन में होने वाला खलल है। उसका कारण शायद भारत में अंग्रेजों के शासन काल से ही खोजना होगा। अग्रेजों के लिए मंदिर के भीड खलल भी है और खतरा भी है। उसी मानसिकता को आज तक विदेशी भाषा अंग्रेजी का मीडिया ढो रहा है और इसी प्राथमिकता के आधार पर अंग्रेजी मीडिया किसी भी घटना की रपट करता है।

इस मानसिकता और प्राथमिकता का एक और कारण भी है । जिन दिनों अंग्रेज इस देश पर राज करते थे, वे यहां के भारतीय समाज को अपने लिए खतरा समझते थे और मुस्लिम समाज एवं ईसाई समाज को अपना पक्षधर मानते थे। इसलिए बहुसंख्यक भारतीय समाज का कोई भी कृत्य उनकी दृष्टि में निंदनीय और ईसाई व मुस्लिम समाज के लिए खतरनाक माना जाता था। अंग्रेजी मीडिया आज भी उसी मानसिकता को ढो रहा है। यही कारण है कि गुजरात का जननिर्णय,रामसेतु को लेकर हुई राष्ट्रीय महासभा और उडिया अस्मिता के लिए संघर्षरत ओडिया लोग अंग्रेजी मीडिया की दृष्टि में खतरनाक कृत्य हैं और मुस्लिम व ईसाई समाज के हितों के विपरीत हैं ।

सारत: विदेशी भाषा के मीडिया की जडें ब्रिटिश शासनकाल की मानसिकता में गहरे धंसी हुई हैं। इसके विपरीत भारतीय भाषाओं के मीडिया की जडें उसी संघर्ष में से उपजी हैं जो ब्रिटिश शासन के खिलाफ आम भारतीय ने किया था ।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

Wednesday, 2 January 2008

उड़ीसा से आ रहे संकेतों को सुनो

लेखक : कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

उड़ीसा देश का पहला ऐसा राज्य था जिसने 1956 में मजहब परिवर्तन पर रोक लगाने के लिए कानून पारित किया था। उड़ीसा का अनेक क्षेत्र जनजाति बहुल हैं और चर्च जनजातियों को ईसा की शरण में ले जाने के लिए अंग्रेजों के वक्त से ही प्रयास कर रहा है। ब्रिटिश काल में ईसा की शरण में लाने का अर्थ ब्रिटिश सत्ताधारियों की शरण में ही लाना था। इसलिए यह एक प्रकार से अंग्रेजी शासन के खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन को निष्क्रिय करने का अप्रत्यक्ष प्रयास भी था। चर्च के इस आक्रमण ने जनजातिय क्षेत्र के लोगों को अपनी अपनी भाषा, संस्कृति, विरासत और पूर्वजों के और नजदीक ही नहीं ला दिया बल्कि उससे भावात्मक लगाव को भी बढ़ाया। मनोवैज्ञानिक रूप से इसकी व्याख्या यूं की जा सकती है कि जब किसी संस्कृति का अस्तित्व खतरे में पड़ता है तो उससे जुड़े हुए लोग खतरे को सूँघकर इक्ट्ठे ही नहीं हो जाते बल्कि उनके अन्य छोटे-मोटे मतभेद इस आसान खतरे के कारण समाप्त हो जाते हैं। उड़ीसा के जनजाति क्षेत्रों में भी चर्च को लेकर ऐसा ही हो रहा है।

चर्च ने जनजातिय क्षेत्र के लोगों की इस एकता और प्रतिरोध से लड़ने के लिए जो रणनीति बनाई वह केवल उड़ीसा के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण भारत के लिए भी खतरनाक कही जा सकती है। सबसे पहले तो उन्होंने अपने विदेशी स्रोतों को सक्रिय करते हुए ज्यादा धन की माँग की और आशा के अनुरूप चर्च को विदेशों से अरबों रूपये की सहायता आनी शुरू हो गई। यदि भारत सरकार इस विषय पर कोई श्वेत पत्र प्रकाशित करें तो यह भयावह स्थिति और भी स्पष्ट हो जाएगी। द्वितीय चर्च ने दिल्ली में सरकार के भीतर और बाहर उस वर्ग को पकड़ा जिस वर्ग के लिए चर्च की अवैध गतिविधियों के विरोध का अर्थ ही हिन्दू सांप्रदायिकता है। उनके लिए आतंकवाद, चर्च और इस्लाम से जुड़ी हुई किसी भी गतिविधि का प्रयोग यदि कोई भारतीय या भारतीय संगठन करता है तो वह हिन्दू सांप्रदायिकता ही है। कांग्रेस और सीपीएम में इस अवधारणा को लेकर आश्चर्यजनक रूप से समानता देखी जा सकती है। गुजरात में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में लोकनिर्णय पर टिप्पणी करते हुए सीपीएम ने स्पष्ट ही कहाकि इस देश की मिट्टी में अभी भी भारतीय संप्रदाय की जड़ें गहरी जमी हुई है। उसे उखाड़ने के लिए नई रणनीति बनानी होगी। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने भी लगभग इसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त की। उनका कहना था कि अफजल गुरू के लिए फांसी की मांग करना हिन्दू आतंकवाद है। जाहिर है चर्च को सीपीएम की यह रणनीति बहुत ही ज्यादा अनुकूल पड़ती है। इसलिए तीनों आश्चर्यजनकर रूप से एक दूसरे के हितों की रक्षा करते हैं। उड़ीसा के मामले में ऐसा ही हो रहा है। अब जब उड़ीसा के लोग खासकर जनजाति क्षेत्रों के लोग चर्च की अभारतीयकरण की नीति के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं तो कांग्रेस और सीपीएम स्पष्ट ही अपने नकाब उतारकर चर्च के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हो गई है। इन दोनों के लिए उड़ीसा के जनजाति क्षेत्र के लोग हिन्दू आतंकवादी है और इस हिन्दू आतंकवाद से चर्च की रक्षा करना जरूरी हो गया है। चर्च इनके लिए पवित्रता का प्रतीक है। क्योंकि चर्च इनको ठोस रूप से वोटें मुहैय्या करवा सकता है।

उड़ीसा के कंधमाल जिला में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पर ईसाई एजेण्टों द्वारा किए गए आक्रमणों को इसी परिदृश्य में देखना होगा। लक्ष्मणानंद सरस्वती उड़ीसा की अस्मिता के प्रतीक है। वे ओडिया भाषा संस्कृति और परंपरा के संरक्षण की बात कहते हैं। उन्होंने इस कार्य के लिए अपना सारा जीवन होम दिया है। न उन्हें विधायक बनना है, न सांसद बनना है, न उन्हें रहने के लिए महलों की जरूरत है, न खाने के लिए छत्तीस प्रकार के व्यंजनों की । वे महात्मा गांधी की तरह उड़ीसा के ग्राम-ग्राम में झोंपड़ी में और जनजाति के लोगों के घरों में पिछले 45 वर्षों से घूम रहे हैं। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती एक प्रकार से उड़ीसा का सांस्कृतिक प्रवाह है। वे मधुर ओडिया भाषा में कीर्तन करते हैं। उत्कल प्रदेश की मिट्टी के गीत गाते हैं । उनमें उत्कल प्रदेश की रंग-गंध बसी है। चर्च जानता है कि यह उत्कल अस्मिता और उत्कल गंध उसके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। इसलिए चर्च ने शायद भारत में निर्णायक लड़ाई करने का निर्णय कर लिया है। इसीलिए उसने स्वामी जी पर क्रिसमस के दिन ही प्रहार किया है। लेकिन यह लड़ाई लड़ने से पूर्व चर्च ने अपनी मोर्चा बंदी भी सख्त प्रकार से की हुई है। यह लड़ाई शुरू करने से पहले उसने सत्ता के केन्द्र पर सोनिया गांधी को स्थापित कर दिया है। सीपीएम को साथ ले लिया है और मीडिया के एक वर्ग को इस कार्य के लिए योजना पूर्वक प्रशिक्षित कर दिया। इस पूरी मोर्चाबंदी के बाद चर्च ने उड़ीसा से अपना नया अभियान शुरू किया है। मीडिया के लिए यह आक्रमण उत्कल अस्मिता के प्रतीक स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पर न होकर हिन्दू गुण्डों द्वारा चर्च पर किजा जा रहा आक्रमण है। कांग्रेस, सीपीएम और मीडिया के लिए उड़िसा का जनजातिय समाज असामाजिक तत्व है जो चर्चों को जला रहा है। ब्रिटिश शासकों की दृष्टि में जनजातिय समाज असभ्य और बर्बर था। कांग्रेस और सीपीएम की दृष्टि में यह समाज हिन्दू गुंडागर्दी का प्रतीक है। यदि दिग्विजय सिंह की माने तो भारत में हिन्दू आतंकवाद प्रारंभ हो चुका है। आश्चर्य नहीं होगा यदि कल भारत सरकार स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को हिन्दू आतंकवादी घोषित कर दे । जहां तक सीपीएम का प्रश्न है उसके लिए हर भगवाधारी सांप्रदायिक है और चर्च व अफजल गुरू धर्मनिरपेक्षता के उत्कृष्ट प्रतीक है। यह सब उस समय हो रहा है जब गुजरात में लोगों ने कांग्रेस और सीपीएम की इस संकीर्ण सांप्रदायिक दृष्टि का मुंहतोड़ उत्तर दिया है।

उड़ीसा से स्पष्ट संकेत आ रहे हैं। उड़ीसा के लोग अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो रहे हैं। इधर कांग्रेस और सीपीएम भी मोर्चा संभाल रही है। जैसे तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता ने कहा है कि गुजरात के लोक निर्णय से यह आशा फिर बंधी है कि भारत और भारतीयता की लड़ाई अभी पूरी तरह हारी नहीं है। वह फिर जीती जा सकती है इसकी संभावना बढ़ गई है। चर्च ने इस लड़ाई को अब उड़ीसा में लड़ने का निर्णय किया है। भारत के सब लोगों को उड़ीसा के लोगों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़ा होना होगा।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

Friday, 21 September 2007

परमाणु समझौता और राम सेतु विध्वंस-साजिश के जुड़ते सूत्र

-डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

पिछले दिनों भारत और अमेरिका में जो परमाणु समझौता हुआ है उसका देश के भीतर हर स्तर पर विरोध हो रहा है। यदि संसद में सदस्यों की संख्या के आधार पर किसी प्रस्ताव को पारित या खारिज मानना हो तो यह समझौता आसानी से खारिज माना जाएगा क्योंकि साम्यवादी टोला, एनडीए और तीसरा मोर्चा तीनों ही इस समझौते का विरोध कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस साधारण सी गणना के महत्व को सोनिया गांधी न जानती हों क्योंकि यह जोड़ और तकसीम का गणित पांचवीं, छठी कक्षा में ही पढ़ा दिया जाता है इसके लिए एमएससी करने की जरूरत नहीं है। इस बाल गणित को जानते हुए भी सोनिया गांधी का समझौते को लागू करने का हठ इस समझौते के सूत्र कहीं और तलाश करने के लिए विवश कर रहा है।

अब हम रामसेतु की चर्चा करेंगे। ऊपर से देखने पर पूछा जा सकता है कि परमाणु समझौते और रामसेतु को तोड़ने की साजिश का आपस में क्या संबंध हो सकता है? लेकिन गहराई से भीतर झांकने पर दोनों का संबंध अत्यंत स्पष्ट ही नहीं होता बल्कि भारत के भविष्य के लिए चिंता भी पैदा करता है। रामसेतु को तोड़ने के लिए सोनिया गांधी की सरकारी अत्यंत हड़बड़ी में है। वह इसके किसी भी पक्ष पर विचार करने के लिए तैयार नहीं है। जिस प्रकार पिछले कुछ दशकों से श्रीलंका में प्रभाकरण के नेतृत्व में एक समानांतर सरकारी चलाई जा रही है और उस सरकार को चर्च और ईसाई देशों से करोड़ों रुपये का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष अनुदान मिल रहा है। राजीव गांधी ने भारत विरोधी इस गढ़ को ध्वस्त करने का प्रयास किया था। परंतु उन सभी शक्तियों ने मिलकर राजीव गांधी का कत्ल कर दिया। राजीव गांधी हत्याकांड में जिन लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज है उनमें प्रभाकरण का नाम भी आता है। डीएमके की एलटीटीई के साथ क्या सांठगांठ हैं। इसको लेकर तमिलनाडु में ही विद्वान क्यास लगाते रहते हैं। एलटीटीई को सहायता पहुँचाने के लिए जिन समुद्री जहाजों का इस्तेमाल किया जाता है, उनके श्रीलंका की जल सेना द्वारा पकड़े जाने की संभावना बनी रहती है क्योंकि सागर में श्रीलंका के ऊपर से घूमकर ही समुद्री जहाज जा सकते हैं। वैसे एलटीटी ने अब तक थोड़ी बहुत अपनी जलसेना भी विकसित कर ली है। यदि रामसेतु टूट जाता है तो एलटीटीई के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा दूर हो जाएगी। अमेरिका का भी रामसेतु के टूटने में हित है क्योंकि वह पहले ही धमकियाँ दे रहा हैकि श्रीलंका और भारत के बीच का समुद्र अंतर्राष्ट्रीय जल है वह इसे श्रीलंका और भारत के बीच का जल क्षेत्र नहीं मानता। रामसेतु के टूट जाने पर अमेरिका का यह दावा और भी पुख्ता होगा और विदेशी जहाज जिनके मालिक एलटीटी की मदद कर रहे हैं भारत के जल क्षेत्र में स्वछंदता से घूमना शुरू कर देंगे। भारत का समुद्री सीमांत खतरे में पड़ जाएगा। रामसेतु के टूटने से केरलीय तट थोरियम भी नष्ट हो जाएगा। लेकिन प्रश्न यह है कि यह सब जानते बुझते हुए भी सोनिया गांधी सरकार रामसेतु को तोड़ने के लिए वाजिद क्यों है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि राजीव गांधी हत्याकांड में प्रभाकरण का नाम होते हुए भी सोनिया गांधी की सरकार उसके खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं कर रही? इसके साथ ही जिस डीएमके को राजीव गांधी हत्याकांड में सोनिया गांधी स्वयं जिम्मेवार मानती थीं उस डीएम के साथ सोनिया गांधी ने किसके कहने पर समझौता किया है? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि राजीव गांधी हत्याकांड में जिन चार लोगों को फांसी की सजा हुई उनकी सजा क्षमा करवाने के लिए सोनिया गांधी ने क्यों अपील दायर की? इतना ही नहीं एक अभियुक्त को सोनिया गांधी ने राजीव गांधी फाउंडेशन की ओर से छात्रवृत्ति भी प्रदान की। ये सारे सूत्र इस बात की ओर संकेत करते हैं कि एलटीटीई, सोनिया गांधी की सरकार और रामसेतु को तोड़ने का षडयंत्र इन सभी के सूत्र किसी एक स्थान से ही संचालित हो रहे हैं । राजीव गांधी इसमें बाधा बन सकते थे इसलिए उन्हें पहले ही रास्ते से हटा दिया गया। यह अमेरिका का भारत को गोद में लेने का षडयंत्र है।

इस षडयंत्र का दूसरा सूत्र अभी हाल ही में हुए भारत अमेरिका परमाणु समझौते से जा जुड़ता है। रामसेतु को तोड़ना अमेरिका द्वारा भारत के समुद्री सीमांत को घेरना है और परमाणु समझौता उसे सामरिक दृष्टि से पंगु बनाना है। इन दोनों कामों में सोनिया गांधी की सरकार अमेरिका की सबसे बड़ी सहायक सिध्द हो रही है। अमेरिका पिछले अनेक सालों से भारत पर सीटीबीटी और एनपीटी पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डालता रहा है। लेकिन नरसिम्हा सरकार और उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने अमेरिका के इस दबाव के आगे झुकने से इंकार कर दिया। इतना ही नहीं वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में तो परमाणु बम धमाके से अमेरिका का पूरा तंत्र हिल गया था। शायद अमेरिका ने उसी वक्त यह निर्णय ले लिया था कि अब दिल्ली में सोनिया गांधी को स्थापित करने का अवसर आ गया है और उसकी इस साजिश में साम्यवादियों ने स्वेच्छा से या दबाव से शामिल होने की सहमति दी। सोनिया गांधी की सरकार स्थापित करने के उपरांत यह समझौता न होता तो तब हैरानी अवश्य होती। इस समझौते के बाद भारत परमाणु क्षेत्र में अमेरिका का एक प्रकार से उपनिवेश बन जाएगा। इसलिए परमाणु समझौता और रामसेतु का विध्वंस ये दोनों अमेरिका के लंबे हितों की पूर्ति के लिए दो आवश्यक प्रकल्प है जिन्हें जॉर्जबुश और सोनिया गांधी हर हालत में पूरे करने पर अड़ी हुई हैं।

कुछ तथाकथित विशेषज्ञों को यह भ्रम है कि अमेरिका चीन के मुकाबले भारत को मजबूत करना चाहता है। परंतु अमेरिका का इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने लोकतांत्रिक देशों के मुकाबले सदा तानाशाह देशों की सहायता की है। लंबी रणनीति में अमेरिका और चीन स्वभाविक मित्र हो सकते हैं। इसलिए अमेरिका भारत को सोनिया गांधी के माध्यम से अपना उपनिवेश बनाने का प्रयास कर रहा है। रामसेतु विध्वंस और परमाणु संधि इसकी शुरूआत भर है। जाहिर है कि आने वाले लोकसभा चुनावों में अमेरिका की दिलचस्पी बढ़ेगी क्योंकि अमेरिका नहीं चाहेगा कि सोनिया गांधी की सरकार दिल्ली से हट जाए।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)