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Wednesday 29 April 2009

संप्रग सरकार यानी घोटालों की सरकार

कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार के चरित्र में भ्रष्‍टाचार समाहित रहा और उसने
संकीर्ण स्‍वार्थों की खातिर पूरे तंत्र को ध्‍वस्‍त कर दिया। कांग्रेसनीत केन्‍द्र
सरकार के शासन में गेहूं आयात घोटाला, स्‍पेक्‍ट्रम घोटाला, स्‍कॉर्पियन पनडुब्‍बी
घोटाला, वोल्‍कर घोटाला, सेज घोटाला, बालू प्रकरण, डीडीए घोटाला.....जैसे घोटालों
का अंतहीन सिलसिला जारी रहा।


घोटालों की सरकार यानी संप्रग सरकार के कारनामों पर एक नजर-

बालू का मुद्दा
डीएमके मंत्री द्वारा अपने बेटों को फायदा पहुंचाने के लिए पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्रालय से अनुरोध करने तथा प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा मंत्रालय को पत्र लिखना दुर्भाग्यपूर्ण रहा।

मंत्री महोदय ने घोटाले में न केवल अपनी भूमिका को स्वीकार किया, जिसमें उन्होंने कहा कि मैने अपने बेटों की स्वामित्व वाली कम्पनियों के लिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय से फायदा पहुंचाने की बात का अनुरोध किया है, बल्कि वह बड़ी दिठाई से 'तो क्या हुआ' जैसा रवैया अपनाकर चलते रहे।

इस घोटाले का रहस्य खुलने से एक और भी बड़ी बात जुड़ गई कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने डीएमके मंत्री के इस मामले की सिफारिश करते हुए आठ-आठ पत्र पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस मंत्रालय को लिखे।

यूपीए चेयरपर्सन की चुप्पी भी इस मामले में एक दम साफ रही क्योंकि यह बात हर व्यक्ति जानता है कि सरकार की पूरी राजनीतिक सत्ता ही उनके हाथों में है।

प्रधानमंत्री और यूपीए चेयरपर्सन दोनों ही की चुप्पी से पता चलता है कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व की सरकारों में शुचिता और जवाबदेही किस हद तक गिर गई है जो कभी पहले स्वतंत्रता के दशकों में हुआ करती थी।

क्वात्रोच्चि पर रहम

हाल ही में केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने बहुचर्चित बोफोर्स तोप सौदा दलाली कांड के मुख्य अभियुक्त इतालवी नागरिक ओतावियो क्वात्रोच्चि का नाम आरोपी सूची से हटा दिया। ऐसा लगता है सोनिया गांधी के दवाब में प्रधानमंत्रीजी झुक गए हैं।

पिछले वर्ष यूपीए के कानून मंत्री श्री एच.आर. भारद्वाज की कृपा से बोफोर्स मामले में दलाल ओत्तावियो क्वात्रोच्चि के व्यक्तिगत खातों को डिफ्रीज कर दिया गया। सीबीआई सूत्रों के अनुसार इसका मतलब क्वात्रोच्चि के खिलाफ केस को कमजोर किया जाना है। एक ऐसी पार्टी, जिसमें वहां की सुप्रीम लीडर की इजाजत के बिना एक पत्‍ता भी हिल नहीं सकता है, जिससे निष्कर्ष निकालना जरा भी कठिन नहीं है। कानून मंत्री श्री एच.आर. भारद्वाज ने जो कुछ भी किया, उसे वह अपनी सुप्रीम लीडर की स्वीकृति के बिना करने की हिम्मत कर ही नहीं सकते थे।

वह तब तक यह सब कुछ नहीं कर सकते थे, जब तक उन्हें यह विश्वास न हो जाए कि ऐसा करने से ही उनकी सुप्रीम लीडर खुश होगी। यह बात कि वे खुश थी, इस बात से सिद्ध हो गई जब श्री भारद्वाज की गलती के लिए उन्हें हटाने की बजाए उनको बचाया गया तथा उन्हें लगातार छठी बार राज्यसभा के लिए नामित कर उन्हें पुरस्कृत किया गया।''

यह याद रखना जरूरी होगा कि श्रीमती सोनिया गांधी के साथ क्वात्रोच्चि के व्यक्तिगत सम्बंध सबको मालूम है और कुछ सूत्रों का तो यह भी कहना है कि ये सम्बंध बहुत पहले के हैं। क्वोत्रोच्चि ने गांधी परिवार के सम्बंध में अपनी निकटता की बात अपने विभिन्न साक्षात्कारों में स्वीकार भी की है जिसका किसी ने खण्डन भी नहीं किया है। यूपीए सरकार क्वात्रोच्चि पर बड़ी मेहरबान रही है, हालांकि उनके खिलाफ आज भी रेड कार्नर नोटिस निकला हुआ है। वह अभी तक पुलिस और कोर्ट की निगाह में भगौड़ा है जिसे यूपीए सरकार बचा रही है।

क्वात्रोच्चि गिरफ्तार
20 फरवरी 2007 को क्वात्रोच्चि अर्जेंटीना में गिरफ्तार कर लिया गया। अर्जेंटीना के कानून के मुताबिक भारत सरकार को उसके प्रत्यर्पण के लिए तीस दिनों के अंदर केस फाइल करनी थी, लेकिन संप्रग सरकार ने इस अति महत्त्वपूर्ण सूचना को लोगों से 20 दिनों तक छिपाए रखा। दुर्भाग्य है कि यह सूचना लोगों को चैनेलों के माध्‍यम से मिली। ऐसा लगता है कि सरकार इसे पूरे 30 दिनों तक छिपाए रखना चाहती थी, ताकि क्वात्रोच्चि फरार हो जाए। संप्रग सरकार यह कह कर अपना बचाव कर रही थी, कि भारत की अर्जेंटीना से कोई प्रत्यर्पण संधि नहीं है, हालांकि स्रोतों का कहना है कि दोनों देशों के बीच ब्रिटिश काल से ही प्रत्यर्पण संधि है, जिसे दोनों देशों में से किसी ने भी भंग नहीं किया है।
सच तो यह है कि संप्रग सरकार का निर्णय गलत था। गौरतलब है कि अबू सलेम को बिना प्रत्यर्पण संधि के ही पुर्तगाल से भारत लाया गया था।

सीबीआई की लगातार विफलता से न केवल क्वात्रोची को रिहा होने में मदद मिली, बल्कि वह अपने देश लौटने में सफल रहा। सीबीआई अर्जेंटिना के कानूनों के मुताबिक दस्तावेजों को पेश करने में असफल रही। वह 25 मई 1997 के कोर्ट आदेश को भी प्रस्तुत करने में असफल रही, जिसके आधार पर भगोड़े का प्रत्यर्पण प्रयास जारी था। सीबीआई प्रत्यर्पण सुनिश्चित कराने के लिए अर्जेंटिना कोर्ट में दस्तावेज पेश करने में विफल रही। यह प्रत्यर्पण आदेश के लिए आवश्यक वैधानिक आधारों को भी नहीं पेश कर सकी। सीबीआई का सर्वाधिक हास्यास्पद बहाना यह कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पांच महीने बाद भी वह अर्जेंटिना कोर्ट के आदेश की आधिकारिक अनुवादिक कॉपी प्राप्त नहीं कर सकी। यह सभी गतिविधियां हमारे इस दावे की भलीभांति पुष्टि करते हैं कि 'क्वात्रोची बचाओ अभियान' में सीबीआई के जरिए सरकार शामिल है।

स्कोर्पियन पनडुब्बी घोटाला
गत मार्च 2006 में यूपीए सरकार का भ्रष्टाचार का एक बड़ा घोटाला सामने आया। मामला था र्स्कोपियन पनडुब्बी खरीद मामले में लगभग 750 करोड़ की दलाली लेने का। जिस 'थेल्स' नाम कंपनी से भारत सरकार ने यह पनडुब्बी खरीदी उस कंपनी का नाम विश्व बैंक की काली सूची में दर्ज है। एनडीए सरकार के कार्यकाल में इस कंपनी की अविश्वसनीयता को धयान में रखते हुए थेल्स कंपनी के प्रस्तावों को रद्द कर दिया गया था। पर वहीं वर्तमान यूपीए सरकार ने उसी कंपनी से 18798 करोड़ रूपये के स्कोर्पियन पनडुब्बी का सौदा किया तथा लगभग 750 करोड़ रूपये की दलाली इस पूरे सौदे में कुछ बिचौलियों के बीच बांट ली गयी।

मित्रोखिन आर्काइव्ज में खुले भेद
'मित्रोखिन आर्काइव्ज' के प्रकाशन से कांग्रेस और कम्युनिस्टों की शर्मनाक गाथा सामने आई जिससे पता चलता है कि धान के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरे में डाला जा सकता है। इस बात का आरोप लगा है कि इमर्जेंसी के उन बदनाम दिनों में केजीबी ने श्रीमती गांधी के समर्थन देने तथा उनके राजनैतिक विरोधियों के खिलाफ गतिविधियां चलाने के लिए 10.6 मिलियन रूबल (उस समय के विनिमय दर के हिसाब से लगभग 10 मिलियन पौंड से अधिाक) की राशि खर्च की थी।

केजीबी के पेपरों से यह भी पता चलता है कि 1977 के चुनावों में केजीबी ने 21 गैर कम्युनिस्ट राजनीतिज्ञों को, जिन में चार केन्द्रीय मंत्री भी शामिल थे, को मदद दी थी। मास्को ने केजीबी के माध्‍यम से सीबीआई को बडी तादाद में धान दिया था। अकेले 1975 के पहले छह महीनों में ही 25 लाख रूपए भेजे गए थे।

वोल्कर
पॉल वोल्कर के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र समिति में जो रहस्योद्धाटन हुए हैं उससे कांग्रेस की विफलताओं की सूची और बढ़ गई। इसमें कांग्रेस और तत्कालीन विदेश मंत्री श्री नटवर सिंह को 2001 में ईराकी तेल बिक्री में गैर अनुबंधीय लाभार्थी के रूप में दिखाया गया है। शुरू में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने श्री नटवर सिंह से मुलाकात करने के बाद अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि अनाज के बदले तेल कार्यक्रम के बारे में संयुक्त राष्ट्र जांच में जो कुछ तथ्य सामने आए हैं वे किसी विपरीत निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए अपर्याप्त हैं।

बाद में कांग्रेस और प्रधानमंत्री को मुंह की खानी पड़ी जब श्री नटवर सिंह ने त्यागपत्र देने का फैसला किया ताकि कांग्रेस अधयक्ष श्रीमती सोनिया गांधी की खाल बचाई जा सके क्योंकि वे भी इस घोटाले में उतनी ही शामिल थी और यह बात उनकी सहमति और जानकारी के बिना नहीं हो सकती थी।

अब जांच श्री नटवर सिंह तक सीमित है और आश्चर्य की बात है कि यूपीए सरकार इस घोटाले पर अजीब सी चुप्पी साधो है जिसमें कांग्रेस भी शामिल है। सरकार ने वोल्कर घोटाले की जांच के लिए जस्टिस आर.एस. पाठक अथोरिटी गठित की है। यह अथोरिटी बड़ी धीमी गति से कार्य कर रही है। इसका 6 महीने का कार्यकाल पूरा हो चुका है। और इसका कार्यकाल आगे बढ़ा दिया गया है।

पाठक अथॉरिटी की रिपोर्ट
जस्टिस आर.एस. पाठक अथॉरिटी की रिपोर्ट से कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी और पूर्व विदेश मंत्री के. नटवर सिंह के लिए गहरा धक्‍का लगने वाली बात होनी चाहिए क्योंकि ये दोनों उसी दिन से ही अपने को निर्दोष होने का दावा करते आ रहे हैं जबसे संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा नियुक्त वोल्कर कमिटी ने 'अनाज के बदले तेल' के कार्यक्रम के अंतर्गत अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए तेल वाउचरों में इन दोनों का नाम गैर-अनुबंधीय लाभार्थी के रूप में लिया था। जस्टिस पाठक ने नटवर सिंह, उनके बेटे जगत सिंह दोनों को ही ठेका प्राप्त करने में अपने पदों का दुरूपयोग करने का दोषी पाया है। एक ऐसी पार्टी जहां श्रीमती सोनिया गांधी की स्वीकृति के बिना पता तक भी नहीं हिल सकता तो कैसे यह माना जा सकता है कि जो कुछ हुआ उसके बारे में श्रीमती गांधी को पता ही नहीं था।

जस्टिस पाठक अथॉरिटी रिपोर्ट से प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह द्वारा क्लीन चिट पर भी प्रश्न खड़े हो जाते हैं जिसमें प्रधानमंत्री ने यह दावा किया था कि रिपोर्ट में 'अपर्याप्त साक्ष्य' है जिनसे श्री नटवर सिंह के खिलाफ किसी विपरीत निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। यदि ऐसी बात है तो जस्टिस पाठक श्री नटवर सिंह को कैसे दोषी ठहरा सकते हैं। यदि ऐसा है तो डा. मनमोहन सिंह ने क्यों नटवर सिंह से विदेश पोर्टफोलियो छीना और कुछ दिनों बाद क्यों उन्हें अपने मंत्रिमंडल से हटा दिया?

बोइंग सौदे में जांच की आवश्यकता
यूपीए सरकार ने एयर इंडिया के लिए विमान प्राप्त करने के लिए जो ढंग अपनाया है उससे भारत और विदेशों में गहरी नाराजगी है। जो प्रक्रिया अपनाई गई हैं उसमें कहीं पारदर्शिता नहीं हैं।

नौसेना वार रूम से सूचनाएं लीक
पिछले दिनों भारतीय सेना के एक प्रमुख अंग नौसेना के वार रूम से कुछ गुप्त सूचनाएं लीक किये जाने व उन्हें विदेशियों को बेचे जाने का मामला सामने आया। इस बात की पुष्टि इससे भी होती है कि इस मामले में नौसेना के 3 अफसरों को बिना किसी कोर्ट मार्शल या जांच के बर्खास्त कर दिया गया। पर जिन लोगों ने यह सूचना लीक की और विदेषियों को बेचा उनके खिलाफ केंद्र सरकार ने कोई कार्यवाही अभी तक नहीं की है। यदि इस मामले में नौसेना के वरिश्ठ अधिकारियों को बर्खास्त किया गया तो इन बिचौलियों को सरकार क्यों बचा रही है? वह भी तो देशद्रोह का मामला है। रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी का इस पूरे मामले में बयान आश्‍चर्य में डालने वाला है । उनका कहना है कि लीक हुई सूचनाएं वाणिज्य महत्व की थी।

Saturday 4 April 2009

'मुंह में मार्क्‍स, बगल में मदनी'

'मुंह में मार्क्‍स, बगल में मदनी।' देश के सभी दलों को धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाने वाली माकपा का यह नया दर्शन है। चुनावी मौसम में मुसिलम वोटों के लिए माकपा की बेताबी देखने लायक है और इसके लिए उसे सांप्रदायिक और आतंकवादी मुसिलम संगठनों से हाथ मिलाने से भी कोई परहेज नहीं रहा। केरल में अपने वाम सहयोगियों के विरोध के बावजूद वह कोयंबतूर बम कांड के आरोपी और आतंकवादियों से रिश्ते रखने वाले अब्दुल नासेर मदनी की पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) से गठबंधन कर रही है तो पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रिजवानुर हत्याकांड के बाद मुस्लिमों में बढ़ते असंतोष से पार पाने के लिए जमाते-इस्लामी-ए-हिंद और जमीअत-उलेमा-ए हिंद के साथ सहयोग की संभावनाएं तलाश रही है।

माकपा हमेशा से अल्पसंख्यकों की खास हितैषी होने का दावा करती रही है। पार्टी के मुताबिक वह अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और विकास पर विशेष ध्यान देती है। सच्चर कमेटी की सिफारिशों को अमली जामा पहनाने के लिए उसने यूपीए सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखा। माकपा शासित राज्यों केरल और पश्चिम बंगाल में उसकी सरकारों ने अल्पसंख्यकों के विकास के लिए हर संभव कदम उठाए। लेकिन मुस्लिम इन दावों से प्रभावित हुए बगैर उससे छिटकते जा रहे हैं। चुनाव से ठीक पहले उसे अपने दो मुस्लिम सांसदों केरल के अब्दुल्ला कुट्टी और पश्चिम बंगाल के अबू आयेश मंडल को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निष्कासित करना पड़ा। यह कहीं न कहीं मुसिलमों में पार्टी के प्रति बढ़ते असंतोष का परिचायक है। केरल में तो माकपा को मुसिलम वोट कम ही मिलते हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में अभी तक मुसिलम वोट माकपा के साथ थे। अब यहां भी नंदीग्राम और रिवानुर हत्याकांड के बाद मुसिलम वोटों के उससे छिटक कर तृणमूल के साथ जाने के आसार नजर आ रहे हैं।

भाजपा की केसरिया सांप्रदायिकता को लेकर नाक-भौं सिकोड़ने वाली माकपा को शायद इस्लामी सांप्रदायिकता और उग्रवाद से कोई परहेज नहीं है। केंद्रीय नेतृत्व के संकोच, बाकी वाम दलों के विरोध और पार्टी के मुख्यमंत्री धड़े के एतराज के बावजूद केरल माकपा पर हावी पिनराई विजयन गुट मदनी की पीडीपी से गठबंधन कर रहा है। मदनी राज्य की उग्रवादी मुसिलम राजनीति के सितारे हैं और संगीन आरोपों से घिरे रहे हैं। वे कोयंबतूर बमकांड के अभियुक्त रहे लेकिन सबूतों के अभाव में बरी हो गए। लेकिन हाल ही में पकड़े आतंकवादियों से पता चला कि मदनी और उनकी पत्नी सूफिया के आतंकवादियों से रिश्ते लगातार बने रहे हैं और वे उन्हें पनाह भी देते रहे हैं। इसके अलावा उन पर सांप्रदायिकता भड़काने सहित कई मामलों में बीस मुकदमें चल रहे हैं। एक समय मदनी ने इस्लामी सेवक संघ बनाया था लेकिन अब उसका नाम बदल की पीडीपी कर दिया है।

केरल की सबसे ताकतवर मुसिलम पार्टी मुसलिम लीग कांग्रेस की अगुआई वाले मोर्चे के साथ हैं। इसलिए माकपा पिछले कुछ अर्से से उसके गढ़ में सेंध लगाने के लिए मदनी की पीडीपी का इस्तेमाल कर रही है। लेकिन माकपा और मदनी का यह सहयोग पर्दे की ओट में चलता था। माकपा कहती थी पीडीपी उसका समर्थन कर रही है तो वह कैसे इंकार करे। लेकिन इस चुनाव में माकपा की कलई खुल गई है क्योंकि उसने पोन्नई की सीट भाकपा के घोर विरोध के बावजूद मदनी की पार्टी के उम्मीदवार को दी। इसके बाद माकपा ने वाम मोर्चे के कार्यकर्ता सम्ममेलनों में मदनी और उनकी पार्टी के नेताओं को बुलाना शुरू किया। इसका वाम मोर्चे के प्रमुख घटक भाकपा और आरएसपी ने विरोध किया। इन दोनों दलों की दलील है कि पीडीपी एक सांप्रदायिक पार्टी है। लेकिन माकपा उनके विरोध की जरा भी परवाह नहीं कर रही।

मदनी को लेकर वाम मोर्चे में ही नहीं तो माकपा के अंदर भी मतभेद है। खुद मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ही पीडीपी के साथ गठबंधन के खिलाफ हैं। उन्होंने हाल ही में यह बयान देकर अपनी नाराजगी साफ कर दी कि मदनी को क्लीन चिट नहीं दी जाएगी। यह भी बताया जाता है कि मुख्यमंत्री ने पार्टी की पोलित ब्यूरो से माकपा-पीडीपी गठबंधन के खिलाफ शिकायत की है। लेकिन राज्य माकपा सचिव विजयन पीडीपी को 'धर्मनिरपेक्ष' होने का प्रमाण पत्र बांटते फिर रहे हैं। पार्टी के सामने पशोपेश की स्थिति तब पैदा हो गई जब जमाते-इस्लामी-ए-हिंद और जमीअत-उलेमा-ए-हिंद ने भी पीडीपी को सांप्रदायिक संगठन करार दे दिया। मजेदार बात यह है कि माकपा का केंद्रीय नेतृत्व पार्टी के लिए इन दोनों संगठनों का समर्थन जुटाने में लगा हुआ है। इन संगठनों की जल्दी ही पश्चिम बंगाल वाम मोर्चे के अध्यक्ष विमान बोस के साथ बैठक होने वाली है। यह बात अलग है कि इन दोनों मुसिलम संगठनों का केंद्रीय नेतृत्व माकपा के साथ सहयोग के पक्ष में है लेकिन उनकी स्थानीय इकाइयां इसके खिलाफ है। पश्चिम बंगाल की इकाई नंदीग्राम के बाद माकपा के साथ किसी भी तरह के तालमेल के खिलाफ है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि माकपा के अभेद्य गढ़ों केरल और पश्चिम बंगाल में पार्टी के पैरों तले जमीन खिसकती जा रही है। इससे हताश माकपा मुसलिम सांप्रदायिक और उग्रवादी संठनों के साथ प्रेम की पींगें बढ़ाने के लिए मजबूर हो रही है। दरअसल माकपा मुसिलमों को रिझाने के लिए हर तह के तरीके इस्तेमाल करती रही है। उसने मुसलिमों के इराक और फिलिस्तीन जैसे वैश्विक इस्लामी मुद्दे बहुत जोर-शोर से उठाए। करेल में उसकी सभाओं में अक्सर सद्दाम हुसैन और यासिर अराफत की तस्वीरें तक लगाई जाती रहीं। मुसलिम समुदाय में व्याप्त पिछड़ेपन को दूर करने के लिए उसने सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू कराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। हाल ही में उसने अपने घोषणा पत्र में पार्टी ने मुसलिमों के लिए विशेष उपयोजना बनाने के अलावा उनके लिए समान अवसर आयोग गठित करने और बैंक कर्जों में से 15 फीसद कर्ज मुसलिमों को देने के लुभावने वायदे किए। गुरूवार की प्रेस कांफ्रेंस में करात ने माकपा शासित राज्यों में मुसिलमों के लिए किए गए विकास कार्यों के आंकड़ों का अंबार लगा दिया। लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि मुसलिम मतदाताओं पर न तो इन विकास कार्यों का असर हो रहा है और न चुनावी वायदों का। बड़ी तादाद में मुसलिमों को टिकट देना भी बहुत काम नहीं आता इसलिए चुनाव में ऐसे मुसलिम संगठनों का साथ लेना जरूरी हो गया है जिनका मुसलिमों पर अच्छा खास असर हो। मुसलिम वोटों की मृग मरीचिका उसे मुसलिम सांप्रदायिक ओर उग्रवादी मुसलिम संगठनों के साथ हाथ मिलाने के लिए मजबूर कर रही है।

-सतीश पेडणेकर
जनसत्ता(28 मार्च, 2009) से साभार