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Thursday 27 September 2007

सुषमा स्वराज पहली महिला सर्वश्रेष्ठ सांसद


भारतीय जनता पार्टी की प्रखर नेता व राज्यसभा सदस्य सुषमा स्वराज उत्कृष्ट सांसद का पुरस्कार पाने वाली देश की पहली महिला सांसद बन गई हैं। गत 13 सितम्बर को संसद के केन्द्रीय कक्ष में सम्पन्न एक गरिमामय कार्यक्रम में राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता राज्यसभा सांसद श्रीमती सुषमा स्वराज को वर्ष 2004 हेतु उत्कृष्ट सांसद सम्मान से अलंकृत किया।

राष्ट्रपति श्रीमती पाटिल ने श्रीमती सुषमा स्वराज की प्रशंसा करते हुए उन्हें राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों की प्रखर वक्ता बताया। इस मौके पर सुषमा ने इस पुरस्कार के लिए पहली बार किसी महिला को चुनने के लिए चयन समिति को धन्यवाद दिया और कहा कि यह सौभाग्य की बात है कि उन्हें यह पुरस्कार देश की पहली महिला राष्ट्रपति के हाथों मिला है। उन्होंने कहा] मेरा कद तो छोटा था। सहयोगियों ने यह पुरस्कार देकर मेरे कद को बड़ा कर दिया है। साथ ही उन्होंने ईश्वर से इस पुरस्कार की मर्यादा को बनाए रखने की शक्ति प्रदान करने की कामना की और वचन दिया कि वह हर संभव प्रयास कर इस पुरस्कार का मान सम्मान बनाए रखेंगी।

श्रीमती स्वराज को अर्पित प्रशस्ति पत्र में कहा गया है कि उन्होंने सत्ता पक्ष और विपक्ष में रहते हुए सांसद के रूप में प्रशंसनीय भूमिका निभायी है। यहां प्रस्तुत है श्रीमती सुषमा स्वराज को अर्पित प्रशस्ति पत्र का मूल पाठ-


प्रशस्ति-पत्र
श्रीमती सुषमा स्वराज का तीन दशकों से अधिक का उत्कृष्ट सार्वजनिक जीवन रहा है। उन्हें हरियाणा सरकार में सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री तथा दिल्ली की प्रथम महिला मुख्यमंत्री होने का गौरव प्राप्त है। एक प्रतिभाशाली वक्ता होने के साथ-साथ उन्होंने देश में संसदीय लोकतंत्र को सुदृढ़ करने में विशिष्ट योगदान दिया है।

श्रीमती सुषमा स्वराज बारी-बारी से लोक सभा तथा राज्य सभा की सदस्य रही हैं और उन्होंने सत्ता पक्ष तथा विपक्ष में रहते हुए बखूबी प्रशंसनीय भूमिका निभाई है। उन्होंने संसदीय मंच का उपयोग लोगों के सरोकारों को प्रभावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करने में किया है। सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के सदस्य के रूप में नियमों तथा आचार सम्बंधी मानदंडों का कड़ाई से पालन करते हुए उन्होंने सदैव संसदीय संस्थाओं की गरिमा कायम रखी है। संसदीय कार्य मंत्री के रूप में उन्होंने सभा में सार्थक तथा उद्देश्यपूर्ण वाद-विवाद सुनिश्चित किया। सूचना और प्रसारण मंत्री के रूप में दूरगामी परिणामों वाली नीतियां लागू करने का श्रेय भी उन्हें जाता है। संसद के कार्यकरण की उनकी गहरी समझ] देश के समक्ष मुद्दों के प्रति उनके वास्तविक सरोकार तथा उनकी तीक्ष्ण बुध्दि एवं विचारों को प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त करने की उनकी शैली ने दोनों सभाओं में वाद-विवाद को जीवंतता प्रदान की है। लोकतांत्रिक मूल्यों की प्रबल समर्थक होते हुए उन्होंने संसद की गरिमा तथा मर्यादा को कायम रखने का सजग और सतत प्रयास किया है।

श्रीमती सुषमा स्वराज ने देश की अनेक वर्षों की सेवा के दौरान चुनौतियों का डटकर सामना किया है। सामाजिक मुद्दों के प्रति उनकी संवेदनशीलता तथार् कत्तव्यों के प्रति उनकी निष्ठा को सभी ने सराहा है। संघर्ष की उनकी अदम्य क्षमता तथा उनके अटूट विश्वास ने उन्हें भारत के लोक जीवन में उनकी एक विशिष्ट नेता के रूप में पहचान बनाई है।

सार्वजनिक जीवन में विभिन्न क्षमताओं में उनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए भारतीय संसदीय ग्रुप द्वारा श्रीमती सुषमा स्वराज को उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार 2004 से सम्मानित किया जाना सर्वथा उचित है।

Wednesday 26 September 2007

सेतुसमद्रम् परियोजना-दिवालियेपन की निशानी

लेखक-विनोद बंसल

श्रीराम सेतु को तोड़ने से भगवान श्री राम की एक दुर्लभ निशानी समाप्त होगी बल्कि भारत को काफी नुकसान भी होगा। जैसा कि श्रीराम और श्रीराम सेतु के अस्तित्व को लेकर कुछ ओछी मानसिकता वाले वोटों के भूखे राजनेता बयान बाजी कर रहे हैं, विश्व भर के हिन्दुओं की भावना आहत होना स्वाभाविक ही है। यदि श्रीराम को भगवान एंव श्रीराम सेतु को उनके द्वारा निर्मित न मानने वालों की ही मानें तो भी इस परियोजना में भारत सरकार को कितना नुकसान होगा इसका अन्दाज इस परियोजना को प्रारम्भ करने से न पूर्व में सोचा गया न किसी ने इस दिशा में कोई कदम उठाने का प्रयत्न किया।

बारह मीटर गहरे, 48 किमी. लम्बे व तीन किमी. चौडे श्रीराम सेतु को तोडकर सन् 2008 तक नहर का काम पूरा कराने वालों ने यह नहीं सोचा कि इससे सुनामी के खतरे को हम मोल ले रहे हैं, थोरियम के विश्व के सबसे बडे भण्डार को नष्ट किया जा रहा है तथा क्षेत्र में विद्यमान 3300 समुद्री वनस्पतियों व लगभग 450 प्रकार के समुद्री जीव जन्तुओं के जीवन के साथ-साथ जो लाखों मछुआरे इस क्षेत्र में अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं उनका क्या होगा।

अब यह देखते हैं कि इस परियोजना से जुडे महारथी इसके बारे में क्या कहते हैं। रामेश्वरम् से लगभग 666 किमी दूर चैन्नई स्थित एल एण्ड टी रामबोल नामक संस्था (जो इस परियोजना की इंजिनियंरिग सलाहकार है तथा जिसने इसके लिए वर्ष 2004 में एक रिर्पोट तैयार की थी) के टीम प्रमुख श्री टी. श्रीनिवासन को इस परियोजना की खामियों के बारे में बताते हुए पूछा गया कि क्या वाकई परियोजना से जहाजों के आवागमन में लगने वाले समय की बचत हो पायेगी, तो श्री श्रीनिवासन के चेहरे पर विस्मयकारी चुप्पी थी। इन्फ्रास्ट्रक्चर अर्थशास्त्री श्री जेकब जौन के अनुसार जो समुद्री जहाज कन्याकुमारी एवं तूतीकोरिन से चलेंगें उनके बारे में जो समय की बचत का अनुमान मै. एल एण्ड टी रामबोल रिर्पोट में लगाये गये है वे बहुत बढ़चढ़ कर बनाये गये आंकडे हैं, जो वास्तविकता से परे हैं। उनके अनुसार ''यूरोप व अफ्रीका से आने वाले जहाज कभी इन बन्दरगाहों पर नहीं जाते तो उतना समय कहां बच पायेगा'' यह बात बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि परियोजना के कुल खर्च का 60 प्रतिशत से अधिक भाग विदेशी समुद्री जहाजों से मिलने का अनुमान लगाया गया है। सेतुसमुद्रम् कोर्पोरेशन लि. के अधीक्षक अभियन्ता श्री मैनिक्कम से जब यह पूछा गया कि क्या किसी देशी या विदेशी जहाजरानी कम्पनी से पूछा गया है कि इस परियोजना के पूरा होने पर आप अपने जहाज इस 'छोटे' रास्ते से ले जाओगे? तो उन्होनें अपना पल्ला झाडते हुए कहा कि ''मै ड्रैजिंग कार्पोरेशन आंफ इण्डिया इस कार्य को देखते हैं''।

समुद्री मामलों के अर्थशास्त्री एवं रिसर्च एण्ड इंफोरमेशन सिस्टम फौर डवलपिंग कन्ट्रीज के एशोसिएट फैलो श्री प्रवीर डे के अनुसार परियोजना में बचने वाले समय को गलत तरीके से आंका गया है। क्योंकि जब बडे समुद्री जहाज इस नहर में से होकर गुजरेंगें तो उनकी गति बहुत धीमी हो जायेगी तथा वहां पर विशेष तौर से इसके लिए प्रशिक्षित पाइलटों की आवश्यकता पडेगी। इस कारण कोई भी जहाज इस रास्ते से जाना पसन्द नहीं करेगा।

सेवा निवृत्त नौ सेना कैप्टेन एच बाला कृष्णन के अनुसार 'परियोजना के दस्तावेजों के अनुसार 32,000 डी डब्ल्यू टी (डेड वेट टोनेज) भार क्षमता के जहाज ही इस नहर से निकल सकेंगे जबकि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को देखें तो 60,000 से अधिक क्षमता के जहाज भी बहुतायत में हैं जो कि इस क्षेत्र से नहीं गुजर सकेंगे'। अर्थात् कोई भी बडा जहाज इस नहर से नहीं जा सकेगा। श्री वी.एम.वैन्द्रे जो कि पुणे के पास सैन्ट्रल वाटर एण्ड पावर रिसर्च स्टेशन सीडब्ल्यूपीआरएस के निदेशक हैं, कहते हैं कि ऐसे प्रोजेक्ट को प्रारम्भ करने से पूर्व हाईड्रोलिक माडल्स विभिन्न प्रकार के टैस्ट करने हेतु तैयार किये जाते हैं जो कि इस परियोजना के लिए नहीं किये गये।

आखिर इस परियोजना में लगने वाले 3000 करोड से अधिक रूपयों तथा विश्व में करोडों राम भक्तों की भावनाओं से खिलवाड करने के पीछे क्या मानसिकता है? शिंपिंग इंण्डस्ट्री को तो इससे कुछ मिलने वाला है नहीं क्यों कि न समय की बचत और न ही तेल की बचत होगी। भला, कोई क्यों गली कूंचों में भटकना चाहेगा जब उसके पास हाइवे उपलब्ध है। जिस 'शौर्टकट' की बात सरकार कर रही है, वह महज एक दिखावा है। श्री प्रवीर डे कहते हैं ''यह सिर्फ राजनीति है, जो भारत को रामसेतु तोड़ने के लिए वाध्य कर रही है''। इससे कुछ लोगों का व्यक्तिगत लाभ तो हो सकता है किन्तु उससे होने वाली हानि सिर्फ एक देश को ही नही, पूरे विश्व को है। हो सकता है कि इस परियोजना के पीछे विदेशी शक्तियों का हाथ हो जो कि परमाणु ऊर्जा के प्रमुख श्रोत यूरेनियम के जनक थोरियम के विपुल भण्डार को सदा के लिए भारत से छीन कर परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में हमें अपंगु बनाना चाहते हैं। यदि हम थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर बनाने का कार्य आरम्भ करते हैं तो आगामी लगभग तीन सदियों तक हम न खाडी के देशों पर निर्भर रहेंगे न अमेरिका के साथ परमाणु करार के लिए वाध्य होगें। साथ ही करोडों बेरोजगारों को अपने ही देश में काम मिल सकेगा तथा लोगों की आस्था के साथ भी खिलवाड़ रूक सकेगा ।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

पार्टी लाइन से अलग राह पकड़ते बुध्ददेव भट्टचार्य

लेखक- दीनानाथ मिश्र

पश्चिम बंगाल के माक्र्सवादी मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टचार्य ने कहा है कि ''मैं अंध-अमेरिका विरोध में विश्वास नहीं करता। समय के साथ हम बदलते हैं। हम अपनी सोच भी बदलते हैं। और अगर परिवर्तन करना लोगों के हित में है तो हम भी क्यों न बदलें?'' दिग्गज माक्र्सवादी नेता बुध्ददेव भट्टाचार्य के ये विचार बहुत महत्वपूर्ण हो जाते, जबकि पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत अमेरिका के प्रति धर्मान्ध विरोध पर अड़े हुए हैं।

यद्यपि बुध्ददेव का यह बयान अमेरिका से आणविक ईंधन से सम्बंधित समझौते के संदर्भ में नहीं है। मगर राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोग जानते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टियां और वाममोर्चा कठमुल्लों की तरह अमेरिका विरोधी विचार रखते रहे हैं। यह केवल परमाणु करार 123 से सम्बंधित हाल में आए घोर अमेरिका विरोधी बयान की बात नहीं है। शीत युध्द के दिनों में जब विश्व अमेरिका और रूस के दो ध्रुवों में टकराव देख रहा था तब से वामपंथियों के विचार सोवियत समर्थक और अमेरिका विरोधी रहे हैं। वह अमेरिका के लिए पूंजीवादी, साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी, नव उपनिवेशवादी जैसे शब्दों का प्रयोग करते रहे हैं। और इस समय जब माक्र्सवादी पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत ने अपनी पुरानी लाइन पर अड़े रहने वाले बयानों की झड़ी लगा रखी हो ऐसे में बुध्ददेव भट्टाचार्य का उक्त बयान कारत और पार्टी को चुनौती देने वाला भाषित होता है। इसलिए भी यह बयान बहुत महत्वपूर्ण है।

पिछले दो-तीन महीनों से माक्र्सवादी पार्टी के अंदर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार को परमाणु करार के सवाल पर गिराने या नहीं गिराने को लेकर बहस चल रही है। और कम्युनिस्ट पार्टियां इस सवाल पर सरकार को गिराने की गरम-नरम धमकियां देते रहे हैं। संयुक्त प्रगतिशील की जान अटकी हुई है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कब तक बर्दाश्त करते। उन्होंने भी एक अवसर पर कह दिया कि समर्थन वापस लेना हो तो ले लें। देश में राजनैतिक अस्थिरता का माहौल बन गया है। बाजार प्रभावित होने लगे। साथी दल चुनाव की तैयारी में लग गए। इससे समझा जा सकता है कि देश में राजनैतिक अस्थिरता किस धरातल पर पहुंच गई है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का बेड़ा राजनैतिक हिलोरों में अब डूबा, तब डूबा की हालत में पहुंच गया। ऐसे में बुध्ददेव भट्टाचार्य का यह बयान बहुत अहम अर्थ वाला हैं और यह पार्टी के भीतर उथल पुथल का भी द्योतक है।

पश्चिम बंगाल के ही पूर्व मुख्यमंत्री ज्योतिबसु सीधे-सीधे तो बुध्ददेव जैसी लाइन नहीं ली लेकिन वह इतना जरूर कहते रहे हैं कि मध्यावधि चुनाव नहीं होंगे। हमारी पार्टी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साथ बातचीत करती रहेगी और कोई न कोई रास्ता निकलेगा। बुध्ददेव भट्टाचार्य का उक्त बयान अपने में एक गाली समेटे हुए है। अमेरिका विरोधवाद का, जिसको और कड़ी भाषा में कहा जाए तो कठमुल्लापन कह सकते हैं। जहां तक माक्र्सवादी पार्टी के वर्तमान नेतृत्व का सवाल है, प्रकाश कारत घनघोर और कट्टर विचारधारा के नेता माने जाते हैं। दूसरा संयोग यह है कि माक्र्सवादी पार्टी पर आज केरल का गु्रप हॉवी है। इसे समझने के लिए माक्र्सवादी पार्टी के नीति नियामक निकायों को समझना होगा। सर्वोच्च निकाय 17 सदस्यी पोलित ब्यूरो है। और दूसरी निकाय केन्द्रीय समिति है। इसमें 79 सदस्य होते हैं। पोलित ब्यूरो में 17 में से 5 सदस्य पश्चिम बंगाल के थे। उसमें पश्चिम बंगाल के राज्य सचिव अनिल विश्वास और सीटू के महासचिव चित्रव्रत मजुमदार का निधन हो गया। पश्चिम बंगाल के प्रभावी सदस्यता 5 से घटकर तीन हो गई है। इसीलिए प्रकाश कारत पोलित ब्यूरो में अपना दबदबा बनाए हुए हैं। केरल का गु्रप हॉवी है। पोलित ब्यूरो में प्रकाश कारत की पत्नी बृंदा कारत भी हैं। अलबत्ता केन्द्रीय समिति में पश्चिम बंगाल के पन्द्रह-सोलह सदस्य हैं। मगर पोलित ब्यूरो सभी बड़े निर्णयों में निर्णायक होता है। इसी फैसले के कारण ज्योति बसु प्रधानतंत्री बनते-बनते रह गए थे। जिसे उन्होंने ऐतिहासिक भूल बताया था। इसी निकाय की भूल के कारण संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में माक्र्सवादी पार्टी और वाममोर्चा सरकार में सम्मिलित नहीं हुए थे।

पार्टी के महासचिव प्रकाश कारत ने जिस दिन केन्द्रीय सरकार को भारत-अमेरिका समझौते के 6 महीने के लिए टालने का सुझाव दिया, उसके दूसरे दिन ही ज्योति बसु की यह नसीहत आना कि अंध अमेरिका विरोधवाद के वह कायल नहीं हैं। भले ही वह अपने बारे में कह रहे थे। लेकिन वह न केवल एक महत्वपूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री हैं बल्कि पोलित ब्यूरो के सदस्य भी हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसका विषय अमेरिका के प्रति रूख ही है जो अमेरिका पार्टी की निगाह में शत्रु रहा है। इस अमेरिका विरोधी नीति पद से पार्टी अपने पूरे इतिहास में कभी विचलित नहीं हुई। बुध्ददेव भट्टाचार्य के इस बयान के गर्भ में गम्भीर परिवर्तन के संकेत हैं अमेरिका के साथ परमाणु करार के प्रबल विरोध का एक कारण तो अमेरिका के प्रति पार्टी का परम्परागत रवैया रहा है।

मगर दूसरा उतना ही महत्वपूर्ण कारण चीन परस्ती भी रहा है। कम्युनिस्ट पार्टियां हमेशा राष्ट्रहित के बजाए अन्तर्राष्ट्रीय नजरिए से सोचती नहीं हैं। उनके लिए राष्ट्रयी हित गौण है। और अन्तर्राष्ट्रीय कम्युनिज्म मे हित प्रमुख हैं। आज कम्युनिस्ट विश्व का नेता निसंदेह चीन है। और जहां तक माक्र्सवादी पार्टी का सवाल है उसका चीन से जुड़ाव जन्मजात है। इसी सवाल पर पार्टी टूटी थी। सोवियत संघ के समर्थक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अलग हो गई है और चीन समर्थित माक्र्सवादी पार्टी अलग हो गई। चीन ने भारत पर हमला किया था तो माक्र्सवादी नताओं के प्रभाव में ही पार्टी ने चीन को हमलावर मानने से इनकार किया और भारत को ही हमलावर बताया। पिछले महीने से चीन के अरूणाचल पर दावे की चर्चा चलती रही है। चीनी सरकार के प्रतिनिधि भारत आकर खुलकर यह सवाल खड़ा करते रहे हैं। अभी कुछ महीने पहले ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में माक्र्सवादी पार्टी के छात्र संगठन ने प्रकारांतर से अरूणाचल पर चीनी दावे को सही बताया। आज जब परमाणु करार पर टकराव की स्थिति पैदा हुई है तो उसकी पृष्ठभूमि में भी पार्टी की चीनपरस्ती ही बोल रही है। अब जरा हम बुध्ददेव भट्टाचार्य के बयान को फिर से एक बार देखें। वह कहते हैं- समय बदलता है, सोच बदलती है, नीतियां बदलती हैं, तो हम क्याें न बदलें? उन्होंने यह भी कहा कि हमें अमेरिकी निवेश की शिक्षा आईटी आदि क्षेत्रों में जरूरत है।

यह स्मरणीय है कि पश्चिम बंगाल के उद्योग सचिव पश्चिम बंगाल में निवेश के लिए अमेरिकी यात्रा कर रहे थे। उन्होंने तर्क देते हुए यहां तक कह दिया कि आज वियतनाम जैसा कम्युनिस्ट देश भी अमेरिकी मदद ले रहा है। हालांकि तर्क पश्चिम बंगाल के आर्थिक हित का दिया गया। लेकिन स्थानीय हित को अन्तर्राष्ट्रीय हित के ऊपर महत्व दिया गया है। यह रास्ता प्रदेश से राष्ट्रीय हित की ओर जाता है। और इसीलिए मैं कहता हूं कि माक्र्सवादी पार्टी में गम्भीर मतभेद पनप रहे हैं। मैं उस तरह के मतभेदों की बात नहीं कर रहा जिससे माक्र्सवादी पार्टी की केरल इकाई गृहकलह में उलझी हुई है। एक तरफ मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंद हैं और दूसरी तरफ पिनरई विजयन हैं। दोनों का संघर्ष कार्यकर्ताओं के स्तर पर भी हिंसक संघर्ष की नौबत आ जाना माक्र्सवादी पार्टी के लिए तो सोचनीय है ही। पार्टी महासचिव प्रकाश कारत ने दोनों पोलित ब्यूरो सदस्यों को अनुशासनहीनता के सवाल पर निलंवित कर दिया। भले ही केरल की इकाई के इन झगड़ों को नरमपंथी गरमपंथी या कोई और नाम क्यों न दिया जाए या कोई वैचारिक मुलम्मा क्यों न चढ़ाया जाए।

मूल में यह व्यक्तिवादी झगड़े हैं लेकिन बुध्ददेव भट्टाचार्य का बयान जिस बदलाव का संकेत दे रहा है यह माक्र्सवादी पार्टी की आधारभूत सोच को बदलने की दिशा में संकेत देता है। भले ही महासचिव बनकर प्रकाश कारत पार्टी के वैचारिक अधिष्ठान की कितनी ही कड़ाई से पहरेदारी करें, लेकिन पार्टी में एक गम्भीर विभाजन प्रवृति साफ साफ नजर आ रही है। क्योंकि बुध्ददेव भट्टाचार्य ने इस तरह के बयान पहली बार नहीं दिए हैं। पार्टी तो बीसियों साल तक सड़कों पर पूंजीवाद हाय-हाय, टाटा बिरला मुर्दाबाद, का नारा भी लगाया करती थी। लेकिन बुध्ददेव भट्टाचार्य उन्हीं टाटा, बिरला के लिऐ पलक पांवड़े बिछा दिए। आर्थिक सुधारों के लिए भी तरफदारी की। जिसका केन्द्रीय स्तर पर आज भी पार्टी जमकर विरोध कर रही है। या तो नन्दीग्राम और सिंगूर की घटनाओं के कारण बुध्ददेव भट्टाचार्य उस दिशा में सरपट नहीं दौड़ सके। लेकिन आज भी वह जुटे हुए जरूर हैं। पार्टी अपनी लकीर के फकीर की नीति के कारण चीन-परस्ती की लाइन लेकर भारत अमेरिकी करार पर तरह तरह के तर्कजाल बुन रही है।

विश्व पटल पर अगर हम देखें चाहे बड़ी शक्ति हो या छोटी शक्ति, सब अपने राष्ट्रीय हित की तरफ बढ़ रहे हैं। अबने वर्चस्व की लड़ाई भी लड़ रहे हैं। वर्चस्व की लड़ाई में अमेरिका सबसे आगे है। चीन भी अमेरिका की तरह एक ध्रुव बन कर उभरना चाहता है। भारत के चारों तरफ नाकेबंदी को मजबूत करता रहा है। यहां तक कि रूस सोवियत संघ के ध्वस्त होने के बावजूद झटके से उबरने की कोशिश कर रहा है। बदलते परिदृश्य में भारत के राष्ट्रीय हितों की मांग है कि हित रक्षा करते हुए चीन के बढ़ते खतरों से सचेत रहें और इसीलिए माक्र्सवादी पार्टी की तरह राष्ट्रवादी खेमे में अंध-अमेरिकी विरोध वाला रास्ता नहीं अपनाया। बल्कि सावधानी रखते हुए अमेरिका की तरफ भी हाथ बढ़ाया। कदाचित बुध्ददेव भट्टाचार्य की भी यही मंशा हो। लेकिन उनकी इकलौती मंशा से क्या होता है? अभी तो प्रकाश कारत जैसे कठमुल्लों का पार्टी में बोलबाला है।

Tuesday 25 September 2007

आतंकवाद से लड़ने का हमारा मनोबल न्यूनतम

लेखक-हरिकृष्ण निगम

हाल की राष्ट्रसंघ की एक गोपनीय रिपोर्ट के अनुसार भारत की देश के अंदर फैले आतंकवाद से लड़ने की क्षमता आज न्यूनतम है क्योंकि देश की सरकार की इस विकट समस्या से जूझने की न तो कोई सुनियोजित रणनीति है और न ही मनोबल।

यह खुलासा राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद द्वारा गठित आतंकवाद विरोधी समिति की एक गोपनीय रिपोर्ट के प्रारूप द्वारा हाल में किया गया है, जो किसी को भी चौंका सकता है। हमारे देश में आतंकवादियों द्वारा पिछले लगभग 15 वर्षों में लाखों जानें ली जा चुकी हैं पर ऐसा लगता है कि भारतीयों के जीवन का कोई मूल्य नहीं है। न तो सरकार में दृढ़ता है और न ही न्यायिक प्रक्रिया त्वरित निर्णय लेने के अनुरूप है और न ही अधिकांश राजनीतिक दलों के नेता इस विषय को गंभीरता से ले सके हैं। यह भी आरोप लगाया गया है कि हमारा सरकारी ढांचा या शासनतंत्र देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए कोई प्रभावी व दूरगामी नीति नहीं बना सका है। औरतों और देश के मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी हर आतंकवादी हादसे के बाद इन अपराधों के शिकार हुए लोगों या उनके परिवार से सहानुभूमि दिखाने के स्थान पर आतंकवादियों के मानवाधिकार का मुखर समर्थन ही नहीं उन्हें महिमामण्डित भी करता है। साफ है कि आतंकवाद की जड़ों की तलाश के बहाने आतंकवादियों का खुलकर पक्ष लिया जाता है।

स्पष्ट है कि आज हमारी सरकार की आतंकवाद से लड़ने की नाकामी ने हमें 'सॉफ्ट स्टेट' या पूरी व्यवस्था को 'पिलपिला और अक्षम' बना दिया है। मज़े की बात है कि उपर्युक्त रिपोर्ट इसी जुलाई 2007 में भारत सरकार को सौंपी जा चुकी है।

यदि देश में आतंकवादी हमलों में मरने वालों की संख्या पर ही जाएं तो विश्व के रंगमंच पर भारत ही ऐसा देश है जो आतंकवाद का पहले नंबर का सबसे बड़ा क्षेत्र है। एक अनुमान के अनुसार जम्मू कश्मीर सहित देश में पिछले कुछ वर्षों में 70,000 लोग मारे जा चुके हैं और इतने ही हताहत हो चुके हैं। हम भूल रहे हैं कि जब मुंबई में 1992 में बम विस्फोटों की श्रृंखला को अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के साथ-साथ दुनिया भर के विख्यात जोखिम प्रबंधन के विश्लेषकों ने इसे तब तक का 'सर्वाधिक भयावह-निर्मित शहरी आतंकवादी हादसे की संज्ञा दी थी।'

आज राष्ट्रसंघ की 'काऊंटर टेरिरिज्म कमेटी' 9/11 के विमानों द्वारा आत्मघाती बमबारों द्वारा न्यूयार्क के विश्वव्यापार केन्द्र को ध्वस्त करने के बाद से हर तिमाही दुनिया की स्थिति की पुनर्वीक्षा करती है। हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि चाहे राष्ट्रप्रेमी बुध्दिजीवी हों, सुरक्षा विशेषज्ञ हों या सुरक्षा एजेंसियाँ उनका मनोबल तोड़ने के लिए उन्हें कथित सेकुलरवादी 'दक्षिणपंथी' या 'अल्पसंख्यक विरोधी' कहकर हतोत्साहित करने की कोशिश करते हैं। हमारी सरकार व मीडिया के एक बड़े वर्ग की यह आपराधिक नादानी लगती है।

हमारे कानूनों की प्रक्रिया भी ऐसी है कि आतंकवादी हादसों के आरोपियों को सजा दिलवाने में 15-20 वर्ष भी लग जाते हैं। हमारी आज स्थिति है कि राष्ट्रसंघ की समितियाँ कई बार कह चुकी हैं कि आतंकवादियों को घर व अन्य संसाधन मुहैया कराने वालों को नियंत्रित करने में भारत के कानून सक्षम नहीं है। राष्ट्रसंघ का एक चर्चित संकल्प क्र. 1373 जो 9/11 के हादसे के बाद आतंकवाद पर अंकुश लगाने के लिए पारित हुआ था और सभी सदस्य देशों पर लागू है हमारे देश में अनदेखा कर दिया गया। राष्ट्रसंघ की समिति ने दो टूक शब्दों में कहा है-भारत में आतंकवादियों को अनेक अनौपचारिक श्रोतों से धन मिल रहा है, जो चाहे 'हवाला' की चैनल हों, जाली भारतीय करेंसी नोटों का बड़े स्तर पर लाना हो या नशीले पदार्थों की तस्करी हो। पर यह चिंता का विषय है कि भारत सरकार के पास इस पर रोक लगाने की कोई प्रभावी नीति नहीं है।

हमारे देश में वर्तमान कानूनों को लागू कराने की भी कोई सन्नध्दता या तैयारी नहीं है क्योंकि अधिकांश राजनेता भ्रष्ट भी हैं और उनमें आतंकवाद से न तो लड़ने का इरादा है और न ही साहस। सिर्फ ऊपरी दिखावे के लिए वे घड़ियाली आंसू बहाते हैं और अपने वोट बैंक को संवारने के लिए सेकुलरवादी ढोंग रचते हैं। यद्यपि यह भी सच है कि हम पश्चिमी देशों व अमेरिका की तरह हिंसा, अपराध, मादक व द्रव्यों की तस्करी व आतंकवाद के कारण से जांच के घेरे में आए लोगों का जातीय या धार्मिक वर्गीकरण नहीं कर सकते, पर निष्पक्ष व असंप्रक्त होकर ऐसे तत्वों का 'डेटाबेस ' तैयार करना भी विषाक्त राजनीतिक माहौल या तुष्टीकरण की नीति के कारण संभव नहीं है। राष्ट्रसंघ ने यह भी स्पष्ट कहा है कि समिति की रिपोर्ट के अनुसार केन्द्र की खुफिया एजेंसियों या सुरक्षा संगठनाें के काम में राज्य सरकारों या पूर्वाग्रह युक्त मंत्रियों द्वारा अनपेक्षित हस्तक्षेप करना आम बात है। यदि राज्य सरकार के प्रभावशाली नेताओं में ही अपने वोट बैंक के कारण दुराग्रही दृष्टि होगी तो आंतरिक सुरक्षा-होमलैण्ड सिक्यूरिटी की बात भी एक मखौल बन सकती है। इसी रिपोर्ट के अनुसार चाहे नेपाल हो या बंगलादेश बाहरी नागरिकों का देश में अवैध प्रवेश या मानव तस्करी भारत में आम बात है और उनको यदा कदा राजनीतिक संरक्षण भी मिलता है जो देश के लिए घातक सिध्द हो सकता है। आज भी देश में प्रवेश करने वाले लोगों की गुमशुदगी, चोरी गए अथवा खोए हुए पासपोर्टों की वर्तमान उपलब्ध सूचनाएं 'इंटरपोल' तक पहुंचाने का कोई प्रावधान नहीं है। देश में कोई ऐसा कानून नहीं है जिससे 'इलेक्ट्रॉनिक सर्विलेंस' को गुप्त रखा जा सके और किसी भी कार्यक्रम जो सुरक्षा एजेंसियां चलाती हैं उसकी गोपनीयता बरकरार रखी जा सके। आतंकवाद संबंधी समस्या अधिनियम बहुत पुराने हैं और उनमें कोई दम नहीं है। समग्र व प्रभावी तात्कालिक रणनीति के अभाव में देश की 15,100 किमी लंबी जमीनी सीमा और 7500 किलोमीटर की समुद्र तटीय क्षेत्र हमारी लापरवाही के कारण असुरक्षित हैं। आज के 76 सीमावर्ती क्षेत्रों की चौकियों में मात्र 33 ऐसी हैं जहाँ कम्प्यूटरों का प्रयोग होता है और यह स्थिति आतंकवादियों के लिए खुला आमंत्रण है।

चाहे नक्सलवादी हिंसा हो या आतंकवादियों की घुसपैठ यदि हमारी स्वयं की दृष्टि व प्रकृति शुतुर्मुगी हो तब इस देश की रक्षा करना मुश्किल है। बिहार में तो अब तक माओ कम्युनिस्ट सेंटर जैसी देशद्रोही सत्तारूढ़ राजद सरकार की सहयोगी पार्टी थी। आंध्र में कई बार स्वयं राज्य सरकार युध्द विराम के नाम पर स्थानीय अवैधानिक तत्वों से वार्ता करती थी। उसके ऊपर सशक्त पर दिशाहीन अंग्रेजी मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा आतंकवादियों के लिए मानवाधिकार के नाम पर अपने पृष्ठ खोल देना आज सुरक्षा को ध्वस्त करने वाला घातक कदम सिध्द हो सकता है। कश्मीर से हिन्दुओं का पलायन, उत्तरपूर्व में क्षत-विक्षत होते हुए मानचित्र के बावजूद तावांग को देने का समर्थन, हर आतंकवादी हादसे में, घर में छिपे दुश्मनों को पहचानने की जगह मात्र मिनटों में पाकिस्तान को दोष देने की घोषणाएं यह सब हमारे कथित बुध्दिजीवियों की धोखाधड़ी को कई बार सिध्द कर चुका है।

आज विश्वस्तर पर अनेक देश जो कर रहे हैं वह हमें भी करना होगा। चाहे, बाली हो या मेड्रिड, लंदन हो या जर्मनी व डेनमार्क के कुछ शहर, वहां भी आतंकवादी हादसों के बाद जो कदम लिए गए वैसा ही हमें करना होगा। क्या अमेरिका, इंग्लैण्ड' आस्ट्रेलिया, स्पेन और फ्रांस परिपक्व प्रजातंत्र नहीं है? अपने लोकतंत्र की रक्षा व नागरिकों की सुरक्षा के लिए यदि वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? इन सभी देशों से अधिक मरने वालों की संख्या भारत में रही हैं, पर हमारे राजनीतिज्ञ हमें सुलाये रखने की कला में माहिर हैं? जो इनके विरूध्द आवाज उठाता है उसे वे 'साम्प्रदायिक' या 'दक्षिणपंथी' कहकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। आज हमें अपनी प्राथमिकताएं बदलकर ऐसे देशविरोधियों का पर्दाफाश करना जरूरी है जो एक 'वृंदवादन' के रूप में नकली सेकुलरिज्म की आड़ में देश को तोड़ने वालों की साजिश में जाने-अनजाने मोहरे बने हुए हैं।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

एकात्ममानव दर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय : समन्वय नंद


आज (25 सितंबर, 2007) दीनदयाल जयंती है। पं दीनदयाल उपाध्याय महान चिंतक और संगठक थे। वे भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्ममानव दर्शन जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी। प्रस्तुत है उनके विचारों पर आधारित एक प्रेरणास्पद लेख :

जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय का स्थान भारतीय चिंतन परंपरा में काफी महत्वपूर्ण है। भारतीय चिंतन परंपरा में उनकी महत्ता इसलिए है कि उन्होंने पश्चिम के खंडित दर्शन के स्थान पर भारतीय जीवन पध्दति में समाहित एकात्म मानववाद के दर्शन को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की विकास की अवधारणा पश्चिमी अवधारणा से बिलकुल विपरीत है। इतना तो सब मानते हैं कि मानव जीवन के समस्त क्रियाकलापों का उद्देश्य सुख की प्राप्ति है और मानव के यह क्रियाकलाप ही उसके विकास का रास्ता है। पश्चिम के लोग और शायद हमारे देश के नीति निर्धारक भी यह मानते हैं कि जहां ज्यादा उपभोग होते हैं वहां ज्यादा सुख होता है और वही विकास की प्रतीक होता है। परंतु पंडित दीनदयाल उपाध्याय उपभोग या सुख को विकास का पर्याय नहीं मानते थे। वे इसके लिए एक अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया करते थे। वह कहते थे कि व्यक्ति को गुलाब जामुन खाना अच्छा लगता है। व्यक्ति को लगता है कि गुलाब जामुन खाने से सुख प्राप्त हो रहा है। कई वह व्यक्ति सचमुच यह मान लेता है कि गुलाब जामुन में ही सुख है। गुलाम जामुन का उपभोग करने से ही सुख प्राप्त होता है। लेकिन मान लीजिये कि जब व्यक्ति गुलाब जामुन खा रहा हो तो उसके पास उसके किसी परिजन के देहांत की खबर आ जाए। तब व्यक्ति भी वही रहेगा और उसके हाथ में वही गुलाब जामुन रहेगा लेकिन सुख उसके पास नहीं होगा। अगर गुलाब जामुन में ही सुख है तो फिर उस समय भी व्यक्ति को सुख प्राप्त होना चाहिए था। लेकिन ऐसा होता नहीं है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि मन की स्थिति ही सुख की अवधारक है। मन पर नियंत्रण ही वास्तविक विकास है। वह स्पष्ट तौर पर कहते थे कि उपभोग के विकास का रास्ता राक्षसत्व की और जाता है और मन को नियंत्रित करने का विकास का रास्ता देवत्व की ओर जाता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय इस देवत्व के रास्ते का अनुसंधान कर रहे थे । परंतु यह ठीक है कि यह नया रास्ता नहीं था। भारतीय साधु संत तथा सामान्य जन हजारों-हजारों वर्षों से इसकी साधना कर रहे थे । महात्मा गांधी भी एक सीमा तक उपभोग के खिलाफ थे ।

मनुष्य की जितनी भौतिक आवश्यकताएं हैं उनकी पूर्ति का महत्व को भारतीय चिंतन ने स्वीकार किया है, परंतु उसे सर्वस्व नहीं माना। मनुष्य के शरीर, मन, बुध्दि और आत्मा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए और उसकी इच्छाओं व कामनाओं की संतुष्टि और उसके सर्वांगीण विकास के लिए भारतीय संस्कृति में पुरुषार्थ चतुष्टय की जो अवधारणा है पंडित दीनदयाल उपाध्याय उसे आज के युग में भारत के समग्र विकास का मूल आधार मानते थे । पुरुषार्थ के यह चार अवधारणाएं है- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष। पुरुषार्थ का अर्थ है उन कर्मों से है जिनसे पुरुषत्व र्साथक हो। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की कामना मनुष्य में स्वाभविक होती है और उनके पालन से उसको आनंद प्राप्त होता है।

जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है कि मनुष्य की भौतिक आवश्यकता व अन्य आवश्यकताओं को पश्चिम की दृष्टि में सुख माना गया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार अर्थ और काम पर धर्म का नियंत्रण रखना जरुरी है और धर्म के नियंत्रण से ही मोक्ष पुरुषार्थ प्राप्त हो सकता है। यद्यपि भारतीय संस्कृति में मोक्ष को परम पुरुषार्थ माना गया है. तो भी अकेले उसके लिए प्रयत्न करने से मनुष्य का कल्याण नहीं होता। वास्तव में अन्य पुरुषार्थ की अवहेलना करने वाला कभी मोक्ष का अधिकारी नहीं हो सकता।

इसी प्रकार धर्म आधारभूत पुरुषार्थ है लेकिन तीन अन्य पुरुषार्थ एक दूसरे के पूरक व पोषक हैं। यदि व्यापार भी करना है तो मनुष्य को सदाचरण, संयम, त्याग, तपस्या, अक्रोध, क्षमा, धृति, सत्य आदि धर्म के विभिन्न लक्षणों का निर्वाह करना पडेगा। बिना इन गुणों के पैसा कमाया नहीं जा सकता। व्यापार करने वाले पश्चिम के लोगों ने कहा कि आनेस्टी इज द बेस्ट पालीसी अर्थात सत्य निष्ठा ही श्रेष्ठ नीति है। भारतीय चिंतन के अनुसार आनेस्टी इज नट ए पालीसी बट प्रिसिंपल अर्थात सत्यनिष्ठा हमारे लिए नीति नहीं है बल्कि सिध्दांत है। यही धर्म है और अर्थ और काम का पुरुषार्थ धर्म के आधार पर चलता है। राज्य का आधार भी हमने धर्म को ही माना है। अकेली दंडनीति राज्य को नहीं चला सकती। समाज में धर्म न हो तो दंड नहीं टिकेगा। काम पुरुषार्थ भी धर्म के सहारे सधता है। भोजन उपलब्ध होने पर कब, कहां, कितना कैसा उपयोग हो यह धर्म तय करेगा। अन्यथा रोगी यदि स्वस्थ्य व्यक्ति का भोजन करेगा स्वस्थ व्यक्ति ने रोगी का भोजन किया तो दोनों का अकल्याण होगा। मनुष्य की मनमानी रोकने को रोकने के लिए धर्म सहायक होता है और धर्म पर इन अर्थ और काम का नियंत्रण को सही माना गया है।

पंडित दीनदयाल जी के अनुसार धर्म महत्वपूर्ण है परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि अर्थ के अभाव में धर्म टिक नहीं पाता है। एक सुभाषित आता है- बुभुक्षित: किं न करोति पापं, क्षीणा जना: निष्करुणा: भवन्ति। अर्थात भूखा सब पाप कर सकता है। विश्वामित्र जैसे ऋषि ने भी भूख से पीडित हो कर शरीर धारण करने के लिए चांडाल के घर में चोरी कर के कुत्ते का जूठा मांस खा लिया था। हमारे यहां आदेश में कहा गया है कि अर्थ का अभाव नहीं होना चाहिए क्योंकि वह धर्म का द्योतक है। इसी तरह दंडनीति का अभाव अर्थात अराजकता भी धर्म के लिए हानिकारक है ।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार अर्थ का अभाव के समान अर्थ का प्रभाव भी धर्म का द्योतक होता है। जब व्यक्ति और समाज में अर्थ साधन न होकर साध्य बन जाएं तथा जीवन के सभी विभुतियां अर्थ से ही प्राप्त हों तो अर्थ का प्रभाव उत्पन्न हो जाता है और अर्थ संचय के लिए व्यक्ति नानाविध पाप करता है। इसी प्रकार जिस व्यक्ति के पास अधिक धन हो तो उसके विलासी बन जाने की अधिक संभावना है ।

पश्चिम में व्यक्ति की जीवन को टुकडे-टुकडे में विचार किया जबकि भारतीय चिंतन में व्यक्ति के जीवन का पूर्णता के साथ संकलित विचार किया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार हमारे चिंतन में व्यक्ति के शरीर, मन बुध्दि और आत्मा सभी का विकास करने का उद्देश्य रखा है। उसकी सभी भूख मिटाने की व्यवस्था है। किन्तु यह ध्यान रखा कि एक भूख को मिटाने के प्रयत्न में दूसरी भूख न पैदा कर दें और दूसरे के मिटाने का मार्ग न बंद कर दें। इसलिए चारों पुरुषार्थों को संकलित विचार किया गया है। यह पूर्ण मानव तथा एकात्ममानव की कल्पना है जो हमारे आराध्य तथा आराधना का साधन दोंनों ही हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने पश्चिम के खंडित अवधारणा के विपरीत एकात्म मानव की अवधारणा पर जोर दिया है। आज आवश्यकता इस बात की है कि उपाध्याय जी के इस चिंतन को व्यावहरिक स्तर पर उतारने का प्रयास किया जाए ।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

Monday 24 September 2007

विश्व विजेता बनने पर भारतीय क्रिकेट टीम को बधाई!

भारत ने अपने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को शिकस्त देकर ट्वेंटी 20 विश्व कप का विश्व विजेता होने का गौरव पा लिया। विदित हो कि भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए पाकिस्तान को बीस ओवर में 158 रन बनाने की चुनौती दी थी लेकिन पाकिस्तानी बल्लेबाज 152 रनों पर आउट हो गए। अंतिम ओवर तक चले रोमांचक संघर्ष में भारत, पाकिस्तान को पांच रनों से हराकर विश्व विजेता बना।

शाबास भारतीय क्रिकेट टीम!
धोनी की कप्तानी को सलाम!
जय हिन्द! जय भारत!!

कम्युनिस्टों का असली चरित्र उजागर


कॉमरेडों, भारत की जनता मूर्ख नहीं है

पिछले लगभग दो साल से वामपंथी दल भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर यूपीए सरकार को बंदर घुड़की दे रहे है, परमाणु समझौते के विरोध में रैली निकाल रहे हैं, बंद का आयोजन कर रहे हैं, धरना दे रहे हैं, सेमिनार कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य एवं पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु भारत-अमेरिका परमाणु समझौता को जरूरी बता रहे है।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के मानसिक दिवालिएपन का एक नायाब उदाहरण नीचे प्रस्तुत है। निम्न समाचार दैनिक समाचार पत्र 'हिन्दुस्तान' और कार्टून 'नवभारत टाइम्स' से साभार के साथ प्रस्तुत है।

अब बसु बोले- डील जरूरी
एटमी डील परमाणु ऊर्जा के लिए की जा रही है। परमाणु ऊर्जा जरूरी है और न्यूक्लियर प्लांट्स भी। जिस तरह से नए उद्योग पनप रहे हैं, उसे देखते हुए ऊर्जा की मांग बढ़ने की पूरी उम्मीद है। उम्मीद है करार पर यूपीए-लेफ्ट की तकरार जल्द खत्म होगी।
-ज्योति बसु, पूर्व मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल
(21 सितंबर, 2007 को दिया गया बयान)

हम परमाणु ऊर्जा की उपेक्षा नहीं कर सकते। हमें इस दिशा में आगे बढना होगा।
-बुध्ददेव भट्टाचार्य, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल
(17 सितंबर, 2007 को दिया गया बयान)

एटमी करार पर कम्युनिस्टों के पिघलने के संकेत मिलने लगे हैं। क्योंकि 21 सितंबर, 2007 को परमाणु करार पर खुद वाम दलों में नजर आने लगी तकरार का पलड़ा अब सरकार के पक्ष में साफ झुकता नजर आया, जब वाम राजनीति के 'भीष्म पितामह' माने जाने वाले माकपा नेता ज्योति बसु ने खुलकर इसको जरूरी करार दे दिया।

हालांकि हाल ही में करार की अप्रत्यक्ष तरफदारी करने वाले पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुध्ददेव भट्टाचार्य की ही तर्ज पर उन्होंने भी इसे जरूरी बताने के लिए परमाणु ऊर्जा को ही सहारा बनाया। फर्क बस इतना ही था कि भट्टाचार्य ने डील का जिक्र किए बगैर परमाणु ऊर्जा को जरूरी बताया था तो बसु ने डील को परमाणु ऊर्जा के लिए हुई बताकर जरूरी बताया। बसु ने कहा- अमेरिका से हुई परमाणु डील परमाणु ऊर्जा के लिए हुई है और परमाणु ऊर्जा जरूरी है। हमें न्यूक्लियर प्लांट की भी जरूरत है। जिस तरह से नए उद्योग पनप रहे हैं, ऊर्जा की मांग में भी इजाफा होना ही है। बसु ने यह उम्मीद भी जताई कि करार पर चल रही यूपीए-लेफ्ट की तकरार भी जल्द ही खत्म हो जाएगी।

Sunday 23 September 2007

प्रामाणिकता का निरर्थक प्रश्न


-बलबीर पुंज


यूपीए सरकार द्वारा हमारी सांस्कृतिक धरोहर- श्रीराम सेतु पर हो रहे प्रहार के विरूध्द हम लगातार विचारोत्तेजक लेख प्रस्तुत कर रहे है। इसी कड़ी में प्रस्तुत है भाजपा के राष्ट्रीय सचिव श्री बलबीर पुंज का लेख। इस लेख में श्री पुंज ने कुशलतापूर्वक ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में श्रीराम सेतु की प्रामाणिकता को लेकर उपजे संदेह को ध्वस्त किया है और यूपीए सरकार की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीति का पर्दाफाश किया है।

तीव्र जनाक्रोश को देखते हुए केंद्रीय सरकार ने राम और रामायण के अस्तित्व को मान लिया। यदि राम और रामायण सत्यपरक हैं तो रामायण में वर्णित रामसेतु काल्पनिक कैसे हो सकता है? हजारों साल से आस्था के केंद्र-बिंदु रहे विषयों को क्या प्रमाण की आवश्यकता है? कश्मीर के हजरतबल दरगाह में रखे पैगंबर साहब के बाल की प्रामाणिकता पूछने की हिमाकत क्या कोई करेगा? ईसा मसीह को सलीब पर लटकाया गया था। उसी प्रतीक सलीब को ईसाई अनुयायी गले से लगाए रखते हैं। क्या कोई उस पर प्रश्न खड़ा कर सकता है? या ईसा एक कुंआरी कन्या-मदर मेरी के गर्भ से जन्मे थे, क्या इस मान्यता की कोई वैज्ञानिक व्याख्या हो सकती है? केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व विभाग ने यह विवादित हलफनामा संयुक्त रूप से सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया था, जिसमें रामायण में वर्णित पात्रों और घटनाओं को काल्पनिक बताया गया था।

हलफनामे के पैरा सात में लिखा है, ''...एडम ब्रिज को आज तक 'सुरक्षित क्षेत्र' या 'सुरक्षित स्मारक' घोषित नहीं किया गया है। भारतीय पुरातत्व विभाग या भारत सरकार के सामने प्रथमदृष्टया ऐसा कोई अवसर नहीं आया जिसमें कथित सेतु को 'प्राचीन स्मारक' समझ कर नियमानुसार उसके सरंक्षण की बात उठे और इसीलिए भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा इस संदर्भ में कोई अध्ययन नहीं किया गया है।'

हलफनामे के पैरा 32 में लिखा है, '...वैज्ञानिक अध्ययन के प्रकाश में कथित संरचना को मानव निर्मित नहीं कहा जा सकता। वह संरचना केवल बालू और कोरल से संगठित है, जिसे ऐतिहासिक/पुरातात्विक अथवा महत्वूपर्ण नहीं कहा जा सकता।...' जब पैरा सात में सरकार ने स्वयं स्वीकार किया है कि सेतु का कोई वैज्ञानिक अध्ययन ही नहीं किया गया तो फिर सेतु के काल्पनिक होने का दावा कैसे कर दिया गया? हलफनामे के पैरा 29 में कहा गया है, 'नासा ने अपने चित्रों के संदर्भ में किसी अन्य के द्वारा कोई निहितार्थ निकालने की स्थिति में जिम्मेदारी लेने से इंकार किया है।' यह सही है, किंतु यह भी सही है कि नासा ने उसके रामसेतु होने या न होने पर भी कोई सवाल खड़ा नहीं किया है। करोड़ों हिंदुओं की आस्था है कि वह रामसेतु है।

केंद्र सरकार या पुरातत्व विभाग क्या इस प्रश्न का जवाब देंगे कि रामायण में वर्णित उसी स्थान विशेष पर ही सेतु क्यों है? वह लंका को ही क्यों जोड़ता है? क्या अयोध्या में विवादित ढांचे के नीचे महल या मंदिर होने के वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं मिल रहे? क्या लुप्त द्वारकापुरी के समुद्र में मग्न होने के प्रमाण नहीं मिल रहे? क्या रेगिस्तान में विलुप्त सरस्वती नदी के प्रवाह मार्गों की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हो रही? इन सब मामलों में सरकार या पुरातत्व विभाग क्या कर रहा है? रामसेतु ध्वंस के प्रयास के पीछे जहाजरानी मंत्री टी आर बालू का बड़ा हाथ है। बालू द्रमुक पार्टी के नेता हैं।

अनीश्वरवादी द्रविड़ आंदोलन के संस्थापक रामास्वामी नायकर ने कहा था, 'ईश्वर में विश्वास करने वाले मूर्ख हैं।' द्रविड़ आंदोलन के दौरान हिंदू देवी-देवताओं को सार्वजनिक रूप से चप्पलों से पीटा जाता था। मूर्तियां तोड़ी जाती थीं। आश्चर्य नहीं कि टीआर बालू बाबर के प्यादे मीर कासिम का अधूरा काम पूरा करना चाहते हैं। यह दुष्प्रचार करना कि सेतुसमुद्रम परियोजना राजग के काल में प्रारंभ हुई थी, गलत है। इस परियोजना पर राजग के समय में विचार हो रहा था, किंतु परियोजना की संपूर्ण सर्वेक्षण रपट आने से पूर्व ही राजग सरकार चली गई।

भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण विभाग के पूर्व निदेशक बद्रीनारायण का मानना है कि सेतु प्राकृतिक संरचना नहीं है। बद्रीनारायण के अनुसार राष्ट्रीय समुद्र तकनीकी संस्थान के सहयोग से रामेश्वरम और अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में पंक्तिबध्द दस जगह खुदाई की गई थी। इन सभी जगह ऊपरी 6 मीटर के हिस्से में समुद्री रेत, फिर कोरल्स, सैंड स्टोन और निर्माण में प्रयुक्त बड़े पत्थर मिले। इसके बाद के पांच-पांच मीटर में बिखरी बालू और फिर ठोस संरचना दिखाई दी। बालू के ऊपर मिले पत्थर इस प्रकार के थे जो नदियों या मैदानों में मिलते हैं। बद्रीनारायण के अनुसार वे पत्थर समुद्र निर्मित नहीं हैं। उन्हें यहां किसी प्रयोजन से डाला गया होगा। वाल्मीकि रामायण में लिखा है, 'पर्वतांश्च समुद्रत्पाटय यत्रै: परिवहंति च।' अर्थात बड़े-बड़े पर्वतों-पत्थरों को यंत्रों के द्वारा समुद्रतट पर लाया गया।

वैज्ञानिक शोध पत्रों के अनुसार यहां जो कोरल बने वे 7300 ई. से 5400 ई. के बीच बने। बाहर के पत्थर 5400 ई. से 4000 ई. के आसपास के बताए गए हैं। सन 1803 में प्रकाशित 'ग्लोसरी आफ मद्रास प्रेसिडेंसी' (सीडी मैक्लियान द्वारा संपादित) के अनुसार यह सेतु सन् 1480 तक भारतीय प्रायद्वीप को श्रीलंका से जोड़ता था। इस सेतु से लोग आते-जाते थे, किंतु 1480 में आए भयानक तूफान की वजह से संपर्क टूट गया। यह सेतु 30 मील (48 किमी) लंबा और सवा मील चौड़ा है। इस सेतु के ऊपर 3 से 30 फीट तक जलस्तर है। इतने छिछले जल में भारी जहाज कैसे जाएंगे? जहां रामसेतु का अस्तित्व पर्यावरण और हमारे दक्षिणी तटों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है वहीं वह भारत की ऐतिहासिक आध्यात्मिक पहचान का भी प्रतीक है।

यूनेस्को के 1972 के घोषणापत्र में कहा गया है कि जो मानवनिर्मित नहीं है, प्राकृतिक है और उससे लोगों की आस्था जुड़ी है तो वह धरोहर घोषित किया जा सकता है। पुरातत्व स्थल अस्तित्व अधिनियम 1958 के अनुच्छेद 2 (जे) के अनुसार ऐसी कोई भी जगह या अवशेष, जिसमें ऐतिहासिक, पुरातात्विक महत्व समाविष्ट हो और जो सौ वर्षों से अधिक प्राचीन हो उसे राष्ट्रीय धरोहर मानना चाहिए। वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि की है कि 2004 में आए सुनामी से तूतीकोरिन और दक्षिणी केरल के तटों की सुरक्षा इसी सेतु के कारण हो पाई थी। रामेश्वरम और धनुषकोडि क्षेत्र में थोरियम का विश्व का सबसे बड़ा भंडार है। हाल में अमेरिका के साथ परमाणु संधि कर भारत की संप्रभुता को गिरवी रखने वाली सरकार अमेरिकी दबाव में थोरियम के इस भंडार को भी नष्ट करना चाहती है। हैरत है कि जब समुद्री मार्ग के लिए अन्य सस्ते वैकल्पिक मार्ग भी हो सकते हैं तो भारत को इतनी कीमतें चुकाने की क्या आवश्यकता है?

वर्ष 2010 में कामनवेल्थ गेम्स के लिए नई दिल्ली के सुंदर नगर और लोदी रोड इलाके से होते हुए खेलगांव तक सुरंग मार्ग बनाने की योजना केवल इसलिए खटाई में पड़ गई, क्योंकि उससे कथित तौर पर हुमायूं के मकबरे को क्षति पहुंचती। हकीकत यह है कि मकबरा योजना मार्ग से दूर था और पुरातत्व विभाग ने भी योजना को हरी झंडी दे दी थी, किंतु दिल्ली सरकार ने वोट बैंक के लिए एक मकबरे के कारण इस महत्वूपर्ण योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया। यहां हिंदुओं की आस्था और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक रामसेतु को तोड़ने के लिए कुतर्कों का सहारा लिया जा रहा है। क्यो?

Friday 21 September 2007

क्या अब भी कोरी कल्पना ही है हमारे धर्म ग्रंथों में

लेखक-अमृतांशु कुमार मिश्र

भारत का इतिहास अति प्राचीन है। हमारा इतिहास उस समय से है जब धरती पर लोग पढ़ना लिखना नहीं जानते थे। गाथाओं के माध्यम से हमने अपने इतिहास को जीवित रखा। बाद में रामायण और महाभारत के माध्यम से इतिहास को लिखित साक्ष्य प्रदान करने की कोशिश की गई। लेकिन वर्तमान परिदृष्य में सरकार देश के उस प्राचीन इतिहास को मानने को ही तैयार नहीं है। अजीब संयोग है कि जिस देश में राम और कृष्ण हुए उसी देश में उनके अस्तित्व को नकारा जा रहा है। लेकिन महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने कहा था कि जब भी धर्म की हानि होगी मैं प्रकट होऊंगा। अगर कहा जाए तो भगवान ने साक्ष्यों के रूप में प्रकट भी होना शुरू कर दिया है।

श्री राम सेतु के बारे में सरकार के हलफनामे में सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि राम थे ही नहीं। राम सेतु को नकारने का सबसे अच्छा माध्यम तो यही हो सकता था कि जिसने इसका निर्माण किया उसी के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगा दिया जाए । न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। सरकार ने यही किया। कौन सा राम? कौन सा इतिहास? राम तो पैदा ही नहीं हुए। कोई प्रमाण ही नहीं है। यह वैसा ही तर्क है जैसा कि धरती गोल है पर हम नहीं मानते। दिखाओ तो जानें। अब कोई किसी को एक पूरी पृथ्वी तो दिखा ही नहीं सकता। जो नहीं मानना चाहें उनके लिए तो पृथ्वी चपटी ही होगी।

पिछले कुछ दशकों से जहां एक ओर राम जन्मभूमि बाबरी ढाँचा के बाद श्री राम के अस्तित्व को स्वीकारने वाले भक्तों की संख्या में वृध्दि हुई है वहीं श्री राम के अस्तित्व को नकारने वाले भी अधिक सक्रिय हुए हैं। किसी न किसी प्रकार से उसके अस्तित्व को नकारने की भरपूर कोशिश की जा रही है। लेकिन भगवान ने स्पष्ट कर दिया है कि धर्म की हानि होने पर मैं अवश्य प्रकट होऊंगा। इसलिए जब राम के अस्तित्व को नकारा जाने लगा तो नासा के माध्यम से राम सेतु रूपी साक्ष्य प्रकट हुआ। अब भगवान श्री राम को नहीं मानने वालों के लिए भारी समस्या उत्पन्न हो गई है। अगर कहें कि श्री राम सेतु मानव निर्मित है तो हमारे धर्म ग्रन्थ स्पष्ट करते हैं कि राम सेतु का निर्माण भगवान श्री राम ने किया था। अगर भगवान श्री राम ने इसका निर्माण किया था तो उन्होंने अवश्य ही जन्म लिया था और अगर जन्म लिया था तो कोई जन्मस्थली भी होगी। इन सभी पचड़ों में पड़ने से अच्छा है कि भगवान श्री राम के अस्तित्व को ही क्यों न नकार दिया जाय और इसी रणनीति के तहत राम विरोधी तत्व अपना काम कर रहे हैं। एक बार राम के अस्तित्व को नकार दिया तो फिर आधी विजय तो हो ही गई। राम ही नहीं तो राम जन्म भूमि कैसी?

इसी प्रकार भगवान कृष्ण को भी नकारा जाता रहा है। हालांकि महाभारत में वर्णित स्थानों के नाम अभी भी विद्यमान हैं इसलिए कहा जाता है कि कुछ तो सच है लेकिन अधिक कल्पना ही है। अब हमारे धर्म शास्त्रों में वर्णित राक्षसों के भी प्रमाण प्राप्त होने लगे हैं। भारत के उत्तरी क्षेत्र में खुदाई के समय नेशनल ज्योग्राफिक (भारतीय प्रभाग) को 80 फीट का विशाल नर कंकाल मिला है। यह कोरी कल्पना नहीं है। कंकाल की खोपड़ी 10 फीट से भी बड़ी है। उत्तर के रेगिस्तानी इलाके में एम्प्टी क्षेत्र के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र सेना के नियन्त्रण में है।

खास बात यह है कि इतने बड़े मनुष्य के होने का कहीं कोई प्रमाण अभी तक प्राप्त नहीं हो सका था। इसलिए हमारे धर्म ग्रंथों में वर्णित राक्षसों को हम मात्र कोरी कल्पना ही मानते थे। लेकिन अब इन राक्षसों के भी प्रमाण मिलने लगे हैं जिससे देवताओं के कई बार संघर्ष होने की चर्चा हमारे धर्म ग्रंथों में है। उल्लेखनीय है कि 80 फीट के नरकंकाल के पास से ब्रह्म लिपि में एक शिलालेख भी प्राप्त हुआ है। इसमें लिखा है कि ब्रह्मा ने मनुष्यों में शान्ति स्थापित करने के लिए विशेष आकार के मनुष्यों की रचना की थी। विशेष आकार के मनुष्यों की रचना एक ही बार हुई थी। ये लोग काफी शक्तिशाली होते थे और पेड़ तक को अपनी भुजाओं से उखाड़ सकते थे। लेकिन इन लोगों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और आपस में लड़ने के बाद देवताओं को ही चुनौती देने लगे। अन्त में भगवान शिव ने सभी को मार डाला और उसके बाद ऐसे लोगों की रचना फिर नहीं की गई।

महाभारत में भी भीम बकासुर जैसे इसी प्रकार के एक राक्षस से लड़ा था और उसे पराजित भी किया था। पाण्डु पुत्र भीम ने एक राक्षसी हिडिम्बा से विवाह किया था और उससे एक पुत्र घटोत्कच प्राप्त हुआ था। महाभारत के युध्द में उसने भी हिस्सा लिया था और कर्ण के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुआ था। मरते समय उसने अपना आकार बढ़ाया था और शत्रु सेना यानी कौरव सेना पर गिरा था। उसका आकार इतना बड़ा था कि उसके गिरने से भी कई सैनिक मारे गए थे। इन तथ्यों को कभी भी स्वीकार नहीं किया गया क्योंकि कहीं भी विशालकाय मानव के अस्तित्व का साक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ था। लेकिन अब इस 80 फीट के नरकंकाल ने सिध्द कर दिया है कि भारत में राक्षसों का अस्तित्व था। हालांकि इस क्षेत्र में अभी किसी को जाने नहीं दिया जा रहा और आर्कलाजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया का कहना है कि सरकार से अनुमति प्राप्त होने के बाद ही इसपर कुछ कहा जाएगा। अब देखना है कि सरकार इस मुद्दे पर कौन सी रण्‍ानीति अपनाती है और इस 80 फीट के नर कंकाल को क्या कह कर तथ्यों को छिपाने की कोशिश करती है।

पहले श्री राम सेतु तथा अब मिले 80 फीट के नरकंकाल के बाद अब हमें अपने धार्मिक ग्रंथों को कोरी कल्पना नहीं मानकर उसकी गम्भीरता से पड़ताल करनी चाहिए। तथ्य को स्वीकार करना ही होगा। लेकिन तथ्य को वही स्वीकार करेगा जिसे धार्मिक ग्रंथों पर आस्था हो। जो राम के अस्तित्व को ही नहीं मानते वे रामसेतु को क्या मानेंगे। कहीं ऐसा न हो कि राम सेतु के बाद राम जन्म भूमि और उसके बाद दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों पर ही प्रतिबन्ध लग जाए। जब राम ही नहीं हुए तो कैसी विजया दशमी। श्री राम सेतु ही नहीं तो न राम रावण युध्द हुआ और न ही किसी को विजयश्री प्राप्त हुई। श्री राम लंका गए ही नहीं तो फिर उनके आने पर दिवाली कैसी? श्री राम जन्मे ही नहीं तो राम नवमी क्यों? फिर तो होली और जन्माष्टमी जैसे पर्व भी भारत के इतिहास से खरोच दिए जाएंगे। त्योहारों के इस देश की स्थिति की फिर तो कल्पना ही नहीं की जा सकती।

(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

परमाणु समझौता और राम सेतु विध्वंस-साजिश के जुड़ते सूत्र

-डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

पिछले दिनों भारत और अमेरिका में जो परमाणु समझौता हुआ है उसका देश के भीतर हर स्तर पर विरोध हो रहा है। यदि संसद में सदस्यों की संख्या के आधार पर किसी प्रस्ताव को पारित या खारिज मानना हो तो यह समझौता आसानी से खारिज माना जाएगा क्योंकि साम्यवादी टोला, एनडीए और तीसरा मोर्चा तीनों ही इस समझौते का विरोध कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस साधारण सी गणना के महत्व को सोनिया गांधी न जानती हों क्योंकि यह जोड़ और तकसीम का गणित पांचवीं, छठी कक्षा में ही पढ़ा दिया जाता है इसके लिए एमएससी करने की जरूरत नहीं है। इस बाल गणित को जानते हुए भी सोनिया गांधी का समझौते को लागू करने का हठ इस समझौते के सूत्र कहीं और तलाश करने के लिए विवश कर रहा है।

अब हम रामसेतु की चर्चा करेंगे। ऊपर से देखने पर पूछा जा सकता है कि परमाणु समझौते और रामसेतु को तोड़ने की साजिश का आपस में क्या संबंध हो सकता है? लेकिन गहराई से भीतर झांकने पर दोनों का संबंध अत्यंत स्पष्ट ही नहीं होता बल्कि भारत के भविष्य के लिए चिंता भी पैदा करता है। रामसेतु को तोड़ने के लिए सोनिया गांधी की सरकारी अत्यंत हड़बड़ी में है। वह इसके किसी भी पक्ष पर विचार करने के लिए तैयार नहीं है। जिस प्रकार पिछले कुछ दशकों से श्रीलंका में प्रभाकरण के नेतृत्व में एक समानांतर सरकारी चलाई जा रही है और उस सरकार को चर्च और ईसाई देशों से करोड़ों रुपये का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष अनुदान मिल रहा है। राजीव गांधी ने भारत विरोधी इस गढ़ को ध्वस्त करने का प्रयास किया था। परंतु उन सभी शक्तियों ने मिलकर राजीव गांधी का कत्ल कर दिया। राजीव गांधी हत्याकांड में जिन लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज है उनमें प्रभाकरण का नाम भी आता है। डीएमके की एलटीटीई के साथ क्या सांठगांठ हैं। इसको लेकर तमिलनाडु में ही विद्वान क्यास लगाते रहते हैं। एलटीटीई को सहायता पहुँचाने के लिए जिन समुद्री जहाजों का इस्तेमाल किया जाता है, उनके श्रीलंका की जल सेना द्वारा पकड़े जाने की संभावना बनी रहती है क्योंकि सागर में श्रीलंका के ऊपर से घूमकर ही समुद्री जहाज जा सकते हैं। वैसे एलटीटी ने अब तक थोड़ी बहुत अपनी जलसेना भी विकसित कर ली है। यदि रामसेतु टूट जाता है तो एलटीटीई के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा दूर हो जाएगी। अमेरिका का भी रामसेतु के टूटने में हित है क्योंकि वह पहले ही धमकियाँ दे रहा हैकि श्रीलंका और भारत के बीच का समुद्र अंतर्राष्ट्रीय जल है वह इसे श्रीलंका और भारत के बीच का जल क्षेत्र नहीं मानता। रामसेतु के टूट जाने पर अमेरिका का यह दावा और भी पुख्ता होगा और विदेशी जहाज जिनके मालिक एलटीटी की मदद कर रहे हैं भारत के जल क्षेत्र में स्वछंदता से घूमना शुरू कर देंगे। भारत का समुद्री सीमांत खतरे में पड़ जाएगा। रामसेतु के टूटने से केरलीय तट थोरियम भी नष्ट हो जाएगा। लेकिन प्रश्न यह है कि यह सब जानते बुझते हुए भी सोनिया गांधी सरकार रामसेतु को तोड़ने के लिए वाजिद क्यों है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि राजीव गांधी हत्याकांड में प्रभाकरण का नाम होते हुए भी सोनिया गांधी की सरकार उसके खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं कर रही? इसके साथ ही जिस डीएमके को राजीव गांधी हत्याकांड में सोनिया गांधी स्वयं जिम्मेवार मानती थीं उस डीएम के साथ सोनिया गांधी ने किसके कहने पर समझौता किया है? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि राजीव गांधी हत्याकांड में जिन चार लोगों को फांसी की सजा हुई उनकी सजा क्षमा करवाने के लिए सोनिया गांधी ने क्यों अपील दायर की? इतना ही नहीं एक अभियुक्त को सोनिया गांधी ने राजीव गांधी फाउंडेशन की ओर से छात्रवृत्ति भी प्रदान की। ये सारे सूत्र इस बात की ओर संकेत करते हैं कि एलटीटीई, सोनिया गांधी की सरकार और रामसेतु को तोड़ने का षडयंत्र इन सभी के सूत्र किसी एक स्थान से ही संचालित हो रहे हैं । राजीव गांधी इसमें बाधा बन सकते थे इसलिए उन्हें पहले ही रास्ते से हटा दिया गया। यह अमेरिका का भारत को गोद में लेने का षडयंत्र है।

इस षडयंत्र का दूसरा सूत्र अभी हाल ही में हुए भारत अमेरिका परमाणु समझौते से जा जुड़ता है। रामसेतु को तोड़ना अमेरिका द्वारा भारत के समुद्री सीमांत को घेरना है और परमाणु समझौता उसे सामरिक दृष्टि से पंगु बनाना है। इन दोनों कामों में सोनिया गांधी की सरकार अमेरिका की सबसे बड़ी सहायक सिध्द हो रही है। अमेरिका पिछले अनेक सालों से भारत पर सीटीबीटी और एनपीटी पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डालता रहा है। लेकिन नरसिम्हा सरकार और उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने अमेरिका के इस दबाव के आगे झुकने से इंकार कर दिया। इतना ही नहीं वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में तो परमाणु बम धमाके से अमेरिका का पूरा तंत्र हिल गया था। शायद अमेरिका ने उसी वक्त यह निर्णय ले लिया था कि अब दिल्ली में सोनिया गांधी को स्थापित करने का अवसर आ गया है और उसकी इस साजिश में साम्यवादियों ने स्वेच्छा से या दबाव से शामिल होने की सहमति दी। सोनिया गांधी की सरकार स्थापित करने के उपरांत यह समझौता न होता तो तब हैरानी अवश्य होती। इस समझौते के बाद भारत परमाणु क्षेत्र में अमेरिका का एक प्रकार से उपनिवेश बन जाएगा। इसलिए परमाणु समझौता और रामसेतु का विध्वंस ये दोनों अमेरिका के लंबे हितों की पूर्ति के लिए दो आवश्यक प्रकल्प है जिन्हें जॉर्जबुश और सोनिया गांधी हर हालत में पूरे करने पर अड़ी हुई हैं।

कुछ तथाकथित विशेषज्ञों को यह भ्रम है कि अमेरिका चीन के मुकाबले भारत को मजबूत करना चाहता है। परंतु अमेरिका का इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने लोकतांत्रिक देशों के मुकाबले सदा तानाशाह देशों की सहायता की है। लंबी रणनीति में अमेरिका और चीन स्वभाविक मित्र हो सकते हैं। इसलिए अमेरिका भारत को सोनिया गांधी के माध्यम से अपना उपनिवेश बनाने का प्रयास कर रहा है। रामसेतु विध्वंस और परमाणु संधि इसकी शुरूआत भर है। जाहिर है कि आने वाले लोकसभा चुनावों में अमेरिका की दिलचस्पी बढ़ेगी क्योंकि अमेरिका नहीं चाहेगा कि सोनिया गांधी की सरकार दिल्ली से हट जाए।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

Thursday 20 September 2007

राम को नकारना आपराधिक कृत्य : अरुण जेटली



सेतुसमुद्रम परियोजना के लिए इस सरकार ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अस्तित्व पर ही प्रश्न खड़े कर दिए है। मेरा मानना है कि रामसेतु तोड़ने पर आमादा सरकार ने देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत करने का आपराधिक कृत्य किया है। देश की अस्मिता पर हुए इस प्रहार का जिस तरह विश्व हिन्दू परिषद् व बहुसंख्यक समुदाय ने प्रतिकार किया उससे भयभीत होकर सरकार को पीछे हटना पड़ा।

इस सरकार की कार्यशैली से तो ऐसा लगता है कि जैसे देश में हिन्दू मतदाता हैं ही नहीं। इससे पहले अगर संप्रग सरकार के साढ़े तीन साल के कार्यकाल पर नजर डालें तो संप्रदाय विशेष को तुष्ट करने वाले कदम उसने लगातार और निर्लज्जता के साथ उठाए। पोटा को खत्म करने और आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को आरक्षण के साथ इसकी शुरुआत हुई। बांग्लादेशी घुसपैठियों की मदद करने के लिए आईएमडीटी एक्ट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त करने के बावजूद उसे लागू करने के लिए सरकार ने सारी हदें तोड़ी। बनर्जी आयोग का गठन और फिर सच्चर समिति की विवादित रिपोर्ट।

करोड़ों हिन्दुओं के आराध्य राम के अस्तित्व को नकारना संप्रग सरकार की मानसिकता का सबसे ज्वलंत उदाहरण है। रामसेतु के मुद्दे पर सरकार का रवैया कई कारणों से अवांछनीय है। पहली बात तो आस्था व मान्यताओं पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाए जाते। भारत की संस्कृति में राम ऐसे रचे बसे हैं कि उसके बगैर यहां के समाज की कल्पना ही नहीं की जा सकती, फिर सवाल यह भी उठता है कि दुनिया भर में रामसेतु या एडम ब्रिज जैसा कथित प्राकृतिक निर्माण कहीं और क्यों नहीं हुआ? दूसरा अहम सवाल है कि चार अन्य विकल्प मौजूद हैं, जिससे श्रीलंका तक जहाजों का मार्ग भी बन जाए और रामसेतु को क्षति न पहुंचे। इसके बावजूद सेतु को क्षति पहुंचाने वाला विकल्प ही सरकार ने क्यों चुना? वैसे भी यह परियोजना आर्थिक दृष्टि से भी कोई बहुत अधिक फायदेमंद नहीं है। जाहिर है कि यह सिर्फ सरकार की हिन्दूविरोधी मानसिकता ही है कि आर्थिक रूप से अपरिहार्य नहीं होने के बावजूद इस परियोजना के लिए वह राम को नकारने से भी नहीं घबराती? प्रस्तुति-राजकिशोर

अतीत भंजक कांग्रेस

लेखक राजनाथ्‍ा सिंह सूर्य

राम के अस्तित्व को नकारने वाले शपथपत्र पर तीखी आलोचना झेलने के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार उसे वापस लेने के अपने निर्णय को भले ही क्षतिपूर्ति के रूप में देखे, लेकिन इस प्रकरण से उसे राम की शक्ति और पैठ का अहसास जरूर हो गया होगा। यह हास्यास्पद है कि कांग्रेस ने अपने सहयोगियों सहित न केवल रामधुन छेड़ दी है, बल्कि प्रबंधन पाठ्यक्रम में राम के विचार शामिल करने का निश्चय किया है। संप्रग सरकार हिंदू भावनाओं को आघात पहुंचाने वाले इस घटनाक्रम से यह कहकर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती कि पुरातत्व विभाग के कुछ अधिकारियों की गलती से यह घटना हुई। यह इस बात का द्योतक है कि देश के मान बिंदुओं, आस्था केंद्रों और प्राणवायु के समान जीवनदाता महापुरुषों के बारे में कथित सेकुलर सरकार की सोच कितनी सतही है।

यदि सेकुलर सोच और संदर्भ में सरकार की आदत की समीक्षा की जाए तो यही कहा जा सकता है कि भारतीय अतीत के प्रति पाश्चात्य शोधकर्ताओं ने जो कुत्सित विचार प्रकट किए हैं उनका इस सरकार पर पूरा प्रभाव है, अन्यथा कोई कारण नहीं था कि शपथपत्र में राम के अस्तित्व को नकारने वाला अंश शामिल किया जाता। यह अंश शामिल करना उस सोच का ही विस्तार है जिसे इसी महीने के प्रारंभ में लखनऊ में बिना प्रसंग के वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने यह कहकर प्रगट किया था कि जिन पुस्तकों में लिखा है कि भारत कभी सोने की चिड़िया था या यहां दूध-दही की नदियां बहती थीं उन्हे फाड़कर फेंक देना चाहिए। हिंदू हित विरोधी सेकुलर सोच के और भी बहुत से प्रसंग हैं। जो शपथपत्र सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल किया गया उसे सांस्कृतिक मंत्रालय के अधीन पुरातत्व विभाग ने तैयार किया था और न्यायालय में कोई भी शपथपत्र बिना कानून मंत्रालय की समीक्षा के दाखिल नहीं किया जाता। दोनों ही मंत्रालयों के मंत्री कांग्रेसी है और उनकी पहचान सोनिया गांधी के करीबी लोगों के रूप में है। विचित्र है कि शपथपत्र मामले में अब कांग्रेस के मंत्रियों में ही घमासान आरंभ हो गया है। वास्तव में राम के अस्तित्व को नकारने से हिंदू समाज में जो नाराजगी पैदा हुई उसने आम कांग्रेसियों के मन में आगामी चुनाव में 1977 की हार की पुनरावृत्ति होने का भय भर दिया है। शपथपत्र दाखिल करने के दूसरे ही दिन एक लेख में डा. कर्ण सिंह ने इस ओर इशारा भी कियाब्‍ रामसेतु आम आदमी की आस्था के सम्मान के लिए कांग्रेस को विवश करने का कारण बना है, लेकिन इस कदम को एडवांटेज सोनिया गांधी के रूप व्याख्यायित करने का प्रयास क्या कांग्रेस को वांछित सफलता दिला सकेगा।

यदि शपथपत्र की वापसी एडवांटेज सोनिया गांधी है तो फिर नुकसान में कौन है। क्या संप्रग सरकार जिसकी ओर से यह शपथपत्र दाखिल किया गया था या फिर एक ब्यूरोक्रेट की तरह आचरण कर रहे प्रधानमंत्री, जो हर ऐसे विवाद के बाद मौन हो जाते है। राम हमारे रोम-रोम में बसे है। यह बात अमेरिका यूरोप या रोम वाले भले न समझें, लेकिन प्रत्येक भारतीय समझता है। यही कारण है कि महात्मा गांधी ने रामराज्य को आदर्श और रामधुन को प्रेरणा का स्त्रोत माना था। कांग्रेस गांधी के रामराज्य और रामधुन के महत्व को वर्षो पहले भुला चुकी है। इसीलिए इस प्रकरण में चारों खाने चित्त हो जाने के उपरांत उसने शपथपत्र वापसी के लिए सोनिया गांधी को श्रेय देने का राग छेड़ दिया। यह प्रचारित किया जा रहा है कि राम के अस्तित्व को नकारने वाला शपथपत्र अदालत में प्रस्तुत होने से सोनिया गांधी बहुत नाराज है और उन्होंने तुरंत गलती सुधारने के निर्देश दिए। कुछ कांग्रेसी इस प्रचार में जुट गए हैं कि शपथपत्र वापस लेकर कांग्रेस ने भाजपा से पहल छीन ली है। देश की किसी समस्या का आकलन क्या इस प्रकार पहल छीन लेने के आधार पर किया जाना सम्यक सोच कही जा सकती है। जो सरकार स्वतंत्रता संग्राम के महारथी वीर सावरकर के गौरव को अंडमान के सेलुलर जेल से उखाड़ फेंक चुकी है,जो पाठ्य पुस्तकों को मैकाले की इस अवधारणा के आधार पर तैयार कर चुकी है कि वेद चरवाहों के गीत भर हैं जो भगवान राम का मखौल उड़ाने वाली संस्थाओं को अयोध्या में प्रदर्शनी लगाने के लिए अनुदान देती है, जिसने देश की 85 प्रतिशत आबादी की परवाह किए बिना देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का बता दिया है, जिसने आजादी के बाद भारत विभाजन करने वाली मुस्लिम लीग को अपने मंत्रिमंडल में जगह दी वह सेतु समुद्रम परियोजना का उद्घाटन करने के बाद यदि पीछे हटी है तो उसका कारण राम की शक्ति है। भारत के अतीत के प्रति उस कांग्रेस से आस्थावान होने की कैसे अपेक्षा की जा सकती है जो खुद अपने ही निकट के अतीत के प्रति आस्थावान नहीं रही है।

कांग्रेस किसी आदर्श का प्रतीक नहीं रह गई है। उसे तो कांग्रेस में भी विश्वास नहीं रहा। राजीव गांधी हत्याकांड की जांच के लिए गठित जैन आयोग ने इस मामले में द्रमुक की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाया था। उस समय कांग्रेस के समर्थन से इंद्रकुमार गुजराल सरकार केंद्र में थी, जिसमें द्रमुक के मंत्री भी शामिल थे। कांग्रेस ने उनको निकाल देने का फरमान जारी किया और न मानने पर गुजराल सरकार गिरा दी। आज वही द्रमुक न केवल केंद्र में कांग्रेस के साथ है, बल्कि अपने मनमाफिक विभाग पर कब्जा भी किए हुए है। जहाजरानी विभाग भी उसमें एक है, क्योंकि सेतु समुद्रम परियोजना इसी विभाग की देखरेख में पूरी की जानी है। द्रमुक के टीआर बालू गुजराल सरकार में भी इसी विभाग के मंत्री थे और आज भी है। सेतु समुद्रम डीएमके की साख से जुड़ी परियोजना है, इसीलिए अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में भी इसका परीक्षण कराया गया था। समीक्षा समिति ने छह मार्ग सुझाए थे जिनमें वे मार्ग भी शामिल थे जिनसे रामसेतु को कोई हानि नहीं पहुंचती। किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के पूर्व सरकार चली गई।

सेतु समुद्रम परियोजना के संदर्भ में भाजपा क्या जवाब देगी या दे रही है, यह भाजपा को सोचना है, लेकिन देश की जनता को सोचने का मुद्दा तो शपथपत्र से मिल ही गया। जनता की जरा सी नाराजगी से संप्रग सरकार यदि बैकफुट पर आ गई है तो उसकी हुंकार मात्र का क्या परिणाम हो सकता है, यह समझने की आवश्यकता है। कांग्रेस वोट बैंक खिसकने के डर से चिंतित है। इसी के वशीभूत होकर इंदिरा गांधी ने 1983 में रामजन्मभूमि का ताला खोलने की पहल की थी। आश्चर्य नहीं होगा यदि तीन महीने बाद सर्वोच्च न्यायालय में जो शपथ पत्र दाखिल किया जाए उसमें सेतु समुद्रम परियोजना को कुछ और समय के लिए लंबित कर दिया जाए, क्योंकि तब भी लोकसभा के चुनाव शेष रहेंगे। नि:संदेह इस घटना ने जनता को उसकी शक्ति का संज्ञान कराने का काम किया है। आजादी के बाद से सेकुलरिज्म के नाम पर उन आस्थाओं पर निरंतर प्रहार हो रहा है जिनके सहारे हमारे समाज ने कभी अपनी हस्ती पर आंच नहीं आने दी। सहिष्णुता के नाम पर आघात पर आघात सहते रहने के अभ्यास को अब विराम देने का समय आ गया है।

Wednesday 19 September 2007

तो हटा दो गांधी जी की समाधि से 'हे राम!' - तोगड़िया

-डा. प्रवीण भाई तोगड़िया, अन्तरराष्ट्रीय महामंत्री, विश्व हिन्दू परिषद

'अगर राम थे ही नहीं तो महात्मा गांधी की समाधि पर अंकित 'हे राम!' हटा दो। माकपा के महासचिव येचुरी अपने नाम से 'सीताराम' हटा दें।' विश्व हिन्दू परिषद् के अन्तरराष्ट्रीय महामंत्री डा. प्रवीण भाई तोगड़िया ने केन्द्र सरकार के शपथ पत्र पर क्रुध्द होते हुए यह कहा।

उन्होंने कहा कि शपथ पत्र दाखिल होने के एक दिन बाद ही देश के 5 हजार से अधिक स्थानों पर चक्का जाम से भयभीत होकर ही केन्द्र सरकार ने वह शपथ पत्र वापस लिया है। 12 सितम्बर को देशव्यापी चक्का जाम के बाद सांयकाल नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में डा. तोगड़िया ने बताया कि पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रात: 8 बजे से 11 बजे तक ही चक्का जाम रखा गया। चूंकि रामसेतु को तोड़ने का हम विरोध कर रहे हैं इसलिए नगरों के प्रमुख सेतुओं को ही प्रदर्शन के लिए चुना गया था। इसके साथ ही प्रमुख राजमार्गों पर भी चक्का जाम किया गया। देश में 4716 स्थानों पर प्रमुख रूप से चक्का जाम किया गया। कुल मिलाकर 3 हजार स्थानों पर बड़े प्रदर्शन हुए। 626 राष्ट्रीय राजमार्गों को यातायात के लिए बंद कर दिया गया। कुल मिलाकर 9 लाख 53 हजार 61 कार्यकर्ताओं ने इसमें भाग लिया। यह पूरा आंदोलन शांतिपूर्ण रहा। हमने चिकित्सा वाहन (एम्बुलेंस), अग्निशमन वाहन और पुलिस के वाहनों को 'चक्का जाम' से मुक्त रखा था, इस निर्देश का कार्यकर्ताओं ने कड़ाई से पालन किया। कहीं भी कार्यकर्ताओं ने उग्र प्रदर्शन नहीं किया बल्कि पुलिस द्वारा बल प्रयोग करने पर वे जमीन पर बैठकर, लेटकर केवल राम नाम संकीर्तन करते रहे। कुल मिलाकर एक लाख से अधिक कार्यकर्ताओं को इस दौरान गिरफ्तार किया गया। तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश और नागपुर को छोड़कर बाकी स्थानों पर कार्यकर्ताओं को 12 बजे के बाद ही छोड़ दिया गया था।

डा. तोगड़िया ने कहा कि यह हमारा शांतिपूर्ण आंदोलन था। पर केन्द्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में शपथ पत्र दाखिल कर हिन्दू समाज का जो उपहास किया है, वह उत्तेजित करने वाला है। इस कारण भविष्य में प्रदर्शन उग्रतर होते जाएंगे और इसकी जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की होगी। उन्होंने कहा कि जो लोग हिन्दुओं के आराध्य श्रीराम के अस्तित्व के बारे में प्रमाण मांग रहे हैं वे पहले इस्लाम और ईसाईयत के पैगम्बरों के बारे में प्रमाण प्रस्तुत करें। दरअसल यह सरकार चुनाव नजदीक देख वोट बैंक की राजनीति के कारण राम और रामसेतु के अस्तित्व को नकार रही है। इसलिए आंदोलन के अगले चरण में 27 सितम्बर से 15 अक्तूबर तक प्रत्येक गांव और शहर के प्रत्येक मोहल्लों में रामायण और श्री रामेश्वरम् मंदिर की पूजा का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। डा. तोगड़िया ने कहा कि रामसेतु की रक्षा का विषय श्रध्दा के साथ विकास से भी जुड़ा है। इस सेतु के टूटने से 4 लाख मछुआरे बेरोजगार हो जाएंगे, 4 लाख से अधिक समुद्री जीव मारे जाएंगे, भविष्य की बिजली के स्रोत थोरियम का भंडार नष्ट हो जाएगा, सुनामी से नुकसान का खतरा बढ़ जाएगा। इसके बावजूद केन्द्र सरकार आंख मूंदकर अमरीका के दिखाए रास्ते पर चल रही है। दरअसल परमाणु संधि और रामसेतु का ध्वंस कहीं न कहीं आपस में जुड़े हैं। अमरीका नहीं चाहता कि भारत के पास थोरियम का भंडार रहे। इसका प्रमाण यह भी है कि तमिलनाडु के समुद्र तटों से थोरियम युक्त रेत की चोरी करके अमरीका भेजने वाले गिरफ्तार हुए हैं। डा. तोगड़िया ने कहा कि किसी अन्य मजहब के लोग भी हमारे इस आंदोलन के विरोधी नहीं हैं, बल्कि तमिलनाडु के मुस्लिम और ईसाई मछुआरे भी हमारे साथ है। हम इस आंदोलन का राजनीतिकरण कतई नहीं होने देंगे। प्रस्तुति: जितेन्द्र तिवारी

Tuesday 18 September 2007

रामसेतु रक्षा-हिन्दू अस्मिता रक्षा

-नरेन्द्र कोहली
रामसेतु एवं सर्वोच्च न्यायालय में सरकार के शपथपत्र पर टिप्पणी करते हुए सुप्रसिध्द साहित्यकार एवं रामकथा के आधुनिक रचयिता श्री नरेन्द्र कोहली ने नाथद्वारा प्रवास से पाञ्चजन्य से बातचीत करते हुए कहा कि पूरे परिदृश्य में देश की जनता को चाहिए कि वह ऐसी जागृति पैदा करे जिसकी आंच सरकार तक पहुंचे। अभी तक वह आंच दिखती नहीं है। लंदन में एक अभिनेत्री दो आंसू टपकाती है तो सारा मीडिया पागल हो जाता है, लेकिन यहां रामसेतु टूट रहा है किन्तु जिस परिमाण में देश को जागना चाहिए वह अभी बाकी है। अब केवल शांति के मार्ग से काम नहीं चलेगा। हमें आक्रामक होकर अपनी बात सामने रखनी होगी। सरकार का रवैया ऐसा ही है जैसे कोई पुलिस किसी हत्यारे को बचाने के लिए कहे कि उसके पास कोई प्रमाण नहीं है। जब वह प्रमाण इकट्ठा ही नहीं करेगी तो प्रस्तुत क्या करेगी? अब कोई पूछे कि ताजमहल में जो कब्र है उसमें मुमताज महल ही दफन है, इसका क्या प्रमाण है? तो संस्कृति मंत्रालय और पुरातत्व विभाग क्या जवाब देंगे? पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग का काम है कि वह इतिहास खोजे, लिखे और देश का गौरव बढ़ाए। पर ऐसा लगता है कि उस पर विदेशी विधर्मी पैसा हावी है। यह सरकार के मन में बैठा हिन्दू द्वेष है जो उन्हें प्रेरित कर रहा है। उसे हिन्दुओं से भय नहीं है। इसलिए हिन्दुओं का मन दुखे तो दुखे उसे परवाह नहीं। कल को सरकार कह सकती है कि कैलास पर्वत शिव का धाम है, इसका क्या प्रमाण है? ऐसे तत्व हिन्दू-द्रोही ही नहीं, देश-द्रोही भी हैं। वे हिन्दू करदाताओं के पैसे से वेतन पाते हैं और हिन्दुओं की आस्था पर ही प्रश्न चिन्ह खड़े करते हैं।

यह् पूछे जाने पर, कि क्या कारण है कि बाकी साहित्यकार एवं पत्रकार ऐसे मामलों पर चुप रहते हैं, उन्होंने कहा कि हमारे देश में ऐसा परिवेश बना दिया गया है कि कोई यदि राष्ट्र की बात करे तो उसे पिछड़ा हुआ या गुनहगार जैसा बना दिया जाता है। सबको अपनी व्यक्तिगत छवि की चिंता है। सब साफ-सुथरे दिखना चाहते हैं। हिन्दू की बात करने में ही उन्हें डर लगता है कि उन्हें साम्प्रदायिक-कम्युनल कह दिया जाएगा। मैं तो कहता हूं देश में दो ही वर्ग हैं-एक कम्युनल, दूसरे क्रिमिनल। हम कम्युनल हैं क्योंकि हिन्दू-हित यानी राष्ट्रहित की बात करते हैं। अगर देश में सच्चा सेकुलरिज्म हो तो मैं सबसे पहले उसमें शामिल होऊंगा। मैं हिन्दू द्वेष को सेकुलरिज्म नहीं मान सकता। ऐसे लोग समाज का प्रतिनिधित्व करने के लायक नहीं हैं। इनका हर तरीके से विरोध होना चाहिए-कलम से विरोध करो, आवाज उठाकर विरोध करो और जरूरत पड़े तो हाथ उठाने में भी मत हिचकिचाओ।

सिर्फ हिन्दुओं से ही आस्था के प्रमाण क्यों मांगे जाते हैं?

-सुषमा स्वराज, सांसद (राज्य सभा), भाजपा

श्रीराम सेतु के संदर्भ मं संसद में आवाज गुंजाने वाली प्रखर भाजपा नेता श्रीमती सुषमा स्वराज को गत 13 सितम्बर को 2004 के लिए सर्वश्रेष्ठ सांसद का सम्मान मिला। परन्तु वे अपनी श्रेष्ठता के सम्मान के बाद भी रामसेतु प्रकरण के कारण क्रुध्द थीं। उन्होंने पाञ्चजन्य से एक बातचीत में कहा कि सिर्फ हिन्दुओं से ही उनकी आस्था के प्रमाण क्यों मांगे जाते हैं? क्या हमारी आस्था प्रमाणपत्रों के आधार पर टिकी है? हिन्दुओं को भी केवल इतना ही कहना चाहिए कि रामसेतु हमारी आस्था है, हमारा विश्वास है और इसके लिए किसी को हमसे कोई प्रमाण मांगने का हक नहीं है। यह वह देश है जहां के हर अंचल में रहने वाली महिला वह गीत गाती है कि देखो, पति-पत्नी के बीच कितनी गाढ़ी प्रीति है कि हमारे राम जी समुद्र पर सेतु बांधकर अपनी पत्नी को वापस लाए। मैं तो कहती हूं कि रामसेतु के लिए भारत की महिलाएं ही इकट्ठा होकर बड़ी से बड़ी कुर्बानी देते हुए उसे बचा लेंगी- पुरुषों को एक तरफ बैठे रहने दिया जाए तो भी।

श्रीमती सुषमा स्वराज ने कहा कि मू-ए-मुकद्दस (हजरत बल) के खो जाने पर जब कहा गया कि वह हर हाल में खोजा जाना है क्योंकि वह हमारे पैगम्बर साहब की छाती का बाल है, तो किसी ने उनसे यह नहीं कहा कि इसका प्रमाण दो। हिन्दुओं ने उनकी भावना का साथ दिया। इसी प्रकार जब ईसाई वर्जिन मेरी के सुपुत्र जीसस को सर्वोच्च आदर देते हैं तो कोई यह नहीं कहता कि यह तो संभव ही नहीं है। क्योंकि आस्था और विश्वास पर कोई प्रश्न खड़ा नहीं कर सकता। संसद में भी हमने यह विषय उठाते हुए कहा था कि अखबारों में समाचार छपा कि केवल 15 पेड़ों को काटने से बचाने के लिए मेट्रो का रास्ता बदला गया है तो क्या करोड़ों हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक रामसेतु उन 15 पेड़ों से भी गया-गुजरा हो गया?

श्रीमती स्वराज ने कहा कि उन्होंने संसद में आवाज उठाई है कि इस मामले में प्रधानमंत्री हस्तक्षेप करें और अगर सम्बंधित मंत्री रामसेतु विध्वंस नहीं रोकते तो उन्हें मंत्रिमण्डल से बर्खास्त करें।

Saturday 15 September 2007

साहित्य और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : प्रो. चमनलाल गुप्त

हिंदी साहित्य चिंतन की परंपरा भारतीय चिंतन परंपरा का ही अंश है जो अत्यधिक समृध्द और प्राचीन है। भारत जैसी अविच्छिन्न साहित्यिक परंपरा कम ही राष्ट्रों के पास है। भारत के सांस्कृतिक प्रवाह से निरंतर पुष्ट होती हुई साहित्यधारा कभी विरल तो कभी विशाल नदी का रूप धारण कर भारतीय जनमानस को आप्लावित करती रही है। भारतीय संस्कृति प्राचीन, निरंतर प्रवाहशील, नित-नवीन और फिर भी सनातन रूप से विद्यमान रहनेवाली अद्भुत संस्कृति है। इस संस्कृति का बाह्य रूप स्थान समय और युगीन संदर्भों में बदलता रहा है, अपने को युगानुकूल एवं ग्राह्य बनाता रहा है। यही कारण है कि प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक प्रवाह ऊपर से बदलता रहा परंतु भीतर से वह शांत सुस्थिर रहा, अपने स्वरूप को बनाए रहा।

साहित्य और संस्कृति के विकास की दिशा और खोज का विषय एक ही है। साहित्य एक स्तर पर मनुष्य के ऐन्द्रिय बोध को संस्कारित एवं परिष्कृत करता है। उसे शब्द के भीतर छुपे सूक्ष्म भाव और अर्थ से ही परिचित नहीं करवाता, उसकी नाद शक्ति से आंदोलित भी करता है। साहित्य, भाषापरक अभिव्यक्ति है परंतु वह भाषेतर सूक्ष्म भावों और विचारों को व्यंजित करता है। संस्कृत साहित्य के महान विद्वान प्रोफेसर सिलवां लेवी ने भारत वर्ष की संपूर्ण चिंतन धारा को एक शब्द में समेटते हुए कहा है कि संपूर्ण साहित्य साधना का लक्ष्य है 'रस' की प्राप्ति। 'रस' जो शब्द और अर्थ के 'साहित्य' अर्थात् साथ-साथ रहने के भाव से जुड़ा है परंतु जिसे कहा नहीं जा सकता, अनुमित नहीं किया जा सकता, जो लक्षित भी नहीं होता बल्कि व्यंग्य होता है और समान हृदय वाले, अनुभवी सहृदय द्वारा ही ग्रहीत होता है। धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में जिसे सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म कहा गया उसे ही साहित्य में रस कहकर उसकी प्रकृति 'ब्रह्मानंद सहोदर' स्वीकार की गई। मैक्समूलर ने भारतीय अध्यात्म साधना का लक्ष्य सच्चिदानंद स्वरूप परब्रह्म की प्राप्ति मानते हुए उसे सांसारिकता से परे अतीत अथवा वियाण्ड (Beyond) की खोज माना है। साहित्य और संस्कृति दोनों ही मनुष्य को जड़ से मुक्त कर चेतन की ओर ले जाते हैं, उसकी सुप्त चेतना को जागृत कर परम तत्व की ओर अग्रसर करते हैं। साहित्य और संस्कृति मनुष्य को बेहतर मनुष्य और बेहतर मनुष्य को देवत्व प्रदान करने का साधन है।

साहित्य और संस्कृति दोनों का संबंध किसी एक समाज से रहता है जो किसी भूखंड विशेष पर स्थिर रहता है। देश, देश में रहने वाले जन और उस जन के सामाजिक, आर्थिक जीवन से संस्कृति का स्वरूप निर्मित होता है। देश एक भौगोलिक इकाई है जिसका निर्माण प्राकृतिक तत्वों से होता है। पर्वत, नदियां, मरुस्थल अथवा घने वन आदि इसके निर्णायक होते हैं। राज्य एक प्रशासनिक इकाई है। एक देश में अनेक राज्यों का निर्माण्ा हो सकता है, होता है। देश के लिए भौगोलिक एकता और राज्य के लिए राजनीतिक, प्रशासनिक एकता अनिवार्य तत्व है। राष्ट्र इन दोनों की अपेक्षा अधिक व्यापक और सूक्ष्म इकाई है जिसका आधार सांस्कृतिक अथवा भू-सांस्कृतिक हुआ करता है। किसी विशेष भूखंड पर रहने वाले लोग अपने लौकिक और परलौकिक सुख और समृध्दि के लिए, जीवन यापन और मुक्ति साधना के लिए जो जीवन पध्दति, मूल्य चेतना, सौंदर्य बोध और चिंतन-मनन की प्रणालियां विकसित करते हैं वे ही उसकी संस्कृति के वाहक और परिचायक कहे जा सकते हैं। देश एक स्थूल एवं दृश्य इकाई है, राज्य एक प्रशासनिक परिकल्पना है, परंतु फिर भी उसकी निश्चित सीमाएं रहती हैं। राज्य, देश की अपेक्षा सूक्ष्म इकाई है। राष्ट्र, देश और राज्य की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म एवं भावात्मक इकाई है। जिसका आधार मूलत: जन की सौंदर्य बोधात्म, भावात्म एवं वैचारिक एकता है जिसे संक्षेप में सांस्कृतिक एकता कह सकते हैं।

आज भी सुनने को मिल जाता है कि भारत राष्ट्र का निर्माण 1947 में हुआ था फिर हम राष्ट्र नहीं हैं बल्कि राष्ट्र बनने जा रहे हैं। (we are a nation in the making) यदि हम आजादी से पहले राष्ट्र नहीं थे तो क्या थे?

पश्चिम में राष्ट्र राज्य की कल्पना की गई और राजनीतिक इकाई राज्य को ही राष्ट्र का पर्याय मान लिया गया। 'संयुक्त राष्ट्र संघ' मूलत: 'संयुक्त राज्य संघ' है जिसमें संप्रभुता संपन्न अथवा स्वायत्ताशासी राज्य, सदस्यता ग्रहण कर सकते हैं। एक सोवियत रूस, राष्ट्र के रूप में उसका सदस्य था। सोवियत रूस के अनेक टुकड़े होकर स्वतंत्र राज्य बन गए और आज उनमें से अधिकतर संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य बनकर राष्ट्र कहलाते हैं। इंडोनेशिया से तैमूर टूट कर नया राष्ट्र बन गया है। राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं हो सकता। भारत सदा से ही राजनीतिक रूप से बंटा रहा परंतु सांस्कृतिक दृष्टि से इसमें एकता रही है। सांस्कृतिक एकता ही युगों से हमारी एकता का आधार रही है। भारत एक राजनीतिक इकाई के रूप में मनु, रघु, राम, युधिष्ठिर, अशोक अथवा विक्रमादित्य जैसे कुछ एक चक्रवर्ती शासकों के काल में भले ही एक रहा हो परंतु अधिकांश समय अनेक गणों, राज्यों अथवा सियासतों में बंटा रहा जो आपस में प्राय: लड़ते-भिड़ते भी रहते थे। इस देश का साधारण जन सदा ही राजनीतिक सीमाओं के पार सोचता था क्योंकि उसके लिए संस्कृति ही राष्ट्र का आधार थी। किसी भी पुण्य कार्य के लिए शुध्द जल की प्राप्ति देश की सातों प्रमुख नदियों के जल को मिलाकर ही होती थी और वह गाता था -

'गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती
नर्मदे सिंधु कावेरि जलेस्मिन सन्निधिं कुरू'॥

इसी प्रकार सात मोक्षदायक पुरियां, द्वादश ज्योतिर्लिंग, बावन शक्ति पीठ, चारधाम, चार महाकुंभ क्षेत्र, रामायण, महाभारत, श्रीमदभगवत जैसे ग्रंथ आदि हमारी एकता के मूलाधार थे। भारत की एकता और अखंडता का आधार सांस्कृतिक एकता रही है इसलिए यह स्वाभाविक है कि भारतीय राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की संज्ञा दी जाए। हिंदुओं के लिए चारों धामों की यात्रा अर्थात् भारत भूमि की भारत माता की परिक्रमा पुण्यदायी और मोक्ष देने वाली मानी गई। यही हमारी राष्ट्रभक्ति है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विरोध छद्म धर्म निपरेक्षवादी और भौतिकवादी-साम्यवादी अपने-अपने कारणों अथवा स्वार्थों से करते हैं। भारत के सांस्कृतिक स्वरूप को समझने के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय संस्कृति निरंतर विकसनशील, बहुलवादी, उदार, विभिन्न मतों, पंथों, धर्मों, पूजा-पध्दतियों, जीवन-शैलियों, विचारधाराओं और आस्थाओं और विश्वासों को अपने में समेट कर चलने में समर्थ रही है। ऋग्वेद में कहा गया 'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति' अर्थात् परमसत्ता एक ही है जिसे विद्वान विभिन्न नामों से पुकारते हैं। यही एकमात्र ऐसी संस्कृति है जो विभिन्न धर्मों को एक ही सत्य तक पहुंचने का मार्ग घोषित करती रही है। इसी संस्कृति में कहा गया 'अपनी भिन्न-भिन्न रूचि के अनुसार सीधे या टेढ़े मार्ग पर श्रध्दापूर्वक चले हुए सभी साधक, हे प्रभु, तुम तक उसी प्रकार पहुंचेंगे, जिस प्रकार उत्तार, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम किसी भी दिशा की ओर बहने वाली नदियां समुद्र तक पहुंच जाती हैं।' (शिवमहिम्नस्तोत्र) संत विनोबा भावे ने इसीलिए भारतीय संस्कृति को 'भी वाद' कहा था क्योंकि इसमें अपने मत के साथ दूसरों के मतों को भी स्वीकृति है। सभी धर्म और संस्कृतियां उनकी नजर में 'ही वाद' से ग्रस्त हैं अर्थात् वे अपने मार्ग के सिवा अन्य सभी मार्गों को व्यर्थ और गलत मानती हैं। जब कुछ धर्मनिरपेक्षवादी भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विकास से अन्य पंथों, धर्मों अथवा संस्कृतियों के विनाश की आशंका जताते हैं तो वे भूल जाते हैं कि भारतीय संस्कृति के साथ-साथ इन सबका अस्तित्व इसी धरती पर सदियों से बना रहा है, बना रहेगा। भारतीय संस्कृति सहिष्णु भी है और गुणों को स्वीकारने वाली सारग्राही भी यही इसकी दीर्घजीविता का रहस्य भी है। साम्यवादी विचारक अपने भौतिकवादी दुराग्रहों के कारण संस्कृति के आदर्शपरक, आध्यात्मिक मूल्यों को अस्वीकार करते हुए भारतीय सांस्कृतिक चेतना को संकीर्ण सांप्रदायिक कहकर नकार देते हैं। भारत को वे राष्ट्र ही नहीं मानते। उनकी दृष्टि में संस्कृति सामाजिक-आर्थिक मूल से उपजी बाह्य रचना है जिसका जीवन मूलभूत भौतिक ढांचे अर्थात् उत्पादन के साधन और उत्पादन के संबंधों पर निर्भर करता है। भारतीय धर्म साधना उनके लिए आदिम युग की अज्ञता है और भारतीय सांस्कृतिक चिंतन का आध्यात्मिक अंश उन्हें निरर्थक प्रतीत होता है। जिस समाजवादी, भौतिकवादी संस्कृति पर वे गर्व करते थे उसके खंडहर पूरे पूर्वी युरोप और टूटे-बिखरे सोवियत गणराज्य में वे देख कर भी नहीं देख पा रहे। उनकी शुध्द भौतिकतावादी तथा कथित विज्ञान परक संस्कृति दो सौ वर्ष में ही भरभरा कर गिर पड़ी जबकि भारतीय संस्कृति सदियों से अपने स्वरूप को अक्षुण्ण रखते हुए और अपने बाहरी रूप को समय, स्थान और परिस्थिति के अनुरूप बदलते हुए आगे बढ़ती रही है। परम तत्व की खोज और उस सच्चिदानंद स्वरूप तक पहुंचने की ललक भारतीय संस्कृति के ऐन्द्रिय बोध को सूक्ष्म सौंदर्यबोध में बदलती रही, भावबोध को उदार विश्व-बंधुत्व का गीत सुनाती रही और बौध्दिक चिंतन-मनन को षडदर्शन और ज्ञान-विज्ञान की ऊंचाइयों से भी आगे ब्रह्मांड की सूक्ष्म एकता में बांधती रही। भारतीय धर्म-साधना मानववाद की साधना है जो मनुष्य को श्रेष्ठ मनुष्य बनाकर परम तत्व तक पहुंचाने का साधन बनती है, भारतीय सांस्कृतिक चिंतन, मनुष्य मात्र के उत्थान का चिंतन है। इसमें सांप्रदायिकता के लिए कोई स्थान हो ही नहीं सकता। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का विरोधी एक तीसरा वर्ग भी है जो पश्चिम की चिंतन परंपरा से अभिभूत है। पश्चिमी राजनीतिक चिंतन में राष्ट्र-राज्य' की परिकल्पना फलीभूत हुई इसलिए राष्ट्र एक राजनीतिक इकाई ही माना गया। हिटलर, मुसोलिनी जैसे राष्ट्रवादी नायकों के उभरने से राजनीतिक राष्ट्रवाद का विस्तारवादी, फासीवादी चेहरा सामने आया। पश्चिम में राष्ट्रवाद युध्द और हिंसा के साथ-साथ कट्टरवाद का पर्याय बन गया। 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' में ये लोग सांस्कृतिक कट्टरवाद अथवा आधिपत्य जमाने की लालसा देखते हैं और इसका विरोध करते हैं। भारतीय सांस्कृतिक चेतना जिन उदार मानवीय और सार्वभौम तत्वों से निर्मित हुई है उसमें सार्वभौमिक आकर्षण मौजूद है परंतु भारतीय संस्कृति का अतीत साक्षी है कि इसका प्रचार कही भी, कभी भी आग और तलवार के बल पर नहीं किया गया।

भारतीय साहित्य अपने सांस्कृतिक मूलाधार का ऋणी रहा है। 'हिंदी साहित्य की भूमिका' पुस्तक में पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य पर प्राचीन संस्कृत साहित्य के प्रभाव को रेखांकित करते हुए महाभारत और रामायण को असंख्य महाकाव्यों, उपन्यासों, नाटकों, कहानियों का प्रेरक सिध्द किया है। रामायण और महाभारत तो निश्चय ही संपूर्ण भरतीय वांगमय के उपजीव्य ग्रंथ रहे हैं। बौध्द, जैन साहित्य जो पालि, प्राकृत, अपभ्रंश अथवा अन्य देशज् भाषाओं में रचा गया हमारी सांस्कृतिक चेतना का अंग है। हम जाने अनजाने में बुध्द के मध्यम मार्ग के अनुयायी हैं और उसकी करुणा हमारे रक्त में प्रवाहित है। जैनों की अहिंसा संस्कार बन हमारे जीवन को पोषित करती है। साहित्य में जैन और बौध्द साहित्य विद्रोह और विरोध का साहित्य है, परंतु उसे भी भारतीय संस्कृति ने आदर पूर्वक स्वीकार किया है। भगवान बुध्द और वृषभ हमारे यहां विष्णु के अवतार स्वीकार कर लिए गए। सांस्कृतिक दृष्टि से भारत की विशिष्टता यही है कि भारतीय संस्कृति ने यहां पर विजेता बनकर आई जातियों को भी आत्मसात कर लिया और उनकी संस्कृति के सकारात्मक, जीवंत तत्वों को अपने में समेट लिया।

भारत में इस्लाम का प्रवेश एक महत्वपूर्ण घटना है। इससे पूर्व जो आक्रांता आए वे इतने संगठित और सुसंस्कृत न थे कि भारत की समृध्द परंपराओं को चुनौती दे सकते। इस्लाम नवीन चिंतन और समाज-दृष्टि से संपन्न सांस्कृतिक दृष्टि लेकर आया। इस्लाम के आने पर भारतीय संस्कृति को एक नए प्रकार की चुनौती का सामना करना पड़ा। हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में 'संक्षेप में चुनौती का स्वरूप सामाजिक अधिक था, धार्मिक और दार्शनिक कम।' कई कारणों से भारतीय संस्कृति में पतनशीलता आ चुकी थी और उसकी पाचन शक्ति क्षीण हो चुकी थी। पहले धक्के से एक बार लड़खड़ाने के पश्चात फिर एकाएक भक्ति आंदोलन के रूप में भारतीय संस्कृति के प्रवाह ने इस्लामी संस्कृति को भीतर तक भिगो दिया और अपनी भीतरी गंदगी को उठा कर तटों पर फेंक दिया। इस साहित्यिक सांस्कृतिक आंदोलन में से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पुन: स्थापित हुआ। इस महान सांस्कृतिक क्रांति में संपूर्ण भारतवर्ष ने भाग लिया। शिवकुमार मिश्र के शब्दों में -

'इस आंदोलन में पहली बार राष्ट्र के एक विशेष भूभाग के निवासी तथा कोटि-कोटि साधारण जन ही शिरकत नहीं करते, समग्र राष्ट्र की शिराओं में इस आंदोलन की ऊर्जा स्पंदित होती है, एक ऐसा जबर्दस्त ज्वार उफनाता है कि उत्तार, दक्षिण, पूर्व-पश्चिम सब मिलकर एक हो जाते हैं और सब एक दूसरे को प्रेरणा देते हैं, एक दूसरे से प्रेरणा लेते हैं और मिलजुलकर भक्ति के एक ऐसे विराट नद की सृष्टि करते हैं उसे प्रवाहमान बनाते हैं, जिसमें अवगाहन कर राष्ट्र के कोटि-कोटि जनसाधारण जन सदियों से तप्त अपनी छाती शीतल करते हैं, अपनी आध्यात्मिक तृषा बुझाते हैं, एक नया आत्मविश्वास, जिंदा रहने की, आत्मसम्मान के साथ जिंदा रहने की, एक शक्ति पाते हैं।' भक्ति काव्य भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूर्तरूप था। हिंदी साहत्य ने इससे कबीर का सिंहनाद प्राप्त किया जिसने निर्गुण साधना और समतावादी जीवनदृष्टि को अपने काव्य में स्थापित किया। तुलसी का रामचरित मानस आदर्श राम राज्य की परिकल्पना लेकर आया। तुलसी ने क्रूर मुस्लिम राज को राक्षस राज के मिथक में बदल दिया। सूर की रागात्मक आशावादी दृष्टि जीवन में प्यार जगाने लगी और जायसी ने पद्मावत के माध्यम से भारतीय संस्कृति की गरिमा को स्वीकार किया। यह अद्भुत तथ्य है कि भयंकर संघर्षों के बीच रचा गया भक्ति साहित्य पूरी तरह असांप्रदायिक या धर्म निरपेक्ष है। यह भारतीय सांस्कृतिक चिंतन का प्रभाव है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विस्फोट पुन: पुनर्जागरण काल में देखा जा सकता है। राजा राममोहन राय जिस औपनिषदिक ज्ञान को लेकर समाज सेवा की ओर अग्रसर हुए वह शुध्द भारतीय था। स्वामी विवेकानंद ने जिस वेदांत और अद्वैतवाद के आगे पश्चिम को झुकने के लिए विवश किया वह शुध्द भारतीय-सांस्कृतिक चिंतन था। विवेकानंद 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के प्रखरतम विचारक और अजेय योध्दा थे। उनकी धर्म साधना, उनका प्रचार, उनकी दार्शनिकता, उनकी तपस्या, उनके जीवन के सारे क्रिया-कलाप जिस स्रोत से जीवन शक्ति पाते थे वह था राष्ट्रवाद। भारत में रहकर भारतीय शिष्यों के बीच उन्होंने अपने समाज की कमियों को रेखांकित किया, रूढियों पर प्रहार किया, विवशताओं पर आंसू बहाए परंतु पश्चिम में खड़े होकर उन्होंने भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता का सिंहनाद किया और भारत को धर्म-आध्यात्म के क्षेत्र में विश्व गुरु के रूप में स्थापित किया। कभी भूलकर भी भारत की बुराई विदेश में नहीं की और ऐसा करने वालों को मुहतोड़ जवाब दिया। यह कार्य किसी विरक्त संन्यासी का नहीं, कर्मठ देशभिमानी योध्दा का था जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की मजबूत धरती पर स्वतंत्र भारत की नींव रखना चाहता था। महर्षि अरविन्द हो या स्वामी दयानन्द या फिर शरच्चंद्र जैसा साहित्यकार सभी राष्ट्रवाद से प्रेरित थे। भारत का संपूर्ण स्वाधीनता संग्राम अमर बलिदानियों का सुलगता हुआ इतिहास और अहिंसावादियों की आंसुओं में डूबी कहानियां सभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रत्यक्ष रूप है। भारत माता का चित्र, वंदेमातरम् का नारा और तिरंगे की आन के लिए प्राणोत्सर्ग, राष्ट्रीयता के परिचायक हैं। संपूर्ण भारतीय साहित्य में असंख्य साहित्यकारों ने अनेकानेक भाषाओं में भारतीय संस्कृति का यशोगान किया। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पुनर्जागरण अथवा नवजागरण के युग का सत्य था, स्वाधीनता संग्राम का सत्य था इसलिए ब्रिटिश साम्राज्य पराजित हुआ, हमें आजादी मिली।

स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात,् स्वाधीन भारत ने अपनी सांस्कृतिक पहचान संवारने की जगह भुलाने की कोशिश की। भारतीय संस्कृति को सामूहिक या सामाजिक संस्कृति कहकर उसे कोई विशिष्ट पहचान देने से परहेज किया। 'वोट बैंक' की राजनीति हावी हुई और भारत की सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक स्वार्थ का अजगर निगलने लगा। साहित्यकार सत्ताा से आतंकित हुए या आकर्षित या फिर आजादी के पश्चात् दिग्भ्रमित, धीरे-धीरे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राह छोड़ तात्कालिक यथार्थ, कंकड़-पत्थर बटोरने लगे। साहित्य क्रमश: समाज से दूर जा रहा है, उसकी प्रेरणा का स्रोत नहीं बन पा रहा। आज के साहित्यकार जातीय अस्मिता के प्रतीक न बन कर तुच्छ स्वार्थों की पहरेदारी कर रहे हैं।

इस संक्रांति बेला में राष्ट्रवादी संगठनों का चाहे वे किसी भी क्षेत्र में क्रियाशील क्यों न हों यह दायित्व बनता है कि वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का झंडा उठायें, भारतीय संस्कृति के सर्व-समवेशी, सामाजिक रूप की रक्षा करते हुए भी उसकी मूल पहचान को न मिटने दें क्योंकि इससे अलग भारत की कोई पहचान न थी, न है और न हो सकती। वैश्वीकरण के दौर में जहां अस्मिता का संघर्ष और तेज होगा वहां पुन: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के माध्यम से सशक्त भारत, अपराजेय भारत को गढ़ने का काम भारतीय साहित्यकार करते हैं तो साहित्य लेखन को सार्थक करेंगे।

-(लेखक हि.प्र. विश्वविद्यालय, शिमला में प्राध्यापक है।)

Friday 14 September 2007

स्तालिन और माओ का राष्ट्रीय हित- नवभारत टाइम्स

विशेष संवाददाता
नई दिल्ली: राष्ट्रीय हित की आड़ में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का विरोध करने वाले भारतीय कॉमरेड बिल्कुल भूल गए कि माओत्सेतुंग ने परमाणु टेक्नॉलजी के लिए क्या किया था। प्रतिष्ठित चीनी लेखिका हात सुइन ने अपनी किताब द मॉर्निंग डल्यूज में लिखा है कि स्तालिन के सोवियत संघ से माओ के संबंध परमाणु टेक्नॉलजी को लेकर खराब हुए। माओ ने परमाणु हथियार बनाने के लिए सोवियत संघ से टेक्नॉलजी मांगी। स्तालिन इसके लिए तैयार नहीं हुए। यहां से खटास आनी शुरू हुई और दुनिया का पहला कम्युनिस्ट देश चीन की नजर में संशोधनवादी बनने लगा।

परमाणु टेक्नॉलजी हासिल करने के पीछे माओ के असली इरादे बाद में सामने आए। माओ का चीन आक्रामक राष्ट्रवाद पर चल रहा था, जिसे सम्मान प्रदान करने के लिए क्रांति का मुलम्मा चढ़ाया गया। अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर ऐटम बम गिराए तो माओ आए दिन थर्मोन्यूक्लियर युद्ध की बात किया करते थे। माओ यह भी कहते थे कि परमाणु युद्ध के बाद भी समाजवादी निर्माण के लिए बड़ी संख्या में चीनी बच जाएंगे। राजनैतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती है, इस सिद्धांत की तर्कसंगत परिणति थर्मोन्यूक्लियर युद्ध की कल्पना में ही हो सकती थी।

भारतीय कॉमरेड जिस परमाणु समझौते का विरोध कर जाने-अनजाने चीन का काम कर रहे हैं, उस चीन के राष्ट्रवाद की एक और मिसाल। जापानी, फ्रांसीसी और अमेरिकी उपनिवेशवाद-साम्राज्यवाद के खिलाफ लगातार संघर्ष करने वाले वियतनाम पर 1979 में चीन ने हमला किया था। सोवियत संघ से दोस्ती के कारण वियतनाम चीन की आंख की किरकिरी पहले से ही बना हुआ था। बारूद में चिनगारी का काम किया वियतनाम में चीनी उद्यमियों के खिलाफ कार्रवाई ने। आक्रामक राष्ट्रवाद का परिचय देते हुए उस समय चीन ने ऐलान किया था कि 1962 में जिस तरह भारत को सबक सिखाया गया, उसी तरह वियतनाम को सिखाया जाएगा। भारत के जले पर नमक छिड़कते हुए बाद में चीन ने यह भी कहा कि भारत की रेग्युलर आर्मी की तुलना में वियतनाम के बॉर्डर गार्ड्स ने लड़ाई बेहतर लड़ी। राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के प्रतीक वियतनाम पर चीन के हमले की निंदा सीपीएम ने आज तक नहीं की है।

भारतीय कॉमरेडों के लिए एक-दो बातें स्तालिन के राष्ट्रवाद के बारे में। जर्मन हमले के बाद स्तालिन ने सोवियत जनता का आह्वान समाजवाद नहीं, पितृभूमि की रक्षा के नाम पर किया था। अगस्त 1945 में सोवियत संघ के सामने जापान के आत्मसमर्पण के बाद स्तालिन ने जो कहा वह तो किसी कम्युनिस्ट की भाषा हो ही नहीं सकती। स्तालिन ने कहा था कि हमने राष्ट्रीय अपमान का बदला लेने के लिए 40 साल इंतजार किया। उनका इशारा 1904 के रूस-जापान युद्ध की ओर था। उस युद्ध में जार का रूस जापान के हाथों बुरी तरह हारा था। तो जार की हार का बदला कम्युनिस्ट स्तालिन ने लिया।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : डॉ. दयाकृष्ण विजयवर्गीय 'विजय'

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम समुन्नत संस्कृतियों में से एक है। इसकी सुदीर्घ परंपरा में अनेक मनीषी विद्वानों, मंत्र द्रष्टा ऋषियों तथा तत्ववेत्ता मुनियों के जीवनानुभवों के शाश्वत निष्कर्षों की संचित निधि जुड़ी है। इसकी वरेण्यता आप्त ऋषियों ने 'सा संस्कृति विश्ववारा' कहकर रेखांकित की है। इसी संस्कृति के आचरित चरित्र ने सर्व मानवों को प्रशिक्षित कर संस्कारित किया है। प्रमाण में यह श्लोक उध्दृत कर सकते हैं-

एतद्येश प्रसूतस्य सकाशादग्र जन्मना,
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।

संस्कृति सभ्यता नहीं है। सभ्यता जहां आचरण का बाह्य पक्ष है, वहां संस्कृति जीवन का आंतरिक सौन्दर्य है। जीवन जीने की दृष्टि है। शाश्वत मूल्यों की मंजूषा है। औदात्य की प्रतिष्ठा है। पवित्रता की लेखनी से लिखा जागतिक कर्मों का पावन संविधान है। उच्चासन पर विराजमान सारस्वत मूर्ति संतों का संभाषण है। अभ्युदय का विज्ञान तथा नि:श्रेयस का ज्ञान है। नैर्ष्कम्य का उपनिषद तथा जीवन मुक्ति का आरण्यक है। माधुर्य की भागवत ही नहीं, कर्म की गीता भी है। जीवन का सत ही नहीं, सृष्टि का ऋण भी है। सुख का श्वास ही नहीं, सिध्दि का विन्यास भी है। नवजागरण का शंखनाद ही नहीं, प्रगति एवं समृध्दि का पांचजन्य भी है। अत: गुणात्मक है। सर्व श्रध्देय है। इसके विपरीत सभ्यता सभाओं में बैठने की शिष्टता का मानदंड भर है। सृष्टि व्यवहार का औचित्य है। संस्कृति जहां आध्यात्मिक मूल्य है, वहां सभ्यता विज्ञानात्मक संचेतना है। संस्कृति जहां शाश्वत सत्यों को सहेजे है, वहां सभ्यता यांत्रिक परिणामात्मक उपयोगी सत्यों को सहेजे है। दोनों के वैभिन्य के बीच अंतर्बाह्यता की तथा आध्यात्मिक एवं भौतिकता की अति सूक्ष्म झीनी-सी पारदर्शी पट्टिका है, जिसे सरलता से पृथक करना कठिन है।

जब हम राष्ट्र के आगे सांस्कृतिक शब्द का प्रयोग करते हैं, तब तत्काल हमारा ध्यान, राष्ट्र जनों के उन जीवन-मूल्यों की ओर जाता है जो शाश्वत ही नहीं, राष्ट्र जीवन को अहम् से वयम् की ओर तथा सयम् से ओम तत्सत् की ओर ले जाने वाले हैं। राष्ट्र जीवन को पूर्ण एवं सार्थक बनाने वाले हैं। राष्ट्रजनों की अंतश्चेतना को विकसित एवं सृदृढ़ बनानेवाले हैं। इन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति आस्था जनित निष्ठा ही राष्ट्रजनों को राष्ट्रीय बनाती है। इस तरह राष्ट्रीयता का मूल स्वरूप राजनीतिक न होकर सांस्कृतिक है। निश्चित भू भाग तथा निश्चित निष्ठावान जन तो भौतिक उपकरण हैं। संस्कृति ही आध्यात्मिक, गुणात्मक तथा शाश्वत जीवन-मूल्य है, जिनका अनुसरण करती प्रजा उसे राष्ट्र का रूप प्रदान करती है। मातृभूमि के प्रति भक्ति तथा जन के प्रति आत्मीयता का भाव सांस्कृतिक मूल्य हैं। यही तीनों मिलकर राष्ट्र को राष्ट्र बनाती हैं। राष्ट्र किन्हीं संप्रदायों तथा जन-समूहों का समुच्चय न होकर, एक जीवमान इकाई है। ऐसे राष्ट्र पुरूष का सजीव व्यक्तित्व है, जिसमें भूमि, जन एवं संस्कृति की जीवंत एकता का सतत निवास वर्तमान रहता है। दशम मंडल में ऋग्वेद के ऋषि से शिष्य पूछता है कि राष्ट्र पुरूष के जो विविध रूप दिए गए हैं वे कितने प्रकार से व्यकल्पित किए जा सकते हैं? मंत्र है-
यत् पुरूषं व्यवर्धु: कति धा व्यकल्पन्
मुखं किमस्य कौ बाहु का ऊरू पादा उच्यते? 10-8-11
तब ऋग्वेद का ऋषि उत्तार देता है-
ब्राह्मणोस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत:
उरू तदस्य यद्वैश्य पद्मयां शूद्रो अजायत्। (10-9-92)
अर्थात् राष्ट्र पुरूष का मुख ब्राह्मण, बाहु राजन्य, उरू वैश्य तथा पादशूद्र है। चारों वर्णों के संघात से ही राष्ट्र प्रमुख का निर्माण होता है। इनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह कहना अपराध ही होगा। कर्म निष्ठा ही चारों के लिए मुक्ति प्रदाता बनती है। इस मंत्र के आशय को इस प्रकार भी व्याख्यायित कर सकते हैं कि समाज जीवन में चार प्रकार की मनुष्य प्रवृत्तिायां कार्यरत हैं, बुध्दि, सूक्ति, अर्थ तथा श्रम शक्ति। बुध्दि ज्ञान का पथ प्रशस्त करती है। शक्ति सीमाओं की रक्षा करती है आंतरिक अराजकता का शमन करती है। अर्थ औद्यौगिक एवं व्यापारिक विकास का हेतु है तथा श्रम विकास की योजनाओं की सम्पूर्ति का एकमेव साधन है।

स्वीकृत सांस्कृतिक जीवन दृष्टि ही एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र से पृथक करती है। प्रत्येक राष्ट्र उसकी स्वीकृत जीवन दृष्टि से ही पहिचाना जाता है। पृथकता की यह स्वीकृति तथा इसका सैध्दांतिक पक्ष ही राष्ट्रवाद को जन्म देता है। कोई भी विचार तभी वाद का रूप लेता है जब उसके आचरण कर्ता उस विचार को जीवन का एक अंग बना लेते हैं। राष्ट्र को सामने रखकर जब कोई सिध्दांत या चिंतन निरूपित होता है, तब वह विचार राष्ट्रवाद के नाम से अभिहित किया जाता है। राष्ट्रवादी हर कार्य को राष्ट्र की तात्कालिक परिस्थितियों तथा आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निर्धारित एवं व्यवहारित करता है। फिर चाहे वह प्रश्न राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा का हो या जन के मौलिक अधिकारों की संरक्षा का या संस्कृति की गरिमापूर्ण मर्यादा को सुरक्षित रखने का। राष्ट्रवादी पहले अपने राष्ट्र का हित देखता है। उसके पश्चात् ही नीति निर्धारित करता है तथा आवश्यक संरक्षात्मक कदम उठाता है।

यहां यह प्रश्न उपस्थित हो आना स्वाभाविक है। जब राष्ट्र की परिभाषा में संस्कृति शब्द समाहित है तब राष्ट्रवाद के आगे अतिरिक्त सांस्कृतिक शब्द लगाने की क्यों आवश्यकता पड़ी। सच में यह एक गंभीर प्रश्न है तथा गहराई से विवेचन की अपेक्षा रखता है। संस्कृत शब्द में 'ठक्' प्रत्यय लगकर 'कितिच' सूत्रानुसार सांस्कृतिक शब्द बनता है। इसे हम संस्कृति का भाववाचीकरण कह सकते हैं। सांस्कृतिक शब्द अपनी परिधि की व्यापकता में संस्कृति के सभी उपादानों एवं उपकरणों को समेटे होता है। हम जानते हैं संस्कृति शब्द 'कृ' धातु से 'सम' उपसर्ग पूर्वक 'सुट्' आगम करके 'क्तिन' प्रत्यय के योग से निष्पन्न है। 'सम' उपसर्ग जहां भी जुड़ता है वह वहां संस्कारित अथवा सुन्दरीकृत का अर्थ देता है। 'सम' के सभी अर्थ पश्चात्वर्ती शब्द को विशेषित करते हैं। विद्वान उसके दो ही अर्थ मुख्य रूप से ग्रहण करते हैं। एक तो संस्कारित सम्यक कृति और दूसरा संभूय कृति के रूप में। संघश: कृति सम्भूय कृति कहलाती है। इस तरह संस्कृति संस्कार युक्त सम्भूय कृति है। संस्कार, सामाजिक विद्रूपताओं के साथ मनीषियों के बौध्दिक संघर्ष का सुपरिणाम है। मनुष्य उन पर विजय के पश्चात जिन तात्विक एवं सात्विक निष्कर्षों पर पहुंचता है, वे निष्कर्ष ही शनै:-शनै: संस्कृति बनते चलते हैं। मानवीय जीवन मूल्य बन जाते हैं। कह सकते हैं मानव के जीवनानुभवों का नवनीत ही संस्कृति है। समाज से संघर्ष का क्रम निरंतर बना ही रहता है। इस कारण संस्कृति में नैरंतर्य बना रहता है। यहां यह स्पष्ट कर देना उचित रहेगा कि संस्कृति की स्वीकृत जीवन-दृष्टि में कहीं कोई बदलाव नहीं आता। ऐसे निष्कर्ष संस्कृति के आचरण पक्ष के उपादानों एवं उपकरणों में अभिवृध्दि ही करते हैं। प्रत्येक राष्ट्र अपनी सांसकृतिक परंपरा के शाश्वत मूल्यों से जब तक जुड़ा चलता है, तब तक वह जीवंत एवं समुन्नत बना रहता है। स्खलन उसकी गरिमा तथा प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाता है। मर्यादाओं को नष्ट ही नहीं करता, उपेक्षा तथा तिरस्कार का भाव जगा, परिणामगत दुर्बलताओं को स्वीकारने में भी संकोच नहीं करता। हम जानते हैं सांस्कृतिक स्खलन के कारण ही विश्व के अनेक राष्ट्र मिट गये। इकबाल ने कहा भी है-
यूनान मिश्र रोमां सब मिट गये जहां से
अब तक मगर है बाकी नामोनिशा हमारा।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।

यह जो 'कुछ बात है' यह हमारी सांस्कृतिक निष्ठा ही है। अपनी सनातन संस्कृति के साथ अटूट जुड़ाव ही है। इसी से अनेकों झंझावातों के बीच भारत-तरणी विपत्तिा समुद्र को पार करने में सक्षम एवं समर्थ सिध्द हुई है। इसकी पृष्ठभूमि में भारतीय राष्ट्रीय जीवन का अपनी मूल्यवान आध्यात्मिक संस्कृति को जड़ से दृढ़ता से पकड़े रहना ही है। इसी सत्य को बार-बार उजागर करने के हेतु से मनीषियों को राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द जोड़ने की आवश्यकता अनुभव हुई है। एक और भी कारण हो सकता है। जब राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द जुड़ जाता है तब वह सोच का एकमेव सांस्कृतिक अधिष्ठान भी निर्धारित कर देता है। तब मनीषि, जीवन के समस्त व्यवहारों में संस्कृति को सामने रखकर ही नीति निर्धारित नही ंकरते, आचरण तक भी सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में ही तय करते हैं। तब लक्ष्य का ही नहीं, साधनों की पवित्रता का भाव भी सामने रहता है। इसी कारण तो महाभारत में धर्मराज का यह कथन 'अश्वत्थामा हतौ नरो वा कुंजरौ' कभी अभिशंसित नहीं हुआ। यह किसी अपवाद को सहन नहीं करता। तीसरा कारण यह भी हो सकता है राष्ट्र के उपादान तत्व भू और जन के साथ संस्कृति अपनी पृथक सत्ताा के साथ अलग विचार की अपेक्षा रखती है। जब सांस्कृतिक शब्द राष्ट्रवाद के आगे जुड़ जाता है तब किसी अवमूल्यन, किसी गिरावट अथवा किसी अपवाद के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहता। तब राष्ट्र हित चिंतन की एकमात्र कसौटी सांस्कृतिक बोध ही रह जाती है। राष्ट्रवाद की अवधारणा का एक मात्र निकष सांस्कृतिक अधिष्ठान पर अवस्थित विचार ही रह जाता है। इस तरह यह जोड़ निरर्थक नहीं सार्थक ही कहा जाएगा। इसका परिणामात्मक लाभ भी राष्ट्र को मिला है। इसी बल पर आज भारत विपत्तियों की भारी चट्टानों के बोझ को शीश से उतार फेंकने में, पराधीनता की बेड़ियों को काटने में, धर्मांधता की आंधी को रोकने में तथा मतांतरण के षडयंत्रों को उध्वस्त करने में पूरी तरह सफल हो, विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आने का व्यग्र खड़ा है।

इसी संदर्भ में एक और प्रश्न अंतर्राष्ट्रीयतावादियों ने उठा, राष्ट्रवाद के आगे प्रश्नवाचक लगाने का दुस्साहस किया है। अंतर्राष्ट्रीयतावादी तथा छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी राष्ट्रवाद का नाम सुनते ही नाक भौंह सिकोड़ते हुए कानों में अंगुलियां नहीं, शीशा डाल लेते हैं। मानों राष्ट्रवाद का शब्द प्रयोग, कोई एक बड़ा अपराध हो। ऐसा सोचने वाले स्वयं वर्गवादी हैं। 'दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ' यह कहने वाले स्वयं द्वैतवादी हैं। जो श्रमिक नहीं हैं उन्हें वे शोषक की संज्ञा देते हुए शत्रुवत मान, उनके विनाश तक की भयंकर कामना लिए होते हैं। समाज तक से उनका बहिष्कार तथा तिरस्कार का भाव लिए होते हैं। जबकि राष्ट्रवादी सोच वाला मानव मात्र के हित को अपने राष्ट्र हित से पृथक नहीं मानता। वे भूल जाते हैं, राष्ट्रवादी भारत के मंत्र द्रष्टा ऋषियों ने ही गाया है 'माता भूमि पुत्रोहम् पृथिव्या:। इन्होंने ही 'वसुधैव कुटुम्बकम्' तथा 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' जैसे विश्वात्मक वैश्विक मंत्र दिए हैं। इन मंत्रों की पृष्ठभूमि में वही भारतीय सांस्कृतिक अवधारणा कार्यरत है जिसका अधिष्ठान अध्यात्म है। सारी सृष्टि एक ही चेतन सत्ताा का विस्तार है। कहीं कोई भेद नहीं है। कोई द्वैत नहीं है। यह अभेदात्मक अद्वैत दृष्टि ही उपर्युक्त वैश्विक सोच की नींव में है। दुनिया के मजदूरों को एक करने का नारा देने वाले रूस और चीन आज भी अलग-अलग राष्ट्र हैं। ये बहुत समय तक सीमा संघर्ष में उलझे भी रहे हैं। इनने अपनी प्रादेशिकता का त्याग कब किया है। संयुक्त राष्ट्र संघ को ही लें। यह राष्ट्रों का संघ है। राष्ट्रों की सापेक्षता स्वीकार कर चला है। अपने को अंतर्राष्ट्रीय कहने वाले भूल जाते हैं कि इस शब्द प्रयोग में ही राष्ट्रों की उपस्थिति अनिवार्य है। सारा विश्व राष्ट्रों में बंटा है। हर राष्ट्र की अपनी संस्कृति है। हर राष्ट्र की अपनी भाषा है। जिन राष्ट्रों ने परकीय भाषा एवं संस्कृति अपना रखी है, वे पूर्व में उस राष्ट्र के प्रमुख में पराधीन रह चुके हैं वे राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र होकर भी सांस्कृतिक एवं भाषाई दृष्टि से आज भी पराधीन ही हैं। जिन राष्ट्रों की अपनी भाषा संस्कृति नहीं होती निश्चय ही वे राष्ट्र कहलाने के योग्य पात्र नहीं है।

कई राष्ट्रों की संस्कृति को संप्रदायों ने संकुचित कर कट्टरतावादी रूप दे दिया है। कट्टरता ने गर्हित हिंसा तक के सामने अपना घृणित एवं गर्हित चेहरा उजागर कर दिया है। इससे उनका घृणा भरा आत्मघाती रूप सामने आया है। इससे मानवता का उदारचरित प्रभावित हुआ है। आज सांप्रदायिक कट्टरता ने आतंकवाद का स्वरूप ग्रहण कर, जन जीवन को भयाक्रांत कर दिया है। सांप्रदायिकता तब और भयावह हो जाती है जब वह अपने चिंतन को ही अंतिम मान कर चलती है। तब वह दूसरों के प्रति कहर ढाने लगती है। विष विमन करती हुई दूसरे राष्ट्रों को खंडित तक करने को तुल जाती है। आज इस सांप्रदायिक कट्टरता की आग से विश्व का कोई भी राष्ट्र अछूता नहीं बचा है। सांप्रदायिक कट्टरता धर्म के उदार चरित्र को भूल आज रक्त से सड़कें रंगने में लगी है। यह संस्कृति नहीं, विकृति है अपकृति है। भारत के ऋषियों ने इस कट्टरता का विरोध करते हुए यही कहा है-

अयं निज: परोवेति गणना लघु चेहसाम्
उदार चरितानाम् तु वसुधैव कुटुंबकम्।

उपर्युक्त श्लोक के संदर्भित परिप्रेक्ष्य में तो राष्ट्रवाद के आगे सांस्कृतिक शब्द प्रयोग और भी आवश्यक हो जाता है। यह शब्द प्रयोग राष्ट्रवाद के विरूध्द उद्धोषित लघु चेतस घोषणाओं को जड़ से निर्मूल कर, चिंतन को उदार सहिष्णु मान-संपदा से परिपुष्ट कर देता है। प्रकाश का नंदादीप बन मानवता का पथ प्रशस्त करता है। तब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मानवता का पर्याय, औदात्य का कल्पतरू तथा सर्व हित की चिंतामणि बन जाता है।

भारतीय साहित्य के अवलोकन से हमें इस सत्य के दर्शन होते हैं कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही सदा सर्वदा साहित्य का आदर्श रहा है। क्या संस्कृत साहित्य, प्राकृत साहित्य, पाली साहित्य, अपभ्रंश साहित्य और क्या लोकभाषा साहित्य, सभी ने संस्कृति और राष्ट्रीयता को ही अपना कथ्य बनाया है। प्रगतिवाद जनवाद के नाम से जो अभारतीय चिंतन भारतीय साहित्य में साम्य का नारा लेकर अनुप्रविष्ट हुआ, ऐसे समाज ने कुछ काल के भ्रम के बाद ही नकार दिया। समाज को वह नग्न यथार्थ कहे, या भोगा हुआ यथार्थ कभी स्वीकार नहीं हुआ। सामाजिक सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों पर साहित्य के माध्यम से कभी स्वीकार नहीं हुआ। सामाजिक सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों पर साहित्य के माध्यम से किया जाता यह सीधा आक्रमण भारतीय समाज को भी गले नहीं उतरा। उस साहित्य के लेखकों को पाठकों की खोज के उपाय अपनी बैठकों में सोचने पड़ रहे हैं। इसी तरह से भारतीय समाज ने अस्तित्ववादी, क्षणवादी आधे-अधूरे पाश्चात्य दर्शन को भी कभी स्वीकार नहीं किया है। भले ही इन्होंने प्रयोगवाद, नई कविता आदि के नाम लेकर कितने ही बड़े नाटक क्यों न हों। इनके समकालीन प्रयास समय की कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं।

इसका कारण भी है। साहित्य और संस्कृति का अन्योन्याश्रित संबंध रहा है। साहित्य संस्कृति का संवाहक है और संस्कृति साहित्य की आशा है। संस्कृति साहित्य में लिपटी रहती है। कभी कथानक के रूप में, तो कभी शिल्प के रूप में। वही साहित्य श्रेष्ठता अर्जित करता है जो संस्कृति को अधिकाधिक आत्मसात् किये होते हैं। संस्कृति विहीन साहित्य की कल्पना शशक श्रृंगवत है। संस्कृति भी वही जीवित रहती है जिसका विपुल परिमाण में साहित्य उपलब्ध होता है। जिस संस्कृति का साहित्य नहीं होता, वह संस्कृति कालांतर में अकाल काल कवलित हो जाती है।

मानवता को उजागर करनेवाला साहित्य ही है। साहित्य मनुष्य और समाज की मनोभावनाओं को शब्द के स्तर पर प्रभासित करता हुआ, मानवीय आदर्श की प्रतिष्ठापना करता है। साहित्य के शब्द-शब्द में भावोद्रेक की अप्रतिम शक्ति होती है। यह व्यक्ति को उसकी वास्तविक स्थिति से परिचित करा, उन उदात्ता विश्वासों से जोड़ता है जो उसे महामानव बनाते हैं। सामाजिक धरातल पर मानव का यह उदात्ता की ओर आरोहण है। व्यक्ति के धरातल पर जीवन प्रवृत्तियों का उन्नयत भी साहित्य ही करता है। साहित्य मानवीय संवेदना जगा, मानव संबंधों में सघनता उपजाता है। यह मनुष्य के भीतर चल रहे आंतरिक संघर्ष को तीव्र कर स्वस्थ एवं सही पथ पर अग्रसर करता है। साहित्य की परिधि में जहां सामाजिक संबंधों का नैकटय आता है वहीं सांस्कृतिक परंपरा की पहचान को नवीनतम रूपों से ग्रहण करने की प्रेरणा भी आती है।

साहित्य सृजन इस तरह एक सांस्कृतिक कर्म है। यह संस्कृति को अक्षुण्ण रखता है। संस्कृति साहित्य को अनुप्राणित करती है। साहित्य की जीवनीशक्ति के मूल में उसकी गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा ही होती है। साहित्य, संस्कृति का संवाहक होकर भी सदैव संस्कृत्योन्मुख रहता है। संस्कृति विमुख साहित्य की स्थिति उस रोगी की तरह होती है जिसे मृत्यु-मुख में जाने से कोई उपचार नहीं रोक पाता। जब भी साहित्य संस्कृति विमुख हुआ है, वह या तो दिग्भ्रम की स्थिति जीने लगता है अथवा मृत्यु का ग्रास बना है।

संस्कृति की प्रभविष्णुता अति सूक्ष्म किंतु अति तीव्र होती है। ऐसे समय में वह साहित्य को ही नहीं समय को भी नियंत्रित करती है। संस्कृति की यह प्रभविष्णुता कभी प्रत्यक्ष दिखती है तो कभी नहीं। प्रत्यक्षता की स्थिति में इसे सांस्कृतिक शक्तियां बलशाली हुई समय-रथ की वल्गा थामें दिखाई देती है। आज समय साहित्य के सम्मुख चुनौती बनकर खड़ा है। ऐसी स्थिति में तो साहित्य को समय से आगे निकलने का सामर्थ्य अर्जित करना ही चाहिए। इस हेतु उसे अपने सांस्कृतिक अधिष्ठान पर अंगद चरण जमा खड़ा होना है। तभी वह प्रतिगामी शक्तियों के चेहरों पर चढ़े मुखौटों को हटाने की शक्ति स्वयं में जगा सकेगा। इन दिनों प्रतिभागी शक्तियों ने विश्व-अराजकता के कर्णणारों के साथ दुरभि संधि कर रखी है। ऐसे प्रयासों को कुंठित कर विश्वमंच पर साहित्य को सत्यं शिवं सुंदरम् से अभिमंडित अपनी श्रेष्ठ सांस्कृतिक छवि उपस्थित करनी है। इस सांस्कृतिक समर में भारत को साहित्य के साथ-साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को भी ध्येय े रूप में अंगीकार कर आलोक की नवीनतम दीपशिखा के साथ विश्वमंच पर खड़ा होना है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का अपनाव आज राजनीति के लिए जितना आवश्यक है उससे कम साहित्य के लिए नहीं है। साहित्य का इतिहास अथ से आज तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ही इतिहास है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को ध्येय वाक्य के रूप में जब तक अंगीकार नहीं करेंगे, भारत वैभव के उन्नतम शिखरों का स्पर्श कदापि नहीं कर सकेगा। कालजयी साहित्य नहीं लिखा जा सकेगा। वर्तमान के संकटापन्न इस काल में यदि प्रतिगामी शक्जियों को दुर्बल समझ, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को दुर्लक्ष्य किया तो निश्चय ही यह स्थिति भारत को महंगी पड़ सकती है। इसलिए राजनीति और साहित्य दोनों को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को दृष्टि-पथ में रख, औपनिषदिक मंत्र 'चरैवेति चरैवेति' का घोष गुंजाते हुए त्वर गति से आगे बढ़, भारत को विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा करना है।
(लेखक सुप्रसिध्द साहित्यकार हैं।)

Thursday 13 September 2007

करात का रहस्य : इंडिया टुडे

इस बार के इंडिया टुडे( 19 सितंबर, 2007) में इंडिया टुडे से जुडे श्री एस. प्रसन्नाराजन ने माकपा के महासचिव प्रकाश कारत पर केन्द्रित लेख लिखा है जिसे हम यहां प्रकाशित कर रहे है-

भारतीय वामपंथी ऐसे शत्रु का हौवा खड़ा कर रहे हैं जो उनकी विचारधारा जितना ही नकली है।

यह दास कैपिटल के नाम से मशहूर कहानी से भी अनूठा कथा है और यह साम्यवादी मिथकशास्त्र के सबसे अनूठे सोवियत में घट रही है। जब-जब सभ्य समाज की सीमाओं की चर्चा छिड़ती है, भारतीय लोकतंत्र का हवाला बड़ी शाबासी के साथ दिया जाता है। आज उसी भारतभूमि पर इस विचारधारा को मानने वाले अंतिम योध्दा सड़कों पर उतर आए हैं और आश्चर्यजनक बात है कि ये लोग यह सब राष्ट्रहित के नाम पर कर रहे हैं। समाजवाद नाम से जाने गए विज्ञान का अध्ययन करने वालों को इसमें विडंबना की ही मृत्यु नजर आएगी। लेकिन यह तो भारतीय कहानी है और इसके नायक पुरातत्व के नमूने कॉमरेड है। भारतीय कम्युनिस्ट और राष्ट्रहित- क्या इससे भी अटपटी बात कोई हो सकती है।

जरा गौर करें कि कौन इस 'राष्ट्रीय' स्वतंत्रता अभियान की अगुआई कर रहा है। ऐसे लोगों के पास जो तर्क हैं उनकी जीत हमें 'ज्युशे' के नए संस्करण में पहुंचा देगी और इस प्रकार की आत्मनिर्भरता हमें उत्तर कोरिया जैसे अलग-थलग पड़े, अपने आप में मगन देश जैसा बनाकर छोड़ेगी। भारतीय कम्युनिस्टों के महामहिम श्री प्रकाश कारत, जिनके भजन मीडिया के कुछ 'मूर्तिपूजक' किस्म के लोग दिन-रात गा रहे हैं, इस कथा के महानायक हैं। इस किस्म के मीडिया वालों की नजरों में भारत के दूसरे नंबर के सबसे महत्वपूर्ण राजनेता करात गुस्साए हुए राष्ट्रवादी की भूमिका में हैं।

भला हो परमाणु समझौते का कि आखिरकार हमारी किस्मत खुली और हमें कॉमरेड राष्ट्रवादी के दर्शन आखिर हो ही गए। अगर हम उनकी जंग खाई शब्दाबली को थोड़ी देर के लिए नजरअंदाज कर दें तो करात का राष्ट्रवाद (या राष्ट्रहित की उनकी अवधारणा) उतना ही आत्ममोह से ग्रस्त करने वाला है, जितनी उनकी विचारधारा। इतना तो तय है कि भारतीय कम्युनिस्टों ने राष्ट्र को कब का गंवा दिया है। उनके सांसदों की गिनती में न पड़े। हां, अगर राष्ट्र से उनका तात्पर्य प. बंगाल और केरल के देहाती क्षेत्रों के कुछ सोवियतों से है तो बात और है। वे वर्ग और जाति का युध्द भी हार चुके। भारत ने उनकी अवज्ञा कर दी। ट्रॉफी की तरह जीते दो राज्यों में भी शासक दल सूबाई व्यवस्था मात्र है, ऐसी व्यवस्था जो डरा-धमकाकर चलाई जाती है। फिर भी दिल्ली के एकेजी भवन में विराजमान अध्यक्ष के दिलो-दिमाग पर हरदम राष्ट्र की फिक्र चीन से प्रोत्साहित है। उनकी बादशाहत में 'चीनी विशेषता वाले समाजवाद' को चरम राष्ट्रवाद माना जाता है। वहां ऐसे पूंजीवाद का बोलबाला है जो समाजवाद का लबादा ओढ़े है और लेनिनवादी कारागारों के बूते चल रहा है। वहां माओ के महान ग्रंथ केवल समृतिचिन्हों की दुकानों के बेस्टसेलर हैं और वहां के लोग बिग माक्र्स के बदले बिग मैक यानी महा-मॅकडोनल्ड बर्गर के बड़े उपभोक्ता हैं। दिवंगत नेता देंग ने सीमित अमेरिकावाद (यानी पूंजी का स्वागत और लोकतंत्र पर रोक) से चीन में खुले बाजार को खड़ा कर राष्ट्रहित को साधा, हालांकि कम्युनिस्ट व्यवस्था की कालकोठरियां भी साथ-साथ पनपती रहीं। व्यावहारिक रूप से करात का राष्ट्रवाद ह्यूगो शावेज जैसा है। वेनेजुएला के राजनीतिक करतबबाज शावेज 21 वीं सदी के कास्त्रो बनना चाहते हैं और उन्होंने अमेरिका विरोध को राष्ट्रवाद की धुरी बनाया है। उन्होंने इसी से अपना कॅरिअर बना लिया है। करात अपना अमेरिका विरोध प्रदर्शन ऐसे देश में कर रहे हैं जिसे उन्होंने जीता नहीं है। उन्होंने किताब और नारे हासिल किए है या यूं कहे कि उधार ले लिए हैं, उनके पास बनाने या गंवाने के लिए कोई साम्राज्य नहीं है। वैसे, उन्हें राजनीतिक वैश्यावृत्ति के विशेषाधिकारों को भोगने में मजा आता है, यानी ऐसे अधिकार जिनके साथ कोई जवाबदेही नहीं होती। उन अधिकारों के मजे लेने के लिए उन्हें ऐसे शत्रु की जरूरत है जिसे निरक्षर और भयभीत अल्पसंख्यक मुहल्लों में घुमाया जा सके। उनके पास अमेरिका विरोध का वाद है, हालांकि इस वाद को भारत समेत विश्व के सभ्य समाज ने कब का खारिज कर दिया है। (हां, इतना जरूर है कि सबसे पैने तर्क वाले अमेरिका विरोधी अपनी बात अमेरिकी लहजे में ही कहते है)। देश की सुरक्षा की बात करते हुए भी भारतीय कम्युनिस्ट एक ऐसे शत्रु की छवि सामने रखता है जो उसकी विचारधारा की तरह ही नकली है। हो सकता है कि दूसरे शत्रु (जो सचमुच शत्रु हों और सामने हों) उसके मतलब के नहीं। तथाकथित सांप्रदायिकतावादियों, जातिवादियों और पूंजीवादियों ने मिलकर भारत को एक ऐसा राष्ट्र बना दिया है जो कम्युनिस्टों की पहुंच से परे हो गया है। उन शत्रुओं ने युध्द जीत लिया है और राष्ट्र को भी। ऐसे में बौखलाए क्रांतिकारियों के पास अमेरिका विरोध ही अंतिम नारा रह गया है। इसी बौखलाहट को ध्यान में रखकर करात को समझा जा सकता है।

भारतीय कम्युनिस्टों के ख्वाबों का भारत करात जैसे कॉमरेडों के भारत से काफी अलग है। राष्ट्रहित को तभी बेहतर साधा जा सकता है जब भारतीय कम्युनिस्ट उस असत्य से खुद को मुक्त कर लें जिसे इतिहास ने कब का ठुकरा दिया।