हितचिन्‍तक- लोकतंत्र एवं राष्‍ट्रवाद की रक्षा में। आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

Tuesday 31 July 2007

कम्युनिज्म पर दीनदयाल उपाध्याय के विचार- 8



भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष पं. दीनदयाल उपाध्याय मूलत: एक चिंतक, सृजनशील विचारक, प्रभावी लेखक और कुशल संगठनकर्ता थे। वे भारतीय राजनीतिक चिंतन में एक नए विकल्प 'एकात्म मानववाद' के मंत्रद्रष्टा थे। दीनदयालजी ने माक्र्स के सिध्दांतों को 'भारत की धरती पर पूर्णत: आधारहीन' बताया। उनका मानना था कि भारत के बाहर भी किसी देश ने माक्र्स के सिध्दांतों को व्यवहार में नहीं अपनाया। माक्र्सवाद में व्यक्ति तथा समष्टि का संपूर्णता से चिंतन न होने के कारण इसका पराभव निश्चित है।

कम्युनिज्म पर दीनदयाल उपाध्याय के विचार-

· विश्व का एक भी देश कम्युनिज्म के मार्गदर्शक सिध्दांतों के अनुसार समाज-जीवन का निर्माण नहीं कर पाया है। कम्युनिस्ट देशों ने भी मूल कम्युनिस्ट विचारों के प्रति प्रतिबध्दता छोड़ दी। वर्ग-कलह, जड़वाद, इतिहास की भौतिक व्याख्या, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद विश्व में सिध्दांत बनकर रह गए। 'दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ' की गुहार एक नारा बनकर रह गया। 'विवाह' संस्था की समाप्ति, व्यक्तिगत संपत्ति की समाप्ति, धर्म को 'अफीम की पुड़िया' आदि कथन केवल नारे बनकर रह गए। श्रमिकों की तानाशाही एक अस्थायी संक्रमण व्यवस्था की बजाय एक स्थायी असहिष्णु तानाशाही का रूप लेती दिखाई देती है। समाज न राज्यविहीन था, न वर्गहीन है।

· माक्र्सवाद का पहला आक्रमण प्रजातंत्र पर होता है।

· समाजवादी व्यवस्था में राज्य संस्था न केवल आर्थिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहती है, बल्कि वह लोगों के राजनीतिक अधिकारों पर अधिकार भी कर लेती है। अत: समाजवाद की बंदूक की गोली प्रजातंत्र की छाती पर ही चलती है। समाजवाद एवं प्रजातंत्र एक साथ नहीं रह सकते। बाघ और बकरी का सह-अस्तित्व असंभव है। हरेक समाज की संस्कृति तथा समाज-रचना का विचार आर्थिक विकास के साथ ही करें तो यह उधेड़बुन और भी उलझ जाती है।

· बोल्शेविक क्रांति से लेकर आज तक रूस का इतिहास अनेक विफलताओं का ही इतिहास सिध्द हुआ है। वह इस विचार-प्रणाली की न केवल अपूर्णता का द्योतक है, अपितु भयानक परिणामों का भी जन्मदाता है। समाजवाद ने पहला आघात लोकतंत्र पर किया और समाजवाद में आस्था रखनेवाले रूस के बाहर के लोगों को उसने भयभीत कर दिया।
साम्यवादी या समाजवादी अपनी असहिष्णु प्रवृत्ति के अनुसार भिन्न मतावलंबियों को चुनी हुई विशिष्ट गालियां भर देते रहते है। सारे संसार ने भी यह देख लिया है कि जहां भी साम्यवाद आता है, वहां सबसे पहले लोकतंत्र की बलि चढ जाती है, मनुष्य मनुष्य नहीं रहता, बल्कि वह निर्गुण शासनतंत्र का एक नितांत विवश दास बन जाता है। लोकतंत्र और माक्र्स प्रणीत समाजवाद का एक ही म्यान में रहना सर्वथा असंभव है। (साभार- साम्यवाद का सच, लेखक-सतीशचंद्र मित्तल)

Friday 27 July 2007

कम्युनिज्म पर श्रीगुरुजी के विचार-7



विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी को भारत के ऋषियों-मनीषियों की परंपरा में माना जाता है। उनमें चाणक्य की दूरदर्शिता, वसिष्ठ का ज्ञान, गांभीर्य तथा आध्यात्मिकता, जनक की अनासक्ति, जल में कमल जैसी रहने की भावना थी। टाइम्स ऑफ इंडिया ने उन्हें आधुनिक विवेकानंद कहा तो हिंदुस्तान ने राष्ट्रोत्कर्ष की अनन्य भक्ति, दिनमान ने सच्चा संन्यासी कहकर संबोधित किया, तो इंडियन एक्सप्रेस ने भारतीय इतिहास का प्रगाढ अध्येता कहा।

कम्युनिज्म पर श्रीगुरुजी के विचार-

"The mass liquidation, slave camps,communes, forced labour, brain washing and all such inhuman engines of dictatorship in Russia have reduced the individual to such low depths of misery and slavery as was unheard of even under the unbridled kingship or during the worst days of capitalism."
-Shri Guruji(A Bunch of Thoughts)p.13

"Under the garb of socialism , what is it that is actually taking place? We find that all the measure being undertaken here are only an improve carbon copy of what had happened in China. The only difference is that these developments were brought about by brutal violence in China whereas here the same things are being done by polished propaganda."
-Shri Guruji(A Bunch of Thoughts)p.192

"Now a days our leaders are trying to cover up the fatal defect of socialism, i.e. the wiping out of the individual as a living entity, by coining new slogans like 'Democratic Socialism' and so on. As a matter of feet the two concepts of Democracy and socialism are mutually contradictory 'Socilism cannot be democratic and democracy cannot be socialistic."
-Shri Guruji(A Bunch of Thoughts)p.194

"Socialism is not a product of this soil. It is not in our blood and tradition. It has absolutely nothing to do with the traditions and ideals of thousands of years of national life. It is a thought alien to crores of our people here."
-Shri Guruji(A Bunch of Thoughts)p.193


Thursday 26 July 2007

कम्युनिज्म पर जयप्रकाश नारायण के विचार- 6



दुनिया भर के प्रमुख विचारकों ने भारतीय जीवन-दर्शन एवं जीवन-मूल्य, धर्म, साहित्य, संस्कृति एवं आध्यात्मिकता को मनुष्य के उत्कर्ष के लिए सर्वोत्कृष्ट बताया है, लेकिन इसे भारत का दुर्भाग्य कहेंगे कि यहां की माटी पर मुट्ठी भर लोग ऐसे हैं, जो पाश्चात्य विचारधारा का अनुगामी बनते हुए यहां की परंपरा और प्रतीकों का जमकर माखौल उड़ाने में अपने को धन्य समझते है। इस विचारधारा के अनुयायी 'कम्युनिस्ट' कहलाते है। विदेशी चंदे पर पलने वाले और कांग्रेस की जूठन पर अपनी विचारधारा को पोषित करने वाले 'कम्युनिस्टों' की कारस्तानी भारत के लिए चिंता का विषय है। हमारे राष्ट्रीय नायकों ने बहुत पहले कम्युनिस्टों की विचारधारा के प्रति चिंता प्रकट की थी और देशवासियों को सावधान किया था। आज उनकी बात सच साबित होती दिखाई दे रही है। सच में, माक्र्सवाद की सड़ांध से भारत प्रदूषित हो रहा है।

आधुनिक भारत के इतिहास में संपूर्ण क्रांति के उद्धोषक, 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' के प्रतीक, जननायक तथा युगद्रष्टा जयप्रकाश नारायण भारतीय विचारकों तथा चिंतकों में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनके विचारों से जनमानस आंदोलित हुआ, जिसके दूरगामी परिणाम हुए। साथ ही वे महान स्वतंत्रता संनानी तथा संगठक भी थे। ब्रिटीश सरकार उन्हें सबसे खतरनाक व्यक्ति मानती थी। मोहम्मद करीम छागला के शब्दों में-'वे भारत में दूसरी आजादी के जनक थे।

सामान्यत: जयप्रकाशजी के विचारों को पांच सोपानों में बांटा जाता है। ये है- कट्टर माक्र्सवादी, समाजवादी, गांधीवादी, सर्वोदयवादी, तथा समग्र क्रांतिकारी।

यद्यपि जयप्रकाश नारायण का माक्र्सवाद के प्रति मोह समाप्त नहीं हुआ, परंतु माक्र्सवाद की अनेक कमियां उनके मन को कचोटने लगी। फलत: वे शनै:-शनै: माक्र्सवाद से दूर होते गए। उसके कई कारण रहे।

पहले, उन्होंने देखा कि भारतीय कम्युनिस्टों का यहां के राष्ट्रीय आंदोलन में कोई योगदान नहीं है। न ही उन्होंने सविनय आंदोलन में कोई योगदान दिया, न ही अगले आंदोलनों में।

दूसरे, यहां की कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्रता की पक्षधर नहीं है, बल्कि सोवियत संघ के निर्देशन में कार्य करती है।

तीसरे, जयप्रकाश नारायण भारतीय कम्युनिस्टों के हिंसात्मक साधनों के पक्षपाती नहीं थे।

चौथे, जयप्रकाश ने अपने निष्कर्षों तथा विश्लेषणों द्वारा स्पष्ट किया कि सोवियत संघ या चीन की सफलताओं का श्रेय साम्यवादियों की क्रांति को नहीं दिया जा सकता। वे रूस की सफलता का कारण प्रथम विश्वयुध्द तथा चीन की सफलता का रहस्य द्वितीय विश्वयुध्द को मानते थे। उनका मत था कि यदि ये युध्द न होते तो इनकी क्रांतियां दबा दी जातीं।

पांचवें, जयप्रकाश नारायण रूस में स्टालिन को भारी भूल मानते थे। उनका मत था कि जर्मनी में हिटलर की ताकत मजबूत होने के लिए स्टालिन तथा अंतरराष्ट्रीय संगठन दोषी हैं।

छठे, उनका मत था कि क्रेमेलिन के निर्देशन में कार्य करने वाले विभिन्न देशों के साम्यवादी गलत मार्ग का अनुसरण करते रहे हैं। इससे उनके अपने देश की उपेक्षा होती रही है।

सातवें, जयप्रकाश नारायण साम्यवादियों से सदैव आशंकित रहते थे तथा उनकी निष्ठा पर संदेह रहता था। 1957 के चुनावों के पश्चात् एक पत्र में अपने साथियों को उन्होंने लिखा कि विश्व के साम्यवादियों ने किस प्रकार माक्र्सवाद को तोड़ा मरोड़ा है।

आठवें, वे रूसी ढंग के सर्वाधिकारी अधिनायकवाद को भारत के लिए अनुचित मानते थे।

"History will soon prone that Communism instead of being the final flowering of human civilisation, was a temporary aberration of the human mind, a brief nightmare to be soon forgotten Communism, as it grew up in Russia and in growing up in china now, rather the darkness of the soul and imprisonment of the mind, colossal violence and injustice. It is not the cold war or the economic war that will spell the ultimate defeat of Communism, it is rather, the working of the human sprit."
-Jay Prakash Narayan