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Monday, 25 February, 2008

क्या यह आर्थिक मॉडल वास्तव में भारतीय है?

लेखक- एस. गुरूमूर्ति

इस लेख के शीर्षक-प्रश्न के उत्तर की पुष्टि व्यावहारिक प्रमाणों व वैचारिक तर्कों दोनों से देनी होगी और देनी भी पड़ेगी। व्यावहारिक प्रमाणों के बिना आर्थिक मसलों पर दार्शनिक विवेचना विवादित तो होगी ही साथ ही तुच्छ भी समझी जाएगी। इसलिए व्यावहारिक बहस पहले। लेकिन बहस शुरू करने से पहले एक चेतावनी! मामला जटिल है, अतएव सामान्यतया, तमाम आंकड़े व विस्तृत विश्लेषण की जरूरत होगी। खासतौर पर इस प्रश्न की मानक प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग है, जैसा कि लेख की मांग (चर्चा करने की) है। लेकिन यह कोई शोध लेख नहीं है, जहां भारी-भरकम आंकड़ों की जरूरत होगी। अपेक्षाकृत इस संक्षिप्त लेख का उद्देश्य महज दो महत्वपूर्ण 'व्यावहारिक आंकड़े' के जरिए उत्तर देना है। इसलिए यह लेख दो अति सांकेतिक लेकिन ठोस व अविवादित तथ्यों पर आधाारित हैं। पहला, क्या यहां के आर्थिक प्रतिरूप में कुछ खास है, जो भारतीय है और वह ऐसे पश्चिमी सामाजिक-आर्थिक मॉडल से भिन्न है, जिसे बतौर 'वैश्विक' स्वीकृति मिल रही है और सभी के लिए फायदेमंद बताया जा रहा है?

सर्वप्रथम, भारत में निवेश व बचत की गुणवत्ता को लेते हैं। इस समय घरेलू बचत भारत की सकल राष्ट्रीय आय की 32 प्रतिशत से ज्यादा है और ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस साल यह 34 फीसदी को छू लेगी। इस तरह हमारा देश उन देशों में शामिल है, जहां बचत दर सर्वोच्च है। भारत की संपूर्ण बचत में पारिवारिक बचत का हिस्सा 80 प्रतिशत है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय आर्थिक परिदृश्य में परिवार संस्था का कितना दखल है। लेकिन बचत की राशि से ज्यादा बचत की प्रकृति महत्वपूर्ण है, जो समाज के भौतिक जीवन के नजरिए को स्पष्ट रेखांकित करती है। समस्त बचत का 98 प्रतिशत हिस्सा सुरक्षित बचत है, जो फिक्स्ड रेट सेविंग जैसे- भविष्य निधि व बैंक जमा के रूप में हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि अति प्रचारित स्टाक मार्केट ने भारत की बचत को कितना आकर्षित किया है? महज 2 प्रतिशत। जो इस बात का संकेत है कि देश के बहुत ही कम परिवारों का जुड़ाव स्टॉक मार्केट से है। जबकि अन्य देशों की स्थिति बिल्कुल विपरीत है। एक अनुमान के मुताबिक 55 प्रतिशत अमेरिकी परिवारों का संबंधा स्टॉक मार्केट से है। इससे बहुत कम परिवार जर्मनी में (अमेरिकी तुलना में आधे) में स्टॉक मार्केट से जुड़े हुए हैं। जहां तक जापान की बात है, वहां अमेरिका की तुलना में एक तिहाई परिवारों का संबंघ स्टॉक मार्केट से हैं।

इसका क्या अर्थ है? बिल्कुल साधारण, पैसे के मामले में समाज उतना रिस्क नहीं लेता। कुछ समाज ज्यादा रिस्क लेते हैं और कुछ समाज उससे कम। उनकी तुलना में भारतीय 'नो-रिस्क' की कैटेगरी में आते हैं। इसका एक यह भी अर्थ है कि भारत में जोखिम पूंजी (रिस्क कैपिटल) का निर्माण नहीं होता। बहुत से लोग इसे अल्प विकसित 'स्टॉक मार्केट' व परंपरागत तथा रूढ़िगत सामाजिक सोच के रूप में भी उध्दृत करते हैं, जिसे सुधारवादी दूर करना चाहते हैं। दरअसल, ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों में निवेश से भारतीयों के कतराने का संबंध देश में नीति-निर्माण से है। लेकिन क्या जोखिम पूंजी का अल्प निर्माण एक कमी है, जैसा की बहुत से लोग सोचते हैं? इस प्रश्न का जवाब तलाशने से पहले हमें दूसरे प्रश्न के उत्तर देने की जरूरत है। क्यों अमेरिकन अपनी बचत को स्टॉक मार्केट में लगाने का जोखिम लेते हैं, जबकि भारतीय ऐसा नहीं करते?

अमेरिकी समाज में भारी उपभोग के चलते अमेरिकन का झुकाव बचत की तरफ कम है। उपभोग को बढ़ाने के लिए ब्याज दर लगातार एक जैसी बनी (कम स्तर पर) हुई है। पहले से ही कम बचत पर ज्यादा लाभ कमाने की जोखिम लेने के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है और दबाव भी डाला जाता है। सरकार की सामाजिक सुरक्षा द्वारा भी अमेरिकियों को ज्यादा उपभोग व कम बचत करने का प्रोत्साहन मिलता है। जब व्यक्ति एक बार आश्वस्त हो जाता है कि रिटायर के बाद उसकी देखरेख सरकार करेगी, या बीमार होने पर उसका इलाज होगा, या उसके बेरोजगार बेटे, बेटी विधावा पत्नी या वृध्द मां-बाप की देखरेख सरकार करेगी, तो स्वाभाविक तौर पर बचत की तरफ उसका झुकाव कम होगा। यदि कोई बचत भी करता है, तो वह स्टॉक मार्केट या अन्य जोखिम भरे क्षेत्रों में निवेश करने का जोखिम लेता है। पश्चिमी देश व अमेरिका में परिवारिक दायित्व राष्ट्रीयकृत हैं। यही वजह है कि वहां पारिवारिक बचत काफी कम है यहां तक कि 'निगेटिव' है। आधाुनिकता के दवाब मसलन- तलाक, सम-लैंगिक विवाह, फेमिनिज्म और सम-लैंगिकता के कारण परंपरागत परिवारों की संख्या काफी कम है। आधो से अधिक परिवार 'सिंगल पैरेंट्स फैमिली' हैं और ज्यादातर परिवार उधार व क्रेडिट कार्ड पर जी रहे हैं। अमेरिका में समस्त क्रेडिट कार्डों की संख्या वहां की वयस्क आबादी की चार गुना है, जिसके फलस्वरूप जो भी बचत होती है उसका बड़ा हिस्सा जोखिम भरे स्टॉक मार्केट में चला जाता है। यही वजह है कि ज्यादा परिवार स्टॉक मार्केट से जुड़े हैं। इस प्रकार अमेरिकी स्टाक मार्केट का रोजाना सूचकांक अमेरिका के आर्थिक स्वास्थ्य को दर्शाता है। इसके अलावा यहां की 'मासिक खुदरा ब्रिकी' आंकड़े अमेरिका के खपत स्तर को बताते हैं। लेकिन जो देखने में आ रहा है वह यह कि अमेरिका की सामाजिक सुरक्षा अमेरिकी सरकार को दिवालिया बना रही है। यही नहीं, अमेरिकियों में बचत को असंगत बनाने में इसकी प्रमुख भूमिका है। इस तरह अति सक्रिय और बहु-व्यापक स्टाक मार्केट 'सामाजिक सुरक्षा दायित्वों' की उपज है, जिसकी जिम्मेदारी राज्य ने परिवार से लेकर राष्ट्रीयकृत कर दिया है।

यहां स्थिति पूर्णतया अलग है। भारतीय परिवार सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद लेते हैं। कुछ अपवादों को छोड़कर ज्यादातर परिवार अपने बुजुर्गों, बेरोजगार बेटे, बेटियों आदि की देखरेख करते हैं। यह किसी आर्थिक दवाबवष नहीं, बल्कि पारिवारिक, सांस्कृतिक व धार्मिक कर्तव्य के कारण है। इस अर्थ में भारत विश्व की सबसे बड़ी निजीकृत अर्थव्यवस्था है, क्योंकि यहां पश्चिम का सबसे बड़ा लोक दायित्व- यहां की जीवन शैली में रची-बसी संस्कृति के कारण-परिवार यानी निजी हाथों में है, वह भी बिना किसी कानून या सरकारी आदेशों के। खास तौर पर अमेरिका पिछले कई सालों से अपनी कई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को निजीकरण करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन वह ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि वहां भारतीय समाज जैसा कोई पारिवारिक सिस्टम नहीं है, जो इन दायित्वों का निर्वाह कर सके। यदि यहां कोई राज्य सहाय्यित सामाजिक सुरक्षा है, तो वह केवल सरकारी कर्मचारियों की पेंशन योजना है। लेकिन यह केवल सीमित योजना है, बहु-व्यापक नहीं। भारतीय परिवारों की अधिकांश बचत सावधि योजनाओं या सुरक्षित प्रतिभूतियों में निवेश होती है। अतएव भारतीय स्टॉक मार्केट न तो भारतीय समाज की समृध्दि दर्शाते हैं और न ही वे भारतीय निवेशकों के विश्वास को प्रदर्शित करते हैं, जैसा कि पश्चिमी देश के स्टॉक मार्केट करते हैं। हालांकि यह (भारतीय स्टॉक मार्केट) पश्चिमी निवेशकों के विश्वास को दर्शा सकता है। लेकिन स्टॉक मार्केट की जो महत्ता अमेरिकी या अन्य देशों में है, वैसी ही महत्ता हमारे आर्थिक विचारकों, लेखकों व अन्य लोगों द्वारा भारतीय स्टॉक मार्केट को देना कुछ और नहीं बल्कि साफ बरगलाने की कोशिश है।

स्टॉक मार्केट में सामान्य भारतीय की अरूचि को देखते हुए वर्तमान वित्तमंत्री ने बार-बार भारतीय निवेशकों से आग्रह किया कि वे बैंकों के बजाय शेयर बाजार में पैसा लगाएं, लेकिन भारतीय परिवारों ने इस एक्सपर्ट सलाह पर गौर नहीं किया। वहीं, भारतीय परिवार आधुनिक आर्थिक विचारकों की राय के विपरीत, सोना पर ज्यादा विश्वास करते हैं, न टीसीएस या इंफोसिस जैसी कंपनियों के शेयरों पर। वे विश्व के समस्त स्वर्ण उत्पादन का एक तिहाई हिस्सा खरीदते हैं, जिसकी कीमत उनके द्वारा खरीदे गए स्टॉक की कीमत से कहीं ज्यादा है। पश्चिमी आर्थिक विचारक तथा यहां पर उनकी कार्बन कॉपी, सोने की खरीद को उपभोग व शान-शौकत की वस्तु मानते हैं। लेकिन सामान्य भारतीय, चाहे पढ़ा-लिखा हो या अशिक्षित हो, इसे विश्वसनीय निवेश मानता है। साथ ही वे इसे आभूषण के तौर पर इसे इस्तेमाल भी कर लेते हैं। वे यह जानते हैं कि दलाल स्ट्रीट में खरीदे गए शेयर उनके शरीर की शोभा नहीं बढ़ा सकते हैं और वे यह भी समझते हैं कि सोने ही एक मात्र निवेश है, जिसका मूल्य नहीं गिरता। आर्थिक विश्लेषक इसे निवेश का प्राचीन मॉडल कर कह आलोचना कर सकते हैं। सोने के प्रति ललक के कारण टिकाऊ व गैर टिकाऊ वस्तुओं के प्रति झुकाव कम होता है। आखिरकार, सुरक्षित बचत, कम उपभोग और सोने की ललक के क्या संकेत हैं। इन सभी को यदि समेकित रूप से देखें तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था की स्त्रीगत विशेषता है। हां, भारतीय अर्थव्यवस्था का यह अनाक्रमक आयाम, इसकी पारिवारिक विशिष्टता व भारतीय परिवार की खूबियों के कारण से है, जिन पर महिलाओं का अत्यधिक दबदबा है। इस प्रकार, भारतीय आर्थिक मॉडल का प्रथम अंग 'परिवार' है।

दूसरा महत्वपूर्ण सांकेतिक सांख्यकीय आंकड़ा, हालांकि यह पूर्णतया आर्थिक नहीं है, लेकिन इसका राजनैतिक अर्थशास्त्र पर गहरा असर है, वह यह है कि 2004 के अंत तक भारत में गांवों की संख्या लगभग 7 लाख थी, लेकिन पुलिस स्टेशन की संख्या केवल 12,404 ही थी। फिर भी यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक यहां पर संसार में सबसे कम अपराधा हैं। कुछ गुमराह लोग तर्क देते हैं अभिलिखित अपराधा इसलिए कम हैं, क्योंकि अपराधों का पता नहीं चलता और उनकी रिपोर्ट नहीं प्राप्त होती।

दरअसल, पुलिस की कम जरूरत की असली वजह भारतीय समाज की विशिष्टता है। भारतीय समाज अविश्वसनीय रूप से जटिल है। यदि हम संसार को एक तरफ रख दें और भारतीय समाज का दूसरी तरफ, तब भी भारतीय समाज ज्यादा जटिल दिखाई पड़ेगा, क्योंकि भारतीय समाज तमाम समुदायों, संप्रदायों, अनेकों देवी-देवता, विभिन्न भाषाएं, रीति-रिवाज से ओत-प्रोत है। फिर भी हम एक राष्ट्र व एक राज्य है और हमारी अर्थव्यवस्था भी एक है। क्योंकि, उदाहरण के तौर पर, हम लोग करोड़ों देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, लेकिन भारतीय देवता आपस में झगड़ते नहीं हैं। नतीजतन, करोड़ों देवी-देवताओं के पुजारी आपस में उनके नाम पर संघर्ष नहीं करते। आखिर इस विशाल व अति जटिल परंपरागत समाज का (संपूर्ण मानवता का छठां हिस्सा) आधुनिक भारतीय संवैधानिक व आर्थिक व्यवस्था में क्या भूमिका है? इसका उत्तर विशिष्ट भारतीय आर्थिक मॉडल के अस्तित्व का पूर्ण संकेत दे देगा।

पश्चिमी की अवधारणा के नजरिए से देखें तो भारत स्वशासित ज्यादा है, बजाय राज्य द्वारा शासित होने के। स्वशासित होने की योग्यता का विकास भारतीय परपंरा व रीति-रिवाजों के तहत विकसित अनुशासन की वजह से है, जो भारत के परिवार व समाज को शासित करती है। भारत की विविधाता इसमें मदद करती है और अनुशासन के परंपरागत नियमों को बरकरार रखने की क्षमता को मजबूत करती है। दरअसल, यहां ग्रामीण समुदाय की भूमिका (यहां तक की जाति व्यवस्था की भूमिका भी, जिसे कई कारणों से तुच्छ प्रमाणित किया गया, जिसकी चर्चा हम लेख के अंत में करेंगे) पुनर्विचार की मांग करती है। इस लेख का मत है कि जातिगत चुनावी राजनीति के घालमेल के कारण सामाजिक-राजनीतिक मोर्चा पर काफी भ्रम हुआ। स्वदेशी अकादमी परिषद् द्वारा कराए गए एक पांच साला सर्वेक्षण से (जिसमें 30 से अधिक समुदाय आधारित औद्योगिक समूह शामिल हैं) यह तथ्य उजागर हुआ कि यूपी, पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिनाडु के औद्योगिक संकुल के विकास में स्थानीय जातियों की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। गौरतलब है कि इन स्थानीय जातियों जिसमें अगड़ी और पिछड़ी जातियां शामिल हैं। आगरा व कानुपर में अनुसूचित जातियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

इन औद्योगिक संकुलों का विकास सामुदायिक प्रतियोगिता व आपसी सहयोग के मिलेजुले प्रभाव के कारण हुआ, जिसे 19वीं शताब्दी में एमाइल दरखाइम ने सोशल कैपिटल कहा और 21वीं शताब्दी में फ्रांसिस फुकुयामा भी इस बात को अनेकों बार दुहराया। ये संकुल इस बात के प्रमाण हैं कि समुदाय और जातियां भारत की सोशल कैपीटल हो सकती है, जैसा कि स्वामीनाथन अंकलेश्वर अय्यर ने एकोनॉमिक टाइम्स ( वर्ष 2000) में लिखे अपने लेखों से स्पष्ट किया है। एकोनॉमिक पावर हाउस के रूप में जाति की अवधारणा पर जोर गुरूचरण दास ने अपनी पुस्तक 'इंडिया अनबाउंडेड' में भी किया है।

स्वदेशी एकेडमी कौंसिल द्वारा किए अधययन यह पता चलता है कि जहां राजनीतिक वर्गों द्वारा समुदाय व जातियों को राजनीति में हिस्सेदारी के बदले राज्य समर्थित लाभ (State-conferred benifits) के लिए प्रेरित किया गया, वहां वे वोट बैंक के रूप में परिवर्तित हो गए और राज्य पर उनकी निर्भरता बढ़ गई। जब वे वोट बैंक के रूप में परिवर्तित हो गए और राज्य पर उनकी निर्भरता बढी, तब विकास के स्थान पर उनकी अवनति हुई। वहीं दूसरी तरफ स्वदेशी एकेडमी कौंसिल ने अपने अधययन में पाया कि जो समुदाय या जातियां अपने व्यवसाय व उद्योग में लगी रहीं, उनका विकास तेजी से हुआ। बाद में चलकर इन जातियों व समुदायों ने राजनीतिक मामलों में भी जमकर हिस्सेदारी ली। आखिर इन महत्वपूर्ण विषयों पर वस्तुपरक अधययन क्यों नहीं हो रहे है? इसका जवाब इतिहास की ओर इशारा करता है। दरअसल, इसका कारण बौध्दिक सुस्ती और वर्तमान राजनीतिक व बौध्दिक रूप से तथाकथित सही के खिलाफ अलग राय रखने की बौध्दिक हिचकिचाहट है।

आइए हम भारतीय समाज व इसकी परंपरा (जिसमें जातियां भी शामिल हैं) के खिलाफ कल्पित बातों के इतिहास पर नजर डालते हैं। यदि हम पश्चिमी समाज से इसकी तुलना करें तो भारतीय समाज का बाह्य रूप अराजकतापूर्ण है। चर्चिल ने कहा था कि यदि भारत में लोकतंत्र लाने का प्रयास किया जाता है तो वह अराजकता में बदल जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यदि वे कुछ दिन और जिंदा रहते तो उन्हें अपनी बातों को वापस लेना ही पड़ता। 1950 के दौरान भारत में अमेरिकी राजदूत केनिथ गालब्रेथ ने उपहासपूर्ण ढंग से भारत को Functioning anarchy कहा था, जिसको उन्होंने हाल ही में इस तरह संशोधित किया कि मेरा मतलब यह था कि भारतीय राज्य पर निर्भर नहीं थे और यह भारतीय समाज की ताकत थी, जो भारत को विकास की प्रक्रिया पर ले गई। भारतीय समाज का बाह्य रूप विश्व के प्रमुख लोगों को धोखे में क्यों रखता है कि वे सत्य से परे जाकर अपने विचार देते हैं।

इसका कारण यह है कि भारतीय समाज काफी हद तक संबंधों पर आधारित समाज है (एमाइल दरखाइम) और बहुत कम हद तक समझौते पर आधारित समाज (रूसो)। लेकिन भारत का संविधानवाद जो पूर्णतया एंग्लो-सैक्सन अनुभवों व ऐसे राजनीतिक तथा आर्थिक बहसों पर आधारित है, जो भारत की मूल विशेषता की अनदेखी करता है। आपसी संबंधों पर निर्भर रहने के कारण भारतवासी की सामूहिक रूप से सामाजिक समझौते द्वारा निर्मित राज्य पर निर्भरता कम है। वे परिवार, जाति व ग्राम्य स्तर के तमाम अंगों पर ज्यादा निर्भर हैं।

ये सब कुछ वे ही तत्तव हैं, जो संबंधों पर आधारित समाज में मिलते हैं और जिन पर एमाइल दरखाइम जैसे जर्मन परंपरावादियों से लेकर फ्रांसिस फुकुयामा जैसे आधुनिक विचारकों ने चर्चा की है। अति आधुनिक लोगों के उपहास (इन लोगों द्वारा नैतिक-सामाजिक निगरानी) के बावजूद बहुसंख्यक भारतीय-परिवार, जाति और समुदाय की निगरानी से लाभान्वित हैं। इसलिए उन्हें राज्य द्वारा निगरानी की कम जरूरत पड़ती है। यही वजह है कि यहां पुलिस थानों की संख्या कम है। एक चीज निश्चित है। मनुष्य को निगरानी की जरूरत पड़ती है। मसला यह है कि इस मामले में परिवार, माता-पिता या समाज ज्यादा बेहतर है या पुलिस थाने का पुलिस इंस्पेक्टर। इससे राज्य को राहत मिलती है, लेकिन इससे राजनीतिक वर्ग का स्व-निर्भर व स्वशासित समाज के साथ असहज महसूस करना स्वाभाविक है, क्योंकि वे राजनीतिक वर्ग पर निर्भर नहीं रहेंगे। स्वशासित व स्वप्रबंधान की शक्ति कहां से आती है? चर्चिल व गालब्रेथ को भारत की मुख्य विशेषता को न समझ पाने के लिए माफ किया जा सकता है, लेकिन भारत के 'अंग्रेजीदां' को कैसे माफ किया जा सकता है, जो न केवल भूल करते हैं, बल्कि भारत के मूल तत्तव को समस्या कहकर उपहास उड़ाते हैं?

यह हमें भारत की सामाजिक-आर्थिक या स्वदेशी के विस्तृत दार्शनिक आधार की ओर ले जाती है। महात्मा गांधी ने कहा था कि स्वदेशी सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विचारों का मिश्रण है। पंडित दीन दयाल ने कहा कि 'यह एकात्म संकल्पना है, जिसे ठीक ही गांधीजी ने पहले ही बहुत स्पष्ट भाषा में कहा है। इन दो महात्माओं ने जो कहा है उसका सार तत्तव यह है: सामाजिक अर्थशास्त्र-व्यक्तिगत, सामूहिक व व्यक्ति को प्रभावित करने वाले उन आदर्शों के बीच का संतुलन है, जो व्यक्तिवाद की वकालत नहीं करते। जैसा कि पूंजीवादी व मार्क्सवादी आर्थिक विचारों में मिलता है।

भारत के वर्तमान इतिहासकार व आर्थिक विचारक जो भारत की सामाजिक आर्थिक समस्या की जड़ भारत की परंपरा को मानते हैं, वे दरअसल, जर्मन दार्शनिक मैक्स वेबर की पुस्तक 'द् सोशियोलॉजी ऑफ इकोनामिक्स' से प्रेरणा लेते हैं। वेबेरियन का मत है कि आधुनिक पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था, प्रोटेस्टेंट ईसाई मत की देन है, जिसने व्यक्तिवाद को जन्म दिया, ईसाई जगत में पुनर्जागरण को प्रोत्साहित किया और स्वतंत्र सोच को विकसित किया। 'कांन्टे्र सोशल मॉडल' को उध्दृत करते हुए पिछली शताब्दी के प्रथम चतुर्थांश में वेबर ने भी स्वीकार किया था कि हिन्दू और बौध्द (भारत और चीन पढ़े) कर्म और पुर्नजन्म में विश्वास और भारत में जाति व्यवस्था के कड़ापन के कारण प्रोटेस्टेंट समाज की तरह विकास नहीं कर सकते। फलस्वरूप, समस्त भारतीय सामाजिक विचार व आर्थिक सिध्दांत इस संकल्पना से उत्पन्न हुए कि जब तक भारत के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को धवस्त नहीं किया जाएगा, तब तक भारत का विकास व आधुनिकीकरण नहीं हो सकता। इस तरह भारतीय सामाजिक सुधारकों, सामाजिक-आर्थिक चिंतकों खास तौर पर माक्र्सवादी व समाजवादी विचारकों ने भारतीय व्यवस्था को निरपेक्ष, व्यक्तिवादी बनाने तथा समुदाय, ग्राम्य व्यवस्था को तोड़ने पर जोर दिया। साथ ही, बड़े पैमाने पर गांवों से पलायन कर शहरों में बसने के लिए (शहरीकरण) प्रेरित किया और समेकित रूप से इसे आधुनिकता का पर्याय माना गया।

भारतीय समाज पर वेबर के विचार पूंजीवादी दृष्टिकोण पर आधारित हैं, जबकि बेबर से लगभग 70 साल पहले अपने लेखों में कार्ल माक्र्स ने भारतीय समाज की सामाजिक नजरिए से व्याख्या की (न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून में 25 जून 1853 को प्रकाशित)। साधारण शब्दों में कार्ल मार्क्स के विचार ये हैं: ग्राम्य अर्थतंत्र या भारत के गणतंत्र पूंजीवादी व्यवस्था की तुलना में कम शोषणकारी हैं। वे भारत की शक्ति भी हैं और उनकी कमजोरी भी। माक्र्स के शब्दों में, 'सभी गृह युध्द, आक्रमण, क्रांतियां, विजय व अकाल अत्यधिक जटिल व विधवंसकारी तो दिखाई पड़ते हैं, लेकिन इनका असर सतह से नीचे नहीं हुआ। इंग्लैंड ने समस्त भारतीय सामाजिक ढांचे को तोड़ दिया, वह भी बिना किसी पुनर्संरचना के संकेत के, जो अभी भी नजर नहीं आते।' लेकिन वे कहते हैं, 'उन्होंने (ब्रिटिश) स्थानीय उद्योग को चौपट करते हुए स्थानीय समुदाय को भंगकर इसे (भारत) नष्ट कर दिया और स्थानीय समाज की सभी उत्कृष्ट व उन्नत चीजों को खत्म कर दिया।' साथ ही, वह यह भी कहते हैं, 'इंग्लैंड, सच्चे अर्थों में, हिंदोस्तान में एक सामाजिक क्रांति ला रहा है, लेकिन वह केवल अपने स्वार्थी हितों के कारण..।' मार्क्स इस विधवंस को सही ठहराते हैं और कहते हैं कि इस तरह की विधवंस की जरूरत है, क्योंकि भारत का स्थिर ग्राम्य समाज, क्रांति के मूल तत्तवों को अपनाने की इजाजत नहीं देता और क्रांति के बिना, जैसा कि मार्क्स का विश्वास है, मानवता के सपने पूरे नहीं होंगे। आखिर में मार्क्स ने कहा कि इंग्लैंड का यह अपराधा इतिहास का वह छिपा औजार है जो क्रांति लाने में सहायक होगा। जर्मन कवि गोथे को उध्दृत करते हुए यहां तक कहा कि ब्रिटिश द्वारा विनाश स्वागतयोग्य है, क्योंकि यह सुखद है। (गोथे- ' Should this touture then torment us, since it bring us greater pleasure. ')

वेबेरियन व मार्क्स की दोनों विचारधाराएं, प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियन सामाजिक मॉडल की समानांतर उत्पाद हैं। यदि इसे धार्मिक संदर्भ में देखें तो यह चर्च के खिलाफ एक विद्रोह था, जो व्यक्तिवाद का हिमायती था। दोनों का विश्वास था कि भारतीय समाज व इसकी पंरपरा को तोड़ना चाहिए और इसी विखंडन को आधुनिकता के रूप में प्रेषित किया। कुल मिलकार पूंजीवादी व माक्र्सवादियों का यह कहना है कि भारतीय ग्राम्य-समुदाय मॉडल को नष्ट किया जाना चाहिए, ताकि वेबर की बाजार आधारित अर्थव्यवस्था व पूंजीवाद तथा माक्र्स की सामाजिक क्रांति का रास्ता खुल सके। जब तक ग्राम्य-समुदाय व्यवस्था जीवित है-जो आज भी जीवित है- तब तक भारत में न तो पूंजीवादी और न ही साम्यवादी मॉडल स्वीकार है। क्योंकि भारत में जाति, समुदाय और समाज को नष्ट कर व्यक्तियों को झुंड के रूप में नहीं बदला जा सकता।

वहीं दूसरी तरफ, पूंजीवादी और साम्यवादी दोनों ने सामाजिक ढांचे को नष्ट कर दिया, साथ ही, परिवार संस्था को भी विखंडित कर दिया। जब माक्र्स व वेबर अपने सिध्दांतों को विकसित कर रहे थे, तो वे समुदाय की शोषण वृत्ति पर विचार तो किया, लेकिन परिवार पर उस तरह नहीं सोचा। लेकिन जब समाज की निगरानी से मुक्त व्यक्तिवादी सोच का प्रभाव फैला तो इसका असर परिवार भी पड़ा। आज प्रोटेस्टेंट तथा पूर्व साम्यवादी समाज में सबसे बड़ी आर्थिक समस्या परिवार की बिखराव है। इस पारिवारिक टूटन के आर्थिक नतीजे -सामाजिक सुरक्षा दायित्व व पारिवारिक बचत का ह्रास- समाज को दिवालिया बना रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ कैथोलिक समाज मसलन-इटली, स्पेन, आयरलैंड और फ्रांस अपेक्षाकृत बेहतर हैं, क्योंकि इन लोगों ने परिवार व मुख्यतया समुदाय मॉडल को सुरक्षित रखा है।

यहीं व्यावहारिक प्रमाण व दार्शनिक संकल्पना- जिसकी चर्चा लेख के शुरू में हुई है-मिलते हैं और यहीं महात्मा गांधी व दीनदयाल द्वारा प्रवर्तित भारतीय मॉडल वेबर (पूंजीवाद) और मार्क्स (साम्यवाद) के मॉडल से पूर्णतया भिन्न है। गांधीजी और दीनदयालजी का सिध्दांत व्यक्ति का परिवार, समाज और समुदाय के साथ एकात्म पर टिका है। साथ ही, गांधीजी व दीनदयालजी दोनों अपने आर्थिक मॉडल में सांस्कृतिक व सभ्यतागत तत्तवों का समावेश करते हैं। यह सांस्कृतिक व सभ्यतागत तत्तव समाज, समुदाय और परिवार के साथ व्यक्ति के संबंधों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। एक अर्थों में पश्चिम व्यक्तिवादिता पर जैसा जोर देता है, वैसा जोर भारत में नहीं है और व्यक्तिवाद की जैसी अवधाारणा भारत में है, वैसी अवधारणा पश्चिम व साम्यवादी देशों में नहीं है। गांधीजी और दीनदयालजी, दोनों में से किसी ने भी कार्ल माक्र्स की तरह दार्शनिक अवधारणा का प्रतिपादन नहीं किया। वे व्यावहारिक जीवन से प्राप्त अनुभवों के आधार पर अपने सिध्दांत प्रस्तुत किए। भारत का समाज ही (परिवार, समुदाय व समाज के साथ व्यक्ति का एकात्म) भारत की सबसे अहम संस्था है और इसका सामूहिक प्रभाव भारत की सामाजिक पूंजी है।

पूर्व में उल्लिखित मामलों के अतिरिक्त भारत में उच्च बचत के लिए परिवार का योगदान सर्वाधिक है, जो इस वक्त सकल राष्ट्रीय आय की 34 फीसदी है और इसमें देश के 80 प्रतिशत परिवारों का योगदान है। वहीं, इसके विपरित प्रोटेस्टेंट व पूर्व-साम्यवादी समाजों में अल्प पारिवारिक बचत है। इन परिवारों पर केवल कर्ज हैं। अमेरिकी में 21 करोड़ वयस्क आबादी के 57 करोड़ क्रेडिट कार्ड के चलते अमेरिकी परिवारों पर 2 ट्रिलियन डालर से ज्यादा का कर्ज है, जो 90 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा है। अमेरिकी में प्रति व्यक्ति पर चार क्रेडिट कार्ड हैं। जबकि एकीकृत समाजों में उपभोग व बचत में संतुलन बना रहता है और जिसका प्रभाव बचत पर पड़ता है। वहीं व्यक्तिनिष्ठ समाज में इस तरह का संतुलन नहीं दिखता, नतीजतन बचत की बजाय ऋण व खर्च पर जोर रहता है। उसका परिणाम यह रहा कि पिछले 6 सालों से अमेरिकी अर्थव्यवस्था उधार पर चल रही है। अमेरिका ने भारत समेत लगभग सभी देशों से कर्ज ले रखा है। परिवार खंडित समाजों में सामाजिक सुरक्षा का दायित्व राज्य पर होता है, जबकि भारत में सामाजिक सुरक्षा की सभी जिम्मेदारी का निर्वहन परिवार करता है।

इस आधार पर हम कह सकते हैं कि भारत विश्व की सबसे बड़ी निजी अर्थव्यवस्था है। खासतौर पर पश्चिम में सरकार पर सबसे बड़ा भार सामाजिक सुरक्षा का है। विशेषज्ञों के अनुसार 2020 तक जाते-जाते अमेरिकी स्वास्थ्य सुरक्षा अमेरिकी अर्थव्यवस्था को दिवालिया बना देगी। इसके ठीक विपरित, भारत में सामाजिक सुरक्षा का दायित्व भारतीय परिवार उठाते हैं। यहीं वजह है कि वे सुरक्षित निवेश की तलाश करते हैं और स्टॉक मार्केट में निवेश करने से कतराते हैं।

अब कोई भी समझ सकता है कि अमेरिकी स्टॉक मार्केट में पूंजी क्यों लगाते हैं और भारत के लोग सुरक्षित फिक्स्ड रेट सिक्योरिटी व बैंक डिपाजिट में अपना धान जमा करते हैं? आखिर इस अंतर के क्या नतीजे हो सकते हैं? परिवार-खंडित समाजों की तुलना में भारत की ब्याज दर ज्यादा होना निश्चित है। लेकिन यहां कम ब्याज दर की मांग है, जो इस बात का संकेत है कि सुधार प्रक्रिया जारी है।

दूसरा, पश्चिम में उद्योगों की वित्तीय जरूरतें ज्यादातर इक्विटी से पूरी हो जाती है और वे कर्ज पर कम निर्भर रहते हैं। यदि बड़ी इक्विटी से सुरक्षित उद्योग की बैंक देय-राशि बाकी है, तो 'बेसल नॉर्म' के तहत बैंक उसे गैर-कार्यशील पूंजी (Non-Preforming Asset) घोषित कर सकता है। लेकिन भारतीय उद्योगों में अपेक्षाकृत कम इक्विटी फाइनेंस है, इसलिए पश्चिम की तरह 'गैर-कार्यशील पूंजी' का नियम यहां पर लागू नहीं हो सकता। लेकिन यहां पर, परिस्थितियों में अंतर किए बिना सुधार प्रक्रिया के नाम पर पश्चिम के सभी नियामक नियमों की अंधी नकल जारी है। परिवार-खंडित पश्चिम समाज में सड़क, रेलवे, जल-वितरण, हवाई अड्डे, बंदरगाहों को सरकार ने निजी हाथों में सौंप दिए हैं और पारिवारिक दायित्व से जुड़े मामलों- मसलन-वृध्दों की देखरेख, बेरोजगार पारिवारिक सदस्यों को सहायता आदि-का राष्ट्रीयकरण कर परिवार से राज्य को हस्तांतरित कर दिए गए।

भारत में स्वदेशी या भारतीय दृष्टिकोण को सुरक्षित रखने की जरूरत है और यह भी प्रयास होने चाहिए कि परिवार व समाज के कार्य राज्य को न सौंपे जाय। साथ ही यह भी कोशिश होनी चाहिए कि व्यक्ति को राज्य या बाजार के हवाले न कर दिया जाय। अतएव, हम समझ सकते हैं कि परिवार, समुदाय और समाज से जुड़े एकात्म मानव की अर्थव्यवस्था सफल है, जबकि परिवार व समाज से विखंडित व्यक्तिवादी अर्थव्यवस्था कार्य-संस्कृति को नष्ट करती है। पूर्ववर्ती व्यवस्था ही भारतीय मॉडल है और इसी का भारत में चलन है। लेकिन सच यह है कि भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया में इस बात की पहचान आर्थिक, सामाजिक व पारिवारिक संदर्भ में नहीं की गई। यह संतुलन कानून द्वारा किस तरह भंग किया जा सकता है, इसका अनुमान 'घरेलू हिंसा कानून' से कर सकते हैं। इस कानून के जरिए राज्य व पुलिस का हस्तक्षेप हर आंगन में होगा। यह कानून पश्चिम की सामाजिक व पारिवारिक स्थित का अंधानुकरण है। किसी भी दल ने इस कानून के विरोधा का साहस नहीं दिखाया, क्योंकि इसे महिलाओं को सुरक्षित करने के रूप में देखा गया।

लेकिन कानून का पारित करने से पहले इस बात पर गौर नहीं किया गया कि विश्व की सर्वाधिक सशक्त (Empowerment) स्वीडेन की महिलाएं-जिनकी उद्योग, राजनीति, व्यवसाय, सरकार व अन्य तमाम क्षेत्रों में पुरूषों के साथ बराबर की हिस्सेदारी है- सर्वाधिक त्रसित महिलाओं में से हैं। एक अनुमान के अनुसार यहां की 40 फीसदी महिलाओं के साथ साल में कम से कम एक बार पीटने की घटना होती है।

लेकिन एक अंतर है, ये पति द्वारा नहीं, बल्कि अपने 'ब्यॉव फ्रेंड' द्वारा प्रताड़ित होती हैं। यहां के तीन-चौथाई पुरुष-स्त्री बिना विवाह किए एक साथ रहते हैं। इसलिए भारत में सामाजिक मसलों पर बहस के दौरान इस बात पर गौर नहीं किया जाता कि सरकार द्वारा उठाए गए सामाजिक उपायों का आर्थिक मामलों पर क्या प्रभाव पड़ेगा। ऐसा पश्चिम का अंधानुकरण के कारण है, जबकि यहां की सामाजिक स्थित पश्चिम से बिल्कुल भिन्न है। इसी को गांधीजी व दीनदयालजी ने सांस्कृतिक भिन्नता के रूप में व्याख्या दी और निश्चित रूप से इस बात को समझने में भारतीय राजनीतिक व बौध्दिक प्रतिष्ठान पूर्णतया असफल रहा।

भारतीय राजनीतिक प्रतिष्ठान ने गांधीजी को प्रत्येक शहरों व कस्बों की सड़कों को नामकरण कर उन्हें गलियों में भेज दिया, लेकिन इस बात को सुनिश्चित किया उनके नाम पर कोई केंद्रीय शिक्षण संस्था नहीं खोली जाय। जिसका तात्पर्य यह है गांधाीजी का नाम गलियों में है और उनके विचार भी गलियों तक सीमित हैं। उनके विचारों को शैक्षिक संस्थाओं व घरों में प्रवेश करने से रोका गया। फलस्वरूप, भारतीय युवा वर्ग यह नहीं जानता कि भारत में अपना ही सामाजिक- आर्थिक मॉडल सफल हो सकता है। इसके लिए देशी मस्तिष्क की जरूरत है, जो शहरों में उपजे विचारों से मैले न हों। ऐसा लगता है कि वर्तमान राजनीतिक प्रतिष्ठान ऐसे मस्तिष्क को बड़ी संख्या में लाने के अक्षम है।

एक खुले मस्तिष्क को आसानी से समझाया जा सकता है कि एकात्म चरित्र वाली भारतीय अर्थव्यवस्था ही सफल हो सकती है, जिसका दीनदयालजी ने अपनी पुस्तक में 'एकात्म मानववाद' तथा गांधीजी ने स्वधर्म सिध्दांत पर आधारित स्वदेशी अवधारणा में प्रस्तुत किया है।

(लेखक स्वदेशी जागरण मंच से जुड़े है)

Saturday, 23 February, 2008

वामपंथी व्याधि और उपचार

लेखक- शंकर शरण

जैसे पूरी पृथ्वी पर कोरियोलिस इफेक्ट एक समान है, और नदियों का बहाव इस तरह होता है कि सदैव दाहिना किनारा कटता और टूटता है, जबकि बाढ़ का पानी बाएं किनारे पर फैलता है, उसी तरह धारती पर लोकतांत्रिक उदारवाद के सभी रूप दक्षिणपंथ पर चोट करते हैं और वामपंथ को गले लगाते हैं। उनकी सहानुभूति सदैव वामपंथ के साथ रहती है, उन के पांव केवल बाईं दिशा में चलने को प्रस्तुत रहते हैं, उनके व्यस्त सिर सदैव वामपंथी तर्कों को सुनने के लिए हिलते हैं- किंतु यदि वे दक्षिणपंथ की ओर से एक बात सुनने के लिए कोई कदम उठाएं तो लज्जा अनुभव करते हैं।1
-अलेक्सांद्र सोल्झेनित्सिन, नवंबर 1916: लाल चक्र/द्वितीय गांठ

1.
आज धरती पर मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी राजनीति अप्रासंगिक हो चुकी है। जहां इस की उत्पति हुई थी, उन यूरोपीय देशों में अब इसका नामलेवा भी कठिनाई से मिलता है। तब क्यों भारत में न केवल यह अब भी प्रभावी है वरन् इसकी शक्ति बढ़ी प्रतीत होती है? भारतीय नीति-निर्माण, विशेषकर शिक्षा, संस्कृति और अंतर्राष्ट्रीय संबंध में इसका दखल पहले से बढ़ा है। यही नहीं, महत्वपूर्ण नियुक्तियों में मार्क्‍सवादियों की पसंद-नापसंद की निर्णायक भूमिका देखी जा रही है। इस चिंताजनक स्थिति के कारण विविध हैं, जिनमें कुछ हमारा दुर्भाग्‍य भी है। सभी बिंदुओं को ठीक-ठीक समझे बिना इस व्याधि का उपचार होना कठिन है।

वामपंथ की अपील एक भूमंडलीय व्याधि है, यह तो स्पष्ट है। मार्क्‍सवादी राजनीति के सभी दावों की पोल खुल जोने के बाद भी आज भी, हर कहीं, जब-तब, किसी विषय पर, वामपंथी शब्दजाल, यहां तक कि उसकी घातक-से-घातक अनुशंसाओं को भी आदर से देखा जाता है। इसका मुख्य कारण यही है कि वह निर्धान, दुर्बल जनों की पक्षधारता के रूप में प्रस्तुत की जाती है। चाहे व्यावहारिक परिणाम में वह दुर्बलों की और दुर्गति करने वाली ही क्यों न हो, किंतु जब कोई विचार वामपंथी शब्दजाल में आता है, तो अच्छे-अच्छे समझदार सहानुभूति में सिर हिलाते हैं। इसी को भूगोल के 'कोरियोलिस इफेक्ट' के रूपक से सोल्झेनित्सिन ने सटीक व्याख्यायित किया है।

किंतु भारत में वामपंथी प्रभाव बनने, बढ़ने के स्थानीय कारण भी रहे। ब्रिटिश शासन रहने के कारण हमारे उच्च वर्ग की कई पीढ़ियां औपनिवेशिक शिक्षा से दीक्षित हुई। जिसने सचेत रूप से भारतीय दर्शन, चिंतन, परंपरा एवं संस्कृति को हीन तथा पश्चिमी चिंतन को श्रेष्ठ प्रचारित किया था। सत्ता, शक्ति व निरंतर प्रचार के दबाव में यह भी दिखाया गया मानो भारत की पराधीनता में उस श्रेष्ठता का भी हाथ था। चूंकि मार्क्‍सवादी, वामपंथी विचारधाराएं भी पश्चिमी उत्पति हैं, अत: उन्हें भी महत्व दिया गया। उन्नीसवी-बीसवीं शती में हमारे देश के अनेक भावी नेता और भावी विद्वान पढ़ने इंग्लैंड गए, और वहां के प्रचलित फैशन वामपंथ से प्रभावित हो लौटे।

यही नहीं, भारत के हिंदू चिंतन, स्वदेशी राजनीतिक कार्यक्रमों, मानदंडों को अपदस्थ करने के लिए हमारे क्रांतिकारियों को मार्क्‍सवाद की ओर झुकाने और इस प्रकार पथभ्रष्ट करने का कार्य स्वयं अंग्रेज शासकों ने भी किया। जेल में भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को मार्क्‍सवादी पुस्तक-पुस्तिकाएं पढ़ने के लिए देना इस उद्देश्य से था कि वे स्वेदशी आंदोलन (1905-1910) की विशुध्द भारतीय राष्ट्रवादी, क्रांतिकारी परंपरा से दूर हों। इस प्रकार बंकिमचंद्र, स्वामी दयानंद, लोकमान्य तिलक, स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, श्री अरविंद प्रभृत मनीषियों, क्रांतिकारियों की सशक्त प्रेरणाओं से विमुख हों। अनुभव तथा दूरदृष्टि रखने वाले अंग्रेज जानते थे कि वह देसी प्रेरणाएं उनकी औपनिवेशिक सत्ता के लिए अधिक घातक है। इसलिए उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को विभाजित और रोगग्रस्त करने के लिए मार्क्‍सवादी कीटाणुओं को फैलाने में स्वयं भी एक भूमिका निभाई थी। यह भी स्मरण रहे कि 1947 तक भारतीय कम्युनिस्टों का संचालन, निर्देशन प्राय: ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के माध्‍यम से होता रहा।

भारत को मजहबी आधार पर विभाजित करने तथा पाकिस्तान बनवाने में भारतीय कम्युनिस्टों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी उसी पृष्ठभूमि में समझा जाना चाहिए। भारतीय राष्ट्रवाद को विखंडित करने में ब्रिटिश साम्राज्यवाद, इस्लामी साम्राज्यवाद तथा कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद, इन तीनों ने अलग-अलग और मिलकर भी काम किया था। इस महत्वपूर्ण तथ्य को स्वतंत्र भारत में छिपाया गया। इसी कारण हमारी युवा पीढ़ी आसन्न इतिहास की भी कई मोटी बातें भी नहीं जानती। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि स्वतंत्र भारत के दुर्भाग्य से इसके पहले प्रधाानमंत्री ही पक्के कम्युनिस्ट समर्थक थे। महात्मा गांधाी ने अपने निजी प्रेम व मोह में जवाहरलाल नेहरू को अकारण, अनावश्यक रूप से अपना 'उत्तराधिकारी' घोषित कर, इस प्रकार अपनी प्रतिष्ठा का प्रयोग कर के उन्हें सत्ता दिला दी। जबकि नेहरू अपने विचारों, नीतियों, चरित्र आदि किसी बात में गांधी से मेल नहीं खाते थे। नेहरू विचारों में पक्के सोवियतपंथी थे, इसका प्रमाण उनका संपूर्ण लेखन-भाषण है।

नेहरूजी के नेतृत्व में बल-पूर्वक, सत्ता के दुरूपयोग, सेंशरशिप, प्रलोभन-प्रोत्साहन-हतोत्साहन तथा अलोकतांत्रिक तरीकों से यहां मार्क्‍सवाद- लेनिनवाद तथा सोवियत संघ व लाल चीन के प्रति आलोचनात्मक विमर्श को रोका गया। (देखें, सीताराम गोयल, जेनिसिस एंड ग्रोथ ऑफ नेहरूइज्म, खंड 1, 1993, पृ. अपप.गपपए 11.28)। भारत में जो ऐतिहासिक संघर्ष रामस्वरूप जी की पुस्तिका 'लेट अस फाइट द कम्युनिस्ट मीनेस' (1948) जैसे कई गंभीर प्रकाशन तथा 'सोसाइटी फॉर डिफेंस ऑफ फ्रीडम इन एशिया' (1952) की स्थापना के साथ आरंभ हुआ था, उसे यदि नेहरू ने अनैतिक तरीकों से शुरू में ही दबोच कर नष्ट न किया होता तो भारत में मार्क्‍सवादी दबदबा कायम नहीं हो सकता था। वह तरीके थे, उदाहरणार्थ: किसी पुस्तक प्रदर्शनी में स्वयं अधिकारियों द्वारा (पार्टी कार्यकर्ताओं या गुंडों द्वारा नहीं) इनके प्राची प्रकाशन का स्टॉल जबर्दस्ती बंद करवा कर (कलकत्ता, अप्रैल 1954); नौकरी से निकलवाकर; पोस्टल विभाग द्वारा नियमानुरूप प्राप्त की गई सुविधा को अवैध तरीके से छीनकर (1953); विदेश में कम्युनिज्म विरोधी सम्मेलनों में जाने से रोकने के लिए बिना कारण बताए पासपोर्ट न देकर (मई 1955); भारत में कम्युनिस्ट-विरोधी सम्मेलनों को विफल बनाने के लिए महत्वपूर्ण लोगों को कह-सुन कर उसमें जाने से रोक कर; प्रेस में वैसे कार्यक्रमों की चर्चा को गुम या कम करवा कर; आयोजकों-लेखकों को खुफिया पुलिस द्वारा परेशान करवा कर; अखबारों में महत्वपूर्ण पदों पर कम्युनिस्टों और उनसे सहानुभूति रखने वालों को नियुक्त करवा कर; उनके माधयम से प्रेस में कम्युनिस्ट विरोधी लेखकों, राष्ट्रवादी विद्वानों पर तरह-तरह के लांछन लगवाकर; आदि। ऐसे तरीकों से नेहरूजी के समय में इस वैचारिक आंदोलन को खड़े होने से पहले ही गिरा दिया गया था। लगभग उन्हीं जबरिया तरीकों से जैसे कम्युनिस्ट देशों में 'क्रांतिविरोधी' या 'प्रतिक्रियावादी' संगलनों, विचारों, संस्थाओं को धवस्त किया जाता रहा है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सीमाओं के कारण इसमें जो मर्यादा रही हो, यह और बात है। नेहरूजी को बड़ा लेखक, बुध्दिजीवी माना जाता है। किंतु कम्युनिस्ट विचारों का प्रचार वह जोर-जबर्दस्ती के सहारे ही कर सके थे। वह तो माओत्से तुंग द्वार 1962 में लगाए गए तमाचे ने खेल खराब किया और कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद की वास्तविकता दिखा। भारतवासियों को एक गहरा झटका दिया अन्यथा नेहरूजी फिडेल कास्त्रो वाले रास्ते पर जा रहे थे।

इस तरह छल, बल, प्रपंच, सत्ता के दुरूपयोग आदि सब प्रकार से इसकी पूरी व्यवस्था की गई कि अंतर्राष्ट्रीय आंदोलन के कुकर्मों को भारतीय जनता न जान सके, बल्कि उसके प्रति सहानुभूतिशील हो। ध्‍यान रहे, सरदार पटेल के 1950 में आकस्मिक निधन के बाद नेहरू का हाथ रोकने वाला भी न रहा। अन्य राष्ट्रवादी या तो किनारे कर दिए गए या उन्होंने चुप्पी साधा ली। इस परिस्थिति में नेहरूजी ने केवल कम्युनिस्ट विचारधारा ही नहीं, बल्कि भारत-विभाजन कराने वाले कम्युनिस्टों को भी वैचारिक-राजनीतिक रूप से ऊंचा स्थान दिलाया। चूंकि वह काल स्वतंत्र भारत की नीतियों-परंपराओं की स्थापना का भी था, इसलिए वामपंथी मिथ्याचारों, भ्रमों, नारों आदि को आधिकारिक रूप से जो प्रथम स्वीकृति मिली, उसने कालांतर में स्थापित मूल्यों का स्थान पा लिया। उसका दबदबा आज भी चल रहा है।

इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रक्रिया को इससे और सुविधाा हुई कि गैर-वामपंथी, राष्ट्रवादी विचारों वाले लोग, संगठन और संस्थाओं ने उसके घातक परिणामों को नहीं समझा। इसलिए कोई कड़ा, संगठित विरोधा नहीं किया। कुछ लोग तो उल्टे सोवियत, चीनी, कम्युनिस्ट प्रचारों की कई बातों को सत्य मान बैठे। इसलिए लेनिनवाद की साम्रााज्यवादी विचारधाारा, उसके घातक नारों, प्रस्थापनाओं, उसके निहितार्थों के प्रति जनता को शिक्षित करने के स्थान पर उसे भी एक विचार के रूप में आदर देने लग गए। बल्कि सामंजस्य बिठाने तक का प्रयास करने लगे। यह शतियों पुरानी हिंदू भूल का ही दुहराव था, जो बाहरी, साम्राज्यवादी विचारधाराओं का गंभीर अध्‍ययन करने के प्रति उदासीन रही और कुछ ऊपर झूठी-सच्ची बातों के आधार पर उसके बारे में कामचलाऊ राय बना कर अपने कर्तव्य का अंत समझती है। भारत-विरोधी, शत्रुतापूर्ण विचारों के प्रति यह आत्मघाती सहिष्णुता; स्थायी वैरभाव से भरी आक्रामक विचारधाराओं को बिना ठीक से जाने उनके प्रति भी 'सम' भाव दिखाना -हिंदुओं की इस पुरानी भूल का भी लाभ कम्युनिस्ट राजनीति को मिला।

इन्हीं संयुक्त दुर्भाग्यों का परिणाम था कि जब सभी विकसित, सभ्य देशों में समय के साथ कम्युनिज्म के सिध्दांत-व्यवाहर की पोल खुलने लगी, तब भी स्वतंत्र भारत में उसके प्रति शिक्षित लोगों में भ्रम बना रहा। इस बीच नेहरू से लेकर इंदिरा जी तक के दौर में कम्युनिस्टों ने शैक्षिक, वैचारिक, नीति-निर्माण संस्थानों में गहरी घुसपैठ बनाई। राष्ट्रवादी विचारों वाले नेताओं और विद्वानों ने इसका विशेष प्रतिरोधा नहीं किया। फल हुआ कि विद्वत-संस्थाओं, पाठय-पुस्तकों, समाचार-पत्रों आदि पर कम्युनिस्टों के पर्याप्त नियंत्रण के माधयम से देश की नई पीढ़ी को वैचारिक रूप से भ्रष्ट, अशक्त किया गया। आज प्रशासन, मीडिया, विद्वत-जगत आदि सभी क्षेत्रों में नेतृत्वकारी स्थानों पर ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो सचेत या अचेत रूप से भारतीय सभ्यता-संस्कृति के विरूध्द हैं। वे हर उस चीज की वकालत करते हैं जिसके लिए कम्युनिस्ट, इस्लामी या मिशनरी संगठन प्रयत्नशील हैं। हिंदू समाज को निर्बल बनाने तथा तोड़ने एवं भारत को तरह-तरह से विखंडित करने के सभी बाहरी प्रयासों को हमारे प्रबुध्द, सत्तासीन वर्ग का मानो उदार समर्थन प्राप्त है। उन प्रयासों की हर आलोचना उन्हें 'हिंदू सांप्रदायिकता' लगती है। यह अनायास नहीं हुआ। इसके पीछे वह पृष्ठभूमि है जिसकी ऊपर संक्षिप्त चर्चा है।

दुर्भाग्यवश राष्ट्रवादी भारतीयों एवं हिंदू उच्च-वर्ग की कमियां आज भी यथावत् हैं। पिछले सौ वर्ष के कटु अनुभवों के बाद भी वे भीरूता और भ्रम के शिकार हैं। बल्कि यह भी उदासीनता का ही संकेत है कि एक उदार लोकतंत्र में रहते हुए भी उन्हें हाल के इतिहास और वर्तमान घटनाक्र्रमों की भी कई गंभीर बातों का कुछ पता नहीं रहता। 1947 में एक झटके में भारत का विभाजन इसीलिए संभव हुआ था-क्योंकि लाहौर, करांची, ढाका और बंबई, इलाहाबाद, मद्रास के भी प्रबुध्द, प्रभावी, धानी-मानी हिंदू ऐसी किसी चीज की कल्पना ही नहीं करते थे। वे भी, आज की तरह, 'जनता तो एक है' 'सभी धार्म समान हैं', 'हमारी संस्कृति साझी है', 'हर विचारधारा में अच्छी बातें हैं' तथा 'केवल राजनीति वाले गड़बड़ी करते हैं' जैसे बाजारू, झूठे जुमले दुहरा कर अपना बौध्दिक, राष्ट्रीय कर्तव्य समाप्त समझते थे और मजे से अपने-अपने उद्योग, व्यापार, साहित्य या कला की दुनिया में मगन थे। इसीलिए जब एकाएक साम्राज्यवादी विचारधााराओं का एक निर्णायक, समवेत प्रहार हुआ ते वे हतप्रभ् उसकी मार झेलने के सवा कुछ न कर सके। कृपया धयान दें: 1947 में भी संपूर्ण भारतीय जनसंख्या में प्रत्येक इस्लामी राजनीतिकर्मी, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता, ईसाई-मिशनरी प्रचारक अथवा ब्रिटिश अधिकारी की तुलना में राष्ट्रवादी विचारों वाले दस-दस सुशिक्षित, संपन्न, स्वस्थ हिंदू मौजूद थे। एक के अनुपात में दस और समर्थ होकर भी वे कुछ क्यों न कर सके? क्योंकि वे वैसे आघात के लिए तैयार न थे।

इस प्रकार, भारतीय सभ्यता के प्रति स्थायी वैर-भाव से भरी शत्रु विचारधाराओं के प्रति भ्रम, उदासीनता और तैयारी न होने से ही भारत को को छल से तोड़ा गया था। किंतु आज भी वह विचारधाराएं यथावत् अपने प्रयास में जुटी हुई हैं। और आश्चर्य की बात है कि आज भी हमारा उच्च वर्ग उसी तरह अपनी अज्ञानी या स्वार्थी दुनिया में निश्चिंत बैठा है। वह सेंसेक्स, प्रति व्यक्ति आय, कथित विकास के आंकड़ों पर फूल कर, सड़कें, बिल्डिंगे बनवा कर, इंडिया शाइनिंग और सेक्यूलरिज्म की रट लगाकर एवं हर समुदाय के उत्कृष्ट प्रतिनिधियों की ओर निहार कर स्वयं को और देश को सुरक्षित समझता है। किंतु कश्मीर, असम, नागालैंड, मेघालय आदि की फिसलती हालत से आंख मिलाने से कतराता है - जहां मुट्ठीभर कटिबध्द इस्लामी, ईसाई-मिशनरी नेता और पश्चिमी-अरबी धान से चलने वाले संगठन भारत से इंच-इंच धारती छीन रहे हैं। इस ज्ञात संकट से आंख मिलाने के बदले भारत का हिंदू उच्च-वर्ग उन्हीं वैरी विचारधााराओं के ही थमाए गए झूठे नारे दुहरा कर प्रसन्न, शुतुरमर्ग की तरह आश्वस्त रहना अथवा अपनी लज्जास्पद स्थिति को छिपाना चाहता है। उन नारों पर संदेह उत्पन्न होने पर भी जांचने के बदले उस संदेह से ही अपने को दूर रखने का यत्न करता है। इस आत्मघाती प्रवृत्तिा को विदेशी तत्तव तथा मीडिया, विश्वविद्यालय आदि में जमे मूढ पर प्रगल्भ हिंदू प्रोत्साहन देते हैं कि वह असुविधाजनक सच्चाइयों का सामना करने के बदले उससे आंखें फेर ले। और फेरे ही रखे। भारत के उच्चवर्गीय हिंदुओं की इस लज्जास्पद प्रवृत्ति के कारण ही स्वतंत्र भारत में कश्मीर क्षेत्र में हिंदुओं का सामूहिक विनाश हुआ, असम में हो रहा है तथा केरल, पश्चिमी बंगाल, बिहार और उत्तार प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र उसी दिशा में डग बढ़ रहे हैं। और यह सब केवल एक पहलू है-हमें भौगोलिक रूप से विखंडित, संकुचित करने के प्रयास।

भारत को भावनात्मक, वैचारिक, सांस्कृतिक रूप से भी पहले नि:शस्त्र, फिर धवस्त करने के यत्न भी उतनी ही कटिबध्दता से हो रहे हैं। और उसके प्रति भी हमारे उच्च-वर्ग-नेताओं, बुध्दिजीवियों, प्रशासकों, उद्योगपतियों की उदासीनता वैसी ही लज्जास्पद है। यह उदासीनता केवल अज्ञानजन्य नहीं, यह इससे स्पष्ट है कि यदि कोई भारत के सभ्यतागत शत्रुओं के कुटिल प्रयासों के प्रति धयान आकृष्ट कराता है तो उल्टे उसे ही चुप कराने का चौतरफा उपाय किया जाता है। उसे लांछित, दंडित कर दूसरों को भी संदेश दिया जाता है कि सब चुप रहें। कहने की आवश्यकता नहीं कि स्थायी शत्रुताभाव से भरे देशी-विदेशी बैरी इससे और प्रोत्साहित होते हैं। मिशनरियों द्वारा देश के सुदूर, छिपे इलाकों में असहाय हिंदुओं का संगठित, आक्रामक रूप से धार्मांतरण कराना; उन्हीं मिशनरियों द्वारा मुखौटा बदल कर देश की राजधानी में 'सेक्युलरिज्म', 'दलित मुक्ति', 'मानवाधिकार' आदि की आक्रामक वैचारिक गतिविधिायों द्वारा शिक्षा, प्रशासन और न्यायतंत्र को विभिन्न हथकंडों से बरगलाकर अपने अनुकूल बनाना; इस्लामी तत्तवों द्वारा भारतीय राज्य-नीति व न्यायपालिका तक को अपने दबदबे में रखने का यत्न करना; तथा इने-गिने मार्क्‍सवादियों द्वारा देश के संवैधाानिक पदों पर नियुक्ति कर अपना वीटो चलाना तथा इन्हीं सब तत्तवों द्वारा भारत की राष्ट्रवादी चिंताओं और हिंदू धार्म-परंपरा को एक स्वर में दिन-रात निंदित करना आदि इसके कुछ प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

इस प्रकार भारत को वैचारिक, सांस्कृतिक रूप से मूढ, असहाय बनाकर पराभूत करने के गंभीर प्रयास हो रहे हैं। यह प्रयास निष्फल नहीं, यह इसी से स्पष्ट है कि जो सहज बातें कोई हिंदू विद्वान या नेता चार दशक पहले कह सकता था, आज नहीं कही जा सकती। उसे दंडित होना पड़ेगा। डॉ. कर्ण सिंह जैसे विख्यात विद्वान और राजनेता को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार यह कह कर नहीं बनाया गया कि उनमें हिंदूपन है जबकि उपराष्ट्रपति के लिए सभी उम्मीदवार इस आधार पर चुने गए कि वे मुस्लिम हैं। दोनों ही कार्य एक-दो कम्युनिस्टों ने सुनिश्चित किए। प्रत्येक दल के अनेक नेता यह अनाचार मौन देखते रहे, बल्कि इसमें योगदान किया। यह सांकेतिक घटनाएं हैं जिनसे सीख ली जानी चाहिए कि साम्राज्यवादी, आक्रामक विचारधााराओं, संगठनों के प्रति अनुचित सहिष्णुता दिखा कर जो 'सहमति' बनाई जाती है, वह स्थिति को यथावत नहीं रहने देती। वह आगे-आगे राष्ट्रवादियों से, हिंदुओं से और भी रणनीतिक-वैचारिक स्थान छीनेगी। अर्थात्, इससे शांति या सहयोग नहीं बनेगा, बल्कि विषम स्थिति और बिगड़ेगी। दूसरे शब्दों में, जिस चीज से हिंदू उच्च वर्ग बचना चाहता है, ठीक वही और भी भयावह, अशांत रूप में आएगी। 1947 में यही हुआ था। यदि आप आज शत्रु विचारों से वैचारिक लड़ाई से भी कन्नी काटते हैं तो कल आपको प्रत्यक्ष युध्द झेलना पड़ेगा। इस का उल्टा भी सत्य है: यदि आज आप वैचारिक प्रतिकार करते हैं तो कल युध्द की नौबत नहीं आएगी। वैचारिक संघर्ष से ही समाधान निकल आ सकता है-बशर्ते आपकी चौकसी ढीली न हो।

2.
सामाजिक विकास के लिए मधय मार्ग चुनने से अधिक कठिन कोई कार्य नहीं। बड़बोलापन, तना हुआ मुक्का, बम, जेल की सलाखें तब आपके किसी काम नहीं आएंगी, जैसे वह दोनों अतिवादी ध्रुवों वाले लोगों के काम आती हैं। मधय मार्ग पर चलना अत्यधिक आत्म-नियंत्रण, नितांत अडिग साहस, सबसे धौर्यपूर्ण आकलन और सर्वाधिक सटीक जानकारी की मांग करता है।2

-अलेक्सांद्र सोल्झेनित्सिन, नवंबर 1916रु लाल चक्र/द्वितीय गांठ

इस संकटपूर्ण स्थिति में भारत के चिर-शत्रुओं -मार्क्‍सवादियों तथा अन्य साम्राज्यवादी विचारधाराओं, संगठनों के विरूध्द किसी राष्ट्रवादी को कैसा संकल्प लेना चाहिए? भारतीय सभ्यता के स्थाई बैरियों के प्रतिकार के लिए भारतीय राष्ट्रवादी को क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए?

यह बात भी सोलेझिनित्सिन के शब्दों से ही समझना आरंभ करें। जिसे उन्होंने मधय-मार्ग कहा है उसी को हम राष्ट्रवादी मार्ग मान कर चलें तो पहली बात तो यह कि भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए वह तरीके उपयुक्त नहीं हैं-जिनका सहारा मार्क्‍सवादी, मिशनरी या इस्लामी राजनीतिकर्मी लेते हैं। यदि हिंदू राजनीतिकर्मी या समाजसेवी केवल बड़ी-बड़ी बातों या छल-प्रपंच से काम चलाना चाहें तो उसकी दुर्गति होगी। उदाहरणार्थ, जो हिंदू नेता समझते थे कि वे भी केंद्र में सत्ताधारी बनकर उसी तरह शिक्षा-संस्थाओं का उपयोग या दुरुपयोग करेंगे, उन्हें संभवत: समझ आयी होगी कि उनके लिए वह मार्ग नहीं खुला है। हिंदू नेता जिस तरह तीन दशक तक उदासीन भाव से मार्क्‍सवादी-नेहरूपंथी प्रचारकों द्वारा शिक्षा की विकृति देखते रहे वैसे उनके शत्रु नहीं रहने वाले! वे तो अच्छे कार्यों पर पर भी आसमान सिर पर उठा लेंगे और आपका काम करना दूभर कर देंगे। वे सचेत रहे हैं और आप उदासीन - इस का अंतर तो समझें। अत: मात्र सत्ता के आसरे किसी विकृति को सुधारने का भी काम यदि हिंदू नेता करना चाहें तो उचित, संवैधाानिक कदम होने पर भी उसके विरूध्द अंतर्राष्ट्रीय रूप से संगठित हिंदू-विरोधी शक्तियां समवेत रूप से चीख-पुकार आरंभ कर देंगी। 1998-2004 के बीच यही हुआ।

दूसरी बात, माक्र्सवादियों इस्लामियों द्वारा की गई अनुचित जिदों, याचनाओं पर भी उदारता दिखाने और समर्थन दे देने के बदले में वे हिंदू नेताओं की उचित मांगों पर भी सहयोग देंगे, इसकी आशा करना भारी भूल है। हिंदू पहचान वाले नेतागण कभी न भूलें कि उनके लिए वे रास्ते नहीं खुले हैं जो अंतर्राष्ट्रीय रूप से कटिबध्द, संपन्न हिंदू-विरोधी संगठनों, नेताओं के लिए सुलभ हैं। वे यह भी समझें कि शतियों से पराधीनता में रहते हुए हिंदू समाज का अभी कोई स्वाभाविक, आत्मविश्वासपूर्ण बुध्दिजीवी या शासनकर्मी वर्ग तक नहीं बना है। और यह काम किसी जादू से या रातों-रात नहीं हो सकता। अत: केवल सत्ता प्राप्ति की जुगत में लगे रहना और उसी माधयम से कुछ करने की आशा करना (यद्यपि यह भी संदिग्ध है कि अनेक हिंदू नेता कोई वैसा राष्ट्र-हित या हिंदू हित का काम करना चाहते भी हैं) एकदम व्यर्थ है।

अत: राष्ट्रहित का कार्य नित्य का कार्य है जो प्रत्येक राष्ट्रविरोधी कदम के सुनिश्चित, प्रभावी विरोध की मांग करता है। चाहे वह प्रशासन में हो, शिक्षा-संस्कृति या अर्थ-व्यवस्था और विदेश नीति में। साथ ही, देश के लिए लोगों को जगाना, संगठित और तत्पर करना भी नित्य किए जाने का कार्य है। विशेषकर विचार, शिक्षा, संस्कृति, न्यायतंत्र के क्षेत्र में तो यह नित्य, इंच-इंच भूमि के लिए लड़ी जाने वाली अहर्निश लड़ाई है जिसमें प्रत्येक कोताही, उसी अनुपात में शत्रु को लाभ देने के समान है। चार दशक में भारत में आ गए जिस प्रतिकूल परिवर्तन का ऊपर उल्लेख है, वह इसी तरह शत्रु के विचारों के प्रति उदारता या उदासीनता दिखाने का भी फल है।

यह लड़ाई लड़ने के लिए शक्ति एकत्र करने के साथ-साथ अहर्निश जागरूकता आवश्यक है। यदि शत्रु ने रूप बदल लिया है तो आपको भी तदनुरूप बदलना होगा। उदाहरण के लिए सोवियत संघ और विश्व साम्यवादी तंत्र के पतन के बाद मार्क्‍सवादियों ने अपनी शब्दावली और वैचारिक लड़ाई के क्षेत्र बदले हैं। भारत ही नहीं, कई देशों में कम्युनिस्टों ने अब अपनी शक्ति इस्लाम को समर्पित कर दी है। यद्यपि पहले भी कम्युनिस्ट लोग इस्लाम के प्रति सदय थे, किंतु सोवियत विघटन के बाद यह बढ़ गया। जिन्हें इसके बारे में अधिाक जानने की इच्छा हो वह प्रसिध्द 'फ्रंटपेज मैगजीन' के मुख्य संपादक डेविड होरोवित्ज की नई पुस्तक 'अनहोली एलायंस: रेडिकल इस्लाम एंड द अमेरिकन लेफ्ट' से जायजा ले सकते हैं। वैसे होरोवित्ज ने अपने पचास वर्ष के अनुभव के आधार पर यह पुस्तक लिखी है। कम्युनिस्टों के पास अब किसी सामाजिक क्रांति का मोटा विचार भी शेष नहीं है। अंधा-अमेरिका विरोधा के नाम पर साम्यवादी लोग पहले भी अयातुल्ला खुमैनी जैसे तानाशाहों, अत्याचारियों का समर्थन करते रहते थे। अब वही उनका एकमात्र अवलंब है जिस कारण वे सिमी, जिलानी, तालिबान, सद्दाम, अहमदीनेजाद, जवाहिरी जैसे हर तरह के देसी-विदेशी इस्लामवादियों के साथ दिख रहे हैं।

अत: धयान रहे कि अब कम्युनिस्ट नेता मार्क्‍स या लेनिन की प्रस्थापनाएं नहीं दुहराते। उसके स्थान पर उन्होंने भारत के अन्य सभ्यतागत शत्रुओं के मुहावरे उठा लिए हैं। इसलिए अब वे सेक्यूलरिज्म, माइनॉरिटी राइट्स, मानव अधिकार, वीमेन राइट्स, दलित अधिकार आदि के नारे लगाते हैं। यह सभी नारे भारतीय सभ्यता को विखंडित करने के लिए ही प्रयोग किए जा रहे हैं। इसीलिए यहां इनका सबसे अधिक उपयोग ईसाई-मिशनरी, इस्लामी राजनीतिकर्मी और पश्चिमी सम्रााज्यवादी तंत्र करते रहे हैं। माक्र्सवादी अब उन्हीं के साथ जुड़े हुए हैं। ऐसी स्थिति में यदि आज कोई राष्ट्रवादी मार्क्‍स, लेनिन के ग्रंथ पलट कर उसकी आलोचना करके माक्सर्ववादियों से लड़ना चाहता है तो वह मूर्खता कर रहा है। उस का समय तीन दशक पहले था (जब उसे नहीं किया गया)। आज तो आपको सेक्यूलरिज्म, मानवाधिकार आदि की आड़ में देशद्रोहियों को सहयोग और इसके लिए संविधान, कानून का नित्य भीतरघात करने के संयुक्त वामपंथी-इस्लामी-मिशनरी प्रपंचों से लड़ना होगा। यहां माक्र्सवादी अब मुख्यत: भारतीय राष्ट्रवाद तथा हिंदू धार्म की लानत-मलानत करते हैं और भारत को कमजोर करने में लगी विदेशी शक्तियों अथवा संगठित धर्मांतरण कराने में लगी मिशनरी एजेंसियों के लिए ढाल बनकर खड़े होते हैं।

इस लड़ाई को रोज-रोज वैचारिक, शैक्षिक और कानूनी क्षेत्र में लड़ना होगा। मीडिया, प्रशासन और न्यायालय - इन तीन क्षेत्रों पर मार्क्‍सवादियों एवं सभी साम्राज्यवादी शत्रुओं ने स्वयं को केंद्रित किया है। जबकि दुर्भाग्यवश, राष्ट्रवादी शक्तियां केवल चुनावी लड़ाई और जोड़-तोड़ पर ही ध्‍यान दे रही हैं। मीडिया पर धयान देती भी हैं तो उसे 'मैनेज' करने का प्रयास होता है। किन्हीं पत्रकारों या मालिकों को खुश करके कुछ विशेष नेताओं या नीतियां का बचाव करने के लिए। किंतु राष्ट्र-हित के लिए लड़ाई का कोई भाव नहीं दिखता। जबकि आवश्यकता बिल्कुल सीधी लड़ाई की है। विदेशी धन, प्रायोजन और तरह-तरह के विदेशी पुरस्कारों, निमंत्रणों का ढेर लिए जो साम्राज्यवादी, हिंदू विरोधी शक्तियां हमारे देश के चुनिंदा बुध्दिजीवियों, पत्र-पत्रिकाओं, चैनलों आदि को खुले-छिपे नियंत्रित कर रही हैं-उसे राष्ट्रवादी उसी तरह 'मैनेज' नहीं कर सकते। उन्हें तो उसके विरूध्द खुली लड़ाई लड़नी होगी। जनता को उसके प्रति सचेत करने और उनका बहिष्कार करने के लिए प्रेरित करना होगा। यदि निष्ठा से लड़ी जाए तो इस लड़ाई में केवल जीत ही जीत है। ठोस तथ्यों, उदाहरणों के साथ खुली व परिश्रमपूर्ण लड़ाई पूरे देश को शिक्षित करेगी। शत्रुओं के कदम ठिठकेंगे। प्रशासन और न्यायपालिका के लोग भी तरह-तरह के मनुहार करने वाले सुंदर लोगों के प्रति तनिक सचेत होंगे। ऐसे लोग जो उन्हें कभी 'मानव-अधिकार' तो कभी 'दलित' तो कभी 'वीमेन' के नाम पर उन्हें विदेशी प्रपंचों का सहायक बनाने में कभी उद्धाटन कराने तो कभी व्याख्यान देने बुलाते हैं। और ये भोलेनाथ हिंदू, न्यायालयों के न्यायाधीशों से लेकर डी.आई.जी. या वाइस-चांसलर तक इसकी भी जांच नहीं करते कि जो संस्था उन्हें आदरपूर्वक 'एजुकेशनल वर्कशॉप' में बुला रही है, वह करती क्या क्या है, उनके नेतागण किन अन्य कार्यों में कटिबध्द हैं तथा इन सबके लिए उन्हें धान कौन और किसलिए देता है। यह पूरी प्रक्रिया हमारे उच्च वर्गीय लोगों को 'थपकियां देकर सुलाने का विराट आयोजन' (अज्ञेय) कर रही है। इन सबसे भारत के सभ्यतागत् शत्रुओं की जो पहुंच पकड़ बढ़ रही है - वह बिना सीधाी लड़ाई के नहीं रोकी जा सकती।

किंतु यह लड़ाई बड़ी बुध्दिमता, नियमितता और धौर्य से ही लड़ी जा सकती है। केवल क्षोभ या आक्रोश से उलझ पड़ना प्रतिकूल फल देगा। जैसा, हाल में कई घटनाओं ने दिखाया। 'वालेन्टाइन डे' के अवसर पर या पार्कों में युवक-युवतियों को बरजने का प्रयास, किसी समाचार-चैनल के दफ्तर पर मामूली तोड़-फोड़ या जहां-तहां त्रिशूल बांटना आदि कदमों के पीछे चिंता सही थी। किंतु परिणाम विपरीत हुए। हिंदू-विरोधाी शक्तियों ने इसका अपने पक्ष में सफलतापूर्वक उपयोग किया। उन कामों में क्या गलती रही? हिंदू-विरोधाी शक्तियों ने इसका अपने पक्ष में सफलतापूर्वक उपयोग किया। उन कामों में क्या गलती रही? पहली, कि जो रास्ते इस्लामी गिरोहों के लिए हर देश में खुले हैं, मान्य हैं-हिंसा और धमकी वह हिंदुओं के लिए स्वीकार्य नहीं होगी। क्यों और कैसे यह असमान स्थिति बनी हुई है, इस पर निर्भीक, गंभीर विचार किए बिना वैसे अविचारी तरीके अपनाना उल्टा परिणाम देगा ही। हर बात पर हिंसा उग्रवादी कट्टरपंथी विचारधााराओं के मार्ग हैं। राष्ट्रीय निर्माण, देश की भलाई, लोगों को वास्तव में समर्थ, सक्षम बनाने का लक्ष्य हो तो हिंसा या बम साधान हो भी नहीं सकता। दूसरे, वैसे विचारहीन आक्रोश से भरे कामों से शत्रु विचारों, संगठनों को तो कोई चोट नहीं पहुंचती उल्टे साधाारण व्यक्ति प्राय: कोई हिंदू या राष्ट्रवादी व्यक्ति ही कष्ट पाते हैं। तब वैसे काम करके हिंदूवादी या राष्ट्रवादी संगठन केवल उपहास पाते हैं।

इसीलिए वैसे कदम उठाने चाहिए जिससे हानि, एकदम छोटी-सी ही क्यों न हो, शत्रु विचारों, संगठनों को पहुंचे। उसके अवसर रोज आते हैं, किंतु उन्हें गंवा दिया जाता है। इसलिए कि उन साधारण लगने वाली बातों का महत्व समझा नहीं जाता। हिंदू उसकी उपेक्षा कर देते हैं और हिंदू-विरोधी उससे लाभ उठा लेते हैं। उदाहरण के लिए, यदि हमारे कोई न्यायाधीश या उच्च अधिकारी किसी मिशनरी संगठन द्वारा आयोजित 'मानवाधिकार' पर सेमिनार का उद्धाटन करने चला जाता है तो उनसे मिलकर प्रतिवाद व्यक्त करना।

संबंधित संगठन के बारे में प्रामाणिक जानकारी देते हुए उदघाटनकर्ता महोदय को सावधान करना कि वैसे संगठन अपने असली, संगठित धार्मांतरण कार्यों के लिए उनके नाम की प्रतिष्ठा से अपने संगठनों को प्रतिष्ठित बना रहे हैं। इसका वास्तविक प्रयोग एक ऐसे कार्य में होता है जो नैतिक, कानूनी दृष्टि से भी अवैध है। अथवा, यदि कोई बड़ा समाचार-पत्र किसी समाचार को तोड़-मरोड़ कर हिंदू विरोधी रूप में प्रस्तुत करता है अथवा किसी प्रसंग में राष्ट्रविरोधी शक्तियों का बचाव करता है-तो इसका ठोस उदाहरण लेकर उस पत्र के संचालकों का ध्‍यान नहीं आकृष्ट कराया जाता। दो-तीन बार ऐसा हो जाए तो पुन: ठोस उदाहरण मिलने पर जिसमें पत्र के संपादक कोई बचाव करने की स्थिति में न हों, लोगों से उस पत्र या चैनल का बहिष्कार करने के लिए कहा जा सकता है। इसी प्रकार, यदि किसी पाठय-पुस्तक में स्पष्टत: किसी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार है, किसी विचार या समुदाय के प्रति अनुपातहीन आलोचना या पक्षपात है तो संबंधित शिक्षण-संस्थान एवं प्रकाशक के विरूध्द शांतिपूर्वक किंतु कटिबध्दता से उसे संशोधित करने का आंदोलन चलाया जाना चाहिए। ऐसे संघर्ष के लिए धौर्यपूर्वक अथक प्रयत्न किया जाए तो सफलता निश्चित है। छोटी सफलताएं ही बड़ी का मार्ग प्रशस्त करेगी।

नि:संदेह इस प्रकार के नीरस कार्य बड़े परिश्रम-साधय हैं। यह केवल साधान ही नहीं, धौर्य और सटीक जानकारी की मांग करते हैं। पर आज चिंताशील हिंदुओं, राष्ट्रवादियों को यही तो समझना चाहिए कि उनके लिए सीधा और आसान मार्ग नहीं है। वे मार्क्‍सवादियों की तरह लफ्फाजी करके या इस्लामवादियों की तरह धामकी देकर कुछ नहीं पा सकते। किसी 'बड़े मुद्दे' पर जनता को आवेश में लोकर, एकबारगी देशव्यपी समर्थन (वोट) जुटाने की आस में लगे रहना भी आलस्य और स्वार्थी प्रवृत्ति का ही परिचायक है। इसे कभी किसी नेता या गुट को लाभ हो जाए, उससे देश का भला नहीं होगा। सच्चे देशक्तों को शॉर्ट-कट की दुराशा त्याग देनी होगी। उन्हें शत्रुओं को छोटी-छोटी चोट देकर भी, अत्यंत साधारण दिखने वाली, किंतु अर्थपूर्ण जीत प्राप्त करके ही, राष्ट्रवादी जनता का आत्मविश्वास, साहस और रचनात्मकता बढ़ानी होगी।

कहने की आवश्यकता नहीं कि ऐसे संकल्प वे नहीं ले सकेंगे जो केवल बड़े नेताओं की चापलूसी करके या जोड़-तोड़ करके इस या उस पद पर जाने की ताक में लगे रहने को ही राजनीति समझते हैं। यह कथित राजनीति नेहरूपंथ या कम्युनिस्टपंथ में तो चल सकती है जिनके लिए साम्राज्यवादी विचारों, संगठनों के साथ 'भाई-चारा' रखना सहज कार्य है। किंतु भारत में देशभक्ति की राजनीति और वंदे मातरम् का संकल्प रखने वालों के लिए कोई सरल मार्ग नहीं है। कम से कम अभी नहीं है। इसे हृदयंगम करके ही कोई राष्ट्रवादी महात्वाकांक्षा रखनी चाहिए।

टिप्पणी:
1. मूल रूसी से आधिकारिक अंग्रेजी अनुवाद इस प्रकार है:
Just as the Coriolis effect is constant over the whole of this earth's surface, and the flow of rivers is deflected in such a way that it is always the right bank that is eroded and crumbles, while the floodwater goes leftward, so do all the forms of democratic liberalism on earth strikes always to the right and caress the left. Their sympathies always with the left, their feet are capable of shuffling only leftward, their heads bob busily as they listen to leftist arguments - but they feel disgraced if they take a step to or listen to a word from the right. (Aleksandr Solzhenitsyn, Novermber 1916: The Red Wheel-Knot II)
2. मूल रूसी से आधिकारिक अंग्रेजी अनुवाद इस प्रकार है:
Nothing is more difficult than drawing a middle line for social development. The loud mouth, the big fist, the bomb, the prison bars are of no help to you, as they are to those at the two extremes. Following the middle line demands the utmost self-control, the most inflexible courage, the most patient calculation, the most precise knowledge. (Aleksandr Solzhenitsyn, Novermber 1916: The Red WheelèKnot II)

लेखक प्रख्‍यात स्‍तंभकार है।

Wednesday, 6 February, 2008

केरल- जमीन घोटाले में घिरी माकपा

प्रदेश के अलप्पुझा जिले में एक राजनीतिक विवाद तेजी से सुलग रहा है। यह विवाद उपजा है सरकार द्वारा वर्षों पूर्व खेतिहर मजदूरों को बांटी गई जमीन को लेकर। इस मुद्दे पर माकपा पर विपक्षी दलों के आरोपों की झड़ी लग गई है। भाजपा सहित विभिन्न दलों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं। भाजपा ने इस भूमि घोटाले में लिप्त सभी दोषियों के विरुध्द कड़ी कार्रवाई की मांग की है। यह भूमि पर्यटन व्यवसाय से जुड़े कुछ बड़े लोगों को बेची गई थी जिसके बदले में माकपा के कई नेताओं को घूस के रूप में काफी पैसा प्राप्त हुआ है।

उधर आरोपों में फंसी माकपा ने अपनी मुसीबत टालने की गरज से कूटामंगलम सर्विस कोआपरेटिव बैंक के निदेशक मंडल को निरस्त कर दिया है। केरल का 'धान का कटोरा' कहे जाने वाले कुट्टनाड के आर ब्लाक की जमीन की खरीद के कारण बैंक इस समय आर्थिक संकट झेल रहा है। बैंक पर जिस निदेशक मंडल का नियंत्रण था, उसके सभी सदस्य माकपा के कार्यकर्ता हैं। निदेशक मंडल के सदस्यों ने ही कूटामंगलम सर्विस कोआपरेटिव बैंक से पार्टी के ही कुछ लोगों को जमीन खरीदने के लिए ऋण उपलब्ध कराया था जबकि वही जमीन कुछ खेतिहर मजदूरों को पहले ही दी जा चुकी थी। समस्या तब पैदा हुई जब ऋण धारक पैसा नहीं लौटा पाए और बैंक पर आर्थिक संकट मंडराने लगा, बैंक को बंद करने के हालात पैदा हो गए।

माकपा के खिलाफ सबसे बड़ा आरोप यही है कि सभी सम्बंधित नियमों को ताक पर रखकर ऋण बांटे गए थे। माकपा सूत्रों के अनुसार इस पूरे सौदे में ही घोटाला है। भाजपा का कहना है कि यह भूमि पर्यटन से जुड़े लोगों को बेची गई थी जो अलप्पुझा जिले में काफी प्रभावशाली हैं।

उल्लेखनीय है कि भूमि सुधार आन्दोलन के दौरान यहां के खेतों की जमीन जमींदारों से ले ली गई थी। राजस्व दस्तावेजों के अनुसार यह 170 एकड़ जमीन 217 खेतिहर कृषि मजदूरों को वितरित की गई थी। इसमें से 151.55 एकड़ सन् 2006 में 20 लोगों को बेच दी गई। इस सौदे के लिए बैंक ने 60 लाख रु. के ऋण दिए थे। राजस्व विभाग के आकलन के अनुसार, इस पूरी भूमि का मूल्य 75,34,786 रु. से कम नहीं आंका गया था। इसी आकलन के अनुसार कोआपरेटिव संयुक्त पंजीयक ने बैंक को इस सौदे पर आगे बढ़ने की इजाजत दी थी, मगर बैंक ने सौदे के लिए 60 लाख रुपए तय कर दिये। इस पूरे मामले में स्थानीय माकपा नेता जोसेफ सेबेस्टियन की भूमिका के कारण यह राजनीतिक मुद्दा बन गया है। अलेप्पी जिला सहकारी बैंक, जिसने कूटामंगलम सर्विस कोआपरेटिव बैंक को वह पैसा दिया था, ने कूटामंगलम बैंक को नोटिस जारी कर दिया है, क्योंकि वह बैंक उसका पैसा वापस नहीं कर पाया था। इस सब घटनाक्रम के बाद बैंक के निदेशक मंडल को हटा दिया गया है। भाजपा ने इसे राज्यव्यापी मुद्दा कहते हुए इसके विरोध में प्रदर्शन किया। उसका कहना है कि इस जमीन की खरीद जब प्रतिबंधित थी तब यह सौदा आखिर कैसे हो गया। प्रदीप कुमार

Tuesday, 5 February, 2008

अल्पसंख्यक कल्याण में गुजरात आगे

पिछले दो दशकों का सबसे बडा झूठ है भारतीय जनता पार्टी पर सांप्रदायिकता का ठप्‍पा लगाना। गोयबल्‍स के अनुयायियों ने देशवासियों को गुमराह करते हुए भाजपा की सांप्रदायिक छवि बनाने में आंशिक सफलता प्राप्‍त की। य‍ह अजीब विडंबना है कि जो दल मुसलमानों को वोट-बैंक के रूप में इस्‍तेमाल करता है वह धर्मनिरपेक्ष है और जो दल मुसलमानों को एक नागरिक के तौर पर देखता है उसे सांप्रदायिक कहा जाता है। तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल किसान, मजदूर और गरीबों के विकास को लेकर नहीं अपितु मुस्लिमों को लेकर ज्‍यादा चिंतित नजर आ रहे है।‍ उनका य‍ह रवैया देश में विभाजनकारी मानसिकता को बढावा दे रहा है। उत्‍तर प्रदेश की मुख्‍यमंत्री मायावती और तमिलनाडु के मुख्‍यमंत्री करूणानिधि मजहबी आधार पर मुस्लिमों और ईसाइयों को नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण देने की मांग कर रहे है। केंद्र सरकार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक दर्जा और इसमें मुसलमानों को विशेष आरक्षण देने की मांग पर अडी हुई है। कांग्रेस की आंध्र प्रदेश सरकार ने मुसलमानों को सरकारी नौकरियों में 4 प्रतिशत कोटा देना शुरू कर दिया है। बिहार विधानसभा चुनाव के समय लोजपा नेता श्री रामविलास पासवान ने मुसलमानों के लिए 16.6 प्रतिशत आरक्षण की मांग की, इसके साथ ही श्री पासवान और राजद नेता श्री लालू प्रसाद यादव ने कुख्‍यात आतंकवादी बिन लादेन के हमशक्‍ल मुस्लिम को साथ लेकर चुनाव-प्रचार किया। सच्‍चर समिति ने पोल खोला कि पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की स्थिति दयनीय है। माकपा ने केरल में मुस्लिम बहुल जिला मल्‍लापुरम बनाया। अल्‍पसंख्‍यक कार्य मंत्री अंतुले ने घोषणा की है कि शिनाख्‍त किए गए 90 अल्‍पसंख्‍यक बहुल जिले जो विकासात्‍मक मानदंडों पर पिछडे है उनमें मूल सुविधाओं और आर्थिक सुविधाओं में सुधार के लिए विशेष प्रयास किए जाने का प्रस्‍ताव है। शाहबानो प्रकरण में कांग्रेस ने मुस्लिम कटटरपंथियों के समक्ष घुटने टेकते हुए संविधान का अपमान किया। संसद पर हमले के साजिशकर्ता आतंकवादी अफजल को बचाने के लिए छद्मधर्मनिरपेक्ष दल क्रांति कर रहे है। हद तो तब हो गई जब प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने राष्‍ट्रीय विकास परिषद की बैठक में कहा कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला अधिकार है।

भाजपा राष्‍ट्रवादी राजनीतिक दल है। सबको न्‍याय, तुष्टिकरण किसी का नहीं इस अवधारणा में यह पार्टी विश्‍वास करती है। भाजपा मुसलमानों को वोट-बैंक के तौर पर नहीं बल्कि नागरिक के रूप में देखती है। इसलिए नरेंद्रभाई मोदी गुजरात में साढे पांच करोड गुजरातवासियों के विकास की बात करते है और इसे साकार कर भी दिखाते है।

आज के दैनिक जागरण में यह खबर छपी है कि भाजपा शासित प्रदेश अल्‍पसंख्‍यक कल्‍याण के मामले में अन्‍य राज्‍यों से आगे है।


नई दिल्ली [राजकेश्वर सिंह]। गुजरात दंगों का दाग मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का पीछा भले न छोड़ता हो, लेकिन नतीजों के आईने में देखें तो अल्पसंख्यकों के लिए वे कहीं बेहतर काम जरूर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी इस मोर्चे पर अच्छी साबित हो रहीं हैं। अलबत्ता अल्पसंख्यकों की भलाई का नारा जोर-शोर से लगाने वाले वामदलों का पश्चिम बंगाल और कांग्रेस शासित दिल्ली व जम्मू-कश्मीर की सरकारें प्रधानमंत्री की ओर से तय अल्पसंख्यक तरक्की के मानकों पर कतई खरी नहीं उतर पा रही हैं।

सूत्रों के मुताबिक अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए प्रधानमंत्री की ओर से घोषित 15 सूत्री कार्यक्रम की जमीनी सच्चाई ने कई राज्यों की कलई खोल दी है। बीते साल दिसंबर तक की प्रगति की समीक्षा में पता चला कि सिर्फ 50 जिले ही भौतिक कार्र्यो को कराने और धन खर्च करने के मामले में 50 प्रतिशत से अधिक सफलता हासिल कर सके हैं। कार्य के लिहाज से राज्यों को तीन श्रेणियों में बांटा गया, जिसमें 50 प्रतिशत से ऊपर नतीजों वाले राज्यों को अच्छा माना गया, जिसमें भाजपा शासित नरेंद्र मोदी के गुजरात और बसपा शासित मायावती के उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, कर्नाटक, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, उड़ीसा और तमिलनाडु शामिल हैं।

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, असम, केरल और नगालैंड जैसे राज्यों ने अल्पसंख्यकों के लिए तय विभिन्न कार्यक्रमों में 30 से 50 प्रतिशत के बीच ही परिणाम दिए। वामदल शासित पश्चिम बंगाल और कांग्रेस शासित दिल्ली और जम्मू-कश्मीर ने सबसे ज्यादा खराब प्रदर्शन किया। इन राज्यों ने अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए तय कार्यों में से 30 प्रतिशत से भी कम नतीजे दिए। गोवा, पंजाब, चंडीगढ़ समेत कई दूसरे राज्य भी इसी श्रेणी में शामिल हैं।

गौरतलब है, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अल्पसंख्यकों को विकास की मुख्यधारा में लाने के लिए 2006 में 15 सूत्री कार्यक्रम घोषित किया था। इसके तहत अल्पसंख्यक कल्याण, मानव संसाधन विकास, महिला एवं बाल विकास, ग्रामीण विकास, गृह, श्रम एवं रोजगार, वित्त, शहरी रोजगार एवं गरीबी उन्मूलन मंत्रालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को अल्पसंख्यकों के विकास पर खास फोकस करना है।