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Thursday 26 June 2008

चोंचलिज्म


सोशलिज्म जब कैपिटलिज्म के साथ चोंच लड़ाता है तो एक नयी विचारधारा का जन्म होता है। राजनीति में अभी उसका कोई नाम भले ही न रखा गया हो, हम उसे चोंचलिज्म कह सकते हैं। वैसे, हिंदुस्तान में सोशलिज्म का कैपिटलिज्म के साथ चोंच लड़ाना कोई नयी बात नहीं है। अब तक यह काम चोरी-छिपे किया जाता था। सोशलिस्ट लोग छिप कर कैपिटलिस्टों से समझौता करते थे। बिलकुल वैसे ही, जैसे कोई आदमी अपनी बीवी से छिप कर, दूसरी औरत से मिलता है। लेकिन अब, जब चारों ओर विवाहेत्तर संबंध स्वीकार किये जाने लगे हैं, तो राजनीति भी क्यों न स्वीकार कर ले। चोंचलिज्म कम्यूनिजम की पॉलिसी-इतर संबंध की पैदाइश है।

चोंचलिज्म राजनीति के दड़बे में बंद गरीब की मुरगी है, जो सोने का अंडा देती है। यह गरीब की मुरगी भी अजीब चीज होती है। जब तक गरीब के पास रहती है, सोने का तो छोड़ो सादा अंडा भी ठीक से नहीं देती। जैसे ही किसी अमीर के दड़बे में पहुंचती है, फटाफट सोने के अंडे परोसने लगती है। तभी तो, जब तक जमीन गरीब किसान के पास है, उसका मोल कौड़ियों में होता है। सेठ के कब्जे में पहुंचते ही उसका भाव आसमान छूने लगता है। जमीन वही, नाप वही, इलाका वही, बस मालिक बदलने से भाव बदल जाता है। जाहिर है, मोल भाव का नहीं, मालिक का होता है। गरीब का सस्ता, अमीर का महंगा। कैपिटलिज्म में ऐसा हो तो बात समझ में आती है, सोशलिज्म में भी ऐसा क्यों होता है? क्योंकि, समाजवाद की चोंच पर अब पूंजीवाद की लार चिपक गयी है।

चोंचलिज्म का सबसे ताकतवर रूप पेश किया पश्चिम बंगाल के कम्युनिस्टों ने। जो लोग सरकारी कंपनियों के विनिवेश का छाती पीट-पीट कर विरोध कर रहे थे, उन्होंने किसानों की जमीन का विनिवेश कितनी आसानी से कर दिया। किसान विरोध कर रहे हैं, पर कम्युनिस्ट सुन नहीं रहे। सोशलिज्म को तो गरीब की बात सुननी चाहिए न! सोशलिज्म होता तो सुनता। यह तो चोंचलिज्म है। कम्युनिस्टों का तर्क है कि उद्योगपति को जमीन विकास के लिए दी गयी है। तो क्या कम्युनिस्टों ने आखिर मान लिया कि विकास पूंजीवाद में ही संभव है, कम्युनिज्म में नहीं? कोई कम्युनिस्ट यह बात खुलेआम स्वीकार नहीं करेगा, पर चुपके-चुपके कैपिटलिज्म से चोंच लड़ाता रहेगा। विवोहत्तर संबंध की तरह, नीति- इतर संबंध का भी एक अलग मजा होता है।

वैसे, चोंचलिज्म ने पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों के लिए पहचान का संकट खड़ा कर दिया है। आखिर कम्युनिज्म की पहचान क्या है? एक हंसिया और उसके बीच में लगा हथौड़ा। पहले सिंगुर और फिर नंदीग्राम के किसान अपने हंसिये खींच कर कम्युनिस्ट सरकार के सामने खड़े हो गये। मतलब झंडे से हंसिया तो गया। क्या हथौड़ा बचा रहेगा? मुश्किल है। क्योंकि, किसानों से ली जमीन पर जो कारखाने बनेंगे, वे ऑटोमैटिक होंगे। उनमें काटना, पीटना, ठोंकना- सब काम मशीनें करेंगी। हथौड़ा पुराने जमाने का औजार है। अब हथौड़े की राजनीति भी पुरानी हो जाएगी।

हंसिया गया, हथौड़ा गया, तो फिर कम्युनिज्म के नाम पर हिन्दुस्तानी कम्युनिस्ट क्या करेंगे? और कुछ तो बचा नहीं, इसलिए अमेरिका का विरोध करेंगे। अमेरिका का यह विरोध, विरोध है या विरोधाभास? कैपिटलिज्म से चोंच लड़ाना और कैपिटलिज्म के बाप का विरोध! गुड खाएं, गुलगुलों से परहेज! हिन्दुस्तानी कम्युनिस्ट अमेरिका का विरोध करते हैं, जबकि मूल कम्यूनिस्ट देश रूस और चीन पहले ही अमेरिका के तंबू में बैठ चुके हैं। सबसे ताज्जुब की बात तो यह है कि हिन्दुस्तानी कम्युनिस्ट अपना विरोध उस कांग्रेस के तंबू में बैठ कर प्रदर्शित करते हैं, जो खुद अमेरिका के तंबू में बैठी है। ऐसा सिर्फ राजनीति में ही हो सकता है कि छोटे तंबू में बैठ कर बड़े तंबू को नकार दिया जाए। जी हां, इस दुनिया में सिर्फ नेता ही ऐसा जीव है जो छतरी लगा कर आसमान को नकार सकता है। (साभार- प्रभासाक्षी)

Saturday 21 June 2008

आकार लेता लाल गलियारा- फ्रांसुआ गौशिए


जब हम युवा थे तो माओत्से तुंग, चे ग्वेवारा और यहां तक कि पोल-पोट जैसे शख्स हमारे नायक हुआ करते थे। समय के साथ-साथ हमने माओ के आततायी कृत्यों के बारे में जाना, जिसने अपने ही हजारों लोगों की हत्या कर दी।

पोल-पोट निश्चय ही और ज्यादा क्रूर था। स्टालिन भी इनसे बेहतर नहीं था। इस तरह देखा जाए तो दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में साम्यवाद व्यावहारिक रूप से मर चुका है। अब तो कोई चीन को भी साम्यवादी देश नहीं कह सकता। फिर भी, आज की दुनिया में संभवत: इससे ज्यादा बेरहम पूंजीवादी देश कोई नहीं है। लेकिन भारत में न सिर्फ साम्यवाद जीवित है, वरन खूब फल-फूल रहा है।

पश्चिम बंगाल में इसकी सरकार है, केरल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में इसकी मिली-जुली सरकार है और केंद्र की मौजूदा यूपीए सरकार तो इन्हीं के दम पर टिकी है। यहां आपको नंदन (फिल्मकार मणिरत्नम के पुत्र) जैसे युवा भी मिल सकते हैं, जो चेन्नई में हाल ही में हुई माकपा की बैठक में ‘लाल ब्रिगेड का कार्यकर्ता’ था या फिर डॉ. विनायक सेन जैसे कट्टर साम्यवादी से भी आपका वास्ता पड़ सकता है, जो आजकल जेल में हैं। वैसे साम्यवादी अमूमन भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होते। उनकी सादा जीवनशैली होती है और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होते हैं।

दुर्भाग्य से इसका एक स्याह पहलू भी है, भारतीय साम्यवादियों ने खुद को लेनिन और माओत्से तुंग के हिसाब से इस कदर ढाल लिया है कि न सिर्फ वे धर्म-विरोधी हो गए हैं, जिनके निशाने पर विशेषकर हिंदू रहते हैं, वरन कभी-कभार भारत-विरोधी भी नजर आते हैं। मिसाल के तौर पर वे कभी चीन की आलोचना नहीं करते और यहां तक कि दिल्ली और बीजिंग के मध्य तनाव की सूरत में चीन का ही पक्ष लेते हैं। इसका एक और भी खतरनाक पक्ष है और वह है साम्यवाद का सशस्त्र रूप।

भारत में इसे नक्सलवाद के रूप में जाना जाता है। इस आंदोलन की शुरुआत पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से 25 मई 1970 को किसानों के हिंसक विद्रोह के रूप में हुई। यह सत्य है कि नक्सलवाद की शुरुआत अन्याय के चलते हुई है, जैसा कि नजर आता है कि आज भी भारत के कुछ हिस्सों में ऐसी अक्षम्य विषमताएं हैं जिनकी जड़ में जातीय भेदभाव, जमींदारों का शोषण और स्थानीय प्रशासनिक व राजनीतिक तंत्र की अकर्मण्यता है।

हालांकि, नक्सली अपने उद्देश्यों को लेकर बिलकुल स्पष्ट हैं और वे खुलेआम माओ जेदोंग का हवाला देते हैं कि ‘इसका (माओवाद का) उद्देश्य मौजूदा समाज और इसके संस्थानों को मिटाना और उनकी जगह पर बिलकुल नया ढांचा स्थापित करना है।’ यदि कोई आज के नक्सलवाद को गहराई से देखे तो उसे हत्या, बलात्कार, अपहरण, फिरौती, काली कमाई और मानवाधिकारों का हनन नजर आएगा। आज भारत के 35 राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों में से 16 में फिलहाल माओवादी गतिविधियां जारी हैं।

संभवत: इसी सचाई के आलोक में कुछ दिन पूर्व भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कहना पड़ा था, ‘यह कहना कोई अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है कि देश ने अब तक आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर जिन चुनौतियों का सामना किया है, उनमें नक्सलवाद सबसे बड़ी चुनौती है।’

भारतीय समाज को तोड़ने के लिए नक्सलवाद ने पिछले बारह महीनों में अपनी मारक क्षमता दोगुनी कर ली है। 15 मार्च 2007 को माओवादी विद्रोहियों ने छत्तीसगढ़ के रानी बोदली गांव में छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल के 16 अफसरों और 39 स्पेशल पुलिस अफसरों को मार डाला।

27 अक्टूबर 2007 को नक्सलियों ने झारखंड के चिलखारी गांव में 17 लोगों का कत्ल कर दिया, जिनमें एक इस प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री का बेटा भी था। 16 दिसंबर 2007 को 110 नक्सली छत्तीसगढ़ की दंतेवाड़ा जेल से फरार हो गए। 8 फरवरी 2008 को उड़ीसा में 300 विद्रोहियों, जिनमें 100 महिलाएं भी शामिल थीं, ने एक पुलिस शस्त्रागार के ठिकाने पर 6 पुलिसकर्मियों को गोलियों से भून दिया और अन्य कई को शहर के बीचोंबीच नयागढ़ पुलिस स्टेशन में मार दिया। यह स्थान राज्य की राजधानी भुवनेश्वर से महज 100 किलोमीटर दूर था।

अक्सर कहा जाता है कि नक्सली संघर्ष अपने ढलान पर है, लेकिन यह दूर-दूर तक सच नहीं है। वर्ष 2007-09 के दौरान अपने सशस्त्र संघर्ष को जारी रखने के लिए नक्सलियों के पास तकरीबन 60 करोड़ रुपए का बजट है। नेपाल में अपनी विजय पताका फहराने वाले माओवादियों सेप्रेरणा लेकर भारत में नक्सलवादियों ने हाल ही में एक चौंकाने वाला घोषणापत्र जारी किया है,
1- हम शपथ लेते हैं कश्मीर, असम, नगालैंड, मणिपुर और पूर्वोत्तर के दूसरे हिस्सों में अनेक उत्पीड़ित संगठनों द्वारा चलाए जा रहे सशस्त्र जनआंदोलन में सहभागिता करेंगे।
2- सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों और मुस्लिम, ईसाई व सिख जैसे अल्पसंख्यकों के साथ मिलकर व्यापक संयुक्त मोर्चा गठित करेंगे।
3- एक गुप्त पार्टी तंत्र बनाएंगे, जिस पर दुश्मनों के हमले का कोई असर नहीं होगा।
4- मजदूरों, किसानों, युवाओं, छात्रों, महिलाओं और दूसरे वर्ग के लोगों के मध्य खुले और गुप्त जनसंगठनों का निर्माण।
5- पीपुल्स गोरिल्ला आर्मी (पीजीए) की बेस फोर्स के तौर पर गोरिल्ला जोन के तहत समस्त गांवों में नागरिक सेना तैयार की जाएगी तथा शहरी क्षेत्रों में हथियारबंद आत्मरक्षा इकाइयों की स्थापना की जाएगी।

भारत सरकार ने नक्सलियों को रोकने के लिए बातचीत, बगावत का प्रतिरोध, आदिवासियों को हथियार उपलब्ध कराने समेत हर मुमकिन कोशिश की है, लेकिन इसके खास परिणाम हासिल नहीं हुए हैं। आर्ट ऑफ लिविंग फॉउंडेशन के प्रणोता आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर ने यह दर्शाने के लिए कि बंदूक ही इसका हल नहीं है और प्राणायाम जैसी प्राचीन विधाओं के माध्यम से भी इन लोगों को साथ लाया जा सकता है, नक्सलियों के साथ संवाद प्रक्रिया चालू की है। बिहार यात्रा के दौरान इस प्रकार के आंदोलन से जुड़े 10,000 से ज्यादा युवाओं ने अहिंसा का संदेश फैलाने की शपथ ली।

इंटेलीजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक अजीत दोवल ने कहा है, ‘पिछले पांच वर्षो के रुझानों को देखते हुए हम वर्ष 2010 के सुरक्षा परिदृश्य का मॉडल बना सकते हैं। 260 से ज्यादा जिले, तकरीबन आधा भारत नक्सल प्रभावित होगा जहां सरकारी फरमान शायद ही चलें।’ क्या नक्सलियों का नेपाल से आंध्रप्रदेश तक लाल गलियारा बिछाने का सपना साकार हो रहा है? हम उम्मीद करते हैं कि ऐसा न हो। पुरातनकाल से चली आ रही धर्ममय भारतीय जीवन शैली दूसरे समाधान सुझाती है।
- लेखक पेरिस स्थित ‘ल रेव्यू द ल’इंड’ के प्रमुख संपादक हैं। (साभार-भास्‍कर डॉट)