हितचिन्‍तक- लोकतंत्र एवं राष्‍ट्रवाद की रक्षा में। आपका हार्दिक अभिनन्‍दन है। राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता - आए जिस-जिस में हिम्मत हो

Friday 27 February 2009

यूपीए सरकार की असफलताएं (भाग-10) / भारत निर्माण का ढकोसला

इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की उपेक्षा

इंफ्रास्ट्रक्चर विकास धीमी गति से हो रहा है। राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम एकदम पीछे जा पड़ा है। यही बात राष्ट्रीय रेल विकास योजना पर भी लागू होती है, जिसे राजग सरकार ने शुरू किया था। पिछले साढ़े चार वर्षों में कोई विशेष इंफ्रास्ट्रक्चर योजना शुरू नहीं हुई है।

प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना की उपेक्षा

वाजपेयी सरकार द्वारा शुरू की गई प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना स्वतंत्रता के बाद की सबसे बड़ी योजना थी। यूपीए सरकार ने इसको पर्याप्त रूप में धीमा कर दिया है। एनडीए के शासनकाल में सरकार ने 2801 किलोमीटर सड़कों के निर्माण की प्रक्रिया को तेजी से बढ़ाया था।

नदियों को जोड़ने की योजना का परित्याग

नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना भी एनडीए सरकार द्वारा चलाई गई अन्य मूल्यवान योजनाओं की तरह इस सरकार ने सौतेला व्यवहार किया है और केवल राजनैतिक कारणों से इन पर ध्‍यान नहीं दिया जा रहा है।

बिजली क्षेत्र के सुधारों का अंधकारमय भविष्य

देश में बिजली की आपूर्ति की स्थिति निरंतर बिगड़ती चली जा रही है जबकि यह सरकार बिजली अधिनियम में संशोधान पर बहस कर रही है।

कनेक्टिविटी

यह मानते हुए कि भारत के चहुमंखी और तेज विकास के लिए कनेक्टिविटी बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए एनडीए सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के लिए समयबद्ध कार्यक्रम चलाया था जिसमें ग्रामीण सड़कों का कार्यक्रम- पीएनजीएसवाई भी शामिल था। अधिकांश स्थलों पर यह कार्य धीमा पड़ गया है। नीतिगत भ्रमों के कारण बंदरगाहों और हवाई अड्डों का निर्माण कार्यक्रम भी पीछे रह गया है इससे आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय विकास बुरी तरह प्रभावित होगा।

जल संसाधन

न्यूनतम साझा कार्यक्रम में वायदा किया गया था कि प्राथमिकता के आधार पर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा। दुर्भाग्य से सच यह है कि देश में, हर जगह पानी का अकाल पड़ा हुआ है। भारतीयों द्वारा देशभर में जिन नदियों की पूजा की जाती रही है, वे आज यूपीए सरकार के कुशासन के कारण जहरीले पानी का भंडार बन रही हैं। इसके कारण जल में प्रदूषण की मात्रा बढ़ने से हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बन गया है।

ऊर्जा क्षेत्र

यूपीए सरकार ने पूरे देश को अंधकार का क्षेत्र बना दिया है। एनडीए सरकार ने विद्युत क्षेत्र में जो सुधार किए थे उन्हें यूपीए सरकार ने रोक दिया है और हर व्यक्ति पर इसका असर दिखाई पड़ता है। इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में यूपीए सरकार का प्रदर्शन बहुत असंतोषजनक है जिसे हाल की योजना आयोग के आंकड़ों ने भी बताया है। बिजली का उत्पादन बढ़ती मांग के सामने स्थिर बना है। तेल और गैस के उत्पादन की कहानी भी ऐसी ही बद्तर है और तेल आयात पर हमारी निर्भरता बढ़ गयी है। ऊर्जा क्षेत्र में हमारा प्रदर्शन आर्थिक विकास, रोजगार और जीवन के स्तर को प्रभावित करेगा।

स्वास्थ्य सेवाओं की उपेक्षा

न्यूनतम राष्ट्रीय साझा कार्यक्रम में 3 प्रतिशत खर्च करने का फैसला लिया गया था। अभी तक कुछ नहीं हुआ है। वहीं एनडीए सरकार के दौरान राज्यस्तर पर 6 एम्स खोलने की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।

Thursday 26 February 2009

सीपीआई (एम) में 'एम' यानी मियां-बीवी

गत 2 फरवरी को चण्डीगढ़ में आयोजित पत्रकार वार्ता में एक महिला कार्यकर्ता के देहशोषण के आरोपों में पार्टी से निष्कासित किए गए सीपीआई (एम) पंजाब इकाई के सचिव व पूर्व विधायक प्रोफेसर बलवंत सिंह ने आरोप लगाया है कि पार्टी में आजकल प्रकाश करात व वृंदा करात की तानाशाही के चलते मार्क्सवाद का स्थान मियां-बीवीवाद ने ले लिया है। उन्होंने बताया कि मियां-बीवी की तानाशाही के चलते पार्टी में लोकतांत्रिक मूल्यों को बुरी तरह से कुचला जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि प्रोफेसर बलवंत सिंह को हाल ही में पार्टी से निष्कासित किया गया है। उनके बयान से सीपीआई (एम) में मची घमासान व अनुशासनहीनता खुल कर सामने आ गयी है। और लोकसभा चुनाव से पहले हुआ इस तरह का भांडाफोड़ पार्टी के लिए वज्रपात से कम नहीं समझा जा रहा है। पत्रकारों को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि उन पर लगे देहशोषण के आरोपों के संदर्भ में करात कुनबे ने पोलित ब्यूरो को पूरी तरह से गुमराह किया है। प्रोफेसर सिंह ने बताया कि करात ने झूठ कहा है कि इन आरोपों के बारे में उन्होंने उनसे बात की है। उन्होंने कहा मैंने अपने निष्कासन को लेकर पार्टी को पत्र लिखा परन्तु पार्टी संविधान के अनुसार इस तरह के पत्र का जवाब देने की बाध्यता होने के बावजूद इस पर कोई गौर नहीं किया गया। आरोपों की जांच के लिए पोलित ब्यूरो ने दो सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया परन्तु उनके बयान लेने के लिए तीन सदस्य पहुंच गए जो पार्टी के संविधान का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है। जांच कमेटी के सामने न तो शिकायतकर्ता उपस्थित हुई और न ही उसे शिकायत की प्रति उपलब्ध करवाने के बारे सीताराम येचुरी से बात की गई तो उन्होंने इसे जरूरी बताया परन्तु करात कुनबे ने पार्टी नियमों की कोई परवाह नहीं की।

निष्कासित कम्युनिस्ट नेता ने बताया कि अपने खिलाफ होने वाली कार्रवाई की जानकारी उन्हें सिर्फ मीडिया से मिली है और उनके जवाब की जांच करना तो दूर पोलित ब्यूरो में उस पर विचार तक नहीं किया गया और करात कुनबे के इशारे पर उन पर कार्रवाई की गाज गिरा दी गई। केवल इतना ही नहीं पंजाब के 150 कम्युनिस्ट नेताओं ने पार्टी हाईकमान को अपनी कार्रवाई पर पुनर्विचार करने के संबंध में पत्र भी लिखे पर करात कुनबे ने किसी को जवाब देना उचित नहीं समझा। दाराकेश सैन

Wednesday 25 February 2009

यूपीए की असफलताएं (भाग-9) / अल्‍पसंख्‍यक तुष्टिकरण

सच्चर समिति : मजहबी आरक्षण की वकालत
केन्द्र सरकार ने मुसलमानों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की जानकारी के लिए जस्टिस राजेन्द्र सच्चर के नेतृत्व में समिति का गठन किया। राजेन्द्र सच्चर समिति की सिफारिशें 'मजहबी आधार पर आरक्षण' प्रदान करने वाली है जिन्हें देखकर 1906 में मुस्लिम लीग की याद आ जाती है, जिसके कारण देश का विभाजन हुआ। सच्चर समिति की रिपोर्ट विभाजनकारी है और पूरी तरह से पूर्वाग्रहों से भरी पड़ी है। यह विकृत दृष्टिकोण को प्रकट करती है। समिति की सारी कवायद केवल यह साबित करने की रही कि मुस्लिम समाज हर क्षेत्र में बहुत पिछड़ा है। यदि मुस्लिम समुदाय की आज आजादी के 59 वर्ष बाद ये स्थिति है तो इसके लिए क्या वे ही लोग जिम्मेदार नहीं है जिन्होंने इन 59 में से 54 वर्षों तक देश में शासन किया।

मदानी की रिहाई- क्या ये सचमुच सेक्युलर है?
कांग्रेस, यूपीए के सहयोगी दल और वामपंथी पार्टियां अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के मामले में एक दूसरे से होड़ लगाने में जुटी हैं। यह बात फिर केरल की कांग्रेसनीत गठबंधन सरकार और वामपंथियों वाले गठबंधन से सिद्ध हो जाती हैं। केरल में कांग्रेसनीत यूडीएफ ने 16 मार्च 2006 को विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें खौफनाक आतंकवादी अब्दुल नासर मदानी की रिहाई का प्रस्ताव किया गया है जबकि उस पर बम विस्फोट अभियुक्तों को शरण देने के गम्भीर आरोप रहे हैं।

आपको याद होगा कि फरवरी 1998 में एक चुनाव रैली में कोयम्बटूर में ओमा बाबू उर्फ मजीद तथा अन्य अभियुक्तों ने बम विस्फोट किए थे, जिसमें 59 लोगों की मृत्यु हो गई थी और 200 निर्दोष लोग विकलांग हो गए थे। ऐसे लोगों को पनाह देने वाले मदानी थे। इसके अलावा भी उनका सम्पर्क पाकिस्तान के आईएसआई एजेण्टों से था जो अल उम्मा कार्यकर्ता को प्रशिक्षण देते थे। किन्तु विधानसभा चुनावों को नजर में रखते हुए सत्तारुढ़ कांग्रेस पार्टी और विपक्षी वामपंथियों ने मुस्लिम मतदाताओं की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए एक दूसरे से होड़ लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया। आतंकवाद से लड़ने वाले इन यूपीए और वामपंथियों के सेकुलरिज्म की ईमानदारी के क्या कहने? क्या इसे ही सेक्युलरिज्म कहा जाता है?

मजहब आधारित आरक्षण
केवल वोट बैंक राजनीति के कारण आंध्र प्रदेश में कांग्रेस सरकार ने राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करते हुए मजहब के आधार पर केवल मुस्लिमों के लिए सरकारी नौकरियों में 5 प्रतिशत सीटों का आरक्षण कर दिया। भाजपा ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। उच्च न्यायालय ने मजहब आधारित आरक्षण को 'असंवैधानिक' करार दे दिया, फिर भी कांग्रेस संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ उपाए ढूंढने में लगी हुई है। कांग्रेस फिर अपनी युगों पुरानी अल्पसंख्यक वोट बैंक राजनीति पर लौट आई है। बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक विभाजन करके सरकार सामाजिक कट्टरवाद को जन्म दे रही है।

तमिलनाडु सरकार द्वारा मुस्लिमों और ईसाइयों को आरक्षण
तमिलनाडु सरकार ने शिक्षा संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में मुस्लिम और ईसाई समुदाय को आरक्षण देने की घोषणा की, जो समाज को धार्मिक आधार पर बांटने की कोशिश है। यह कार्य न केवल गैरसंवैधानिक है, बल्कि धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ भी है। संविधान सभा में बहस के दौरान यह निर्णय लिया गया था कि धार्मिक आधार पर कोई आरक्षण नहीं दिया जाएगा। दुर्भाग्य की बात है कि यह सब कुछ वोट बैंक को ध्‍यान में रखकर किया जा रहा है, जो देश की एकता और अखंडता के लिए घातक है। सच तो यह है कि धार्मिक आधार पर आरक्षण धर्मान्तरण को बढ़ावा देता है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में साम्प्रदायिक आरक्षण
सेक्युलेरिज्म की आड़ में यूपीए के मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में 50 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण का आदेश दिया। उच्च न्यायालय ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय न मानते हुए इसे असंवैधानिक करार दे दिया। फिर भी, सरकार उच्चतम न्यायालय पहुंच गई है। हालांकि यह मामला न्यायाधीन है, फिर भी श्री अर्जुन सिंह ने कहना जारी रखा है कि वह न्यायालय के आदेश के बाद भी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक दर्जा दिलाने के लिए कृतबद्ध हैं।

कांग्रेस का 'तथाकथित सेक्युलर' चेहरा
हम यहां दो उदाहरण दे रहे हैं जिनमें कांग्रेस का वह सेक्युलर चेहरा सामने आ जाता है, जिसे कांग्रेस ने भारत को जाति और धर्म के आधार पर बांटा:
1. अक्तूबर 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस ने धर्म और जाति के आधार पर अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की। यह सूची इण्डियन एक्सप्रेस सहित सभी समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई। इस पर कांग्रेस की प्रवक्ता श्रीमती अम्बिका सोनी के हस्ताक्षर थे।
2. यूपीए द्वारा गठित जस्टिस राजेन्द्र सच्चर समिति ने हमारी हथियारबंद सेना से रक्षा सेवाओं में सभी मुस्लिमों की संख्या व सूची देने के लिए कहा।

Monday 23 February 2009

नैनो-नंदीग्राम की चक्की में पिसा बंगाल

निवेशक कर रहे हैं पश्चिम बंगाल में निवेश से तौबा।
नंदीग्राम और सिंगुर घटनाक्रमों के बाद वर्ष 2008 में पश्चिम बंगाल देश के प्रमुख निवेश केंद्रित राज्यों की सूची में 13वें स्थान पर आ गया है जबकि इससे एक साल पहले उसे चौथा स्थान हासिल था। यह खुलासा एसोचैम की ओर से पेश की गई एक रिपोर्ट में हुआ है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक राज्य साल 2007 में राज्य के लिए 2,43,489 करोड़ रुपये की निवेश घोषणाएं की गई थीं, जबकि 2008 में ये घटकर महज 90,095 करोड़ रुपये रह गईं।

एसोचैम के महासचिव डी एस रावत ने बताया कि नंदीग्राम और सिंगुर की घटनाओं ने राज्य में निवेश की कमर तोड़ दी है। उन्होंने कहा कि इन दोनों मामलों के बाद से कारोबारी राज्य में निवेश से कतराने लगे हैं।

जनवरी से दिसंबर 2008 के बीच पश्चिम बंगाल के लिए देश के कारोबार जगत ने 90,095 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणाएं की थीं, जो कि पिछले साल की समान अवधि से 63 फीसदी कम हैं। पिछले वर्ष इसी अवधि में 2,43,489 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणाएं की गई थीं।

हालांकि राज्य में निवेश घटने की एक वजह आर्थिक मंदी भी रही है। नकदी की किल्लत के कारण बुनियादी क्षेत्रों का विकास प्रभावित हुआ और इस कारण निवेश सूची में पश्चिम बंगाल नीचे खिसक आया है।

कैलेंडर वर्ष 2007 और 2008 में राज्य के लिए निवेश के मामले में स्टील क्षेत्र सबसे आगे रहा है। वर्ष 2007 में स्टील क्षेत्र की घरेलू कंपनियों ने जहां राज्य में 85,200 करोड़ रुपये की निवेश घोषणाएं की, वहीं 2008 में यह निवेश घटकर महज 23,000 करोड़ रुपये रह गया। इस तरह अकेले स्टील क्षेत्र की ओर से निवेश में इस दौरान 72.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।

साल 2007 में राज्य में दूसरा सबसे अधिक निवेश करने वाला क्षेत्र रियल एस्टेट रहा, जहां से 52,929 करोड़ रुपये की निवेश घोषणाएं की गईं। हालांकि 2008 में रियल एस्टेट की जगह मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र ने ले ली और इस क्षेत्र से 20,000 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की गई।

राज्य में निवेश के लिहाज से 2007 और 2008 दोनों ही सालों में तेल एवं गैस क्षेत्र तीसरे स्थान पर रहा। इस क्षेत्र ने 2007 में जहां 42,750 करोड़ रुपये की निवेश घोषणाएं की थीं, वहीं 2008 में यह 77 फीसदी घटकर केवल 20,000 करोड़ रुपये रह गईं।

अगर कंपनियों के लिहाज से राज्य में निवेश की हालत देखें तो 2007 में जेएसडब्लू स्टील 35,000 करोड़ रुपये के निवेश के साथ सबसे आगे रहा। कंपनी ने इस निवेश की घोषणा खड़गपुर के निकट सालबोनी में 10 मिलियन टन के स्टील संयंत्र को लगाने के लिए किया था।

डांकुनी में टाउनशिप परियोजना के विकास के लिए 33,000 करोड़ रुपये की निवेश घोषणा के साथ डीएलएफ दूसरे स्थान पर रही।

हल्दिया में क्षमता विस्तार के लिए 29,750 करोड़ रुपये के निवेश के साथ इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन तीसरे पायदान पर रही। जबकि वीडियोकॉन समूह ने चौथे और रिलायंस इंडस्ट्रीज ने पांचवे स्थान पर कब्जा जमाया। (प्रदीप्ता मुखर्जी)

चिकनी है डगर

निवेश के लिए पसंदीदा राज्यों की सूची में पहुंचा 13वें नंबर पर

नंदीग्राम और सिंगुर बने निवेशकों की बेरुखी की वजह

एक ही साल में घट गया लगभग 63 फीसदी निवेश

स्रोत

Friday 20 February 2009

यूपीए की असफलताएं (भाग-9)/ मजहबी आधार पर देश के विभाजन का प्रयास

यूपीए सरकार ने ब्रिटिश राज्य की तर्ज पर 'फूट डालो और राज करो' की नीति अपनाते हुए अनेक ऐसे निर्णय लेने शुरू किए जो उनके राजनैतिक हितों के अनुकूल रहें चाहे उसके प्रभाव देश के लिए घातक ही क्यों न हों। 'वन्देमातरम्' का विरोध करना और प्रधानमंत्री का यह कहना कि देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक है, क्या राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा नहीं बन सकते? अगर भारत में भाईचारे का संबंध नहीं होता और हमारी धर्म-निरपेक्षता की भावना प्रबल नहीं होती तो वातावरण बहुत दूषित हो जाता। संप्रग सरकार इतने पर ही नहीं रूकी। वह शायद तय कर चुकी है कि उनके निर्णयों की प्रतिक्रिया हो। गरीबी को साम्प्रदायिकता का रंग देना कहां तक वाजिब है? अल्पसंख्यक समुदाय दृष्टि से तो खतरनाक है ही, परन्तु आर्थिक दृष्टि से भी बिल्कुल निराधार है। विकास और गरीबी से लड़ाई में साम्प्रदायिक दृष्टि का सर्वथा त्याग करना चाहिए, परन्तु हमें यूपीए की केन्द्र सरकार ने ऐसे भी जिले चयनित किए हैं, जहां पर अल्पसंख्यकों की जनसंख्या अधिक है। इन जिलों के विशेष विकास पर केन्द्र सरकार का विशेष ध्‍यान रहेगा और इसके लिए बजट भी विशेष रूप से रखा गया है।

अल्पसंख्यक तुष्टिकरण
यूपीए सरकार के द्वारा साढ़े चार वर्षों में किये गये चिंताजनक कार्यों में अल्पसंख्यक तुष्टिकरण प्रमुख है। सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में साम्प्रदायिक आरक्षण के अपने प्रयासों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नकार दिये जाने के बाद केन्द्र सरकार ने बैंकों के ऋण और विकास योजनाओं में साम्प्रदायिक आधार पर अलग कोटा निर्धारित करने का प्रयास किया। देश के संसाधनों पर मुस्लिम समुदाय का पहला हक होने का प्रधाानमंत्री का बयान अचंभित करने वाला रहा। समाज के सभी वर्गों का विकास होना चाहिए। विकास को साम्प्रदायिक रंग में रंगने का कोई भी प्रयास निन्दनीय है।

भारत सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय के विकास के लिए आवंटित धन को 400 करोड़ से बढ़ाकर 1400 करोड़ रूपए कर दिया गया है। दूसरी तरफ अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़े वर्ग के विकास के लिए आवंटित धन में 2प्रतिशत की कटौती की गई है। यह समाज के पिछड़े और अनुसूचित वर्ग के साथ अन्याय है। यदि वास्तविकता में समाज के किसी वर्ग तक सरकारी सहायता और विकास के वास्तविक स्वरूप को सुनिश्चित करने की आवश्यकता है तो वे है अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति। सरकार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आवंटित धन में कटौती को समाप्त करना चाहिए और वह धन उचित ढंग से इन वर्गों के गरीब लोगों तक पहुंच सकें उस पर नजर रखने के लिए यदि आवश्यकता हो तो एक नोडल एजेंसी भी बनानी चाहिए।

अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक विभाजन
यूपीए ने देश की शिक्षा पध्दति में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक विभाजन की दीवार को चौड़ा करने का गहन प्रयास किया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मुस्लिमों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का निर्णय एकदम साम्प्रदायिक निर्णय है। इसका उद्देश्य चुनावों में कांग्रेस के लिए अल्पसंख्यकों के वोट हासिल करना है। कांग्रेस नेतृत्व इस प्रकार की विभाजनकारी राजनीति के दीर्घकालीन परिणामों से पूरी तरह उदासीन है।

प्रधानमंत्री का साम्प्रदायिक बयान
कांग्रेस के अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की राजनीति को हवा देते हुए प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय विकास परिषद में यहां तक कह दिया कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यक समुदायों और विशेषकर मुस्लिम समुदाय का है। यदि देश के संसाधनों पर किसी का पहला हक बनता है तो गरीबों का बनता है, अनुसूचित जनजाति के लोगों का बनता है, दलितों का बनता है। परन्तु केन्द्र सरकार की नजर में निर्धान, वनवासी और दलित से अधिक महत्व मुस्लिम समुदाय दिखाई पड़ता है। पूरे समुदाय को सांप्रदायिक आधार पर सुविधा, आरक्षण या पहला हक देने की बात करना असंवैधानिक है। ऐसे प्रयासों के द्वारा यू.पी.ए. सरकार मुस्लिम समुदाय को राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग-अलग रखने का प्रयास कर रही है।

राष्‍ट्रगीत वंदेमातरम् का अपमान
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने वंदेमातरम् राष्ट्रगीत शताब्दी वर्ष के अवसर पर राज्य सरकारों से 7 सितंबर, 2006 को स्कूलों में वंदेमातरम् गीत गाये जाने का निर्देश दिया। इसका देश के कुछ मुस्लिम समुदाय के नेताओं और सेकुलर बुद्धिजीवियों ने विरोध किया। तथाकथित मुस्लिम नेताओं एवं अल्पसंख्यक समुदाय की वोट बैंक की राजनीति को ध्‍यान में रखते हुए अर्जुन सिंह ने अपने आदेश से पलटते हुए कहा कि वंदेमातरम् को गाने के लिए किसी प्रकार की अनिवार्यता नहीं है। कांग्रेस एक बार फिर अपने ही जाल में फंस गई। उसके अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का एक और नायाब उदाहरण तब सामने आया जब कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राष्ट्रगीत वंदेमातरम् के सौ वर्ष पूरा होने के मौके पर गत 7 सितंबर को पार्टी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में नहीं पहुंचे। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह वंदेमातरम् समारोह समिति के अध्‍यक्ष भी थे।

अल्पसंख्यकों के लिए पृथक ऋण व्यवस्था
अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूत करने के चक्कर में संप्रग सरकार धार्म के नाम पर समाज में जहर घोलने का काम कर रही है। संप्रग राज में जल्द ही ऐसा समय आने वाला है जब बैंकों को किसी व्यक्ति को उधाार देने के लिए चैक लिखकर देना होगा तो उसे जानना होगा कि उसका धार्म क्या है? सरकार ने इण्डियन बैंक एसोसिएशन (आईबीए) से कहा है कि वह इस बात पर विचार करे कि वे जितना ऋण देती हैं, उसका कुछ हिस्सा अल्पसंख्यक समुदाय के लिए अलग से रख लिया जाए। यह हिस्सा बैंकिंग सेक्टर द्वारा दिए जाने वाले ऋण का लगभग 6 प्रतिशत की ऊंचाई तक जा पहुंचेगा। वित्ता मंत्रालय के बैंकिंग प्रभाग से अपने 9 जनवरी के पत्र में आईबीए से कहा है कि वह इस प्रस्ताव पर विचार करे कि क्या अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के लिए प्राथमिक सेक्टर में 15 प्रतिशत ऋण अलग से रखा जा सकता है?

Thursday 19 February 2009

यूपीए सरकार की असफलताएं (भाग-8)

हमारी संसदीय शासन व्यवस्था में प्रधानमंत्री को सरकार का सर्वोपरि माना जाता है। जिसके पास राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों अधिकार होते हैं। भारत का प्रधानमंत्री ऐसा नहीं होता है, जैसे कि वह किसी भारतीय कम्पनी का कोई प्रमुख निदेशक हो, वह अपनी राजनैतिक अधिकारों को किसी अन्य व्यक्ति को नहीं सौंप सकता है। आज देश पर एक ऐसी असंवैधानिक व्यवस्था लाद दी गई है कि प्रधानमंत्री के पास अपनी ही सरकार को नियंत्रण में रखने के अधिकार नहीं है और वह हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर संसद की बजाय अपने बॉस के प्रति अधिक उत्तरदायी बना रहता है।

डा. मनमोहन सिंह की एक और दुर्बलता है कि उसके मंत्रीगण किसी महत्वपूर्ण नीतिगत मामले की घोषणा करने से पहले उन्हें विश्वास में नहीं लेते हैं। बहुत से ऐसे अवसर आए हैं कि प्रधानमंत्री के लिए कोई नीति उनके पास एक खबर बनकर पहुंची है जो उन्हें समाचार पत्रों अथवा इलैक्ट्रोनिक मीडिया से मिलती है। इसी कारण उन्हें अपने मंत्रियों को लिखना पड़ा कि वे इस प्रकार की सभी नीतिगत घोषणाओं के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय से अपना सम्पर्क बनाए रखें।

कांग्रेस को जनता ने नकारा
यूपीए के प्रति जनता का आक्रोश पिछले वर्षों के दौरान दिखाई पडा। विगत दो वर्षों में 17 राज्‍यों के विधानसभा चुनाव संपन्‍न हुए, जिनमें से 11 राज्‍यों में यूपीए हारा और कांग्रेस को अपने बल पर केवल चार राज्‍यों में विजय हासिल हुई।

संप्रग सरकार का अधिनायकवादी रवैया
संप्रग सरकार अभी तक अधिनायकवादी रवैए से कार्य कर रही है। राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर वह आम सहमति बनाने का न तो प्रयास किया और न ही विपक्ष के साथ-साथ अपने सहयोगी दलों को विश्वास में लिया। मामला अमेरिका के साथ परमाणु समझौते का हो या अरूणाचल प्रदेश में चीनी घुसपैठ का। दोनों मसलों पर संप्रग सरकार अपनी बात रखने में सफल नहीं हुई। केंद्र सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद को प्रभावी ढंग से नहीं उठाया। आईएमडीटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद भी बंगलादेशी घुसपैठ के मामले में यूपीए सरकार पूरी तरह निष्क्रिय रही। संप्रग सरकार की कमजोर नीति के चलते नेपाल में राजनीतिक संकट गहराया।

महिला आरक्षण
यूपीए सरकार के चार वर्ष पूरे होने के पश्चात् भी महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित नहीं हो सका। वास्तव में महिला विरोधी यूपीए सरकार महिलाओं को आरक्षण का लाभ देना ही नहीं चाहती। चौथे वर्ष के बजट सत्र के दौरान यूपीए ने महिला आरक्षण को लोकसभा के स्थगित होने के पश्‍चात राज्यसभा के अंतिम कार्यदिवस में बड़े ही नाटकीय ढंग से प्रस्तुत किया। जिसका उसके ही सहयोगी दलों ने जमकर विरोध किया व बिल फाड़ कर फेंक दिया। यह दर्शाता है कि यूपीए सरकार इस बिल को लेकर महज खानापूर्ति कर रही है। वह महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए गंभीर नहीं है।

तेलंगाना के साथ धोखा
आंध्रप्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और तेलंगाना राष्ट्रीय समिति ने तेलंगाना राज्य गठन के मुद्दे पर चुनावी गठबंधन किया था कि यदि वे विजयी होते हैं तो वे आंध्रप्रदेश के वर्तमान राज्य को बांट कर एक संपूर्ण तेलंगाना राज्य बना देंगे। दोनों पार्टियां विधानसभा चुनाव में विजयी रहे परंतु कांग्रेस ने लोगों के जनादेश के साथ विश्वासघात किया और कांग्रेस ने अपने इस वायदे को नहीं निभाया। आंध्र के लोगों को मूर्ख बनाने के लिए यूपीए ने रक्षा मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी की अधयक्षता में इस विषय पर एक समिति गठित कर दी है। समिति और यूपीए सरकार जैसे-तैसे समय काट रही हैं। हताश होकर तेलंगाना राष्ट्रीय समिति केंद्र और आंध्र सरकार की कैबिनेट दोनों से अपने इन बुनियादी नीतिगत मतभेदों के कारण बाहर निकल आयी।

Tuesday 17 February 2009

श्रीगुरुजी और राष्ट्र-अवधारणा

अध्‍याय -1
राष्ट्र और राज्य


राष्ट्र, राष्ट्रीयता, हिन्दू राष्ट्र इन अवधारणाओं (concepts) के सम्बन्ध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक (1906 से 1973) श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरुजी ने जो विचार समय-समय पर व्यक्त किये, वे जितने मौलिक हैं, उतने ही कालोचित भी हैं। एक बड़ी भारी भ्रान्ति सर्वदूर विद्यमान है जिसके कारण, राज्य को ही राष्ट्र माना जाता है। 'नेशन-स्टेट' की अवधारणा प्रचलित होने के कारण यह भ्रान्ति निर्माण हुई और आज भी प्रचलित है। स्टेट (राज्य) और नेशन (राष्ट्र) इनका सम्बन्धा बहुत गहरा और अंतरतम है, इतना कि एक के अस्तित्व के बिना दूसरे के जीवमान अस्तित्व की कल्पना करना भी कठिन है। जैसे पानी के बिना मछली। फिर भी पानी अलग होता है और मछली अलग, वैसे ही राज्य अलग है, राष्ट्र अलग है। इस भेद को आंखों से ओझल करने के कारण ही, प्रथम विश्व युध्द के पश्चात्, विभिन्न देशों में सामंजस्य निर्माण करने हेतु जिस संस्था का निर्माण किया गया और जिसके उपुयक्तता का बहुत ढिंढोरा पीटा गया, उसका नाम 'लीग ऑफ नशन्स' था। वस्तुत: वह लीग ऑफ स्टेट्स, या लीग ऑफ गव्हर्नमेंट्स थी। मूलभूत धारणा ही गलत होने के कारण केवल दो दशकों के अन्दर वह अस्तित्वविहीन बन गया। द्वितीय विश्‍व युध्द के पश्‍चात् 'युनाइटेड नेशन्स' बनाया गया। वह भी युनाइटेड स्टेट्स ही है। इस युनाइटेड नेशन्स यानी राष्ट्रसंघ का एक प्रभावशाली सदस्य यूनियन ऑफ सोशलिस्ट सोवियत रिपब्लिक्स (यु.एस.एस.आर) है। वह उस समय भी एक राष्ट्र नहीं था। एक राज्य था। सेना की भौतिक शक्ति के कारण वह एक था। आज वह शक्ति क्षीण हो गई तो, उसके घटक अलग हो गये हैं। यही स्थिति युगोस्लाव्हाकिया की भी हो गयी। वह भी एक राष्ट्र नहीं था। एक राज्य था। तात्पर्य यह है कि युनाइटेड नेशन्स यह राष्ट्रसंघ नहीं, राज्यसंघ है।

'राज्य' की निर्मिति के सम्बन्ध में महाभारत के शान्तिपर्व में सार्थक चर्चा आयी है। महाराज युधिष्ठिर, शरशय्या पर पड़े भीष्म पितामह से पूछते हैं कि ''पितामह, यह तो बताइये कि राजा, राज्य कैसे निर्माण हुये।'' भीष्म पितामह का उत्तर प्रसिध्द है। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था कि जब कोई राजा नहीं था, राज्य नहीं था, दण्ड नहीं था, दण्ड देने की कोई रचना भी नहीं थी। लोग 'धर्म' से चलते थे और परस्पर की रक्षा कर लेते थे।

महाभारत के शब्द हैं :-

''न वै राज्यं न राजाऽसीत्
न दण्डो न च दाण्डिक:।
धर्मेणैव प्रजा: सर्वा।
रक्षन्ति स्म परस्परम्॥''
स्वाभाविकतया युधिष्ठिर का पुन: प्रश्न आया कि, यह स्थिति क्यों बदली। भीष्माचार्य ने उत्तर दिया, ''धर्म क्षीण हो गया। बलवान् लोग दुर्बलों को पीड़ा देने लगे'' महाभारत का शब्द है- ''मास्यन्याय'' संचारित हुआ। याने बड़ी मछली छोटी मछली को निगलने लगी। तब लोग ही ब्रह्माजी के पास गये और हमें राजा दो, ऐसी याचना की। तब मनु पहले राजा बने। राजा के साथ राज्य आया, उसके नियम आये, नियमों के भंग करनेवालों को दण्डित करने की व्यवस्था आयी। नियमों के पीछे राज्यशक्ति यानी दण्डशक्ति का बल खड़ा हुआ। अत: नियमों को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।

आज का राज्यशास्त्र भी इसी स्थिति को मानता है। राज्य यह एक राजनीतिक अवधारणा है, जो कानून के बलपर खड़ी रहती है, उसके बलपर चलती है और कानून को सार्थक रखने के लिए उसके पीछे राज्य की दण्डशक्ति (Sanction) खड़ी रहती है। राज्य के आधारभूत हर कानून के पीछे, उसको भंग करनेवालों को दबानेवाली (coercive) एक शक्ति खड़ी होती है। अर्नेस्ट बार्कर नाम के राज्यशास्त्र के ज्ञाता कहते हैं ''राज्य कानून के द्वारा और कानून में अवस्थित रहता है। हम यह भी कह सकते हैं कि राज्य यानी कानून ही होता हैं।''

"The state is a legal association: a juridically organized nation or a nation organized for actoin under legal rules. It exists for law: it exists in and through law: we may even say that it exists as law. If by law we mean, not only a sum of legal rules but also and in addition, an operative system of effective rules which are actually valid and regularly enforced. The essence of the State is a living body of effective rules: and in that sense the State is law.” (Ernest Barker - Priciples of Social and Political Theory - Page 89)

तात्पर्य यह है कि राज्य की आधारभूत षक्ति कानून का डर है। किन्तु राष्ट्र की आधारभूत शक्ति लोगों की भावना है। राष्ट्र लोगों की मानसिकता की निर्मिति होती है। हम यह भी कह सकते हैं कि राष्ट्र यानी लोग होते हैं। People are the Nation. अंग्रेजी में कई बार 'नेशन' के लिये 'पीपुल' शब्द का प्रयोग किया जाता है।

किन लोगों का राष्ट्र बनता है। मोटी-मोटी तीन षर्ते हैं। पहली शर्त है, जिस देश में लोग रहते हैं, उस भूमि के प्रति उन लोगों की भावना। दूसरी शर्त है, इतिहास में घटित घटनाओं के सम्बन्धा में समान भावनाएँ। फिर वे भावनाएँ आनन्द की हो या दु:ख की, हर्ष की हो या अमर्ष की। और तीसरी, और सबसे अधिक महत्व की शर्त है, समान संस्कृति की। श्री गुरुजी ने अपने अनेक भाषणों में इन्हीं तीन षर्तो का, भिन्न-भिन्न सन्दर्भ में विवेचन करके यह निस्संदिग्धा रीति से प्रतिपादित किया कि यह हिन्दू राष्ट्र है। यह भारतभूमि इस राष्ट्र का शरीर है। श्री गुरुजी के शब्द हैं ''यह भारत एक अखण्ड विराट् राष्ट्रपुरुष का शरीर है। उसके हम छोटे-छोटे अवयव हैं, अवयवों के समान हम परस्पर प्रेमभाव धारण कर राष्ट्र-शरीर एकसन्ध रखेंगे।''

संकलनकर्ता - मा.गो.वैद्य

Saturday 14 February 2009

वेलेंटाइन डे में मैं विश्‍वास नहीं करता: राहुल गांधी


कांग्रेस के महा‍सचिव राहुल गांधी ने गुजरात में तीन दिन के अपने प्रवास (सौराष्‍ट्र) में 14 जनवरी को कहा कि मैं वेलेंटाइन डे में विश्‍वास नहीं करता हूं और मुझे उनके साथ कोई दिक्‍कत नहीं हैं जो इन्‍हें मनाते हैं। उन्‍होंने आगे कहा कि आप किसी का ख्‍याल रखते हैं, इसे जताने के लिए कोई एक दिन नहीं होना चाहिए।

पब कल्चर के बीच पिसता समाज व शालीनता

भारतीय संस्कृति के समुद्र में अनेक संस्कृतियां समाहित हैं। भारत की धरती पर अब एक नई संस्कृति उभर रही है पब कलचर। इस नई संस्कृति के उदगम में समाज नहीं वाणिज्य और बाज़ारभाव का योगदान अमूल्य है। पर मंगलौर में एक पब में जिस प्रकार से महिलाओं और लड़कियों पर हाथ उठाया गया वह तो कोई भी संस्कृति –और कम से कम भारतीय तो बिल्कुल ही नहीं– इसकी इजाज़त नहीं देती। इसकी व्यापक भर्त्सना स्वाभाविक और उचित है क्योंकि यह कुकर्म भारतीय संस्कृति के बिलकुल विपरीत है।

पब एक सार्वजनिक स्थान है जहां कोई भी व्यक्ति प्रविष्ट कर सकता है। यह ठीक है कि पब में जो भी जायेगा वह शराब पीने-पिलाने, अच्छा खाने-खिलाने और वहां उपस्थित व्यक्तियों के साथ नाचने-नचाने द्वारा मौज मस्ती करने की नीयत ही से जायेगा। पर साथ ही किसी ऐसे व्यक्ति के प्रवेश पर भी तो कोई पाबन्दी नहीं हो सकती जो ऐसा कुछ न किये बिना केवल ठण्डा-गर्म पीये और जो कुछ अन्य लोग कर रहे हों उसका तमाशा देखकर ही अपना मनोरंजन करना चाहे।

व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और उच्छृंखलता में बहुत अन्तर होता है। जनतन्त्र में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की तो कोई भी सभ्य समाज रक्षा व सम्मान करेगापर उच्छृंखलता सहन करना किसी भी समाज के लिये न सहनीय होना चाहिये और न ही उसका सम्मान। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की दोहाई के पीछे है हमारी गुलामी की मानसिकता जिसके अनुसार पश्चिमी तथा विदेशी संस्कृति में सब कुछ अच्छा है और भारतीय में बुरा। हम इस हीन भावना से अभी तक उबर नहीं पाये हैं। इसलिये हम उस सब की हिमायत करते हैं जो हमारे संस्कार व संस्कृति के विपरीत है और बाहरी संस्कृति में ग्राहय। इसलिये पब जैसे सार्वजनिक स्थान पर तो हर व्यक्ति को मर्यादा में ही रहना होगा और ऐसा सब कुछ करने से परहेज़ करना होगा जिससे वहां उपस्थित कोई व्यक्ति या समूह आहत हो। क्या स्वतन्त्रता और अधिकार केवल व्यक्ति के ही होते हैं समाज के नहीं? क्या व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और अधिकार के नाम पर समाज की स्वतन्त्रता व अधिकारों का हनन हो जाना चाहिये? क्या व्यक्तिगत स्वतन्त्रता (व उच्छृंखलता) सामाजिक स्वतन्त्रता से श्रेष्ठतम है?


व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की दोहाई के पीछे है हमारी गुलामी की मानसिकता जिसके अनुसार पश्चिमी तथा विदेशी संस्कृति में सब कुछ अच्छा है और भारतीय में बुरा। हम इस हीन भावना से अभी तक उबर नहीं पाये हैं। इसलिये हम उस सब की हिमायत करते हैं जो हमारे संस्कार व संस्कृति के विपरीत है और बाहरी संस्कृति में ग्राहय।

एक सामाजिक प्राणी को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिये जो उसके परिवार, सम्बन्धियों, पड़ोसियों या समाज को अमान्य हो। व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की दोहाई देने का तो तात्पर्य है कि सौम्य स्वभाव व शालीनता व्यक्तिगत स्वतन्त्रता व अधिकार के दुश्मन हैं।

जो व्यक्ति अपना घर छोड़कर कहीं अन्यत्र –बार, पब या किसी उद्यान जैसे स्थान पर — जाता है, वह केवल इसलिये कि जो कुछ वह बाहर कर करता है वह घर में नहीं करता या कर सकता। कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से किसी सार्वजनिक स्थान पर प्रेमालाप के लिये नहीं जाता। जो जाता है उसके साथ वही साथी होगा जिसे वह अपने घर नहीं ले जा सकता। पब या कोठे पर वही व्यक्ति जायेगा जो वही काम अपने घर की चारदीवारी के अन्दर नहीं कर सकता।

व्यक्ति तो शराब घर में भी पी सकता है। डांस भी कर सकता है। पश्चिमी संगीत व फिल्म संगीत सुन व देख सकता है। बस एक ही मुश्किल है। जिन व्यक्तियों या महिलाओं के साथ वह पब या अन्यत्र शराब पीता है, डांस करता है, हुड़दंग मचाता है, उन्हें वह घर नहीं बुला सकता। यदि उस में कोई बुराई नहीं जो वह पब में करता हैं तो वही काम घर में भी कर लेना चाहिये। वह क्यों चोरी से रात के गहरे अन्धेरे में वह सब कुछ करना चाहता हैं जो वह दिन के उजाले में करने से कतराता हैं? कुछ लोग तर्क देंगे कि वह तो दिन में पढ़ता या अपना कारोबार करता हैं और अपना दिल बहलाने की फुर्सत तो उसें रात को ही मिल पाती है। जो लोग सारी-सारी रात पब में गुज़ारते हैं वह दिन के उजाले में क्या पढ़ते या कारोबार करते होंगे, वह तो ईश्वर ही जानता होगा। वस्तुत: कहीं न कहीं छिपा है उनके मन में चोर। उनकी इसी परेशानी का लाभ उठा कर पनपती है पब संस्कृति और कारोबार।

व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की दोहाई के पीछे है हमारी गुलामी की मानसिकता जिसके अनुसार पश्चिमी तथा विदेशी संस्कृति में सब कुछ अच्छा है और भारतीय में बुरा। हम इस हीन भावना से अभी तक उबर नहीं पाये हैं। इसलिये हम उस सब की हिमायत करते हैं जो हमारे संस्कार व संस्कृति के विपरीत है और बाहरी संस्कृति में ग्राहय।

इसके अन्य पहलू भी हैं। यदि हम पब कल्चर को श्रेयस्कर समझते हैं तो यह स्वाभाविक ही है कि जो व्यक्ति रात को –या यों कहिये कि पौ फटने पर– पब से निकलेगा वह तो सरूर में होगा ही और गाड़ी भी पी कर ही चलायेगा। कई निर्दोष इन महानुभावों की मनमौजी कल्चर व स्वतन्त्रता की बलि पर शहीद भी हो चुके हैं। तो यदि शराब पीने की स्वतन्त्रता है तो शराब पी कर गाड़ी चलाना –और नशे में गल्ती से अनायास ही निर्दोषों को कुचल देना– क्यों घोर अपराध है?

एक गैर सरकारी संस्‍थान द्वारा किए गए हालिया सर्वेक्षण ने तो और भी चौंका देने वाले तथ्‍यों को उजागर किया है। दिल्‍ली में सरकार ने शराब पीने के लिए न्‍यूनतम आयु 25 वर्ष निर्धारित की है। परन्‍तु इस सर्वेक्षण के अनुसार, दिल्‍ली के पबों में जाने वाले 80 प्रतिशत व्‍यक्ति नाबालिग हैं। इस सर्वेक्षण ने आगे कहा है कि दिल्‍ली में प्रतिवर्ष लगभग 2000 नाबालिग शराब पीकर गाडी चलाने के मामलों में संलिप्‍त पाये गये हैं। वह या तो शराब पीकर गाडी चलाने के दोषी हैं या फिर उसके शिकार।

हमारी ही सरकारों ने –जिनके नेता पब कल्चर का समर्थन कर रहे हैं– शराब पीकर गाड़ी चलाने को घोर अपराध घोषित कर दिया है और उन्हें कड़ी सज़ा दी जा रही है । हमारी अदालतों –कुछ विदेशों में भी– शराब पी कर गाड़ी चलाने वालों को आतंकवादियों से भी अधिक खतरनाक बताते है जो निर्दोष लोगों की जान ले लेते हैं।

पब कल्चर एक बाज़ारू धंधा है। इसे संस्कृति का नाम देना किसी भी संस्कृति का अपमान करना है। यही कारण है कि इसके विरूध्द प्रारम्भिक आवाज़ चाहे हिन्दुत्ववादियों ने ही उठाई हो पर उनके सुर में उन लोगों नें भी मिला दिया है जिन्हें भारत की संस्कृति से प्यार है।

केन्द्रिय स्वास्थ मन्त्री श्री अंबुमानी रामादोस ने पब कल्चर को भारतीय मानस के विरूध्द करार दिया है और एक राष्ट्रीय शराब नीति बनाकर इस पर अंकुश लगाने का अपना इरादा जताया है। उन्होंने कहा कि देश में 40 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाओं का कारण शराब पीकर गाड़ी चलाना है और इसमें पब में शराब पीकर लौट रहे नौजवानों की संख्या बहुत हैं। उन्होंने आगे कहा कि एक विश्लेषण के अनुसार पिछले पांच-छ: वर्षों में युवाओं में शराब पीने की लत में 60 प्रतिशत की वृध्दि हुई है जिस कारण युवाओं द्वारा शराब पीकर गाड़ी चलाने और दुर्घनाओं में मरने वालों की संख्या में वृध्दि हुई है जिनमें बहुत सारे युवक होते हैं।

कर्नाटक के मुख्य मन्त्री श्री बी0 एस0 येदियुरप्पा, जहां यह घटनायें हुईं, ने अपने प्रदेश में पब कल्चर को न पनपने देने का अपना संकल्प दोहराया है।

उधर राजस्थान के कांग्रेसी मुख्य मन्त्री श्री अशोक गहलोत भी इस कल्चर को समाप्त करने में कटिबध्द हैं। इसे राजत्थान की संस्कृति के विरूध्द बताते हुये वह कहते हैं कि वह प्यार के सार्वजनिक प्रदर्शन के विरूध्द हैं। ”लड़के-लड़कियों के सार्वजनिक रूप में एक-दूसरे की बाहें थामें चलना तो शायद एक दर्शक को आनन्ददायक लगे पर वह राजस्थान की संस्कृति के विरूध्द है। श्री गहलोत ने भी इसे बाज़ारू संस्कृति की संज्ञा देते हुये कहा कि शराब बनाने वाली कम्पनियां इस कल्चर को बढ़ावा दे रही है जिन पर वह अंकुश लगायेंगे।

अब तो पब कल्चर ने ‘सब-चलता-है’ मनोवृति व व्यक्तिगत अधिकारों और राष्ट्रीय संस्कृति, संस्कारों और शालीनता के बीच एक लड़ाई ही छेड़ दी है। अब यह निर्णय देश की जनता को करना है कि विजय किसकी हो। ***

Friday 13 February 2009

यूपीए की असफलताएं (भाग-6)/ गठबंधन नहीं, एक सर्कस

यूपीए गठबंधन के बारे में प्रारंभ में कहा जाता था कि यह एक अप्राकृतिक गठबंधन है। यूपीए गठबंधन का एकमात्र राजनीतिक उद्देश्य था 'भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में नहीं आने देना।' वामपंथी दलों ने इसी आधार पर चार सालों तक नूराकुश्ती के माध्‍यम से जनता को भ्रमित भी किया।

देश की जनता बहुत प्रबुद्ध है, अब वह इन चालों को अच्छी तरह समझ चुकी है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार में न तो कुछ प्रगति दिखाई पड़ रही है और न ही कुछ संयुक्त दिखाई पड़ रहा है। यह विभक्त और प्रगतिहीन गठबंधन का नमूना बन कर रह गया है। यूपीए गठबंधन को जनता का विश्वास तो मिला ही नहीं था, चुनाव के बाद गठबंधन के गुणाभाग से उन्होंने जो कृत्रिम विश्वास पाया भी था उसका भी मान रखने में यह सरकार सफल नहीं रही।

भारतीय जनता पार्टी ने 'गठबंधन का दायित्व' एनडीए की सरकार में जिस तरह निभाया है और वर्तमान में कई राज्यों में निभा रही है, वह भारतीय राजनीति के लिए आदर्श बन चुका है। केंद्र के साथ-साथ राज्य स्तर पर महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ दो दशकों से अधिक, पंजाब में अकाली दल, बिहार में जनता दल (यू) के साथ एक दशक से अधिक और उड़ीसा में बीजू जनता दल के साथ 10 वर्षों से भाजपा का गठबंधन सफलता के साथ चल रहा है। ये सभी गठबंधन भारतीय राजनीति के सबसे स्थायी गठबंधनों में से एक है।

पारस्परिक विश्वास के साथ सामंजस्य बनाते हुए गठबंधन चलाना आसान नहीं होता। भारतीय जनता पार्टी ने 'गठबंधन का दायित्व' एनडीए की सरकार में जिस तरह निभाया है और वर्तमान में कई राज्यों में निभा रही है, वह भारतीय राजनीति के लिए आदर्श बन चुका है। केंद्र के साथ-साथ राज्य स्तर पर महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ दो दशकों से अधिक, पंजाब में अकाली दल, बिहार में जनता दल (यू) के साथ एक दशक से अधिक और उड़ीसा में बीजू जनता दल के साथ 10 वर्षों से भाजपा का गठबंधन सफलता के साथ चल रहा है। ये सभी गठबंधन भारतीय राजनीति के सबसे स्थायी गठबंधनों में से एक है।

यदि यूपीए को संयुक्त मानकर चला जाए तो हमें इस 'संयुक्त' की परिभाषा ही पूरी तरह से बदल देनी होगी। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जिस ढंग से खुलेआम एक दूसरे के खिलाफ बोलते हैं, ऐसी स्थिति में किसी को भी यह शक हो सकता है कि ये यूपीए के भाग हैं अथवा एक दूसरे के विरोधी है। वैसे भी इस गठबंधन की नींव ही मौकापरस्ती पर आधारित है। हर दल अपने-अपने हितों को साधने में लगा है।

यूपीए के अनेक सहयोगी उससे अलग हो गए हैं। बहुजन समाज पार्टी और वामपंथी दल अब उनसे अलग चुके हैं। तेलंगाना ने समर्थन वापस ले लिया। श्री वाइको की पार्टी ने भी यूपीए का साथ छोड़ दिया। लोकदल ने भी पल्ला झाड़ लिया। अत: यह स्पष्ट है कि इन पौने पांच वर्षों में कांग्रेस ने देश की जनता और अपने सहयोगी दल दोनों का विश्वास खोया है।


कांग्रेसनीत यूपीए को देश की जनता पूरी तरह नकार चुकी है। यूपीए व्यावहारिक रूप से संसद में बहुमत खो चुकी है क्योंकि उसके अनेक सहयोगी उससे अलग हो गए हैं। बहुजन समाज पार्टी और वामपंथी दल अब उनसे अलग चुके हैं। तेलंगाना ने समर्थन वापस ले लिया। श्री वाइको की पार्टी ने भी यूपीए का साथ छोड़ दिया। लोकदल ने भी पल्ला झाड़ लिया। अत: यह स्पष्ट है कि इन पौने पांच वर्षों में कांग्रेस ने देश की जनता और अपने सहयोगी दल दोनों का विश्वास खोया है।

यूपीए गठबंधन राजनीति का विचित्र दर्शन पेश कर रहे हैं इसमें विचारों की और क्रियाओं की एकता की बजाय सिर्फ द्वंद और विरोधाभास है। हर दिन मीडिया में रिपोर्टें आती रहती हैं कि वामपंथियों का कोई न कोई घटक सरकार पर न्यूनतम साझा कार्यक्रम से अलग जाता दिखायी पड़ रहा है। यहां तो विचारों की मत-भिन्नता सहमति से कहीं अलग दिखाई पड़ती है।

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कुछ लोग मनमोहन सरकार को एक गठबंधन की सरकार नहीं कहते है बल्कि इसे सर्कस का नाम देते हैं जिसके बहुत से जोकर हैं बल्कि देखा जाये तो यूपीए सर्कस भी नहीं है क्योंकि सर्कस में भी बहुत से पात्र होते हैं जो कम से कम किसी एक के निर्देशन में तो चलते ही हैं। परन्तु यह बात यूपीए के मामले में सही नहीं उतरती है।

लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। यूपीए सरकार के खिलाफ लोग एकजुट हो रहे हैं। देश में इस गठबंधन एवं सरकार के विरूध्द वातावरण बन चुका है।

Thursday 12 February 2009

वामपंथी किले को ध्‍वस्‍त कर आगे बढ रहा है संघ


केवल लफ्फाजी के बूते आप बहुत दिनों तक लोगों को मूर्ख नहीं बना सकते। कम्‍युनिस्‍ट अब तक ऐसा ही करते रहे हैं। यही कारण है कि उन पर से लोगों का विश्‍वास तेजी से उठता जा रहा हैं। ''सर्वहारा की तानाशाही'' के सहारे क्रांति का सपना देखने वाले मार्क्‍सवादियों के आचरण पर गौर करें तो यह स्‍पष्‍ट पता चलता है कि वे अब तक मजदूरों का रक्त चूसते रहे हैं। कम्‍युनिस्‍ट शासित प्रदेशों में गुंडागर्दी ही ट्रेड यूनियन का मुख्य हथियार हैं। इसलिए वहां उद्योग-धंधे ठप्प पड़े हैं और कोई पूंजी निवेश करना नहीं चाहता। इन प्रदेशों में मजदूर अभी भी जिल्‍लत भरी जिंदगी जीने पर विवश हैं लेकिन मजदूर नेता ठाठ की जिन्दगी जीते हैं। ''दुनिया के मजदूरों एक हो'' का नारा बुलंद करने वाले कम्‍युनिस्‍टों के ट्रेडयूनियनवाद ने मजदूरों में कर्तव्यबोध को समाप्त करने की साजिश रची वहीं भारतीय मजदूर संघ ने देशभक्ति को सबसे पहले स्‍थान दिया। कम्‍युनिस्‍टों ने नारा लगाया- 'हमारी मांगे पूरी करो, चाहे जो मजबूरी हो।' वहीं भारतीय मजदूर संघ ने कहा- 'देशहित में करेंगे काम, काम का लेंगे पूरा दाम ।' उल्‍लेखनीय है कि 1962 के चीन युद्ध के समय जब बंगाल के वामपंथी संगठनों ने हड़ताल की वकालत की तब मजदूर संघ से जुड़े श्रमिकों ने अतिरिक्त काम किया।

''सर्वहारा की तानाशाही'' के सहारे क्रांति का सपना देखने वाले मार्क्‍सवादियों के आचरण पर गौर करें तो यह स्‍पष्‍ट पता चलता है कि वे अब तक मजदूरों का रक्त चूसते रहे हैं। कम्‍युनिस्‍ट शासित प्रदेशों में गुंडागर्दी ही ट्रेड यूनियन का मुख्य हथियार हैं। इसलिए वहां उद्योग-धंधे ठप्प पड़े हैं और कोई पूंजी निवेश करना नहीं चाहता। इन प्रदेशों में मजदूर अभी भी जिल्‍लत भरी जिंदगी जीने पर विवश हैं लेकिन मजदूर नेता ठाठ की जिन्दगी जीते हैं। ''दुनिया के मजदूरों एक हो'' का नारा बुलंद करने वाले कम्‍युनिस्‍टों के ट्रेडयूनियनवाद ने मजदूरों में कर्तव्यबोध को समाप्त करने की साजिश रची वहीं भारतीय मजदूर संघ ने देशभक्ति को सबसे पहले स्‍थान दिया। कम्‍युनिस्‍टों ने नारा लगाया- 'हमारी मांगे पूरी करो, चाहे जो मजबूरी हो।' वहीं भारतीय मजदूर संघ ने कहा- 'देशहित में करेंगे काम, काम का लेंगे पूरा दाम ।' उल्‍लेखनीय है कि 1962 के चीन युद्ध के समय जब बंगाल के वामपंथी संगठनों ने हड़ताल की वकालत की तब मजदूर संघ से जुड़े श्रमिकों ने अतिरिक्त काम किया।

कभी देश के हरेक प्रांतों में कम्‍युनिस्‍ट मजदूर संगठनों का दबदबा था और वे प्रथम क्रमांक पर रहते थे। और जब राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ ने मजदूरों के क्षेत्र में काम करने का तय किया तो कम्‍युनिस्‍टों ने इसका मजाक उडाया। लेकिन राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के आनुसंगिक संगठन भारतीय मजदूर संघ ने अपनी राष्‍ट्रवादी विचारधारा और राष्‍ट्रीय निष्‍ठा के दम पर कम्‍युनिस्‍ट मजदूर संगठनों के वर्चस्‍व को ध्‍वस्‍त कर‍ दिया। कम्‍युनिस्‍ट शासित केरल में तो भारतीय मजदूर संघ के सदस्‍यों की संख्‍या वामपंथी मजदूर संगठन सीटू से दुगुनी हैं। कम्‍युनिस्‍टों का ट्रेडयूनियन पर वर्चस्‍व हैं, क्‍योंकि इन प्रदेशों में वे भय और आतंक के बल पर सत्‍ता पर काबिज है। बाकी पूरे देश में भारतीय मजदूर संघ के राष्‍ट्रवाद का पताका लहरा रहा है। 62 लाख 15 हजार 797 सदस्यों के साथ भारतीय मजदूर संघ ने लगातार दूसरी बार देश का सबसे बड़े श्रमिक संगठन होने का गौरव प्राप्त किया है। तमाम झंझाबातों का सामना करते हुए तथा कार्यकर्ताओं द्वारा नि:स्वार्थ भाव से मजदूर, उद्योग व राष्ट्र हित में सच्चे लगन से काम करते रहने के कारण ही बीएमएस को यह शानदार उपलब्धि हासिल हुई है।

62 लाख सदस्यों के साथ बीएमएस नंबर-1 पर बरकरार

62 लाख 15 हजार 797 सदस्यों के साथ भारतीय मजदूर संघ ने लगातार दूसरी बार देश का सबसे बड़े श्रमिक संगठन होने का गौरव प्राप्त किया है। जबकि इंटक, एटक व एचएमएस क्रमश: दूसरे, तीसरे व चौथे स्थान पर है। पिछले सत्यापन में तीसरे स्थान पर रही सीटू खिसकर पांचवें स्थान पर चली गई है। बीएमएस दूसरे स्थान के इंटक से 22 लाख 61 हजार 785 सदस्यों के भारी अंतर से आगे है।

केंद्रीय श्रमायुक्त द्वारा 2002 के सदस्यता सत्यापन को आधार मानते हुए 2008 में जारी अधिसूचना के अनुसार 13 केंद्रीय श्रमिक संगठनों की कुल सदस्य संख्या 2 करोड़ 48 लाख 84 हजार 802 है। इनमें बीएमएस की सदस्य संख्या 62,15, 797, इंटक की 39,54,012, एटक की 34,42,239, एचएमस की 33,38,491, सीटू की 26,78,473, यूटीयूसी की 13,73,268्र टीयूसीसी की 07,32,760, एसईडब्लुए की 06,88,140, एक्टू की 06,39,962, एलपीएफ की 06,11,506, यूटीयूसी 06,06,935, एनएफआईटीयू(धनबाद) की 05,69,599 व एनएफआईटीयू(कोलकात) की 33,620 सदस्य संख्या है। इससे पूर्व 1989 के सदस्यता सत्यापन के आधार पर 1994 में अधिसूचना जारी की गई थी। उस समय भी बीएमएस एक नंबर पर थी तथा दूसरे नंबर पर रही इंटक से 4 लाख 24 हजार 176 सदस्यों के अंतर से आगे थी। उस समय सभी श्रमिक संगठनों की कुल सदस्य संख्या 1 करोड़ 23 लाख 34 हजार 142 थी। 1989 व 2002 के बीच 13 वर्षो के अंतराल में आर्थिक उदारीकरण, श्रमिक यूनियनों के प्रति बाजार के नाकारत्मक रूख के बावजूद केंद्रीय श्रमिक संगठनों की सदस्य संख्या 2 करोड़ 48 लाख से अधिक हो गई है। इस अंतराल में बीएमएस में जहां 30 लाख 99 हजार 233 सदस्यों का इजाफा हुआ वहीं इंटक में 12 लाख 61 हजार 624, एटक में 25 लाख 03 हजार 753, एचएमएस में 18 लाख 57 हजार 528, सीटू में 09 लाख 03 हजार 253 सदस्यों का इजाफा हुआ।

Tuesday 10 February 2009

ब्लू फिल्म की सीडी, प्रयुक्त एवं अप्रयुक्त कंडोम, माला डी की गोलियां और शक्तिबर्धक आयुर्वेदिक दवाएं तथा क्रांतिकारी नक्सली!

''सत्‍ता बंदूक की नली से निकलती हैं'' इस ध्‍येय को मानकर क्रांति का सपना देखने वाले नक्‍‍सलियों के शिविर में अब बंदूक और साहित्‍य बरामद नहीं होते। Bangetudi शिविर में एक छापे के दौरान पुलिस ने एक ब्लू फिल्म सीडी, प्रयुक्त और अप्रयुक्त कंडोम, माला डी की गोलियां और शक्तिबर्धक आयुर्वेदिक दवाएं जब्त कीं। इसके साथ ही यह रहस्‍योद्घाटन हुआ है कि बडी तेजी से नक्‍सली एचआईवी/एड्स से पीड़ित हो रहे हैं और इसके चलते कई नक्सलियों की मौतें भी हुई हैं। नक्‍सलियों पर यौन शोषण का इतना भूत सवार हो रहा है कि वे नाबालिगों को भी नहीं बख्श रहे है। वास्‍तव में महिलाओं का यौन शोषण और निर्दोष लोगों की हत्या ही तो नक्सली क्रांति का असली रूप है।

गत 05 फ़रवरी, 2009 को हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित 'प्रदीप कुमार मैत्रा' की खबर के मुताबिक हाल ही में गढ़चिरौली के जंगलों में हुए 15 पुलिसकर्मियों के नरसंहार के आरोपी सहित नक्सलवादी समूहों के कई कार्यकर्ता यौन संक्रमित रोगों (एसटीडी)-एचआईवी/एड्स से पीड़ित हैं। इसके चलते कई नक्सलियों की मौतें भी हुई हैं।

''सत्‍ता बंदूक की नली से निकलती हैं'' इस ध्‍येय को मानकर क्रांति का सपना देखने वाले नक्‍‍सलियों के शिविर में अब बंदूक और साहित्‍य बरामद नहीं होते। Bangetudi शिविर में एक छापे के दौरान पुलिस ने एक ब्लू फिल्म सीडी, प्रयुक्त और अप्रयुक्त कंडोम, माला डी की गोलियां और शक्तिबर्धक आयुर्वेदिक दवाएं जब्त कीं। इसके साथ ही यह रहस्‍योद्घाटन हुआ है कि बडी तेजी नक्‍सली एचआईवी/एड्स से पीड़ित हो रहे हैं और इसके चलते कई नक्सलियों की मौतें भी हुई हैं। नक्‍सलियों पर यौन शोषण का इतना भूत सवार हो रहा है कि वे नाबालिगों को भी नहीं बख्श रहे है। वास्‍तव में महिलाओं का यौन शोषण और निर्दोष लोगों की हत्या ही तो नक्सली क्रांति का असली रूप है।

हाल ही में एक छापे के दौरान जब्त किए गए नक्सलवादी साहित्य से यह रहस्योद्धाटन हुआ है। दुर्व्यवहार की शिकार महिलाएं प्रतिशोध के भय के चलते अपनी आवाज बुलंद नहीं कर पा रही है। नक्सली कार्यकर्ताओं के यौन दुर्व्यवहार से नक्सली नेतृत्व चिंतित है।

एक नागपुर चिकित्सक के मुताबिक, रामकृष्ण, 35, और महालक्ष्मी, 30, दो नक्सलवादियों, जिनका दो महीने पहले खून का परीक्षण हुआ था, उनमें एचआईवी पॉजिटिव से ग्रसित पाया गया था।

वहीं चौबीस वर्षीय दलम (समूह) के नेता सोनु गावडे, जिन्होंने हाल ही में आत्मसमर्पण किया, वह अपने युवा दिनों में नक्सलवादी आंदोलन की ओर आकर्षित हुई थी। उनका कहना है कि gunpoint पर सेक्स की मांग की जाती है। यह सामान्य सी बात हो गयी है और यह कहना मुश्किल है कि जंगलों में कौन किसके साथ सो रही है। सुश्री गावडे, एक दलम कमांडर बुधु बेतलु मिले और उन्होंने शादी कर ली। 2006 में एक मुठभेड़ के दौरान अपने पति के मौत के बाद उसे कई नक्सली नेताओं के साथ यौन संबंध रखने के लिए मजबूर किया गया।

पुलिस अधिकारी का कहना है, ''2006 में नक्सलियों के बंगेतुड़ी शिविर में एक छापे के दौरान हमने एक ब्लू फिल्म सीडी, प्रयुक्त और अप्रयुक्त कंडोम, माला डी की गोलियां और शक्तिबर्धक आयुर्वेदिक दवाएं जब्त कीं।'' गढ़चिरौली के एसपी राजेश प्रधान कहते हैं कि अतिवादियों ने नाबालिगों को भी नहीं बख्शा।

कई महिला गुरिल्लाओं ने नक्सली आंदोलन को छोड़ दिया और आत्मसमर्पण कर दिया क्योंकि वहाँ हो रहे जबर्दस्ती यौन दुर्व्यवहार से उन्हें नफरत हो गई।



नक्सलियों की शौर्य-गाथा!

Saturday 7 February 2009

क्या पोप को भी अब भारत रत्न मिलेगा ?- डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

भारत सरकार पिछले कई सालों से 26 जनवरी के दिन महत्वपूर्ण व्यक्तियों को सम्मान प्रदान करती है। यह सम्मान पद्म भूषण, पद्म विभूषण और पद्मश्री के नाम से दिया जाता है और जिसको आशातीत सम्मान देना है उसे कई बार भारत रत्न की उपाधि भी प्रदान की जाती है। सम्मान देने की यह परम्परा अंग्रेजों के वक्त में शुरू हुई थी लेकिन उन्होंने सम्मान देने के लिए उपाधियों के नाम अलग-अलग रखे हुए थे। सबसे बड़ी उपाधि तो सर की होती थी और जिसको यह उपाधि मिल जाती थी वह ब्रिटिश शासन का सूर्य कभी न डूबे ऐसी प्रार्थना दिन रात शुरू कर देता था। ऐसे किस्से भी हुए जब प्रार्थना करते-करते भगत को सचमुच का ज्ञान हो गया तो वह सर की उपाधि ब्रिटिश सरकार को वापिस कर गया। दूसरी उपाधियां राय बहादुर और राय साहिब की होती थी। जाहिर है यह उपाधियां उन लोगों को दी जाती थी जो ब्रिटिश शासन के साथ मिलकर भारतीयों का दमन करते थे और समय के अनुसार शासन की सलामती के लिए सरकार को सहयोग भी देते थे। शायद यही कारण था कि सरकार जिनको राय बहादुर और राय साहब बनाती थी, सामान्य जनता टोडी बच्चा हाय-हाय, के नारे लगाकर गलियों में उनको बेपर्दा करते थे।

ऐसा नहीं कि भारत सरकार ने यह पहली बार किया हो। न ही यह पुरस्कार अनजाने में और बिना किसी योजना के दिया गया इक्का दुक्का पुरस्कार है। वास्तव में चर्च को शह देने के लिए और मतातंरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार की सोची समझी लम्बी योजना की एक कड़ी है। यही कारण था कि कुछ साल पहले आस्ट्रेलिया की एक नागरिक श्रीमति ग्लेडेस स्टेन्स को भी पद्मश्री से सोनिया गांधी की सरकार ने सम्मानित किया था। आस्ट्रेलिया की यह नागरिक कुछ साल पहले हिन्दुस्तान में रही थी और उसके पति ग्राहम स्टेन्स उड़ीसा के जन-जाति समाज को मतातंरण के द्वारा इसाई बनाने के आपराधिक कर्म में जुटे हुए थे। इसी के चलते उड़ीसा के क्रुध्द जन-जाति समाज की एक भीड़ ने उन्हें जला दिया था। श्रीमती स्टेन्स उसके बाद आस्ट्रेलिया चली गई। भारत सरकार ने उनको पद्मश्री से सम्मानित किया। अब कोई भला मानुस पूछ सकता है कि श्रीमती स्टेन्स का किसी भी क्षेत्र में भारत को क्या योगदान है। लेकिन चर्च का दबाव था कि इसे पद्मश्री से सम्मानित किया जाये।

सरकार बदली तो जाहिर है उपाधियां भी बदल गई। इसके साथ ही उपाधि देने की कसौटी भी बदल गई। अब सरकार क्योंकि जनता की हो गई थी इसलिए नई उपाधियां भी उन्हीं लोगों को मिलने लगी जिन्होंने जन-कल्याण के लिए किसी न किसी क्षेत्र में बेहतर कार्य किया हो। परन्तु इतिहास बड़ा निर्मम है। वह बार-बार अपने को दोहराता रहता है। धीरे-धीरे इन उपाधियों की कसौटी जन-कल्याण से हटकर उसी मानसिकता में पहुंच गई जिससे गोरी सरकार उपाधियां बांटती थी। जाहिर है उपाधि देने के उद्देश्य भी बदल गये। शायद इसलिए जब किसी को उपाधि मिलती है तो नाम पढ़ कर आम आदमी की प्रतिक्रिया होती है, कम्बख्त बड़ा जुगाडू निकला। कहीं न कहीं से टांका भिड़ा ही दिया। यही कारण रहा होगा कि मोरार जी देसाई प्रधानमन्त्री बने थे तब ऐसा भी विचार होने लगा था कि इन उपाधियों का देना बंद कर दिया जाये। उपाधियां बंद तो नहीं हो सकी अलबत्ता बाद में यह फैसला जरूर हुआ कि इन उपाधियों को अपने नाम के आगे तमगे की तरह इस्तेमाल न किया जाये। परन्तु जिन उस्तादों ने मेहनत से उपाधि ली हो यदि वह उसका उपयोग नाम के आगे नहीं करेंगे तो उसका फायदा क्या?

अबकी बार निर्मला जोशी को सोनिया गांधी की सरकार ने पद्म विभूषण से नवाजा है। निर्मला जोशी नेपाली मूल की है और सुश्री टेरेसा के आंदोलन की अध्यक्षा है। सुश्री टेरेसा युगोस्लाविया की रहने वाली थी। लेकिन मतान्तरण के आंदोलन को बढ़ाने के लिए वह काफी अर्सा पहले भारत में ही आ गई थी। यहां आकर उन्होंने अनाथ बच्चों के लिए आश्रम खोले लेकिन इस बात का ध्यान रखा कि जो अनाथ बच्चे उनके अनाथ आश्रम में आ जाये उनकी सेवा करने से पहले उनके गले में यीशु मसीह के ताबीज लटका दिये जायें। वह सेवा भी करती थी लेकिन सेवा उसका ध्येय नहीं था, ध्येय की पूर्ति के लिए एक माध्यम था। सुश्री टेरेसा को यूरोप ने उसकी इन्ही मतातंरण सम्बन्धी गतिविधियों के कारण उसको नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया था। नोबेल पुरस्कार का लाभ यह रहा कि जो लोग सुश्री टेरेसा द्वारा मतातंरण आंदोलन व उसमें विदेशी शक्तियों के हाथ की जांच की मांग कर रहे थे, वे इस पुरस्कार के भारी भरकम पद से ही इतने भयभीत हो गए कि उन्होंने भी टेरेसा स्तुति ज्ञान प्रारम्भ कर दिया। टेरेसा मिथकों और प्रतीकों के महत्व को जानती थी, इसलिए उसने अपना आश्रम कोलकाता में काली मन्दिर के बिल्कुल पास ही खोला। लेकिन अब टेरेसा तो रही नहीं। नश्वर शरीर है। आखिर कभी न कभी तो नष्ट होगा ही। निर्मला जोशी उसी टेरेसा की वारिस है। अब यह आंदोलन क्या कर रहा है और इसको कहां से पैसा मिल रहा है। इसने मत परिवर्तन विधेयक के बावजूद अनेक स्थानों पर लोगों का मतातंरण कैसे करवाया है। इन सभी प्रश्नों पर हल्ला हो रहा था और जांच की मांग भी उठ रही थी। निर्मला जोशी मतातंरण के उस आंदोलन की अगुवा है जो सुरक्षात्मक शैली नहीं अपनाता बल्कि आक्रामक मुद्रा में ही रहता है। यही कारण है कि पिछले दिनों जब चर्च ने उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी की हत्या करवा दी और उसके बाद चर्च ने उड़ीसा के लोगों पर ही हिंसा फैलाने का आरोप लगाना शुरू कर दिया तो निर्मला जोशी आरोप लगाने वालों की कतार में सबसे आगे दिखाई दे रही थी। अतंतः उसे इसका पुरस्कार तो मिलना ही था क्योंकि भारत सरकार इस समय खुद सारी लाज, हया त्याग कर दृढ़ता से चर्च के आपराधिक कृत्यों के साथ खड़ी है। इसलिए निर्मला जोशी को भारत सरकार ने इस बार का पद्म विभूषण देकर उन लोगों को चेतावनी दी है जो भारत वर्ष में चर्च द्वारा विदेशी शक्तियों की सहायता से चलाए जा रहे मतातंरण आंदोलन का विरोध कर रहे हैं।

ऐसा नहीं कि भारत सरकार ने यह पहली बार किया हो। न ही यह पुरस्कार अनजाने में और बिना किसी योजना के दिया गया इक्का दुक्का पुरस्कार है। वास्तव में चर्च को शह देने के लिए और मतातंरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार की सोची समझी लम्बी योजना की एक कड़ी है। यही कारण था कि कुछ साल पहले आस्ट्रेलिया की एक नागरिक श्रीमति ग्लेडेस स्टेन्स को भी पद्मश्री से सोनिया गांधी की सरकार ने सम्मानित किया था। आस्ट्रेलिया की यह नागरिक कुछ साल पहले हिन्दुस्तान में रही थी और उसके पति ग्राहम स्टेन्स उड़ीसा के जन-जाति समाज को मतातंरण के द्वारा इसाई बनाने के आपराधिक कर्म में जुटे हुए थे। इसी के चलते उड़ीसा के क्रुध्द जन-जाति समाज की एक भीड़ ने उन्हें जला दिया था। श्रीमती स्टेन्स उसके बाद आस्ट्रेलिया चली गई। भारत सरकार ने उनको पद्मश्री से सम्मानित किया। अब कोई भला मानुस पूछ सकता है कि श्रीमती स्टेन्स का किसी भी क्षेत्र में भारत को क्या योगदान है। लेकिन चर्च का दबाव था कि इसे पद्मश्री से सम्मानित किया जाये। चर्च को इसका यह लाभ रहता है कि जन-जाति समाज में इन भारी भरकम उपाधियों के कारण चर्च का आंतक बना रहता है। और उसी आंतक के वातावरण में चर्च मतातंरण का आंदोलन सफलतापूर्वक चलाता है। फिर प्रशासन के छोटे अधिकारियों की हिम्मत नहीं होती कि चर्च के आपराधिक कृत्यों को किसी भी प्रकार रोका जाये।

इसी प्रकार कुछ साल पहले कोटा के अब्राहम थॉमस को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था। अब्राहम थॉमस राजस्थान के कोटा में इमानुएल मिशन के नाम से मतातंरण का बहुत बड़ा अड्डा चलाता है। देश के दूसरे हिस्सों से भी गरीब व असहाय बच्चों का मतातंरण किया जाता था। उस अड्डे पर भारत विरोधी साहित्य की बिक्री होती थी। विदेशों से बहुत सा पैसा इस अड्डे के नाम पर आता था। जब स्थानीय लोगों का विरोध अत्यंत उग्र हुआ और वहां कुछ आन्ध्रप्रदेश के छोटे बच्चों को मुक्त करवाया गया तो सरकार को अब्राहम थॉमस पर कानूनी कार्यवाही करनी पड़ी। वह अनेक महीनों जेल में बंद रहा और सरकार ने उस अड्डे की सम्पति की जांच के आदेश दिए। ऐसा अपराधी अब्राहम थॉमस भी भारत सरकार द्वारा दी गई पदम श्री की उपाधि को माथे पर ताज की तरह इस्तेमाल करके लोगों को डराता फिरता था।

जाहिर है कि यह सारी योजना उसी षडयंत्र का हिस्सा है जिसके अन्तर्गत चर्च को बढ़ावा देकर भारत की अस्मिता को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। चर्च और उसका मतातंरण आंदोलन इसमें अग्रणी भूमिका में दिखाई देते हैं। जब से सोनिया गांधी के हाथों में भारत की सत्ता के सूत्र आ गये हैं तब से चर्च का साहस और अपराध दोनों ही बढ़ गये हैं। निर्मला जोशी को पद्म श्री इसी योजना का हिस्सा है। आश्चर्य नहीं करना चाहिए यदि कल उड़ीसा के सांसद राधा कांत नायक और ऑल इंडिया क्रिश्चियन काऊंसिल के अध्यक्ष जॉन दयाल को अगली 26 जनवरी के दिन पर भारत सरकार विभूषण से सम्मानित कर दें। उड़ीसा पुलिस के सूत्रों के अनुसार कांग्रेस के सांसद राधा कांत नायक पर स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के सूत्रधार होने का संदेह व्यक्त किया जा रहा है। जॉन दयाल, राधा कांत नायक मतातंरण आंदोलन के दाहिने हाथ हैं। राधा कांत नायक उड़ीसा में उस वर्ल्ड विजन संस्था के अध्यक्ष है जो भारत में मतातंरण का आंदोलन तो चलाती ही है साथ ही जिसे अमेरिका की खुफिया संस्था सी.आई.ए. की फ्रंट ऑर्गेनाईजेशन माना जाता है। अब क्योकि राधा कांत नायक स्वामी जी की हत्या के आरोपों से घिरे हुए हैं तो उन्हें अभय दान देने का एक ही तरीका है कि उन्हें भी पदम श्री से सम्मानित कर दिया जाये। जो चर्च के मतातंरण आंदोलन के भीतरी गलियारों से परिचित हैं वे जानते है वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा अंसभव नहीं है।

कुछ साल पहले वेटिकन के राजा पोप दिल्ली आये थे। दिल्ली में उन्होंने बाकायदा प्रैस कान्फ्रैंस करके घोषणा की थी कि चर्च की आगे की रणनीति 21वीं शताब्दी में भारत को मतातंरित कर लेने की है। क्योंकि पिछले 2000 सालों में चर्च ने यूरोप व अफ्रीका को सफलतापूर्वक मतातंरित कर लिया है। सोनिया गांधी और उनके दरबारियों के लिए तो यही भारत की सबसे बड़ी सेवा होगी। वे पोप तो अल्लाह मियां को प्यारे हो चुके है लेकिन उनकी गद्दी पर अब जो पोप बैठे हैं, हो सकता है भारत सरकार उनको भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित कर दें क्योंकि सुश्री टेरेसा की वारिस निर्मला जोशी को सम्मानित करके उसने परम्परा तो बना ही दी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या अब सम्मान एक बार फिर राय बहादुर और राय साहिबों की श्रेणी में आ जायेंगे। क्या भारत के लोगों को इन सूचियों में से एक बार फिर टोडी बच्चो की तलाश करनी होगी ? (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

Friday 6 February 2009

कॉमरेड की करतूतों पर एक कार्टून

साभार- मेल टुडे, 05 फरवरी, 2009

अवश्‍य पढें:
माकपा के राज्‍य सचिव आकंठ भ्रष्‍टाचार में डूबे

यूपीए सरकार की असफलताएं (भाग-4)/असंतुलित विकास

यूपीए की असफलताएं (भाग-1) बेलगाम महंगाई किसानों की दुर्दशा आर्थिक कुप्रबंध

यूपीए सरकार के शासन में अर्थव्यवस्था में भारी असंतुलन है। देश की लगभग 70 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है, जबकि इकॉनोमिक सर्वे 2006-07 के अनुसार कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में मात्र 18.5 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। यानि बहुसंख्यक आबादी का जीडीपी में योगदान महज 18.5 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट है कि देश की बहुसंख्यक 70 प्रतिशत की आर्थिक हालत बहुत खराब है।

आज से 37 वर्ष पूर्व कांग्रेस ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था। इन 37 वर्षों में से 24-25 वर्षों तक कांग्रेस के शासन के बावजूद गरीबी आज भी विकराल समस्या के रुप में विद्यमान है। आज फिर उसी नारे के सहारे राजनीति चमकाने का प्रयास हो रहा है। कांग्रेस के लिए 'गरीबी हटाओ' सिर्फ नारा ही है, क्योंकि उसे गरीबों के हित से कोई लेना देना नहीं है। संप्रग सरकार की गलत नीतियों के कारण विकास में असंतुलन के चलते आर्थिक असमानता का फासला निरंतर बढ़ रहा है। अभी भी देश की 28 प्रतिशत से अधिक जनता गरीबी की रेखा के नीचे है।

देश में इस समय 39 करोड़ श्रमशक्ति है। जिसमें 22.5 करोड़ कृषि क्षेत्र में, 5 करोड़ उद्योग एवं 10.5 करोड़ सेवा क्षेत्र में लगी हुई है। इन आंकड़ों से भी स्पष्ट है कि देश की आधी से अधिक श्रम-शक्ति का उत्पादन न्यूनतम है।

हमारे यहां भुखमरी बढ़ी है। आधिकारिक आंकड़े यह बताते है कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या कागजों में घटी है पर वास्तविकता में बढ़ी है। वहीं इस बात के भी प्रमाण हैं कि पिछले साढ़े चारवर्षों में हमारे देश में भुखमरी बढ़ी है।

कम्युनिस्ट पार्टियां हमेशा आर्थिक नीतियों पर हावी रही चाहे सरकारी उपक्रमों में विनिवेश की बात हो, हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण हो, पेंशन फंड अथोरिटी के गठन की बात हो, बैंकिग सेक्टर के पुनर्विन्यास और सरकारी बैंकों के एकीकरण, रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, ईपीएफ दर, डब्ल्यूटीओ से सम्बंधित जो भी बात हो, हमें कैबिनेट के निर्णयों में अजीब नजारा दिखाई पड़ता है। लोगों को यह भी मालूम होना चाहिए कि कांग्रेस पार्टी ने कभी भी आर्थिक सुधारों में विश्वास नहीं किया है। सच तो यह है कि वह हमेशा परमिट और लाईसेंस राज की नीति पर चलती रही है और उसने उद्यमों और संस्थाओं के भ्रष्टाचार को आगे बढ़ाया है। आज वह अपने ही बुने जाल में फंस गई है।

कथनी और करनी में भेद, केन्द्र सरकार द्वारा आर्थिक सुधारों को जारी रखने में अपनी असमर्थता और भारत के लोगों की छिपी शक्ति का लाभ उठाने में असमर्थता के कारण राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है जिसके कारण भारत के लोगों की छवि खराब हुई है तथा गरीबी के प्रति लड़ाई नहीं लड़ी जा सकी है।

वामपंथियों के गहरे प्रभाव और दखलंदाजी के चलते यूपीए सरकार भेल आदि जैसे सरकारी उद्यमों में विनिवेश के अपने ही निर्णयों को कार्यान्वित नहीं कर पा रही है। इस स्थिति के कारण विदेशी निवेशकों के मन में आशंकाए पैदा हो रही है और देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

खुदरा क्षेत्र पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से बेरोजगारी बढेगी
यूपीए ने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की शुरूआत करने का निर्णय लिया है, जो एक ऐसा उपाय होगा जिससे छोटे व्यापारी तथा विक्रेता बेरोजगार हो जाएंगे तथा आम व्यापारी का जीवन दुखी बन कर रह जाएगा। प्रारम्भिक अनुमानों के अनुसार इस उपाय से खुदरा व्यापार में लगे 4 करोड़ लोग बेरोजगार हो चुके हैं। इससे यूपीए सरकार के इरादों का पर्दाफाश हो जाता है क्योंकि कहने को तो इसमें बेरोजगारों को रोजगार दिलाने की बात कही गई है, परन्तु पहले ही रोजगार युक्त लोग बेरोजगार हो रहे हैं। इससे स्वरोजगार वाले लोगों की संख्या बढ़कर बेरोजगारों की श्रेणी में शामिल हो जाएंगी। इस योजना से निम्नलिखित विपरीत प्रभाव पड़ेंगे:-
-इससे छोटे-छोटे स्टोर खत्म हो जाएंगे क्योंकि वे सुपर मार्केट द्वारा दी गई सेवाओं, उनके मानकों से मैच नहीं कर पाएंगे।
-स्पष्ट ही असंगठित क्षेत्रों में भी खुदरा बाजारों का स्थान समाप्त हो जाएगा।
-इससे प्रतिस्‍पर्धी मूल्यों की शुरूआत होने लगेगी जिससे बहुत से घरेलू दुकानदार समाप्त हो जाएंगे।
-इससे थाईलैण्ड की तरह ही बेरोजगार के अवसर कम हो जाएंगे क्योंकि असंगठित क्षेत्रों में छोटे खुदरा व्यापारियों का स्थान समाप्त हो जाएगा।
-इससे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की रिटेल चेन की पूर्व दिनांकित प्रक्रिया वैध बन जाएगी।
-इससे विदेशी संस्कृति के मानकीकृत रूप को बढ़ावा मिलेगा।
-इससे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का आयात बढ़ता जाएगा और वे भारत में अपने उत्पादों का ढेर लगा देंगी।
-क्योंकि रिटेल में बहुत मामूली निवेश की जरूरत होती है, इसलिए विदेशी व्यापारी देश से बाहर अपने लाभ अपने देश को भेजते रहेंगे।

बचत और पूंजी बाजार
बचत और अर्थव्यवस्था स्थिर पड़ी हुई है क्‍योंकि दीर्घकालीन बैंक जमा राशियों से भी वास्तविक लाभ का पता नहीं चल पा रहा है। इसका कारण यह है कि सरकार अर्थव्यवस्था की सभी बचतों पर एकाधिकार प्राप्त करती जा रही है। राजकोषीय उत्तरदायित्व में जो समय सीमा ला दी गई हैं उस पर नहीं चला जा रहा है। अर्थव्यवस्था में इस प्रवृत्ति को रोकने की आवश्यकता हैं और राजकोषीय बुध्दिमत्ता दिखाना जरूरी है। इससे ही लोगों को बचत करने का प्रोत्साहन मिलेगा।

यूपीए सरकार दावा करती रहती है कि बाजार स्वस्थ हालत में हैं क्योंकि शेयरों की कीमत बढ़ती जा रही है जबकि तथ्य इसके उलट हैं अब स्टॉक मार्किट पूरी तरह से विदेशी संस्थागत निवेशकों के हाथों में है। ये हर भारतीय के लिए चिंता का विषय है इससे भी बढ़कर चिंता का विषय है की भारतीय रिजर्व बैंक ने इस बात की चेतावनी दी है कि कुछ बेईमान तत्वों द्वारा एफआईआई के माध्‍यमों से जो फायदा उठाया जा रहा है वह खतरनाक है। यह बात तब भी हो रही है जबकि पिछले स्टाक स्कैम पर गठित जेपीसी ने ऐसे तात्कालिक उपाय करने की सिफारिश की थी कि एफआईआई संस्थाओं को अवैधा धान का उपयोग करने से रोका जाए।

गरीबी हटाओ नारा मात्र छलावा
आज से 36 वर्ष पूर्व कांग्रेस ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था। इन 36 वर्षों में से 24-25 वर्षों तक कांग्रेस के शासन के बावजूद गरीबी आज भी विकराल समस्या के रुप में विद्यमान है। आज फिर उसी नारे के सहारे राजनीति चमकाने का प्रयास हो रहा है। कांग्रेस के लिए 'गरीबी हटाओ' सिर्फ नारा ही है, क्योंकि उसे गरीबों के हित से कोई लेना देना नहीं है। संप्रग सरकार की गलत नीतियों के कारण विकास में असंतुलन के चलते आर्थिक असमानता का फासला निरंतर बढ़ रहा है। अभी भी देश की 28 प्रतिशत से अधिक जनता गरीबी की रेखा के नीचे है।

यूपीए की असफलताएं (भाग-1) बेलगाम महंगाई किसानों की दुर्दशा आर्थिक कुप्रबंध

Thursday 5 February 2009

गुजरात दंगों के गवाहों को वामपंथी रिश्वत?

'गोधरा कांड' की प्रतिक्रियास्वरूप गुजरात में हुए दंगों पर सर्वाधिक घड़ियाली आंसू बहाने वालों तथा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पानी पी-पीकर कोसने वालों की करतूतों की पोलपट्टी कुछ ताजा आंकड़ें आने के बाद खुल गयी है।

अपने को सामाजिक कार्यकर्ता, धर्मनिरपेक्ष, मानवाधिकारवादी होने का दावा करनेवाली अति मुखर तीस्ता सीतलवाड़ व माकपा ने गुजरात दंगों में हताहत लोगों पर काफी हंगामा मचाया था। अब यह तथ्य उजागर हो गया है कि गुजरात दंगों के गवाहों से बयान दिलवाने के लिए उन्हें उनके द्वारा मोटी-मोटी रकम दी गयी। जो लोग दंगों के शिकार हुए थे तथा चश्मदीद गवाह थे उन्हें 1 लाख तथा 50 हजार रुपए और जो लोग केवल दंगा पीड़ित थे उन्हें पांच-पांच हजार रुपए दिए गए। यह पैसा माकपा-स्रोतों से दिया गया जिसमें तीस्ता सीतलवाड़ की अहम भूमिका थी। यह भी उल्लेखनीय है कि दंगा पीड़ित या चश्मदीद गवाहों को जब धन दिया गया तो वृंदा करात भी मौजूद रही थीं।

ज्ञातव्य है कि अपने को सामाजिक कार्यकर्ता, धर्मनिरपेक्ष, मानवाधिकारवादी होने का दावा करनेवाली अति मुखर तीस्ता सीतलवाड़ व माकपा ने गुजरात दंगों में हताहत लोगों पर काफी हंगामा मचाया था। अब यह तथ्य उजागर हो गया है कि गुजरात दंगों के गवाहों से बयान दिलवाने के लिए उन्हें उनके द्वारा मोटी-मोटी रकम दी गयी। जो लोग दंगों के शिकार हुए थे तथा चश्मदीद गवाह थे उन्हें 1 लाख तथा 50 हजार रुपए और जो लोग केवल दंगा पीड़ित थे उन्हें पांच-पांच हजार रुपए दिए गए। यह पैसा माकपा-स्रोतों से दिया गया जिसमें तीस्ता सीतलवाड़ की अहम भूमिका थी। यह भी उल्लेखनीय है कि दंगा पीड़ित या चश्मदीद गवाहों को जब धन दिया गया तो वृंदा करात भी मौजूद रही थीं।

अंग्रेजी दैनिक 'दि पायनियर' (20 दिसंबर, 2008) में प्रकाशित समाचार के अनुसार गुजरात के एक विवादास्पद गैर सरकारी संगठन 'सिटीजन्स फार जस्टिस एण्ड पीस' (जिसकी अध्यक्ष स्वयं तीस्ता सीतलवाड़ हैं) ने गुजरात दंगों के विभिन्न दस मामलों के के गवाहों को एक-एक लाख रुपए दिलाने की व्यवस्था कराई थी। यह धनराशि माकपा राहत कोष से आयी थी तथा दंगों के लगभग पांच साल बाद गवाहों को अदालत में पेश होने के पहले दे दी गयी थी। इनके अलावा 4 अन्य प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को पचास-पचास हजार रुपए दिये गये थे। जिन लोगों को यह सहायता राशि दी गयी उनके चयन, भुगतान के उद्देश्य तथा राशि में भारी अंतर को लेकर गवाहों में भी रोष व्याप्त रहा।

'सिटीजन्स फार जस्टिस एण्ड पीस' के मुख्य समन्वयक रईस खान ने 'पायनियर' को बताया कि उन्होंने तीस्ता सीतलवाड़ के निर्देश पर 'लाभार्थियों' के नाम माकपा को दिये थे। रईस खान ने कहा कि 'लाभार्थियों' का चयन तीस्ता सीतलवाड़ ने किया और मैंने केवल उनके निदेर्शों का पालन कर नामों की सूची माकपा को भेजी थी। जब इस मामले में तीस्ता से पूछा गया तो उन्‍होंने जवाब दिया कि 'मैं माकपा के निमंत्रण पर (धन वितरण के) समारोह में गयी थी पर धन-संग्रह से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।

एक प्रत्यक्षदर्शी यासीन नईमुद्दीन अंसारी ने जिसे एक लाख रु. दिया गया था, 'पायोनियर' को अहमदाबाद से फोन पर बताया कि 'तीस्ता सीतलवाड़ के संगठन की ओर से कोई उनसे मिला था, लेकिन उस व्यक्ति का नाम उसे अब याद नहीं है।'

गवाहों को धन बांटने का समारोह 26 अगस्त, 2007 को अहमदाबाद में हुआ था तथा उन्हें 'डिमांड ड्राफ्ट' माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य वृंदा करात, तीस्ता सीतलवाड़ तथा रईसखान ने बांटे थे। वृंदा ने स्वीकार किया है कि धन इकट्ठा करने का काम माकपा ने किया था। उन्होंने यह भी बताया कि मेरी पार्टी को गुजरात दंगों से संबंधित किसी मुकद्दमे में कोई लिप्तता नहीं रही है। वृंदा करात ने यह भी माना कि दंगा पीड़ितों के चयन के लिए उन्होंने एक स्थानीय एनजीओ की सहायता ली थी। उनके अनुसार, आर्थिक मदद पाने के लिए बड़ी संख्या में आवेदन पत्र आये थे और धन का वितरण विभिन्न चरणों में किया गया था।

प्राप्त विवरण के अनुसार 1 अगस्त 2007 की तारीख में बने 567540 से लेकर 567554 नम्बर तक के 14 डी.डी. दंगा पीड़ितों को तीस्ता, वृंदा तथा रईस खां के द्वारा बांटे गये थे। सात डी.डी. अहमदाबाद में तथा सात बड़ोदरा में भुगतान के लिए थे। सहायता पाने वालों में यासमीन बानो शेख भी हैं जो जाहिर शेख के भाई नफीतुल्ला की पत्नी हैं।

बड़ोदरा की यासमीन बानो को 50 हजार मिले थे। वह मुकदमा संख्या 144/04 की शिकायतकर्ता हैं। मजे की बात तो यह है कि उसकी शिकायत में कोई दम नहीं था। अदालत ने उसका 'लाई डिटेक्शन' टेस्ट कराने का जब निर्देश दिया तो वह अदालत में गयी ही नहीं।

आर्थिक सहायता पाने वालों में चार लोग बैस्ट बेकरी काण्ड के गवाह तथा 9 अन्य नरोदा पाटया, शाहपुर, खानपुर आदि 2002 के दंगों से सम्बंधित हैं। यह भी ज्ञातव्य है कि उपर्युक्त जानकारी एच. झावेरी की 'सूचना के अधिकार' के तहत दी गयी याचिका पर विभिन्न एजेन्सियों व बैंकों से प्राप्त हुई है।

बैस्ट बेकरी काण्ड के जिन चार गवाहों को आर्थिक मदद दी गयी इनमें सैलुन हसन खां पठान अहमदाबाद (1 लाख रु.), तुफैल अहमद हबीबुल्ला सिद्दकी बड़ोदा व शहजाद खां, हसन खां पठान, बड़ोदा (पचास-पचास हजार रु. प्रत्येक) शामिल हैं।

इनके अलावा अहमदाबाद के दंगों से संबंधित 9 गवाहों को एक-एक लाख रुपए दिये गये। इनके नाम हैं- 1. कुरेशाबीबी हारुन भाई गोरी, बड़ोदा, 2. हुसेना बीबी गुलाम भाई शेख, बड़ोदा, 3. राशिदा बानो यूसुफ खां पठान, अहमदाबाद, 4. फातिमा बानो बाबूभाई सैय्यद, अहमदाबाद, 5. बदरुन्निशा मोहम्मद इस्माइल शेख, अहमदाबाद, 7. मो. यासीन नईमुद्दीन अंसारी, अहमदाबाद, 8. शेख अजहरुद्दीन इमामुद्दीन, अहमदाबाद तथा 9. शरजाह कौसर अली शेख, बड़ोदा। पांच-पांच हजार रु. पाने वालों के नाम भी प्रकाश में आ चुके हैं।

Wednesday 4 February 2009

SEX SCANDAL -माकपा के राज्य सचिव ने किया कॉमरेड की विधवा का देहशोषण


भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) में महिला कार्यकर्ताओं की इज्जत सुरक्षित नहीं है और विदेशी रंग में रंगे कामरेड महिलाओं को बुरी नजर से देखते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक ही है क्योंकि कामरेड तो परिवार संस्था को ध्वस्त करने की तमन्ना रखते हैं। फिर उनके मन में महिलाओं के प्रति इज्जत का भाव कैसे उत्पन्न हो? देहशोषण ही माकपा के लिए नारीमुक्ति का हथियार बन गया हैं। हाल ही में पार्टी कॉमरेड की विधवा ने माकपा पंजाब प्रदेश के सचिव बलवंत सिंह पर देहशोषण के आरोप लगाए कि बलवंत सिंह उसका देहशोषण करते आ रहे हैं।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) में महिला कार्यकर्ताओं की इज्जत सुरक्षित नहीं है और विदेशी रंग में रंगे कामरेड महिलाओं को बुरी नजर से देखते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक ही है क्योंकि कामरेड तो परिवार संस्था को ध्वस्त करने की तमन्ना रखते हैं। फिर उनके मन में महिलाओं के प्रति इज्जत का भाव कैसे उत्पन्न हो? देहशोषण ही माकपा के लिए नारीमुक्ति का हथियार बन गया हैं।

इस प्रकरण से माकपा की थू-थू हुई और अंत में कोई चारा न देख पार्टी ने बलवंत सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया। पार्टी ने जांच के दौरान महिला द्वारा लगाए गए आरोपों को सही पाया। इस प्रकरण से पार्टी की महिला कार्यकर्ताओं में काफी रोष पाया जा रहा है।

SEX SCANDAL - CPM suspends Punjab leader for exploiting comrade's widow

जश्न समारोह के दौरान सीपीएम नेता ने 3 अवयस्क लड़कियों के साथ यौन दुर्व्‍यवहार किया

'35 हजार महिलाओं के साथ हमबिस्तर हुए कॉमरेड कास्त्रो'

तापसी मलिक का ब्‍लात्‍कार कर उसे जलाकर मारने वाले दो कम्‍युनिस्‍ट नेता दोषी

Tuesday 3 February 2009

यूपीए की असफलताएं (भाग-4) / आर्थिक कुप्रबंध

यूपीए सरकार ने सत्ता में आने के बाद वायदा किया था कि वह लोगों को और अधिक रोजगार दिलाएगी, निर्धनता मिटायेगी, कीमतें कम करेंगी और आर्थिक सुधारों में तेजी लायेगी परन्तु वह इस सम्पूर्ण काल में इन क्षेत्रों में कोई विशेष प्रगति करने में विफल रही है। डा. मनमोहन सिंह व उसकी टीम की नीतियों से हमारे आर्थिक सिद्धांत बुरी तरह से बदतर होते चले गए हैं।

यदि एक वाक्य में यह कहा जाय कि इन पौने पांच वर्षों में यूपीए सरकार ने भारत को क्या दिया है तो हम कह सकते हैं कि देश की जनता को सिर्फ दो चीजें मिली है- 'असंतुलित समाज' और 'असुरक्षा का एहसास'।

आर्थिक नीति की विफलता
एनडीए सरकार के शासनकाल में आर्थिक नीति सिर्फ सर्विस सेक्टर, हाउसिंग, आई.टी. और टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों में ही भारत को आगे लाने की नहीं थी बल्कि आम आदमी के दैनन्दिन जीवन में प्रयोग होने वाली सभी चीजों में तात्कालिक अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार भारत को अग्रणी स्थान पर खड़ा कर दिया था। एनडीए के शासनकाल में भारत दूध उत्पादन, फल और सब्जी उत्पादन, चाय उत्पादन और जूट उत्पादन में विश्व में पहले नंबर पर आ गया था। गेहूं और चावल उत्पादन में भारत पूर्णत: आत्मनिर्भर होकर विश्व का तीसरा बड़ा उत्पादक बन गया था। ऐसा इसलिए भी था कि एनडीए सरकार ने अर्थव्यवस्था को कृषि से जोड़ने का प्रयास किया था। जबकि आज यूपीए सरकार के कार्यकाल में गेहूं जैसा मूलभूत खाद्यान्न भी आयात करना पड़ रहा है और वह भी ऊंचे दामों पर और निम्न श्रेणी का। इस कारण से भारत में खाद्यान्न को लेकर भी एक असुरक्षा की भावना विकसित हुई है। कृषि रोजगार की दृष्टि से बहुत रोजगारोन्मुख क्षेत्र है जो बड़ी संख्या में मानव संसाधन का समुचित उपयोग कर सकता है। कृषि भारत का सबसे बड़ा इम्पलायमेंट सेक्टर है। इसके विकास के बिना न बेरोजगारी पर नियंत्रण हो सकता है और न महंगाई पर।

आधारभूत संरचना की योजनाओं की अनदेखी
केन्द्र में एनडीए सरकार के जाने के बाद वर्तमान यूपीए सरकार ने केवल राजनैतिक कारणों से विकास के अनेक कार्य या तो स्थगित कर दिये या उनकी उपेक्षा शुरू कर दी। उदाहरण के लिए भारत में आधारतभूत संरचना के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुये राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना की गति सरकार बदलते ही बेहद मंद हो गयी। चार महानगरों को जोड़ने वाले स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना का कार्य अब तक पूर्ण हो जाना चाहिए था। देश के लिए हितकारी स्वर्णिम चतुर्भुज, उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम गलियारा और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क परियोजना जैसे कार्य सत्ता परिवर्तन से अप्रभावित रहने चाहिये।

उच्च स्तर की चिकित्सा सुविधाओं को देश के सभी क्षेत्रों में उपलब्ध कराने के लिये दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की तर्ज पर एनडीए सरकार ने 6 अन्य संस्थान खोलने का निर्णय लिया था। वह योजना ठंडे बस्ते में चली गई।

किसानों को अपनी भूमि के आधार पर एक निश्चित निर्धारित आय प्रदान करवाने के लिए प्रारंभ की गई कृषि आय बीमा योजना रोक दी गई। किसान क्रेडिट कार्ड का कार्य भी ठंडे बस्ते में चला गया। जिन किसानों के पास क्रेडिट कार्ड हैं उन्हें भी क्रेडिट मिलना बंद हो रहा है।

आने वाले समय में भारत में जल की उपलब्धता एक प्रमुख समस्या बन कर आती दिख रही है। इस संभावित जल संकट से निपटने के लिए वर्षा जल के कुशल प्रबंधन की परियोजना और नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना जिसकी परिकल्पना एनडीए सरकार ने की थी, यूपीए सरकार ने आने के बाद उस पर पर विचार तक नहीं किया गया।

ये सारी योजनायें किसी एक दल के हित के लिए नहीं थी बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के आम जनमानस के हित के लिए थी। इनका अनायास बंद होना अथवा धीमा पड़ना एक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरते हुये भारत के लिए बहुत समस्याजनक है।

आम आदमी: मूल आवश्यकताओं और सुरक्षा का संकट
आम आदमी के लिए न तो आज भोजन और आवास जैसी मूल आवश्यकताएं सहज और सस्ते रूप में उपलब्ध हैं और न ही उसकी सुरक्षा सुनिश्चित है। आज रोटी महंगी और जान सस्ती हो रही है। यह एक विचित्र विडम्बना है कि विकसित भारत बनने की बातों के बीच एक ऐसा समय भी चल रहा है जब भूख से मौतें हो रही हैं और खाद्यान्न को लेकर दंगे तक हुए। महंगाई ने आम जनता के घर का बजट चौपट कर दिया है। स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कल तक एनडीए शासन में अनाजों से भरे रहने वाले गोदामों में आज आस्ट्रेलिया से गेहूं मंगाकर भरे जा रहे हैं। यूपीए की नासमझी और अदूरदर्शिता देश को कहां से कहां ले गई।

दाल-सब्जी-रोटी, फल, दूध, नमक और गैस सभी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। ऐसा लगता है कि मानो आम आदमी की सुख-शांति पर ग्रहण लग गया हो। किसानों की आत्महत्या बंद होने के बजाए बढ़ ही रही है। यूपीए सरकार के ऐजेण्डे से भारत का अन्नदाता बाहर हो चुका है। किसानों के हित में गत पौने पांच वर्ष में यूपीए ने कोई ऐसा कदम नहीं उठाया, जिससे किसानों की समस्याएं कम हो सके। गरीब-किसानों की बात करने वाले वामपंथी अपनी सत्ता और सुविधा के कारण किसानों की मौत के विरोध में मौन धारण किए हुए है। महंगाई के विरोध में वामपंथी प्रदर्शन तो दूर संसद में मुंह तक नहीं खोलते। यूपीए सरकार में मानव विकास की पोल श्री अर्जुन सेन गुप्ता की एक रिपोर्ट में सामने आयी है। इस रिपोर्ट में श्री गुप्ता ने कहा है कि भारत में 77 प्रतिशत के करीब नागरिकों की जिंदगी बहुत कठिन परिस्थितियों में है। इनमें से बहुत सारे बीस रूपये रोज ही कमा पाते हैं। आर्थिक विषमता का यह दौर हमारे लिए खतरे की घंटी है।
क्रमश:

Monday 2 February 2009

यूपीए की असफलताएं (भाग-3) / किसानों की दुर्दशा

यूपीए की असफलताएं (भाग-1)
यूपीए की असफलताएं (भाग-2)/बेलगाम महंगाई

केन्द्र में यूपीए सरकार आने के बाद आम आदमी को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है। परन्तु यदि किसी एक वर्ग पर मानो विपदा का बादल फट पड़ा हो तो वह है कृषक वर्ग। किसानों को उचित मूल्य पर बिजली, पानी, खाद तो नहीं मिल पा रही है और साथ ही साथ वह कर्ज के दुष्चक्र में इस कदर उलझते जा रहे हैं कि एक सीमा के बाद वे आत्महत्या करने पर विवश हो जाते हैं। किसानों की आत्महत्या जितनी भारी संख्या में पिछले कुछ वर्षों में हुई है वह भारत के इतिहास में ऐसा शर्मनाक अध्‍याय पहले कभी नहीं देखा गया।

अन्नदाता की यह दुर्दशा और वह भी जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार के द्वारा हो, एक दुखद विडंबना कही जा सकती है। यूपीए सरकार आज भी इस विडंबना की प्रतीक है। आम आदमी के साथ का दावा करने वालों की पोल खुल चुकी है। अब मुद्दा किसानों की उपेक्षा और तिरस्कार से आगे बढ़कर किसानों के शोषण और अत्याचार तक पहुंच चुका है। विदर्भ और पश्चिम बंगाल इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

एक तरफ भारत में औद्योगिक उन्नति के नये आयाम दिख रहे हैं। कई भारतीय उद्योगपति प्रतिष्ठित विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण कर रहे हैं, परन्तु दूसरी तरफ जितनी भारी संख्या में किसान आत्महत्या को विवश हो रहे हैं, यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है और इसके लिए यूपीए सरकार की अक्षमता और उपेक्षा भी उतनी ही निन्दनीय है।

एक तरफ देश में करोड़पतियों की संख्या बढ़ रही है, बाजार महंगे लग्ज़री उत्पादों से चकाचौंध हो रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ पिछले दिनों देश के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में भारत और चीन की आर्थिक तुलना करते हुए संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों का हवाला देते हुए यह बताया गया कि भारत की 80 प्रतिशत जनसंख्या की औसत प्रतिदिन की आय 2 अमेरिकी डालर से भी कम यानी लगभग 80 रूपए प्रतिदिन से भी कम है। विकास के दो पहलुओं में ऐसा घोर असंतुलन यूपीए सरकार की अदूरदर्शिता, अक्षमता और असंवेदनशीलता का प्रमाण है।

किसानों पर सिर्फ कर्ज की मार ही नहीं पड़ी है बल्कि देश के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग प्रकार की भीषण समस्यायें किसानों को झेलनी पड़ रही है। पश्चिम बंगाल के सिंगूर और नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण के विवाद पर जिस प्रकार वहां के किसानों का दमन किया गया वह नितांत शर्मनाक और दुर्दांत है। इससे भी कहीं आगे जाकर सीपीएम के कार्यकर्ताओं द्वारा गैरकानूनी तरीके से बल प्रयोग और नंदीग्राम के निवासियों के मधय आतंक पैदा करके किसानों से जमीन खाली करवाने का प्रयास किया गया। यह स्वयं को सर्वहारा के मसीहा कहने वालों के वास्तविक चरित्र को उजागर करने वाला था। सिंगूर और नंदीग्राम के किसानों पर भी गत वर्ष सबसे पहले प्रतिक्रिया भाजपा ने व्यक्त की।

आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में पिछले कुछ वर्षों में किसानों ने हजारों की संख्या में आत्महत्या की। महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र तो कई वर्षों से किसानों की कब्रगाह बनता जा रहा है। किसानों की आत्महत्या के सर्वाधिक मामले इस क्षेत्र में हो रहे हैं। प्रदेश और केन्द्र की सरकारें इसका कोई भी समाधान नहीं निकाल पा रही हैं। प्रधानमंत्री का विदर्भ को पैकेज एक भ्रम से अधिक और कुछ सिध्द नहीं हुआ।

अन्नदाता की यह दुर्दशा और वह भी जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार के द्वारा हो, एक दुखद विडंबना कही जा सकती है। यूपीए सरकार आज भी इस विडंबना की प्रतीक है। आम आदमी के साथ का दावा करने वालों की पोल खुल चुकी है। अब मुद्दा किसानों की उपेक्षा और तिरस्कार से आगे बढ़कर किसानों के शोषण और अत्याचार तक पहुंच चुका है। विदर्भ और पश्चिम बंगाल इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

क्या कांग्रेस यह सोचती है कि महान और विकसित भारत किसानों की लगातार बढ़ती लाशों के ढेर के बावजूद बन पायेगा। यह असम्भव है। यह भविष्य के लिए और भी गंभीर संकेत है। जिस प्रकार बीसवीं सदी में स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान कांग्रेस ने अपनी गलत नीति के कारण देश के साम्प्रदायिक बंटवारे को स्वीकारा और उसके बाद और सतत् साम्प्रदायिक संघर्ष की नींव रख दी थी उसी प्रकार यदि कुछ और वर्ष कांग्रेस का शासन रहा तो इस देश में आर्थिक विषमता के ऐसे विष बीज पनप जायेंगे कि वे आने वाले समय में अराजक स्थितियां निर्माण कर सकते हैं।

किसानों का उद्धार कोई राजैनतिक मुद्दा नहीं है। यह केवल एक सामाजिक आवश्यकता ही नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय आवश्यकता भी है। कृषि और मानव श्रम को हाशिये पर रख कर किया जाने वाला विकास कितना व्यावहारिक है यह विचारणीय है।

यूपीए सरकार के पौने पांच वर्ष के कार्यकाल में गांव, गरीब और किसान की स्थिति बद से बदतर हो गई है। गांवों की दुर्दशा इसलिए और भी अधिक चिंताजनक है क्योंकि इस देश का अन्नदाता किसान ही नहीं बल्कि इस देश का रक्षक जवान भी उसी गांव और किसान के परिवारों से आता है। यदि किसान किसी प्रकार विवश होकर खेती से अलग होता रहा तो इस समस्या का एक और आयाम भी हमारे सामने आ सकता है। किसान की दुर्दशा के दूरगामी प्रभाव सिर्फ खाद्यान्न संकट और सामाजिक संतुलन ही नहीं बल्कि एक समय के बाद सेना के लिए प्रतिबद्ध मानव संसाधन की उपलब्धता का संकट भी पैदा कर सकते हैं। जय जवान और जय किसान का नारा सिर्फ तुकबंदी नहीं था बल्कि जवान और किसान के एक स्वाभाविक अंत:संबंध का प्रतीक था।

गांव- गरीब-किसान और नवयुवक तथा सुरक्षा बलों का जवान, इनकी भावनाओं के समझे बगैर अथवा इनकी उपेक्षा करके कोई राष्ट्र प्रगति के पायदान लगातार तय नहीं कर सकता। केन्द्र की यूपीए सरकार ने इन पौन पांच वर्षों में इनकी निरंतर उपेक्षा की है।
किसान भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा कार्यकारी समूह है, जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ा उत्पादक है और सबसे बड़ा उपभोक्ता (ग्राहक) है। बिना किसानों की क्रय शक्ति को बढ़ाये भारत की अर्थव्यवस्था उन्नत नहीं हो सकती।
यूपीए की असफलताएं (भाग-1)
यूपीए की असफलताएं (भाग-2)/बेलगाम महंगाई