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Saturday 31 May 2008

दक्षिण बदलेगा देश की राजनीति- तरुण विजय

कर्नाटक में भाजपा की विजय अब वर्ष 2009 के आम चुनावों का एजेंडा तय करेगी। जैसे-जैसे कर्नाटक के चुनाव परिणाम घोषित हो रहे थे और भाजपा जीत के निकट पहुंच रही थी, मीडिया के सेकुलर पंडितों की परेशानी दिलचस्प होती जा रही थी। इन परिणामों ने न केवल देवगौड़ा-कुमारस्वामी के विश्वासघात को सजा देते हुए सेकुलर शिविर को किनारे धकेला, बल्कि यह भी सिध्द किया कि मीडिया में बैठे सेकुलर तालिबान का अंध भगवा विरोध स्वयं उन्हें अप्रासंगिक बना रहा है। कर्नाटक के परिणाम ने अनेक मिथक तोड़े हैं- भाजपा उत्तर तक सीमित व्यापारियों-उच्च जाति वालों की पार्टी है, वह विकास के नाम पर नहीं जीतती, विंधय के पार भाजपा का कोई प्रभाव नहीं, वह सांप्रदायिक है और इसलिए सुशिक्षितों में अस्वीकार्य है इत्यादि। कर्नाटक में भाजपा ने न सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजातीय क्षेत्रों में असाधारण जीत दर्ज कराई, बल्कि बंगलुरू के आईटी गढ़ से लेकर ग्रामीण इलाकों तक उसकी भगवा पताका बड़ी शान से लहराई।


पर इन सबसे बढ़कर कर्नाटक चुनाव परिणाम का संदेश है कि दस जनपथ का सोनिया-राहुल जादू निष्प्रभावी साबित हुआ है। एक भी प्रदेश ऐसा नहीं है, जहां सोनिया या राहुल बाबा का जनता पर प्रभाव निर्णायक चुनावी जीत हासिल कराने में सफल हुआ हो। इसका नतीजा न केवल राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों पर होगा, बल्कि कांग्रेस के भीतर भी हताशाजनित असंतोष और विद्रोह पनप सकता है। कांग्रेस नेता सोनिया के प्रति अंधा भक्ति सिर्फ तब तक दिखाते हैं, जब तक वह उन्हें जिताकर सत्तासुख दिला सकें। जैसे ही यह आशा खत्म होती है, अर्जुन सिंह, शरद पवार जैसे दिग्गज भी कांग्रेस छोड़कर अलग होने लगते हैं। यह कांग्रेस का वंशवादी दरबारी इतिहास बताता है। वैसे कांग्रेस ने कर्नाटक में अपने तपे-तपाए नेता एस एम क्रिष्णा को पहले राज्यपाल बनाकर प्रदेश के बाहर भेज दिया। चुनाव से पहले वह वापस तो लाए गए, पर पार्टी ने मुख्य चुनाव प्रचार की भूमिका राहुल गांधी के कथित 'करिश्मे' में ही केंद्रित रखी। राहुल कर्नाटक प्रवास में कहीं भी किसी को प्रभावित नहीं कर सके। बंगलुरू में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के युवा वैज्ञानिकों और आईटी विशेषज्ञों की एक सभा में राहुल अपरिपक्व वक्ता सिध्द हुए और उस बैठक से अधिकांश युवा यह कहते हुए बीच से उठ गए कि राहुल भविष्य के भारत के बारे में एक भी प्रश्न का उत्तर नहीं दे सके।


भाजपा ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपार लोकप्रिय बी एस येदियुरप्पा को भावी मुख्यमंत्री घोषित किया था। तीन फरवरी 2006 को बंगलुरू विधानसभा में कुमारस्वामी के नेतृत्व में विश्वास मत अर्जित कर बनी भाजपा-जद (सेकुलर) गठबंधान सरकार में येदियुरप्पा उप मुख्यमंत्री थे। लेकिन जब भाजपा को प्रदेश का नेतृत्व देने का समय आया, तो कुमारस्वामी मुकर गए और राजनीतिक चालबाजी करने लगे। येदियुरप्पा मुख्यमंत्री तो बने, मगर सात दिन बाद ही कुमारस्वामी के जनता दल (सेकुलर) ने धाोखा दिया और सरकार गिर गई। येदियुरप्पा ने धीरज नहीं खोया और कर्नाटक में उनकी छवि एक सज्जन नेता की बनी, जिसे दुष्टों ने धोखा दिया। 27 फरवरी 1943 को जन्मे येदियुरप्पा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं और 1972 में शिकारीपुरा तालुके में जनसंघ की इकाई के सचिव पद से उन्होंने राजनीति शुरू की। वह 1983 से आज तक लगातार छह बार इसी विधानसभा क्षेत्र से चुने जाते रहे हैं। इस बार भी शिकारीपुरा ने अपने प्रिय नेता के साथ धोखा नहीं किया।


कर्नाटक में भाजपा की विजय राष्ट्रीय राजनीति में दक्षिण के प्रभावी उभार का भी प्रतीक है। भारत की विद्या और वैभव तो विंध्‍य पार गया ही है, अब राजनीतिक सत्ता की निर्णायक शक्ति भी दक्षिण से प्रभावित होगी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भाजपा ने कर्नाटक चुनाव केवल विकास और अपनी बेहतर राष्ट्रीय छवि के आधार पर जीते हैं। और राष्ट्रीय एकता को मजबूत सिध्द करने वाला तथ्य यह है कि भाजपा के प्राय: सभी राष्ट्रीय नेता उत्तर से रहे, चाहे वह पार्टी अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह हों, कर्नाटक के प्रभारी अरुण जेटली, वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज, लेकिन इन सबकी कर्नाटक में बहुत लोकप्रिय छवि बनी। जबकि अन्य दाक्षिणात्य नेता प्रांतवाद, भाषावाद, स्थानीय क्षुद्रताओं को उभारकर एक दूसरे प्रांत के साथ ही शत्रुतापूर्ण व्यवहार की राजनीति के सहारे सत्ता की शतरंज खेलते हैं। वहीं भाजपा के विशुध्द राष्ट्रवादी चेहरे ने आतंकवादियों के प्रति कठोर नीति, रामसेतु संरक्षण, यूपीए के मुसलिम तुष्टीकरण और देशद्रोही अफजल की फांसी टालने के विरोधा के साथ-साथ स्थानीय विकास के मुददे उठाए। विगत अप्रैल में एक साक्षात्कार में जब येदियुरप्पा से पूछा गया कि चुनाव में उनके मुददे क्या रहेंगे, तो उनका उत्तर था-सिर्फ तीन मुददे होंगे-पहला विकास, दूसरा विकास और तीसरा भी विकास!


कांग्रेस को उम्मीद थी कि यदि वह कर्नाटक में कुछ जोड़-तोड़ करके सरकार बना पाई, तो राजस्थान, मध्‍य प्रदेश, दिल्ली और छत्तीसगढ़ जैसे प्रमुख राज्यों के विधानसभा चुनावों में वह आक्रामक ढंग से कुछ हासिल कर पाएगी। लेकिन कर्नाटक ने न केवल कांग्रेस के सिकुड़ते-सिमटते प्रांतीय स्वप्न और घटा दिए हैं, बल्कि अगले लोकसभा चुनावों में पराजय की इबारत भी दस जनपथ के बाहर लिख दी है। राजनाथ सिंह भाजपा के लिए अच्छे शुभंकर साबित हुए हैं। वह जब से आए हैं, पार्टी जीत रही है।
दक्षिण भारत के चार राज्यों में जनता उन्हीं पुराने, ऊबाऊ, भ्रष्ट, सत्ता लोलुप नेताओं के चेहरे देख-देखकर अब परिवर्तन की अभीप्सा पाल रही है। सत्ता नजदीक देख कल के कटटर विरोधी भी दरवाजे खटखटाने लगते हैं। इसलिए परिवर्तन की आहट सुनकर अब अगर चंद्रबाबू नायडू, जयललिता आदि क्षत्रप एनडीए के द्वार पर खड़े दिखाई पड़ें, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


भाजपा अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड जैसे इलाकों में भी सरकार बनाने का दमखम दिखा चुकी है और कर्नाटक के साथ वह सात महत्वपूर्ण राज्यों में शासन कर रही है। पर सोनिया की कांग्रेस कहां है? वह सिर्फ दिल्ली केंद्रित मीडिया और आभाहीन मंत्रालयों में दिखती है। डूबती नौका के साथ कोई नहीं तैरता, वैसे ही राष्ट्रीय गठबंधान की राजनीति के इस युग में कांग्रेस का साथ अब कौन देगा, कौन छोड़ेगा, यह प्रश्न भी खड़ा हो जाएगा।


दक्षिण विजय का पहला पग भारतीय जनता पार्टी के लिए भी खतरों और चुनौतियों से भरा हुआ होगा। अगर सरकार का प्रारंभिक दौर अच्छा, विनम्र, कामकाज में जनोन्मुखी और भीतरी एकजुटता प्रकट करने वाला हुआ, तो आंधा्र, तमिलनाडु और केरल का रंग ही नहीं, लाल किले का रंग भी बदलने में सफलता मिल सकती है। (साभार : अमर उजाला 26 मई 2008)
(लेखक श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध संस्थान के निदेशक हैं)

भाजपा की जीत के मायने- वेदप्रताप वैदिक

कर्नाटक में भाजपा की जीत अखिल भारतीयता की जीत है। पिछले 20-25 वर्षों में भारत नामक राष्ट्र-राज्य के लिए एक नई चिंता का उदय हुआ था। राष्ट्र को 100 साल से एक सूत्र में बांधे रखने वाली महान पार्टी कांग्रेस का अखिल भारतीय स्वरूप धीरे-धीरे नष्ट होता जा रहा था और उसका स्थान छोटी-छोटी स्थानीय परिवारवादी पार्टियां लेती जा रही थीं। कांग्रेस का कोई अखिल भारतीय विकल्प नहीं उभर रहा था। अखिल भारतीय सरकारें तो बन रही थीं लेकिन अखिल भारतीय दल नहीं बन रहे थे। अखिल भारतीय विकल्प के अभाव में खतरा यह था कि भारत का हाल सोवियत संघ जैसा हो सकता था। मजबूत सरकार, मजबूत प्रशासन, मजबूत फौज और परमाणु हथियारों के बावजूद जैसे सोवियत संघ बिखर गया, भारत भी बिखर सकता था। कांग्रेस ने भारत की जनता को वैसे ही सहेज रखा था, जैसे कम्युनिस्ट पार्टी ने सोवियत संघ जैसे विविधातामय विशाल देश को संभाल रखा था। कांग्रेस के विकल्प के तौर पर भाजपा उभर रही थी लेकिन यह उभार अधूरा और सीमित था। पहली बार इसने विंध्‍याचल को लांघा है। कोई आश्चर्य नहीं कि दिग्विजय का यह अश्व अब कुछ ही वर्षो में आंध्र और केरल में भी दौड़ता हुआ नजर आए। बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में भाजपा का खाता पहले से ही खुला हुआ है। देश के बहुत कम जिले ऐसे हैं जहां भाजपा नहीं है। कर्नाटक में लहराया भाजपा का ध्‍वज अन्य अहिंदीभाषी राज्यों में भी अब लहराए जाने को आतुर है। यह केवल भाजपा का विस्तार नहीं है, अखिल भारतीयता का विस्तार है। कांग्रेस को धाक्का जरूर लगा है लेकिन उसे खुश होना चाहिए कि यदि उसे पर्दे से गायब होना पड़ा तो इसके पहले उसने अपनी आंखों से अपने योग्य उत्तराधिकारी को देख लिया है।


इन चुनाव नतीजों का संदेश यह नहीं है कि कांग्रेस कर्नाटक या भारत से गायब होने वाली है। कर्नाटक में तो कांग्रेस की शक्ति बढ़ी ही है लेकिन उसके मुकाबले भाजपा को जो बढ़त मिली है, उससे कांग्रेस संकट के बादलों से घिर गई है। सबसे पहले तो कांग्रेस-नेतृत्व की अक्षमता पर मुहर लग गई है। सोनिया गांधी और उनके पुत्र ने किन-किन राज्यों में जोर नहीं लगाया? एक के बाद एक कांग्रेस के किले ढहते जा रहे हैं। हरियाणा और गोवा जैसे राज्यों की जीत भी क्या जीत है? उसका अखिल भारतीय वजन कितना है? अगर आंधा्र प्रदेश और महाराष्ट्र को छोड़ दें तो शेष 9 राज्य मिलकर भी दो-तीन बड़े राज्यों के बराबर नहीं हैं। 11 राज्यों में फैली कांग्रेस वास्तव में आठ राज्य में जमी हुई भाजपा से बड़ी पार्टी नहीं रह सकी है। अब कांग्रेस- गठबंधन में जुड़ी पार्टियों को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी है। अगला आम चुनाव आते-आते कांग्रेस कहीं अकेली न पड़ जाए। कर्नाटक के विधानसभा चुनाव ने नई राष्ट्रीय राजनीति की नींव रख दी है।


यह ठीक है कि भाजपा को सहानुभूति- वोट मिला है लेकिन अगर कांग्रेस गठबंधान की केंद्र सरकार ने लोकहित के असाधारण कार्य किए होते तो भाजपा के मुकाबले में वह इतनी नहीं पिछड़ती। यह कहना कि महंगाई, आतंकवाद, लचर नेतृत्व और आपसी कलह का कांग्रेस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, स्वप्नलोक में विहार करने जैसा है। यह मान लिया जाए कि स्थानीय तत्वों ने ही कर्नाटक का चुनाव-परिणाम तय किया है तो मूल प्रश्न यह खड़ा होता है कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व आखिर किस मर्ज की दवा है? यदि वह खाली घास-फूस है तो मध्‍यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली आदि राज्यों के चुनावों में क्या कांग्रेस का बिस्तर गोल नहीं हो जाएगा और उसका असर क्या लोकसभा चुनाव पर नहीं पड़ेगा? क्या कांग्रेस की शक्ति ऊपर से नीचे की तरफ ही बहती रहेगी? जिस पौधो की जड़ जमीन में न हो और आसमान में लटकी रहे, उसके सूखने में कितनी देर लगती है। यदि कांग्रेस ने अब अपने प्रामाणिक नेतृत्व का आविष्कार नहीं किया और अपनी नीतियों और संगठन में क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं किए तो अगले आम चुनाव के बाद उसके सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा। कर्नाटक ने कांग्रेस को आत्मावलोकन का अवसर प्रदान किया है।


कर्नाटक ने भाजपा को नए रूप में उभरने का न्यौता दिया है। कर्नाटक की जनता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव जीतने के लिए भाजपा को भावनात्मक मुद्दों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। यदि वह विकास, स्वच्छ नेतृत्व, अनुशासित संगठन और प्रगतिशील नीतियों को लेकर जनता के सामने जाएगी तो उसकी झोली खाली नहीं रहेगी। गुजरात और कर्नाटक अन्य राज्यों के लिए भी नमूना बन सकते हैं। जो सफलता नरेंद्र मोदी और येदियुरप्पा को मिली है, वह लालकृष्ण आडवाणी को क्यों नहीं मिल सकती? जैसे येदियुरप्पा मुख्यमंत्री पद के निर्विवाद उम्मीदवार थे, वैसे ही प्रधाानमंत्री पद के उम्मीदवार आडवाणी तो पहले से ही हैं।


कर्नाटक के चुनाव ने दोनों अखिल भारतीय पार्टियों का नक्शा तो बदल ही दिया है, देश के समस्त नेताओं को भी अनेक मुखर संदेश दिए हैं। सेक्युलरिज्म सत्ता के लिए कैसी-कैसी दंड-बैठक लगाता है, यह देवगौड़ा-परिवार ने देश को भली-भांति बता दिया है। इसी तरह कर्नाटक की जनता ने उन नेताओं को भी सबक सिखाया है, जो वचनभंग करते हैं।


ऐसे लोगों की जो दुर्दशा कर्नाटक में हुई है, वह भारतीय राजनीति में नैतिकता के पलड़े को भारी करेगी। गांवों और शहरों में भी भाजपा की जीत ने सबसे बड़ा अखिल भारतीय संदेश यह भी दिया है कि भारतीय राजनीति जातिवाद के जंजाल के ऊपर भी उठ सकती है। भाजपा सिर्फ लिगायत वोटों के दम पर ही नहीं जीती है, उसे दलितों, आदिवासियों और वोक्क लिग्गा लोगों ने भी यथेष्ट समर्थन दिया है।
कर्नाटक ने हमारे अनेक चुनाव विशेषज्ञों और कई टीवी चैनलों की प्रतिष्ठा को पैंदे में बैठा दिया है। उसने सिध्द कर दिया है कि चुनावों के पहले जो भी प्रचार किया जाता है, उसे खूब चबाए बिना निगलना नहीं चाहिए। इसी प्रकार चुनाव के पहले और बाद में बुलाए जाने वाले तथाकथित विश्लेषकों की बातें आंख मींचकर नहीं सुननी चाहिए। कर्नाटक ने उनको विश्लेषक कम, विदूषक अखिल सिध्द किया है।
(साभार : दैनिक भास्कर, 27 मई, 2008)

दक्षिण में दस्तक- बलबीर पुंज

सेकुलर कुनबे की कथित बनियों की पार्टी, सांप्रदायिक दल और उत्तर भारत में सिमटी पार्टी जैसे अलंकरणों से मंडित भारतीय जनता पार्टी को दक्षिण भारत में मिली जीत क्या रेखांकित करती है? दक्षिण भारत में भाजपा की उपस्थिति लंबे समय से है। 2004 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भी भाजपा 79 सीटों के साथ पहले स्थान पर थी, किंतु अपने बलबूते दक्षिण भारत के किसी राज्य में सरकार बनाने का यह पहला अवसर भाजपा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भाजपा के एक प्रभावी अखिल भारतीय दल के स्वरूप पर जनता की मुहर है। पिछले चार सालों में करीब दर्जन भर विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को लगातार पराजय का स्वाद चखना पड़ा है। अभी कर्नाटक के अलावा कांग्रेस को तीन लोकसभा उपचुनावों में भी पराजय मिली है। हिमाचल प्रदेश में भाजपा, महाराष्ट्र में शिवसेना और मेघालय में राकांपा के हाथों कांग्रेस को शिकस्त मिली। प्रांतवार समीक्षा की जाए तो आज भाजपा व्यापक जनाधार वाली सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। मध्‍य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात में भाजपा अपने बूते सरकार चला रही है, जबकि बिहार, उड़ीसा, पंजाब और मेघालय में भाजपा की गठबंधन सरकार है। कांग्रेस और खासकर उनकी कथित स्टार प्रचारक-सोनिया गांधी को गुजरात के बाद अब कर्नाटक के जनादेश से यह पता चल चुका होगा कि भारतीय राजनीति में वंशवाद के लिए अब कोई स्थान नहीं है। कांग्रेस के कथित युवराज राहुल गांधाी कर्नाटक चुनाव में काफी सक्रिय रहे, उन्होंने प्रांत के चारों प्रमुख क्षेत्रों का दौरा किया, किंतु परिणाम सामने है। 1977 का रायबरेली चुनाव हारने के बाद 1978 में कर्नाटक के चिकमंगलूर ने उपचुनाव के द्वारा इंदिरा गांधी को संसद भेजा था। सोनिया गांधी के लिए भी सुरक्षित गढ़ कर्नाटक के बेल्लारी को समझा गया। आज उसी कर्नाटक में कांग्रेस हाशिए पर खड़ी है। कई कांग्रेसी नेता जो पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, उन्हें भी इस बार हार का मुंह देखना पड़ा। यह कांग्रेस के सिमटते जनाधार का ही द्योतक है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मधय प्रदेश आदि हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी कांग्रेस का प्रभाव तेजी से सिकुड़ता जा रहा है। 2004 के आम चुनावों में कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले केवल सात सीटें अधिाक हासिल हुई थीं, किंतु कथित सांप्रदायिक भाजपा को हाशिए पर डालने के लिए कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने अवसरवादी गठबंधन कर एक सेकुलर खेमा खड़ा किया। इस दिशाहीन अवसरवादी खेमे की नीतिविहीन और राजनीतिक वैरशोधान की परंपरा के कारण आज देश न केवल आकाश छूती महंगाई से त्रस्त है, बल्कि हमारी आंतरिक सुरक्षा पर खतरे के गंभीर बादल मंडरा रहे हैं। गुजरात के चुनाव की तरह कर्नाटक के चुनाव में भी भाजपा सुशासन के मुद्दे के साथ मैदान में उतरी और इस राज्य में जिस तरह स्पष्ट जनादेश भाजपा के पक्ष में है उससे साबित होता है कि कांग्रेस की अवसरवादी और जांत-पात की राजनीति को आने वाले समय में भी जनता नकारती रहेगी। बिहार, उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात, कर्नाटक विधानसभा के साथ पिछले चार सालों में स्थानीय निकायों के चुनावों में भाजपा को भारी जीत हासिल हुई है। निश्चित रूप से यह भाजपा की सकारात्मक राजनीति को मिल रही भारी जनस्वी.ति का ही प्रमाण है।


कांग्रेस की जात-पांत की राजनीति कर्नाटक चुनाव में ठहर नहीं सकी। अंतिम समय में वोकलिंगा समुदाय को तुष्ट करने के लिए एसएम कृष्णा को चुनाव की कमान थमाई गई। ओबीसी से सिध्दरमैया, दलित वर्ग से मल्लिकार्जुन खड़गे भी कांग्रेस की नैया पार नहीं करा पाए। लिंगायत समुदाय के भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के लिए प्रस्तावित येदियुरप्पा को पटखनी देने के लिए कांग्रेस और जद (सेकुलर) ने सपा के एस. बंगरप्पा को समर्थन दिया था। यह प्रयोग भी नाकाम रहा। 2004 के कर्नाटक विधाानसभा चुनाव में भी भाजपा 79 सीटों के साथ पहले स्थान पर थी। 65 सीटों के साथ कांग्रेस दूसरे और 58 सीटों के साथ जद (सेकुलर) तीसरे स्थान पर रही थी। इस बार भाजपा को 110 स्थान अर्थात बहुमत से मात्र तीन सीटें कम मिली हैं। कांग्रेस 80 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर है। संप्रग सरकार के प्रारंभिक वर्षों में जिस तरह कांग्रेस ने बिहार, झारखंड और गोवा विधाानसभा के जनादेश को अपहृत करने का प्रयास किया था उससे यह आशंका है कि वह जद (सेकुलर) के साथ गठबंधान कर सरकार बनाने का प्रयास करे। कर्नाटक के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर कांग्रेस के निष्ठावान कार्यकर्ता भले हों, किंतु उनसे राज्य की जनता से विश्वासघात करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसा कोई भी प्रयास कांग्रेस की विश्वसनीयता को और क्षति ही पहुंचाएगा।


इस बार के चुनाव में भाजपा विश्वासघात, महंगाई और आतंकवाद के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरी थी और सेकुलर दल के कथित पुरोधा देवगौड़ा की यदि इस चुनाव में दुर्गति हुई है तो यह साफ है कि उनके दल द्वारा किए गए विश्वासघात को जनता ने गंभीरता से लिया है। महंगाई महत्वपूर्ण मुद्दा तो थी ही, किंतु यहां एक बात पर और ध्‍यान देना होगी कि किसानों की आत्महत्या से द्रवित होने के नाम पर कर्जमाफी का जो अदूरदर्शी और अप्रभावी कदम कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने हाल के दिनों में उठाया था उसे कर्नाटक के किसानों की स्‍वीक्रिति नहीं मिल पाई। कर्नाटक का जनादेश कांग्रेस के लिए कई मायनों में आत्ममंथन का अवसर देता है। पहला वंशवाद से पार्टी अधयक्ष बनना और राजनीतिक दूरदर्शिता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। सोनिया गांधी दस साल तक कांग्रेस की अध्‍यक्ष बने रहने पर कितना ही गर्व महसूस करें, किंतु कटु सत्य यह है कि कांग्रेस में लोकतांत्रिक विधि से अधयक्ष चुने जाने की परिपाटी ही नहीं है। गैर गांधाी-नेहरू वंश से अधयक्ष बनने वाले सीताराम केसरी का हश्र सर्वविदित है। देश को लाइसेंसी राज से मुक्ति दिलाकर उदारवादी अर्थनीति से खुशहाली के पथ पर लाने वाले नरसिंह राव की उपेक्षा किसी से छिपी नहीं है। सोनिया गांधी हों या युवराज राहुल गांधी, इन दोनों का करिश्मा पिछले चुनावों में कांग्रेस को कोई फायदा नहीं पहुंचा सका है।


दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र की निरंकुश पकड़ से कांग्रेस का आने वाले दिनों में और बेड़ा गर्क होने वाला है। कर्नाटक में आधा दर्जन कांग्रेसी नेता होंगे जिनका जनता पर अच्छा प्रभाव है, किंतु गुजरात की तरह यहां भी कांग्रेस नेतृत्व ने किसी भी नेता को मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तावित नहीं किया। केवल गुजरात-कर्नाटक ही नहीं, अन्य राज्यों में भी कांग्रेस अपना कोई सर्वमान्य नेता खड़ा नहीं कर पाई है। वस्तुत: अपने बीच के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को पंचायत स्तर में धाकेल कर कांग्रेस ने गांधाीवादी रास्ते से किनारा कर लिया था। पार्टी एक वंश विशेष के करिश्मे की मोहताज बनकर रह गई है। जहां पार्टी का शीर्ष पद एक वंश विशेष के लिए आरक्षित हो गया हो वहां निचले स्तर से किसी राष्ट्रीय नेता का विकास कैसे संभव है? हाल के चुनावों का निहितार्थ द्वि-दलीय राजनीति का संकेत करता है। क्षेत्रीय दलों से व्यापक राष्ट्रीय हित की अपेक्षा नहीं की जा सकती। देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल-कांग्रेस को वस्तुत: अपनी स्थिति पर आत्मचिंतन करना चाहिए।
(लेखक भाजपा के राश्ट्रीय सचिव व राज्यसभा सदस्य हैं)

दक्षिण में कमल- जनसत्ता

हालांकि भारतीय जनता पार्टी को साफ बहुमत नहीं मिला, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि नतीजे पक्ष में आए हैं। पार्टी को बहुमत मिलने में सिर्फ तीन सीटों की कसर रह गई और उसका दावा है कि निर्दलीय विधायकों के समर्थन से वह यह कमी पूरी कर लेगी। इस तरह दक्षिण भारत में, वह भी अपने बूते, सरकार बनाने का भाजपा का सपना पूरा हो जाएगा। इस मायने में कर्नाटक विधानसभा के चुनाव उसके लिए कांग्रेस से कहीं ज्यादा अहम थे। इन नतीजों ने भाजपा को, जो मुख्य रूप से हिंदी भाषी क्षेत्रों की पार्टी मानी जाती रही है, खुद को एक राष्ट्रीय दल के रूप में स्थापित करने का मौका दिया है और वह भी ऐसे समय जब अगले लोकसभा चुनाव में सिर्फ एक साल रह गया है। यों नतीजे 2004 में हुए चुनावों की लकीर पर ही आए हैं। तब भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी थी और कांग्रेस दूसरे और जनता दल (एस) तीसरे नंबर पर। इस बार भी क्रम वही है। मगर इस दफा जद (एस) की कीमत पर भाजपा को जो फायदा हुआ उसने राज्य की सत्ता को उसके करीब ला दिया। पिछले साल नवंबर में एचडी देवगौड़ा और कुमारस्वामी के अपने वादे से मुकर जाने के कारण भाजपा सरकार बनाने से वंचित रह गई थी। हो सकता है इस कारण उसे थोड़ा सहानुभूति का लाभ मिला हो। पर भाजपा की जीत के पीछे कई और वजहें हैं। महंगाई और जयपुर के धमाकों के कारण आंतरिक सुरक्षा को चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाने में वह सफल रही और इससे कांग्रेस बचाव की मुद्रा में आ गई। भाजपा का प्रचार अभियान भी कांग्रेस की तुलना में ज्यादा सुनियोजित था।


माना जा रहा था कि भाजपा को मुख्य रूप से लिंगायतों के समर्थन का आसरा है, पर इस धारणा को तोड़ने और लगभग सभी तबकों का विश्वास पाने मं वह कामयाब हुई। दूसरी ओर कांग्रेस में सांगठनिक स्तर पर भाजपा के मुकाबले तत्परता और एकजुटता का अभाव दिखा। फिर अनेक सीटों पर टिकट प्रभावशाली नेताओं के चहेतों या रिश्तेदारों को दे दिए गए जिससे कार्यकर्ताओं में रोष फैला। सोनिया गांधाी और राहुल गांधी के दौरों को छोड़ दें, तो कांग्रेस का बाकी प्रचार अभियान बिखरा-बिखरा था। पार्टी ने किसी को मुख्यमंत्री को रूप में पेश नहीं किया। इसका नुकसान यह हुआ कि राज्य कांग्रेस के पांच-छह नेता मुख्यमंत्री पद के दावेदार समझे जा रहे थे और जिस समय पार्टी को पूरी तरह एकजुट दिखना चाहिए था वह गुटों में बंटी नजर आ रही थी। इस तरह कांग्रेस ने अपनी ढिलाई और चुनावी रणनीति की कमी से भाजपा के लिए दक्षिण का द्वार खोल दिया। 2004 में केन्द्र की बागडोर संभालने के बाद से कांग्रेस अब तक कई राज्यों के चुनाव हारी है, पर शायद ही उसने कोई सबक लिया हो। इन चुनावों के अनुभवों से यह साफ हो चुका है कि किसी को मुख्यमंत्री के रूप में पेश न करने की नीति ने उसे नुकसान ही पहुंचाया है। कांग्रेस की परंपरा है कि चुनाव के बाद आलाकमान की इच्छा पर विधायक दल की मुहर लगवा ली जाती है। मगर पार्टी को अब इस पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। साथ ही अगले कुछ महीनों में यूपीए सरकार को महंगाई और आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर अपनी सूझबूझ और दक्षता प्रमाणित करनी होगी। (27 मई, 2008)

दक्षिण में भगवा- हिन्दुस्तान

कर्नाटक के चुनाव नतीजों में कई अर्थ खोजे जा सकते हैं। चुनाव में जीत दर्ज कराने वाली भारतीय जनता पार्टी भले ही इसे कांटे की टक्कर न माने, लेकिन उसके रास्तें में कई तरह के कांटे जरूर थे। और आखिरी क्षण तक दम साधा कर देखे गए नतीजों में यह बार-बार दिखते भी रहे। अब इस चुनाव पर ढेर सारी व्याख्याएं सामने आ रही हैं। इसलिए भी कि पूरे चुनाव का कोई एक मुख्य मुद्दा नहीं था और इसलिए भी कि कई कारणों से आखिरी क्षण तक यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था कि हवा किधार बह रही है। पर अब एक ही अर्थ महत्वपूर्ण है कि भाजपा ने दक्षिण के एक राज्य में अपना भगवा परचम लहरा दिया है और वह भी अकेले अपने बूते। इसमें राहत की सबसे बड़ी बात सिर्फ यही है कि विधानसभा चुनाव का जनादेश उस तरह से खंडित नहीं है, जैसी आशंका थी। या जैसा कि यह पिछले चुनाव में था और जिस वजह से राज्य को साझा सरकार की विद्रूपता से भी दो-चार होना पड़ा। जनता ने जिस तरह हरदनहल्ली देवेगौड़ा की पार्टी को नकारा, उसने एक बात तो साफ कर दी कि साझा सरकार खास हालात में राजनीतिक दलों की मजबूरी हो सकती है, लेकिन अक्सर वह जनता की पंसद नहीं होती। कांग्रेस ने अपनी स्थिति में भले ही मामूली सुधार कर लिया हो, लेकिन ये नतीजे उसके लिए हार की तरह ही है। अगले कुछ दिनों में इस बात का भी विश्लेषण सामने आ जाएगा कि इस हार में उसकी घरेलू कलह का कितना योगदान था, कितना गलत रणनीति का, कितना बढ़ती महंगाई का और कितना बसपा के फैलते आधार का। वजह जो भी हो? राज्य की बहुसंख्यक जनता ने उसके मुकाबले भाजपा को ही ज्यादा पसंद किया।

कर्नाटक के नतीजों में एक राष्ट्रीय पैटर्न देखने की भी कोशिश हो रही है, क्योंकि आम चुनाव महज एक साल दूर है। कुछ महीने बाद होने वाले दिल्ली, मधय प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव के नतीजों से तस्वीर ज्यादा साफ होगी। पर इस जीत से भाजपा के हौसले तो जरूर ही बुलंद हुए होंगे। फिलहाल उसके पास एक साल का समय है, जिसमें कर्नाटक के नतीजों को एक राष्ट्रव्यापी रंग देने की कोशिश कर सकती है। इतना ही समय केंद्र की यूपीए सरकार के पास भी है कि वह कर्नाटक की हार से सबक लेते हुए तमाम मुश्किलों के बीच से अपनी वापसी की राह निकाल ले। कर्नाटक के नतीजों अगले आम चुनाव को और दिलचस्प बना दिया है। (26 मई, 2008)

कर्नाटक का संदेश- राष्ट्रीय सहारा

कर्नाटक में कमल खिलने के साथ उपचुनाव परिणामों के संदेशों को मिलाकर पढ़ें तो इसमें कांग्रेस एवं संप्रग के लिए गहरी चिंता पैदा करने वाली अंतर्वस्तु निहित है। लोकसभा उपचुनावों में हिमाचल के हमीरपुर से भाजपा एवं ठाणे में शिवसेना की विजय को अगर राष्ट्रीय पैटर्न मान लिया जाए तो कांग्रेस एवं संप्रग के लिए खतरे की घंटी बच चुकी है। मेघालय के तूरा से पूर्व लोकसभा अधयक्ष पीए संगमा की पुत्री अगाथा के. संगमा की राकांपा प्रत्याशी के रूप में विजय अवश्य हुई है, लेकिन वहां कांग्रेस से उनका मुकाबला था। मेघालय मे कांग्रेस एवं राकांपा आमने-सामने हैं। हरियाणा के तीन विधानसभा उपचुनावों में से दो पर विजय से कांग्रेस के लिए सांस लेने की थोड़ी जगह मिल गई है, लेकिन वहां भी आदमपुर सीट से भजनलाल की विजय उसकी छाती में कील ठोंकने जैसा परिणाम ही है। गुजरात के बाद कर्नाटक उसके लिए दूसरा करारा आघात है। वह इसे तथाकथित सेक्युलर मतों के बंटवारे की परिणति मान रही है। यह कांग्रेस के दिशाभ्रम का ही सबूत है। क्या कांग्रेस यह कल्पना कर रही है कि गैर भाजपा या गैर राजग सारे दल उसके साथ खड़े हो जाएं? वर्तमान राजनीति में यह कितना नामुमकिन है इसका अहसास उसे होना चाहिए। कर्नाटक में जनता दल (से) और कांग्रेस प्रतिद्वंद्वी हैं। इनके बीच मतों के विभाजन को सेक्युलर-गैर सेक्युलर चश्मे से देखा ही नहीं जा सकता। वहां बसपा और सपा भी मैदान में थी। हालांकि उनको नाममात्र को मत मिले, लेकिन हैं तो वे भी इस तथाकथित सेक्युलर खेमे के दल ही। क्या कांग्रेस यह नहीं जानती कि इन दोनों के साथ उसका व्यापक चुनावी गठजोड़ संभव नहीं? चुनाव परिणाम भी यह साबित नहीं करते कि इस श्रेणी के दलों के बीच मत विभाजन से चुनाव परिणाम व्यापक रूप में प्रभावित हुए हैं। वास्तव में कांग्रेस अपनी लगातार पराजयों के सही संदेशों को पढ़कर अगर आत्ममंथन करे तो वह अपने उत्थान के लिए रास्ते निकाल सकती है, अन्यथा सेक्युलर गैर सेक्युलर की विकारपूर्ण खेमेबंदी में उसके लिए परित्राण का स्पेस है ही नहीं। इस समय देशभर में कांग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के प्रति असंतोष का माहौल है। महंगाई से निपटने की रणनीति से लोगों को राहत नहीं मिली है, आतंकवाद के प्रति केन्द्र का रवैया अस्पष्ट नजर आता है, लोगों को लगता है कि वामदलों के दबाव में सरकार कड़े फैसले नहीं ले पानी है खासकर भारत-अमेरिका परमाणु करार पर वामदलों के हमले के सामने सरकार की लाचारी का नकारात्मक संदेश गया है। कांग्रेस इन सब व्यूहों को धवस्त करने की कोशिश करने की बजाय यदि तीसरे मोर्चे की सोच वाली सेक्युलर और गैर सेक्युलर मोर्चेबंदी की कोशिश करेगी तो उसमें उसे नुकसान के सिवा और कुछ हासिल नहीं होगा। (27 मई, 2008)

दक्षिण में कमल- नवभारत टाइम्स

कर्नाटक का जनादेश स्थिरता के लिए है। राज्य में जिस तरह से सरकारें बनाने-गिराने का खेल चल रहा था, उससे जनता उकता गई थी। वहां राजनीतिक अनिश्चितता के माहौल से पैदा हुए हालात का बीजेपी ने बेहतर ढंग से लाभ उठाया और पुख्ता तैयारी की। उसकी जीत दरअसल कुशल रणनीति की जीत है। दूसरी तरफ कई राष्ट्रीय मुद्दे कांग्रेस के खिलाफ गए। बीजेपी ने शुरू में ही भांप लिया था कि कर्नाटक में हिन्दुत्व का मुद्दा नहीं चलेगा इसलिए उसने स्थिरता और विकास के नारे पर जोर दिया। येदियुरप्पा को भावी मुख्यमंत्री घोषित कर उसने पार्टी कार्यकर्ताओं को तो एकजुट किया ही, लिंगायत वोट का पक्का इंतजाम कर लिया। लेकिन पार्टी दूसरे समुदायों में भी अपना प्रभाव विकसित करने में लगी रही। उसकी इस कोशिश का असर यह हुआ कि रिजर्व सीटों पर भी उसे उल्लेखनीय सफलता मिली। पार्टी ने जमीनी स्तर पर अपना नेटवर्क तैयार करने पर काफी जोर दिया उसने करीब 33 हजार बूथ स्तर की कमिटियां बनाई और जनता से सीधा संपर्क साधा। उसने बड़ी चतुराई से शहरी और ग्रामीण जनता के लिए अलग-अलग तरह के मुद्दे उछाले। बेंगलुरू में मिली जबर्दस्त कामयाबी से यह जाहिर है कि इस मेट्रो सिटी को विकसित करने के उसके वादे ने रंग दिखाया है। जेडी (एस) ने जिस तरह से समझौते की शर्त तोड़ी उससे उसकी छवि खराब हुई और आम आदमी ने उसे ही राज्य की अस्थिरता के लिए जवाबदेह माना और चुनाव में सबक सिखा दिया। जेडी (एस) के रवैये ने बीजेपी के पक्ष में काफी हद तक सहानुभूति की लहर पैदा की। दूसरी तरफ कांग्रेस दुविधा में पड़ी दिखी। वह यह तय नहीं कर पा रही थी कि राज्य में आखिर कौन सी रणनीति अपनाई जाए। उसने उम्मीदवारों की सूची घोषित करने में भी देरी लगाई। नेतृत्व के सवाल पर भी उसने धयान नहीं दिया। अगर पहले ही सीएम कैंडिडेट घोषित कर चुनाव लड़ा जाता तो शायद स्थिति बदल सकती थी। फिर बढ़ती महंगाई ने उसका खेल खराब किया। बीजेपी ने आतंकवाद से निपटने के तौर-तरीके को लेकर केन्द्र सरकार की खिंचाई कर रखी थी, इसी बीच जयपुर बम विस्फोट ने उसे और आक्रमक होने का मौका दिया। इससे भी एक तबका बीजेपी की ओर मुड़ा। निश्चय ही यह बीजेपी की ऐतिहासिक सफलता है। राज्य में 1985 में दो सीटें पाने वाली बीजेपी इस बार 110 पर पहुंच गई है। अब वह केवल उत्तार भारत की पार्टी नहीं रह गई है। इसी उत्साह में वह इस जनादेश को अगले लोकसभा चुनाव से जोड़कर देख रही है लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि कर्नाटक में उसकी जीत में स्थानीय तत्वों की भूमिका ज्यादा है। कर्नाटक में अगर उसने जनता की अपेक्षाएं पूरी नहीं की तो उसे भविष्य में निराश होना पड़ सकता है। कर्नाटक चुनाव का एक संदेश और है जिस पर हरेक पार्टी को गौर करना चाहिए। यह साफ हो गया है कि जनता राजनीतिक अवसरवादिता को बहुत दिनों तक बर्दाश्त नहीं करपाती है। देवगौड़ा परिवार का हाशिए पर जाना यह जाहिर करता है कि सियासत में वही टिकेंगे जो अपने राजनीतिक संवैधानिक दायित्वों को गंभीरता से लेंगे। (27 मई, 2008)

भाजपा को मौका, सबको संदेश- दैनिक ट्रिब्युन

वर्ष 2004 के विधानसभा चुनाव में 58 स्थानों पर विजयी रहे जनता दल(एस) को 30 से भी कम सीटों तक सीमित कर कर्नाटक के मतदाता ने गठबंधन राजनीति के दौर में घोर अवसरवादिता के लिए पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा के अनुयायियों को सबक सिखाने की कोशिश की है। दक्षिण भारत के सबसे तेजी से विकास कर रहे राज्य कर्नाटक में पिछले विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा स्थान पाने के बावजूद जोड़-तोड़ की राजनीति के चलते सिर्फ सात दिन तक सत्ता में रह सकी भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत के करीब पहुंचाकर कर्नाटक के मतदाता ने जोड़-तोड़ की राजनीति को भी नकार दिया है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिला जन समर्थन राष्ट्रीय राजनीति में कुछ नयी संभावनाओं का संकेत माना जा रहा है। 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी से दर्जनभर से कम स्थानों के अंतर के कारण सत्ता से वंचित रहने को हज्म करने में लंबे समय तक विफल रही भाजपा कर्नाटक में अपने प्रत्याशियों को मिले बेहतर जन समर्थन के बाद इसे लोकसभा चुनाव के संकेत के रूप में देखने को उत्सुक है और कांग्रेस ने खामोशी ओढ़ ली है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एस.एम. कृष्णा ने हार की जिम्मेदारी ओढ़ते हुए विपक्ष में रहते हुए अपनी पार्टी के लिए नयी रणनीति बनाने की जरूरत बतायी है। उन्होंने जायज ही कर्नाटक जैसे विभिन्नताओं से भरपूर राज्य का शासन चलाने की चुनौतियों तथा भाजपा से लोगों की व्यापक अपेक्षाओं की तरफ धयान दिलाया है। कर्नाटक में पहली बार अपने बूते पर सत्ता संभालने जा रही भाजपा के ज्यादातर स्थानीय नेताओं को प्रशासनिक अनुभव नहीं होने के चलते उनका काम निश्चय ही मुश्किल हो सकता है। कर्नाटक में कांगेस पार्टी को 2004 से कुछ ज्यादा इलाकों में मिली जीत तथा जनता दल(एस) को मतदाता द्वारा दिया गया झटका क्षेत्रीय दलों की अवसरवादिता की राजनीति को नकारने के मतदाता के संदेश की गूंज देश भर में भावी चुनावों में सुनायी दे तो ज्यादा हैरानी नहीं होगी।
(26 मई, 2008)

दक्षिण में अपने बलबूते पर खिला कमल- पंजाब केसरी

कर्नाटक विधानसभा के चुनाव परिणामों ने देश की जनता को चौंकाया नहीं है बल्कि कांग्रेस को नींद से जगाया है। दक्षिण भारत में पहली बार अपने ही बूते पर भाजपा सरकार बनाने जा रही है। हालांकि 224 में से 110 सीटें जीतने के बाद वह सरकार बनाने से 3 कदम दूर है लेकिन प्रतिद्वंद्वी इस राह में भी मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। कई प्रतिद्वंद्वियों के राजनीतिक समीकरण भी भाजपा को रास आए। इससे सिध्द हो गया है कि अभी तक उत्तर भारत की ही रूढ़िवादी पार्टी मानी जाने वाली भाजपा की स्वीकार्यता दक्षिण में भी है। यह भाजपा अधयक्ष श्री राजनाथ सिंह के लिए गौरव की बात है कि उनके नेतृत्व में पार्टी लगातार विधानसभा चुनावों में विजय दर्ज करती जा रही है। ठीक ऐसा ही इस पार्टी के चुनाव प्रबंधक श्री अरूण जेटली के बारे में भी कहा जा सकता है कि जिस-जिस राज्य का प्रभार उनके हाथ में दिया गया वहां-वहां भाजपा की जीत हुई। मगर कर्नाटक की जीत भाजपा के लिए फूल कर कुप्पा होने वाली नहीं है। इसमें सुश्री मायावती की बहुजन समाज पार्टी का योगदान भी कोई कम नहीं है क्योंकि राज्य में कांग्रेस व भाजपा दोनों को ही बराबर-बराबर 37 प्रतिशत वोट मिले हैं और मायावती की पार्टी के प्रत्याशियों को 7 प्रतिशत के लगभग मत मिले हैं।


वास्तव में कर्नाटक के चुनाव राष्ट्रीय राजनीति में बसपा की महत्वपूर्ण होती भूमिका को रेखांकित करते हैं। ये चुनाव केन्द्र की मनमोहन सरकार और कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व पर सीधी टिप्पणी भी है कि केवल पारिवारिक विरासत कि बूते पर न तो अब पार्टी को चलाया जा सकता है और न सरकार को।
कर्नाटक में कांग्रेस की पराजय ने इसे डूबते जहाज के रूप में परिवर्तित कर दिया है क्योंकि दक्षिणी राज्यों में (केरल को छोड़कर) कांग्रेस को हराने की कूव्वत किसी राजनीतिक दल की अपेक्षा लोकप्रिय फिल्मी सितारों की चकाचौंधा में रही है चाहे वह आंधा्र प्रदेश हो या तमिलनाडू।


पहली बार कांग्रेस किसी दूसरे ऐसे दल से हारी है जिसका दायरा क्षेत्रीय न होकर राष्ट्रीय माना जाता है। जो कर्नाटक 1978 में इंदिरा गांधाी के लिए धाारदार हथियार बनकर उस समय की केन्द्र की जनता पार्टी की मोरारजी सरकार के सीने में सीधो छेद कर गया हो (इंदिरा जी ने 1977 का रायबरेली चुनाव हारने के बाद चिकमंगलूर से 1978 में उपचुनाव लड़ा था) और खुद सोनिया गांधी के लिए इस राज्य का बेल्लारी चुनाव क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित गढ़ समझा गया हो आज यदि वही भाजपा के खेमे में जा रहा है तो इसका संदेश यही है कि इस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से आम जनता का विश्वास खत्म हो रहा है। मगर कांग्रेसियों को यह समझाना बहुत मुश्किल काम है क्योंकि आज भी इनमें अपने ही बनाए हुए सपनों के संसार से बाहर निकलने की ताकत नहीं। हकीकत यह है कि आज का मतदाता जमीनी हकीकत को देखता है, उसके सामने कांग्रेस के शासन के पिछले चार साल शीशे की तरह साफ हैं कि किस प्रकार पूरे मुल्क को कुछ ऐसे लोगों की जागीर समझा जा रहा है जिन्हें इस देश की मिट्टी की सुगंधा का भी अहसास नहीं है। यही वजह है कि पिछले चार सालों में एक दर्जन के लगभग राज्यों में हुए चुनावों में दिल्ली, हरियाणा व मणिपुर को छोड़कर शेष सभी में कांग्रेस धाराशायी हुई और इसने अपने इसी दंभ के चलते भाजपा को सत्ता प्लेट में सजा कर दे दी।
(26 मई 2008)

कर्नाटक के संकेत- अमर उजाला

कर्नाटक के चुनाव परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि देश की राजनीति अंगड़ाई लेने के मूड में है। उसका चरित्र बदल रहा है। इसका तात्कालिक प्रभाव प्रांतीय और राष्ट्रीय राजनीति पर तो पड़ेगा ही, भावी राजनीत की दिशा निर्धारित करने में भी उसकी अहम भूमिका होगी। उसने निश्चय ही भाजपा के चेहरे पर से उत्तर भारत के सवर्णों की पार्टी का ठप्पा साफ कर दिया है। अब वह बेधड़क दक्षिण की ओर कूच कर सकती है। गंगा-यमुना के दोआब की पार्टी अब कृष्णा-कावेरी के तटों, पर अपना भाग्य आजमाने की दिशा में बढ़ रही है। कर्नाटक भाजपा के लिए दक्षिण का प्रवेश द्वार है। हालांकि वर्ष 2004 में हुए विधानसभा चुनावों में भी वह कर्नाटक की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी थी, लेकिन इस बार उसे बहुमत के लगभग करीब पहुंचा कर वहां की जनता ने उस पर सर्वाधिक भरोसा किया है। जबकि राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे थे कि भाजपा और जेडी-एस की खींचतान में कांग्रेस को फायदा हो सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कर्नाटक की जनता ने कांग्रेस के बजाय भाजपा को ज्यादा स्थिर और बेहतर विकल्प माना है। इसके लिए कांग्रेस की प्रांतीय राजनीति तो जिम्मेदार है ही, केन्द्रीय राजनीति भी अपनी जिम्मेदारी से हाथ नहीं खींच सकती। वर्ष 2004 में कांग्रेस वहां दूसरे नंबर की पार्टी थी। उसने जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के पुत्र कुमारस्वामी की महत्वाकांक्षा के चलते यह गठबंधान चल नहीं पाया। बाद में उन्‍होंने वही गठबंधान भाजपा के साथ किया, लेकिन वहां भी उसका वही हश्र हुआ। इस सारे घटनाक्रम में जनता की सहानुभूति भाजपा को ही मिली। कांग्रेस चाहती, तो उस लहर को अपने पक्ष में मोड़ सकती थी। लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई, क्योंकि एक तो उसके भीतर कई गुट बन गए थे और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार भी अनेक हो गए थे। भाजपा के येदियुरप्पा के समक्ष वे टिक नहीं पाए। दूसरा, केन्द्र की संप्रग सरकार की आर्थिक नीतियां भी जनता को रास नहीं आई। आसमान छूती महंगाई और अभिजात्य वर्ग को भाने वाली नीतियों से जनता का दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। यदि कोई उपलब्धि थी भी, तो कांग्रेस उसे जनता तक पहुंचा नहीं पाई। दक्षिण भारत जो कांग्रेस का मजबूत आधार रहा है, वहां से भी कांग्रेस बेदखल हो रही है। पूरी हिंदी पट्टी से वह उखड़ चुकी है। उत्तार प्रदेश, बिहार, मधय प्रदेश, राजस्थान में वह सत्ता से बाहर है। गुजरात, उत्ताराखंड, हिमाचल प्रदेश और पंजाब से भी वह निकल गई। ऐसे में कर्नाटक जैसे राज्य में भाजपा की जीत ने उसका भावी मार्ग कंटककीर्ण बना दिया है। यदि उसने अपनी भावी रणनीत नहीं बदली, तो तय मानिए, अगले साल का लोकसभा चुनाव उसके लिए खुशखबरी लाने वाला नहीं है। जबकि सात राज्यों में अपनी सरकार और पांच राज्यों में गठबंधान सरकार में शामिल भाजपा आगे बढ़ती नजर आ रही है। तो क्या अब भी नहीं चेतेगी कांग्रेस?
(26 मई 2008)

दक्षिण में कमल- राजस्थान पत्रिका

कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी ने अपने बलबूते पर भगवा परचम फहराया है। यूं तो सन 2004 में ही उसने विंधय पर्वत शृंखला के पार अपना कदम बढ़ा दिया था। तब वह 79 सीटें जीतकर एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, पर कांग्रेस तथा जनता दल (ध) ने धार्मनिरपेक्षता की आड़ में सरकार बनाकर जनादेश को पलट दिया था। इस बार जनता ने उसका बदला लेकर दक्षिण में कमल खिला दिया।


जहां तक कांग्रेस की हार का सवाल है, पिछले चार सालों में यह उसकी 16वीं पराजय है। हर बार की तरह अब भी वह क्षेत्रीय मुद्दों का बहाना बनाकर पराजय की खीझ मिटाना चाहेगी, पर उसे सोचना होगा कि हार का यह सिलसिला कैसे टूटे? सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस संयुक्त प्रगतिशील गठबंधान (संप्रग) बनाकर जीती थी। उसी साल आंधा्रप्रदेश, अरूणाचल प्रदेश व महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में वह जीती, पर कर्नाटक, उड़ीसा और सिक्किम में हार गई। अगले साल 2005 में हरियाणा जीती, लेकिन झारखण्ड व बिहार में कांग्रेस ने कड़ी शिकस्त झेली। फिर 2006 में जहां असम व पांडिचेरी में कांग्रेस की सत्ताा बरकरार रही, वहीं पश्चिम बंगाल, केरल व तमिलनाडु में उसे कुछ नहीं मिला। सन् 2007 में मणिपुर व गोवा में कांग्रेस विजयी रही, पर इन छोटे राज्यों के मुकाबले पंजाब, उत्ताराखंड, उत्तार प्रदेश तथा गुजरात जैसे बड़े राज्यों में उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा। सन् 2008 में तो त्रिपुरा, मेघालय, नगालैण्ड और अब कर्नाटक में उसकी हार हुई है। इसका मतलब यह हुआ कि कांग्रेस की लोकप्रियता निरंतर ढलान पर है।


भाजपा के हाथ में इस समय सात राज्यों की सत्ता है। इसके अलावा 5 अन्य राज्यों में उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधान (राजग) के घटकों की सरकारें हैं। निश्चय ही यह उसके भौगोलिक और सामाजिक विस्तार का प्रमाण कहा जा सकता है।


कांग्रेस ने कर्नाटक का चुनाव जीतने के लिए भरसक प्रयास किए। यहां तक कि उसने वोक्कालिगा, लिंगायत, कुरूबा, दलित, मुस्लिम, ईसाई और ब्राह्मण सभी तरह के दिग्गज नेता चुनाव मैदान में उतारे, पर जनता को उनकी तस्वीरें नहीं लुभा पाई। दूसरी ओर भाजपा ने सिर्फ अपने पुराने परखे नेता वी.एस. येदियुरप्पा को ही आगे रखा, जो बीस माह चली कांग्रेस-जद (ध) सरकार और पन्द्रह महीने अस्तित्व में रही जद (ध)- भाजपा सरकार के बाद सिर्फ सात दिन मुख्यमंत्री रहे। दूसरी ओर कांग्रेस ने पहले जनता के सामने प्रदेशाधयक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को रखा पर उन्हें भी मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा नहीं की। चुनाव के सन्निकट अचानक पूर्व मुख्यमंत्री एस.एम. कृष्णा को महाराष्ट्र के राज्यपाल पद से इस्तीफा दिलवा कर मुख्य अभियान प्रबंधाक बना दिया। स्वाभाविक रूप से इससे जनता में संशय की स्थिति उत्पन्न हुई। इस चुनाव में बसपा ने भी कांग्रेस के वोट काटने में काफी अहम भूमिका निभाई। भारत-अमरीकी असैन्य परमाणु करार को लेकर कांग्रेस वामपंथी दलों को तो नाराज कर ही चुकी है, अब संप्रग को भी एकजुट रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। इनमें से दिल्ली को छोड़कर तीनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं। कांग्रेस अगर कम्प्यूटराें के ही भरोसे नहीं रही और उसने मानवीय संवेदनाओं का फायदा उठाया तो सत्ताा-विरोधाी लहर उसकी मदद करेगी। इसके लिए उसे महंगाई तो काबू में करनी ही होगी, आतंकवाद और तुष्टीकरण से जुड़े सवालों पर भी सपाट जवाब देना होगा। इतना तो वह समझ ही गई होगी कि छठे वेतन आयोग की सिफारिशों, सच्चर रिपोर्ट पर अमल और किसानों के कर्ज माफ करने जैसे कदमों को भी वह कम से कम कर्नाटक में तो वोटों में नहीं बदल पाई। आगे अगर जीत हासिल करनी है तो यह कला भी सीखनी होगी।
(26 मई, 2008)

भाजपा की उपलब्धि- दैनिक जागरण

कर्नाटक में भाजपा का अपने बलबूते सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचना इस दल की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। कर्नाटक की जीत ने भाजपा की केंद्र में फिर से पहुंचने की दावेदारी को पुख्ता करने के साथ यह भी संकेत दे दिया है कि वह दक्षिण के अन्य राज्यों में अपनी जड़ें जमा सकती है। महत्वपूर्ण यह है कि कर्नाटक फतह के साथ भाजपा से उत्तर भारत की पार्टी होने का ठप्पा भी हट गया है। कर्नाटक की जीत के बाद भाजपा के इस दावे से असहमत होने का कोई कारण नहीं कि उसने जनाधार बढ़ाने के साथ अपना भौगोलिक विस्तार भी किया है, लेकिन उसे एक और राज्य में जीत का जश्न मनाते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि वह एक समय के अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में रसातल पर पहुंच गई है। उत्तर प्रदेश वह राज्य है जो केंद्र में सरकार गठन में निर्णायक भूमिका निभाता है। भाजपा के लिए यह भी चिंता का विषय बनना चाहिए कि लोकसभा चुनाव के पूर्व जिन राज्यों में विधाानसभा चुनाव होने हैं वहां उसके आसार अच्छे नजर नहीं आते-खासकर राजस्थान और मधय प्रदेश में। यह ठीक है कि भाजपा अब 11 राज्यों में सत्ता में होगी, लेकिन बात तो तब बनेगी जब यह संख्या घटने न पाए। यदि भाजपा को केंद्र की सत्ता में वापसी करनी है तो उसे अपने कुछ मजबूत और भरोसेमंद सहयोगी भी चुनने होंगे। अभी तो उसके पास कुल जमा चार क्षेत्रीय दल ही ऐसे हैं जो केंद्र में उसकी वापसी में सहायक बन सकते हैं। कर्नाटक में सत्ता से वंचित रही कांग्रेस यह दावा कर रही है कि इस राज्य के चुनाव नतीजों का केंद्रीय सत्ता पर असर नहीं पडेग़ा, लेकिन कुल मिलाकर यह एक कमजोर दावा होगा। हां, कांग्रेस इस पर संतोष व्यक्त कर सकती है कि उसका वोट प्रतिशत भी बढ़ा और सीटें भी। कांग्रेस कर्नाटक में और अच्छा प्रदर्शन कर सकती थी, यदि उसने चुनाव के ठीक पहले महाराष्ट्र के राज्यपाल एसएम कृष्णा को अपनी राज्य इकाई पर नहीं थोपा होता। कांग्रेस ने कृष्णा को चुनाव जिताऊ और बड़े नेता के रूप में तो पेश किया, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री का दावेदार बताने में संकोच बरता। इसके दुष्परिणाम सामने आने ही थे। कांग्रेस कर्नाटक के चुनाव नतीजों में महंगाई के असर को कम करके आंकने का जो प्रयास कर रही है वह उसकी भूल ही है। कर्नाटक में जनता दल (सेकुलर) की करारी हार पर सारे देश को प्रसन्न होना चाहिए। उसे 28 तो क्या 2 सीटें भी नहीं मिलनी चाहिए थी। जनता दल (सेकुलर) ने पिछले कुछ वर्षों में जैसी राजनीति का परिचय दिया है वह सिर्फ और सिर्फ अनैतिकता एवं अवसरवाद का पर्यायवाची ही थी। देश की राजनीति में ऐसे अनैतिकतावादी राजनीतिक दलों के लिए कहीं कोई जगह नहीं होनी चाहिए-भले ही वे अपने सीने पर पंथनिरपेक्षता का बिल्ला लगाए घूमते हों। जनता दल (सेकुलर) पंथनिरपेक्ष ताकत के रूप में कुल मिलाकर पंथनिरपेक्षता के नाम पर एक धाब्बा है। विडंबना यह है कि देश में ऐसे अनेक राजनीतिक दल हैं जो पंथनिरपेक्षता की दुहाई देकर भ्रष्ट, जातिवादी और अवसरवादी राजनीति का परिचय दे रहे हैं। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि ऐसे दलों को कांग्रेस अपने गले लगाने के लिए उतावली रहती है। यह तो समझ में आता है कि ऐसे दलों को गले लगाने का उतावलापन वाम दल दिखाएं, लेकिन कांग्रेस सरीखे राष्ट्रीय दल को ऐसा करना शोभा नहीं देता।
(26 मई 2008)

कर्नाटक का जनादेश- दैनिक भास्कर

कर्नाटक में भाजपा की शानदार विजय को सभी समाचार पत्रों ने संपादकीय टिप्पणी में ऐतिहासिक और दूरगामी संदेश देने वाला बताया है। प्रस्तुत है संपादकीय टिप्पणी के प्रमुख अंश-

कर्नाटक का जनादेश


कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों से जितना संतोष राज्य के पैंसठ वर्षीय भाजपा नेता वीएस येदीयुरप्पा को हुआ होगा उतना शायद उनकी पार्टी को भी न हुआ हो। गंभीर व धार्मिक स्वभाव वाले येदीयुरप्पा के लिए यह प्राकृतिक न्याय से कम नहीं कि पिछले साल उनके साथ हुए राजनीतिक हादसे का उन्हें यह प्रतिसाद मिला। अब वे न केवल एक बहुमत वाली सरकार का प्रतिनिधित्व करेंगे, बल्कि दक्षिण भारत में अपनी पार्टी का परचम लहराने वाले पहले मुख्यमंत्री भी होंगे। कर्नाटक में जनता ने जो जनादेश दिया है, उससे यह तो साफ ही है कि विश्वासघात जैसा भावनात्मक मुद्दा अभी भी बहुत मायने रखता है। साथ ही, भाजपा के ऊपर चस्पा सांप्रदायिकता का ठप्पा अब शायद अपना मतलब खोता जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा की यह जीत जहां एक ओर लोगों में इस पार्टी के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन है, वहीं राज्य में एक लंबे समय से वर्चस्व बनाए हुए जनता दल(एस) की मौकापरस्त राजनीति को नकारने का एक संदेश भी है। राज्य में पिछले साल की विचित्र राजनीतिक गतिविधियां अभी लोग भूले नहीं हैं। पहले तो जनता दल(एस) और भाजपा के बीच बीस-बीस महीनों तक गठबंधान सरकार चलाने का करार, फिर नवंबर में भाजपा की बारी आने पर जनता दल(एस) द्वारा समर्थन देने से इंकार के पीछे जो भी कारण रहे हों, पर उस निर्णय का राजनीतिक खामियाजा जनता दल(एस) के मुखिया देवेगौड़ा को महंगा पड़ा। इस घटनाक्रम में येदीयुरप्पा राज्य के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बने तो सही पर केवल एक सप्ताह के लिए और उनका यह कार्यकाल एक उपलब्‍धियों से ज्यादा हास्यास्पद बनकर रह गया और इसी के साथ जनता दल(एस) का विश्वासघात और गठबंधन धर्म का पालन न करना ही भाजपा के चुनाव प्रचार का प्रमुख मुद्दा बना।


आज जब लोगों ने अपना निर्णय दे दिया है, तो देखना यह है कि इन नतीजों का व्यापक अर्थ क्या है? जहां एक ओर वामदलों ने इन्हें यूपीए पर हमला बोलने के एक और मौके के तौर पर इस्तेमाल किया है, वहीं राज्य कांग्रेस के नेता एस एम कृष्णा ने बड़ी साफगोई से इसे अपनी और पार्टी में सबकी जिम्मेदारी के तौर पर स्वीकार किया है। उन्हें महाराष्ट्र के राज्यपाल के पद से हटाकर बड़ी उम्मीदों के साथ राज्य कांग्रेस की चुनाव प्रचार नीति को नेतृत्व देने के लिए बुलाया गया था। अगले कुछ दिनों में जब येदीयुरप्पा अपना पद संभालेंगे, तब उनके अनुशासन पसंद स्वभाव की परीक्षा होना तय है। उनकी सरकार से कर्नाटक के लोगों को काफी उम्मीदें हैं। भावनात्मक समर्थन की चमक से जल्दी ही निकलकर उन्हें इन सबसे जूझना होगा।
(दैनिक भास्कर 26 मई 2008)

दक्षिण में खिला कमल



दक्षिण भारत में पहली बार कमल खिला है। कर्नाटक की 224 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा को 110 सीटें मिली हैं जो बहुमत से मात्र तीन कम है। कांग्रेस को 80 सीटों से ही संतोष करना पड़ा। कर्नाटक पहला ऐसा राज्य है जहां नए परिसीमन के हिसाब से चुनाव हुए है। पिछले साल कर्नाटक के सबसे कम समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले 66 वर्षीय बीएस येदियुरप्पा को भाजपा ने पहले ही मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश किया था। भाजपा 2004 के चुनावों में भी सबसे बड़ी पार्टी थी। तब उसे 79 सीटें मिली थी जबकि कांग्रेस की झोली में 65 सीटें आई थीं। इस बार कई दिग्गज धाराशायी हो गए जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री एन धारम सिंह, आरवी देशपांडे, एच के पाटिल और अभिनेता अंबरीष शामिल हैं। साथ ही बसपा, सपा, जदयू और स्थानीय कन्नड़ चलवली पार्टी को भी निराश होना पड़ा। इनकी झोली खाली ही रही। अन्य के खाते में गई छह सीटों में से एक माकपा को मिली है। येदियुरप्पा ने शिकारीपुरा सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री एस बंगरप्पा को 45 हजार 227 वोटों से हरा कर इतिहास रचा। इस सीट पर कांग्रेस और जदएस ने भाजपा नेता की पराजय सुनिश्चित करने के लिए उम्मीदवार नहीं उतारा था। दक्षिण कर्नाटक के कुछ इलाकों को छोड़ दिया जाए तो भाजपा ने सभी जगहों पर बेहतरीन प्रदर्शन किया है। भाजपा के साथ विश्वासघात करने वाली जनता दल (सेक्युलर) सिर्फ 28 सीटों पर सिमट गई है। उसे 2004 में 58 सीटें मिली थीं। इससे जेडीएस का राजनीतिक भविष्य खत्म हो गया है।


कर्नाटक में भाजपा की जीत
अनुपम............. अतुलनीय.............. ऐतिहासिक



अटल बिहारी वाजपेयी

वरिष्ठ भाजपा नेता व पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कर्नाटक में भाजपा की जीत को ऐतिहासिक बताया। वरिष्ठ पार्टी नेताओं ने उनके निवास जाकर श्री वाजपेयी का मुंह मीठा कराया और उनसे आशीर्वाद लिया। इस मौके पर अटलजी ने आशा व्यक्त की कि लोकप्रिय नेता श्री बी.एस. येदियुरप्पा जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेंगे और जनता से किए गए वायदों को पूरा करने के लिए सार्थक प्रयास करेंगे।


लालकृष्ण आडवाणी
मुझे इस बारे में जरा भी संशय नहीं है कि कर्नाटक में भाजपा की विजय एक परिवर्तनकारी मोड़ साबित होगी जिससे 1989 में भाजपा को प्राप्त सफलता की तुलना में उसकी संसदीय सीटों में बहुत अधिक वृध्दि करेगी। आपको स्मरण होगा कि 1989 में भाजपा ने लोकसभा चुनावों में 86 सीटें जीती थी जबकि 1984 में यह संख्या केवल दो थी। इसके बाद भाजपा का विजय-मार्च रूका नहीं और 1998 में भाजपा-नीत राजग सरकार बनी। इससे केन्द्र में कांग्रेस का एक पार्टी का प्रभुत्व भी समाप्त हो गया और भारत की राजनैतिक व्यवस्था को द्वि-ध्रुवीय प्रणाली में बदल दिया।
लगभग 20 वर्ष बाद, एक और नया मोड़ आया जब भाजपा ने कांग्रेस के एक छत्र राज्य को चुनौती दी। इससे पहले, भाजपा ने उत्तारी तथा पश्चिमी राज्यों में सरकारें बनाने में सफलता प्राप्त की, फिर पूर्व के राज्यों में उड़ीसा तथा बिहार में सरकारें बनाई और अब पहली बार किसी दक्षिणी राज्य में सरकार बनाने में सफल हो रही है। भाजपा का यह भौगोलिक विस्तार तथा साथ ही साथ लगभग पूरे देश में कांग्रेस पार्टी का सिकुड़ता आधार बता रहा है कि अगले संसदीय चुनावों में क्या कुछ होने वाला है।



राजनाथ सिंह
कर्नाटक में भाजपा की ऐतिहासिक जीत पर पार्टी अध्‍यक्ष्‍ राजनाथ सिंह ने कहा है कि कर्नाटक विजय के बाद अब भाजपा पूरे देश की पार्टी बन गई है और उसकी पहुंच देश के स भी हिस्सों तक हो गई है।
श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि इन नतीजों ने भाजपा को आगामी लोकसभा चुनावी दौड़ में सबसे आगे कर दिया है। आजादी के बाद पहला मौका है जब किसी राजनीतिक दल का कद कांग्रेस से भी बड़ा हो गया है। यह उपलब्धि सिर्फ भाजपा ने हासिल की है।



वेंकैया नायडू
कनार्टक में भाजपा की विजय से पार्टी का चिर-प्रतीक्षित सपना पूरा हुआ है। जनसंघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम का ही यह परिणाम है। भाजपा दिनोंदिन आगे बढ़ रही है। वहीं कांग्रेस तेजी से अपना जनाधार खो रही है। इस ऐतिहासिक जीत से राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊँचा हुआ है।



अरूण जेटली
भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री व कर्नाटक प्रदेश प्रभारी श्री अरूण जेटली ने कहा कि यह परिणाम भाजपा के लिए सकारात्मक हैं और कांग्रेस व जद एस की अवसरवादी राजनीति के खिलाफ नकारात्मक वोट। उन्होंने कहा कि लाखों कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के कड़े मेहनत के फलस्वरूप भाजपा को यह महत्वपूर्ण विजय प्राप्त हो सकी है।



सुषमा स्वराज
वरिष्ठ भाजपा नेता एवं राज्यसभा में भाजपा की उपनेता श्रीमती सुषमा स्वराज ने कहा कि कर्नाटक के नतीजों ने कांग्रेस का मनोबल धाराशायी कर दिया है। कर्नाटक चुनाव के नतीजों से लगता है कि आगे आने वाले मधय प्रदेश, राजस्थान व छत्ताीसगढ़ के चुनावों में भी हम गुजरात की तरह सत्ता विरोधी लहर को उलटने में कामयाब होंगे।



अनंत कुमार
भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री श्री अनंत कुमार ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत को भाजपा कार्यकर्ताओं की वर्षों से कड़ी मेहनत का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि यह भाजपा की जीत तो है ही, लेकिन उससे कहीं अधिक कांग्रेस की हार है।



बी. एस. येदियुरप्पा
श्री येदियुरप्पा ने कहा, यह ऐतिहासिक जीत है। हम खुश हैं कि लोगों ने भाजपा और मुझमें विश्वास जताया है। दक्षिण में सरकार बनाने का अटल जी और आडवाणी जी का सपना आज सच हुआ है। श्री येदियुरप्पा ने कहा कि वे धर्मनिरपेक्ष सरकार देंगे।

Saturday 10 May 2008

प्रथम नहीं था 1857 का स्वाधीनता संग्राम


-शिवकुमार गोयल


सन् 1857 ई. के स्वातन्त्र्य समर की 150वीं जयन्ती देश भर में मनाई जा रही है। अंग्रेजों के विरुध्द स्‍वधर्म एवं स्वराज्य के लिए यह सबसे बड़ा सुनियोजित संघर्ष था, इसमें कोई शक नहीं है। परन्तु इसे भारत का 'प्रथम' स्वातन्त्र्य समर कहना एक प्रकार से उन सभी संघर्षों को नकारने जैसा होगा, जो स्वतंत्रता के लिए लड़े गए थे। हमारे योध्दाओं ने सिकन्दर, मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनवी, मोहम्मद गोरी, इब्राहीम लोदी, बाबर जैसे आक्रमणकारियों से संघर्ष किए थे। चन्द्रगुप्त-चाणक्य, शकारि विक्रमादित्य, पृथ्वीराज चौहान, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविन्दसिंह, बन्दा बैरागी, छत्रसाल, कृष्णदेवराय आदि असंख्य वीरों के स्‍वाधीनता संग्राम को क्या हमारे इतिहास के स्वतंत्रता संग्राम में स्थान नहीं मिलना चाहिए? जिस किसी ने अपने देश से बाहरी शत्रु को हटाने के लिए संघर्ष किया, वह स्वाभाविक ही हमारे स्वातन्त्र्य संग्राम का हिस्सा है।

हिन्दुस्थान पर पहला आक्रमण ई. पूर्व 326 में ग्रीक सेना के साथ सिकन्दर ने किया और पोरस को पराजित कर यहां अपना राज जमा लिया। किन्तु कुछ ही समय में वविभिन्‍न हिन्दू सम्राटों की कड़ी टक्कर से घबरा कर वह लहूलुहान होकर अपने देश लौट गया। सिकन्दर के सेनापति सेल्युकस ने भी ई. पूर्व 305 में पंजाब पर आक्रमण कर अपना राज्य जमा लिया। सम्राट चन्द्रगुप्त ने आचार्य चाणक्य की कूटनीति के बल पर सेल्युकस पर आक्रमण कर उसे आत्मसमर्पण को बाधय करके पूरे प्रदेश को स्‍वाधीनता कराया। सेल्युकस को अपनी पुत्री का विवाह भी चन्द्रगुप्त से करना पड़ा।

शकों का आक्रमण एवं पराभव
आगे चलकर शकों ने भारत पर आक्रमण कर काफी बड़े भू-भाग को अपने कब्जे में ले लिया पर इनके विरुध्द भी भारतीय वीरों की तलवार उठी एवं दक्षिण भारत के हिन्दू सम्राटों ने उनसे जमकर टक्कर ली। गौतमी पुत्र शतकर्णी, पुलगामी शालिवाहन ने अपने शौर्य का सिक्का जमाया। कनिष्ट ने मालवा, गुजरात, सौराष्ट्र और सिन्‍धु-क्षेत्रों को शकों से मुक्ति दिलाई। समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शक-यूचियों की सत्ता को पूरी तरह धवस्त करने में सफलता प्राप्त की।

सन् 500 ई. के लगभग हूणों ने गांधाार देश पर आक्रमण कर कब्जा जमाया। सम्राट कुमारगुप्त के पुत्र स्कन्दगुप्त ने हूणों पर आक्रमण कर उन्हें हराया। अन्त में प्रतापी सेनापति यशोवर्धान ने हूणों को खदेड़ते हुए मुल्तान के पास कोरूर के निकट युध्द में उनकी सेना को पराजित किया था।


मोहम्मद बिन कासिम से संघर्ष
ईस्वीं 711 में अरब के सेनापति मोहम्मद बिन कासिम ने 50 हजार की सेना के साथ सिंध प्रान्त पर हमला करके देवल नामक बन्दरगाह को कब्जे में कर लिया। सिन्धा के राजा दाहिर ने कड़ा मुकाबला किया पर कुछ मुस्लिम सैनिकों की गद्दारी के कारण कासिम की सेना जीत गई- दाहिर ने संघर्ष करते हुए बलिदान दिया। कासिम को बाद में निरन्तर चुनौतियां मिलीं एवं अन्त में चित्तौड़ के महापराक्रमी बप्पा रावल के नेतृत्व में राजपूत वीरों ने सिन्धा पर विजय प्राप्त कर उसे कासिम के चंगुल से मुक्त कराया।

ईस्वीं सन् 1001 में दुर्दान्त मजहबी उन्मादी मोहम्मद गजनवी हिन्दुस्थान को जीतकर उसे 'दारूल इस्लाम' बनाने का सपना लेकर आया। सम्राट जयपाल ने पंजाब पर आक्रमण के दौरान उससे डटकर संघर्ष किया पर पराजित हुए एवं आत्मोत्सर्ग करना पड़ा। जयपाल का पुत्र अनंगपाल भी स्‍वाधीनता हेतु निरन्तर संघर्षरत रहा। महमूद ने थानेश्वर तथा मथुरा पर आक्रमण कर अपार धन-सम्पदा लूटी और फिर लौट गया। पुन: 1026 ई. में सोमनाथ पर आक्रमण किया एवं शिवलिंग को तोड़कर अपार सम्पदा लूट कर ले गया। इस काल में चप्पे-चप्पे पर संघर्ष हुआ।

गजनी के बाद गोरी 1191 ई. में गोरी ने दूसरी बार आक्रमण किया। पहले गुजरात आक्रमण में उसे जान बचाकर भागना पड़ा था। पानीपत के तलावड़ी स्थान पर पृथ्वीराज चौहान से उसे जबरदस्त शिकस्त मिली। गोरी पकड़ा गया पर पृथ्वीराज ने उसे दया कर छोड़ दिया एवं अपने देश लौट जाने दिया। अन्त में 1193 ई. में थानेश्वर में हुए युध्द में पृथ्वीराज पराजित हुए एवं बन्दी बनाकर ले जाए गए। उनकी आंखें फोड़ दी गईं पर चन्द्रबरदाई की चतुराई से वह तीर के करिश्मे के बहाने शब्दबेदी बाण से गोरी को मारने में सफल हुआ।

इसके बाद चौदहवीं सदी के आरम्भ में सुल्तान कुतुबुद्दीन, अलाउद्दीन खिलजी फिर मोहम्मद बिन तुगलक एवं फिरोजशाह तुगलक ने उत्पात मचाया। तुगलक की 1388 ई. में मृत्यु के बाद समरकन्द का कुख्यात तैमूरलंग हिन्दुस्थान पर चढ़ आया। राणा कुंभा एवं राणा सांगा ने इन मुस्लिम आक्रान्ताओं के विरुध्द लगातार संघर्ष जारी रखा। इसके बाद इब्राहिम लोदी के साथ भी लम्बा संघर्ष चला।

तुर्क बाबर एवं उसके वंशज
तुर्क रक्त के बाबर ने, जो उस समय अफगानिस्तान का शासक था, लाहौर के सूबेदार दौलतखान के निमंत्रण पर राणा सांगा का दमन करने हेतु हिन्दुस्थान में 1526 में प्रवेश किया। पानीपत में हुई लड़ाई में राणा सांगा एवं इब्राहीम लोदी दोनों की संयुक्त फौज एक साथ थी परन्तु लोदी मारा गया एवं राणा सांगा को भी चित्तौड़ लौट जाना पड़ा।


1530 में बाबर की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र हुमायूं बादशाह बना। हुमायूं का 1556 ई. में अचानक इंतकाल हो गया। उसका पुत्र अकबर 13 वर्ष की उम्र में ही उसका उत्‍तराधिकारी बना। उसके राज्य का संचालन उसका सम्बंधाी एवं मुख्य वजीर बैरहाम खां करता था। पानीपत के पास बैरहाम खां एवं हेमू की सेनाओं की बीच युध्द हुआ। हेमू जीत रहा था पर अचानक उसकी आंख में तीर लगा और वह घायल होकर हाथी से गिर गया। हिन्दू सेना में खलबली मच गई। घायल हेमू का बैरहाम खां ने सिर काट लिया एवं हिन्दुओं की जीत हार में बदल गई। अकबर का आगे विरोधा जारी रहा पर वह मेवाड़ को छोड़कर अन्य राजपूत राजाओं को दबाने या अपने साथ मिलाने में सफल रहा।

अकबर के बाद जहांगीर, फिर औरंगजेब के साथ हिन्दुओं का संघर्ष सर्वविदित है। गुरु तेगबहादुर एवं भाई मतिदास के बलिदान इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं।


गुरु गोविन्दसिंह जी ने मुगलों के बढ़ते अत्याचारों को रोकने हेतु 'खालसा पंथ' की स्थापना की। उनके चारों पुत्रों का बलिदान हुआ, वे भी आजीवन संघर्षरत रहे। अद्भुत कहानी है इन बलिदानियों की और इसी के बल पर आज हिन्दू समाज जीवित है वरना इस्लाम की आंधी कितने देशों एवं कितने समाजों को निगल गई। इनके संघर्षों को यदि हम स्वतंत्रता संघर्ष नहीं कहेंगे तो किसे कहेंगे?

विजयनगर का हिन्दू साम्राज्य
दक्षिण भारत के विजयनगर के पराक्रमी राजा कृष्णदेवराय (1509 से 1537) ने विदेशी-विधार्मी आक्रमणकारियों से अपने देश की पावन भूमि को मुक्त कराने के लिए सतत संघर्ष किया। बीजापुर के आदिलशाह के साथ हुए युध्द में उसने मुस्लिम सेना को कड़ी मात दी। राजा कृष्णदेवराय प्रबल पराक्रमी के साथ-साथ हिन्दू धार्माभिमानी तथा आदर्श शासक थे। 1537 में महाराज कृष्णदेवराय का देहान्त हुआ। उनके बाद आगे चलकर विजयनगर राज्य का शासन राजा रामराय के हाथों में आया। राजा रामराय ने भी सन् 1554 में अहमदनगर के निजाम शाह तथा गोलकुंडा के कुतुबशाह की प्रार्थना पर उनके शत्रु बीजापुर के आदिलशाह पर आक्रमण कर मुसलमान सेना के छक्के छुड़ाये।

सन् 1739 में नादिरशाह अटक पार करके दिल्ली तक जा पहुंचा। पूर्ववर्ती मुस्लिम बादशाहों की तरह नादिरशाह ने हिंदुओं की हत्याएं एवं, लूटमार कराई। मराठा सरदार बाजीराव ने सेना को बलशाली बनाया तथा घोषणा भी की कि दिल्ली के तख्त पर किसी भी विदेशी-विधार्मी के वर्चस्व को सहन नहीं किया जाएगा। मराठा सेना की शक्ति का पता चलते ही नादिरशाह को दिल्ली का तख्त छोड़कर भागने को विवश होना पड़ा था।

अहमदशाह अब्दाली ने सन् 1749 में हिन्दुस्थान पर दूसरा आक्रमण किया। इधार वीर मराठों के तत्कालीन पेशवा नाना साहब ने मल्हारराव होल्कर और जयाजीराव सिन्धिाया को पठानों के सपने चकनाचूर करने का आदेश दिया। 20 मार्च, 1751 को यमुना पार कर उत्तर प्रदेश के कादरगंज में पठान-रूहेलों की सेना पर मराठों ने आक्रमण कर उन्हें पराजित कर भागने को विवश कर दिया।

1757 में पुन: नाना साहब पेशवा ने अपने भाई रघुनाथ राव पेशवा के नेतृत्व में मल्हारराव होल्कर को विशाल सेना के साथ अब्दाली की क्रूर व विधवंसक सेना से टक्कर लेने भेजा। मराठों के इस सतत संघर्ष अभियान ने अब्दाली क सपने चकनाचूर कर डाले। अन्त में उसे काबुल भागने को विवश होना पड़ा।


सन् 1627 में जन्मे शिवाजी महाराज ने क्रूरतम व उन्मादी औरंगजेब को अपने युध्दकौशल तथा छापामार कार्यवाही से नाकों चने चबाने में सफलता प्राप्त की थी। छत्रपति शिवाजी ने मुस्लिम सुल्तानों से दक्षिण के अनेक दुर्ग जीते। छत्रपति शिवाजी तथा अनेक मराठा राष्ट्रभक्तों ने विदेशी-विधर्मीमुसलमानों से हिन्दुस्थान की भूमि को मुक्त कराने के लिए जो संघर्ष किए वे 'भारतीय स्‍वाधीनता संग्राम' के इतिहास के स्‍वर्णिम पृष्ठ हैं। वीर छत्रसाल, महाराणा रणजीत सिंह तथा ऐसे असंख्य अग्रणी राष्ट्रभक्त हमारे देश के दो हजार वर्ष से अधिक के स्‍वाधीनता संग्राम के अप्रतिम राष्ट्रनायक हैं, जिन्हें कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता। 1857 की 150वीं जयंती पर इन सभी वीरों को नमन!