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Saturday, 4 August, 2007

मीडिया का रीतापन और अधीशजी : आशुतोष


गत 5 जुलाई को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री अधीश कुमार का संघ कार्यालय केशव कुंज झण्डेवालान दिल्ली में निधन हो गया।

17 अगस्त, 1955 को आगरा में जन्मे श्री अधीश जी बचपन से ही प्रखर प्रतिभाशाली थे। उन्होंने अपनी पढ़ाई आगरा में की। वे एम.एससी, एल.एलबी थे। पहले वे सर्वोदयी रहे। आर्य समाज में भी उन्होंने काफी कार्य किया। विद्यार्थी जीवन में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रमुख कार्यकर्ता रहे। आपातकाल में उन्होंने जे पी आन्दोलन में भी प्रमुख रूप से हिस्सा लिया। इस कठिन काल में श्री अधीश जी 'लोक संघर्ष' पत्रिका का प्रकाशन करते रहे जिससे लोकतंत्र की रक्षा हुई। आपातकाल में आगरा में पोस्टर चिपकाते हुए पकड़े गए तथा पुलिस ने उन पर बेलन चलाया। ताजमहल में मून लाईट में वे पर्चे बाँटते थे। लालकिला में विदेशी बनकर घुसे और आपातकाल के विरोध में पर्चे बाँटे ।

1982 में वे मेरठ में वे श्री लज्जाराम तोमर की प्रेरणा से संघ के प्रचारक बने। वे सहारनपुर के विभाग प्रचारक, प्रान्त के सह बौध्दिक प्रमुख रहे। 1996 में क्षेत्र प्रचार प्रमुख बनकर लखनऊ आए तथा यहाँ विश्व संवाद केन्द्र की गतिविधियों को नए नए आयाम प्रदान किये ।

श्री अधीश जी अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख तथा तीन वर्ष पूर्व अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख बने। उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारत तिब्बत सहयोग मंच, प्रचार विभाग, प्रकाशन आदि का भी मार्गदर्शन किया। आपने राष्ट्रीय महत्व के कई विषयों पर पुस्तकें भी लिखीं जो काफी लोकप्रिय हुई।

पुस्तक संग्रह तथा पढ़ने की गहन अभिरूचि वाले श्री अधीश जी का विविध विषयों पर गहन अध्ययन था। राष्ट्र हित तथा राष्ट्रीय समस्याओं पर वे अपनी धारा प्रवाह वक्तृता से श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर लेते थे। अपने अत्यन्त सरल सादगी पूर्ण जीवन तथा आत्मीयता पूर्ण व्यवहार से उन्होंने संघ के बहुत से कार्यकर्ता निर्माण किये। वे कुशल संगठनकर्ता भी थे।

अधीशजी के निधन के समाचार से सारे देश में उनके परिचितों को गहरा आघात लगा है लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अनगिन पत्रकारों के प्रेरणा पुंज रहे अधीशजी के जाने से देश का मीडिया प्राय: बेखबर है। प्रस्तुत है हिन्दुस्थान समाचार से जुड़े श्री आशुतोष का एक विचारशील आलेख-


मीडिया की भी कोई देह होती है क्या? क्या उसके भी अधिकार, कर्त्तव्य और धर्म होते हैं? क्या मानव देह की भांति ही इसकी भाषा, भाव और संवेदनाएं होती हैं? क्या उसके भी मेरूदंड, हृदय, मस्तिष्क होता है? क्या उसके रक्त में भी प्राणवायु संचरण करती है? क्या प्राणवायु कम होने से वह भी अस्वस्थ हाती है, बाहर से पहले जैसी किंतु भीतर से खोखली हो जाती है? उत्तर यदि हां में है तो मीडिया के साथ यह हुआ है।

मीडिया की देह आज भी वैसी ही दिखाई दे रही है जैसी 5 जुलाई से पूर्व थी, किंतु खो गया है प्राणवायु जैसा महत्वपूर्ण तत्व जिसका नाम 'अधीश' था। विडंबना है कि देशभर में सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों पत्रकारों के प्रेरणा पुंज रहे अधीश जी के जाने से देश का मीडिया प्राय: बेखबर है। सच तो यह है कि मीडिया यह महसूस भी नहीं कर पा रहा है उसने क्या खोया है।

यदि आलीशान दफ्तरों में बैठकर बुध्दि विलास और मोटे पैकेज पत्रकारिता में वरिष्ठता के मानदंड हैं तो अधीश जी पत्रकार थे ही नहीं! लेकिन यदि पत्रकारिता वह प्रवृत्ति है जो आजादी से पहले तिलक, गांधी और सावरकर में दिखती थी तो अधीश जी का नाम नि:संदेह इस श्रृंखला की आजादी के बाद की कड़ी में है।

1975 में इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपे गए आपात्काल का सबसे पहला शिकार मीडिया ही हुआ था। सभी स्वाभिमानी पत्रकार जेल में थे । जो पत्रकार-संपादक जेल से बाहर थे उनके विषय में श्री आडवाणी की उक्ति प्रसिध्द है-उन्हें झुकने के लिए कहा गया था लेकिन उन्होंने रेंगना शुरू कर दिया। ऐसे रीढ़विहीन रेंगते हुए कलम चलाने वाले मजदूरों को देख उपजी वितृष्णा ने विश्वविद्यालय के छात्र अधीश को पत्रकार बना दिया।

तानाशाही को चुनौती देती तीखी धारदार शब्दावली में आपात्काल की आड़ में नागरिकों पर हो रहे अत्याचार की घटनाओं के विवरण, जो मुख्यधारा के समाचार पत्र छापने से डरते थे, जनता तक पहुंचाने का बीड़ा अधीश जी ने उठाया। आगरा नगर से कुछ किलोमीटर बाहर स्थित रुनकता और कैलाश के जंगलों में साइकल के कैरियर पर लगी छोटी साइक्लोस्टाइल मशीन बनी 'लोक संघर्ष' नाम के भूमिगत समाचार पत्र का छापाखाना। पुलिस की नजर बचाकर समाचार पत्र छापना और रात में उन्हें लोगों के घरों तक पहुंचाना, यह क्रम लगातार चलता रहा।
लोक संघर्ष की प्रतियों की संख्या यद्यपि सैकड़ों में थी लेकिन उसके पाठकों की संख्या असीमित । एक-एक प्रति को दर्जनों लोग मांग-मांग कर पढ़ते थे। पुलिस के बर्बर अत्याचारों के लोमहर्षक वर्णन और तात्कालिक परिस्थितयों पर आग उगलती टिप्पणियों ने न केवल पीड़ित परिवारों अपितु जनसामान्य को भी क्षोभ से भर दिया। दूसरी ओर पुलिस इसका प्रकाशन न रोक पाने से बौखलाई हुई थी। हद तब हो गई जब भारी सुरक्षा को धता बताते हुए भारत सरकार के निमंत्रण पर आये विदेशी प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों तक भी 'लोक संघर्ष'की प्रतियां पहुंच गई और पुलिस सिर धुनती रह गई। यह सिलसिला तभी रूका जब 13 दिसंबर 1976 को आधी रात में वे आपातकाल के विरूध्द पोस्टर लगाते पकड़े गये। उनके साथ वे अमानुषिक अत्याचार किये जिन्हें सुनकर भी सिहरन हो उठती है। पुलिस ने उन्हें मृत प्राय: स्थिति में जेल भेज दिया। तब वे मृत्यु से संघर्ष में विजयी हुए क्योंकि उन्हें बहुत कुछ करना बाकी था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जीवनव्रती प्रचारक के रूप में कार्य करते हुए भी निर्भीक पत्रकारिता की वह प्रवृत्ति चुकी नहीं, केवल रूपांतरित हुई। इसका प्रकटीकरण हुआ विश्व संवाद केन्द्रों की स्थापना के रूप में जहां से मीडिया जगत में पत्रकारिता की राष्ट्रवादी धारा के पत्रकारों की एक पूरी श्रृंखला विकसित हुई।

अधीशजी के लेखन में भाषा के संस्कार, तथ्यों की शुध्दता, सूक्ष्म विश्लेषण, प्रवाहपूर्ण प्रस्तुतीकरण और विषयों का वैभिन्य पाठक पर अपनी अलग छाप छोड़ता था। दर्जनों पुस्तकों का लेखन, संपादन, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजारों लेखों के प्रकाशन के बावजूद मीडिया के लिए वे गुमनाम ही बने रहे ।

छोटे नगरों और कस्बों से निकलने वाले समाचार पत्रों को स्तरीय सामग्री के अभाव से जूझते हुए उन्होंने देखा। अच्छी सामग्री छापने का उपदेश देने के बजाय उन्होंने स्वयं के प्रयासों से ऐसे समाचार पत्र-पत्रिकाओं को साप्ताहिक रूप से देश-विदेश के महत्वपूर्ण समाचार एवं जाने-माने स्तंभकारों के लेख उपलब्ध कराने प्रारंभ कर दिए। पत्र-पत्रिकाओं को यह सामग्री साप्ताहिक आधार पर नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाती थी। इस योजना से नियमित लाभान्वित होने वाले समाचार पत्र-पत्रिकाओं की संख्या छ: सौ से भी अधिक है। देश भर में हजारों युवा और नवोदित पत्रकारों को अधीश जी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।

52 वर्ष से भी कम आयु में पत्रकारिता को इतना बड़ा योगदान देने वाले मौन साधक के अवसान पर यदि देश का मीडिया जगत बेखबर बना रहा तो यह अधीश जी के अनामिक स्वभाव के अनुरूप ही है, परंतु मीडिया की देह यदि अपने आपको कहीं रीता महसूस कर रही है तो कारण है अधीश जी की गैर मौजूदगी ।

यह समय है मीडिया द्वारा अधीश जी के प्रति मन:पूर्वक कृतज्ञता ज्ञापन का, उनके अवदान को स्मरण करने का, उनकी रचनाओं के पुन: अवगाहन का। साथ ही यह विश्वास करने का कि उनके जाने से भी मीडिया में आया रीतापन बहुत देर तक रहेगा नहीं, उनसे प्रेरणा पाये पत्रकारों की नयी पीढ़ी प्राणवायु के नये झोंके के समान उस रिक्तता को दूर कर देगी। नहीं दूर हो सकेगी तो उनकी स्मृतियां। बहुत याद आएंगी उनकी चुटकियां, उनके तर्क, उनके अट्टहास। हमेशा !

4 comments:

Suresh Chiplunkar said...

आपने बिलकुल सही लिखा है, अधीश जी जैसे कई अनाम लेकिन महान लोग संघ ने दिये हैं जिनकी कोई चर्चा नहीं होती, ये साधक लोग हैं, जो आजीवन सिर्फ़ देते ही रहते हैं... मैंने आपके कम्युनिज्म वाले सारे आलेख पढे़, आपने सभी को एक ही जगह संकलित करके बढिया काम किया है

नारद संदेश said...

आशुतोष जी का लेख पढ़ कर पुरानी यादें ताजा हो गई। इस दुनिया में अधीश जी जैसे लोग गिनती के होते हैं।

yaten said...

adhish ji se milna mera teen baar hi hua. pahli baar sikndra rau ke graduation students ke shivir me milna hua. vanha par milne ke baad unhone mujhe agra ke vishwa sanvad kendra me aane ko kaha. lagbhag 5 mahine ke baad jab mein unse mila to unhone mujhe mere naam se bulaya. tab mujhe vahut accha laga. fie patrakarita ko lekar unhone mujhe kafu sare tips diye. last baar mein unse jaipur ke prant pracharak manniya gopal ji ke sath keshav kunj me mila, jab vo mratu sayya par the. ashutosh ji bhi unke sath the.
vastav me humne ek ese jeevat charitra vale patrakar ko kho diya, jiske prerna se hazaron patrkar ne janm liya.

manoj maun said...

MANNIYA ADHISH JI PAR EK VYAKHYANMALA KA AYOJAN LUCKNOW KE ADHISH SABHAGAAR VISHVA SAMVAD KENDRA, SAMVAD NAGAR MEIN DINANK 17/08/2012 KO VISHAY DHARM: BHARTIYA JEEVAN KA AADHAR MEIN KIYA JA RAHA HAI AAP SABHI SADAR AMNTRIT HAI.

MANOJ "MAUN"