Thursday, August 30, 2007

नरेन्द्र मोदी का विकास कार्य प्रशंसनीय हैं-महाश्वेता देवी



पश्चिम बंगाल की प्रसिध्द लेखिका महाश्वेता देवी का मानना है कि बुध्दिजीवियों के बीच वामपंथी मोर्चा जिस प्रकार से अलग-थलग पड़ता जा रहा है, उससे पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में अपने 30 वर्ष के शासन के बाद भी उसने वहां कुछ भी तो नहीं किया है।

नई दिल्ली में आयोजित नौंवे डी.एस. बोर्कर स्मृति व्याख्यान में 'माई विजन ऑफ इण्डिया: 2047 एडी' विषय पर भाषण देते हुए महाश्वेता देवी ने पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार को विकास का कोई भी कार्य न कर पाने के लिए निकम्मा ठहराया और नरेन्द्र मोदी की गुजरात सरकार द्वारा जमीनी स्तर से विकास कार्य को बहुत ऊंचाई तक ले जाने के लिए प्रशंसा की।

उन्होंने कहा कि मैं इस बात से अत्यंत प्रभावित हुई हूं कि गुजरात में कार्य-संस्कृति अत्यंत सुदृढ अवस्था में पहुंच गई है। शहरी और गांव की सड़कें बहुत अच्छी बनी हुई हैं, यहां तक कि दूर-दराज के गांवों तक में भी बिजली और पेयजल उपलब्ध है। मैं विशेष रूप से पंचायतों और स्थानीय स्तर पर बने स्वास्थ्य केन्द्रों में प्राप्त डाक्टरी सुविधाओं से बहुत प्रभावित हुई हूं। यहां की स्थिति पश्चिम बंगाल जैसी नहीं है, जहां अब तक भी गांवों और पंचायती क्षेत्रों में कहीं भी बिजली के दर्शन तक नहीं हो पाते है और सरकार की तथाकथित स्वास्थ्य परिसेवा कहीं दिखाई नहीं पड़ती है। महाश्वेता देवी ने आगे कहा कि पश्चिम बंगाल में 30 वर्षों से सीपीआई(एम) की वामपंथी सरकार का शासन चल रहा है, फिर भी वहां कोई उपलब्धि दिखाई नहीं पड़ती है। उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में भूखमरी से होने वाली मौतें और बाल मृत्यु दर का दौर-दौरा है।

महाश्वेता देवी ने कहा कि मैंने इतिहास, लोक-संगीत और लोक-कहावतों की पुस्तकें पढ़ी है। जरूरत इस बात की है कि गांवों का दौरा किया जाए और ग्रामवासियों से मिला जाए। शायद मैंने इसी प्रकार भारत को जानना शुरू किया। आज 82 वर्ष की आयु में भी नन्दीग्राम का दौरा कर मैं यही कर रही हूं।

Wednesday, August 29, 2007

हिन्दी पत्रकारिता के भविष्य की दिशा

हिन्दी पत्रकारिता के भविष्य की दिशा: डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री


आज जब हम हिन्दी पत्रकारिता की बात करते हैं तो यह जानकर आश्चर्य होता है कि शुरूआती दौर में यह ध्वज उन क्षेत्रों में लहराया गया था जिन्हें आज अहिन्दी भाषी कहा जाता है। कोलकाता का विश्वामित्र ऐसा पहला ध्वज वाहक था। उत्तर प्रदेश, बिहार और उन दिनों के सी.पी. बरार में भी अनेक हिन्दी अखबारों की शुरूआत हुई थी। लाहौर तो हिन्दी अखबारों का एक प्रकार से गढ बन गया था। इसका एक कारण शायद आर्यसमाज का प्रभाव भी रहा होगा। परंतु इन सभी अखबारों का कार्य क्षेत्र सीमित था या तो अपने प्रदेश तक या फिर कुछ जिलों तक। अंग्रेजी में जो अखबार उन दिनों निकलनी शुरू हुई उनको सरकारी इमदाद प्राप्त होती थी। वैसे भी यह अखबारें शासकों की भाषा में निकलती थीं इसलिए इनका रूतबा और रूआब जरूरत से ज्यादा था। चैन्नई का हिन्दू, कोलकाता का स्टेटसमैन मुम्बई का टाईम्स आफ इंडिया, लखनऊ का नेशनल हेराल्ड और पायोनियर, दिल्ली का हिन्दुस्तान टाईम्स और बाद में इंडियन एक्सप्रेस भी। ये सभी अखबार प्रभाव की दृष्टि से तो शायद इतने महत्वपूर्ण नहीं थे परंतु शासको की भाषा में होने के कारण इन अखबारों को राष्ट्रीय प्रेस का रूतबा प्रदान किया गया। जाहिर है यदि अंग्रेजी भाषा के अखबार राष्ट्रीय हैं तो हिन्दी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के अखबार क्षेत्रीय ही कहलाएंगे। प्रभाव तो अंग्रजी अखबारों का भी कुछ कुछ क्षेत्रों में था परंतु आखिर अंग्रेजी भाषा का पूरे हिन्दुस्तान में नाम लेने के लिए भी अपना कोई क्षेत्र विशेष तो था नहीं। इसलिए अंग्रेजी अखबार छोटे होते हुए भी राष्ट्रीय कहलाए और हिन्दी के अखबार बड़े होते हुए भी क्षेत्रीयता का सुख-दुख भोगते रहे।

परंतु पिछले दो दशकों में ही हिन्दी अखबारों ने प्रसार और प्रभाव के क्षेत्र में जो छलांगे लगाई हैं वह आश्चर्यचकित कर देने वाली हैं। जालंधर से प्रारंभ हुई हिन्दी अखबार पंजाब केसरी पूरे उत्तरी भारत में अखबार न रहकर एक आंदोलन बन गई है। जालंधर के बाद पंजाब केसरी हरियाणा से छपने लगी उसके बाद धर्मशाला से और फिर दिल्ली से।

जहां तक पंजाब केसरी की मार का प्रश्न है उसने सीमांत राजस्थान और उत्तर प्रदेश को भी अपने शिकंजे में लिया है। दस लाख से भी ज्यादा संख्या में छपने वाला पंजाब केसरी आज पूरे उत्तरी भारत का प्रतिनिधि बनने की स्थिति में आ गया है ।

जागरण तभी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर से छपता था और जाहिर है कि वह उसी में बिकता भी था परंतु पिछले 20 सालों में जागरण सही अर्थो में देश का राष्ट्रीय अखबार बनने की स्थिति में आ गया है। इसके अनेकों संस्करण दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, बिहार झारखंड, पंजाब, जम्मू कश्मीर, और हिमाचल से प्रकाशित होते हैं। यहां तक कि जागरण ने सिलीगुडी से भी अपना संस्करण प्रारंभ कर उत्तरी बंगाल, दार्जिलिंग, कालेबुंग और सिक्किम तक में अपनी पैठ बनाई है।

अमर उजाला जो किसी वक्त उजाला से टूटा था, उसने पंजाब तक में अपनी पैठ बनाई । दैनिक भास्कर की कहानी पिछले कुछ सालों की कहानी है। पूरे उत्तरी और पश्चिमी भारत में अपनी जगह बनाता हुआ भास्कर गुजरात तक पहुंचा है। भास्कर ने एक नया प्रयोग हिन्दी भाषा के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं में प्रकाशन शुरू कर किया है। भास्कर के गुजराती संस्करण ने तो अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। दैनिक भास्कर ने महाराष्ट्र की दूसरी राजधानी नागपुर से अपना संस्करण प्रारंभ करके वहां के मराठी भाषा के समाचार पत्रों को भी बिक्री में मात दे दी है।

एक ऐसा ही प्रयोग जयपुर से प्रकाशित राजस्थान पत्रिका का कहा जा सकता है, पंजाब से पंजाब केसरी का प्रयोग और राजस्थान से राजस्थान पत्रिका का प्रयोग भारतीय भाषाओं की पत्रिकारिता में अपने समय का अभूतपूर्व प्रयोग है। राजस्थान पत्रिका राजस्थान के प्रमुख नगरों से एक साथ अपने संस्करण प्रकाशित करती है। लेकिन पिछले दिनों उन्होंने चेन्नई संस्करण प्रकाशित करके दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रयोग को लेकर चले आ रहे मिथको को तोड़ा है। पत्रिका अहमदाबाद सूरत कोलकाता, हुबली और बैंगलूरू से भी अपने संस्करण प्रकाशित करती है और यह सभी के सभी हिंदी भाषी क्षेत्र है। इंदौर से प्रकाशित नई दुनिया मध्य भारत की सबसे बड़ा अखबार है जिसके संस्करण्ा अनेक हिंदी भाषी नगरों से प्रकाशित होते हैं।

यहां एक और तथ्य की ओर संकेत करना उचित रहेगा कि अहिंदी भाषी क्षेत्रों में जिन अखबारों का सर्वाधिक प्रचलन है वे अंग्रेजी भाषा के नहीं बल्कि वहां की स्थानीय भाषा के अखबार हैं। मलयालम भाषा में प्रकाशित मलयालम मनोरमा के आगे अंग्रेजी के सब अखबार बौने पड़ रहे हैं। तमिलनाडु में तांथी, उडिया का समाज, गुजराती का दिव्यभास्कर, गुजरात समाचार, संदेश, पंजाबी में अजीत, बंगला के आनंद बाजार पत्रिका और वर्तमान अंग्रेजी अखबार के भविष्य को चुनौती दे रहे हैं। यहां एक और बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड इत्यादि हिन्दी भाषी राज्यों में अंग्रेजी अखबारों की खपत हिंदी अखबारों के मुकाबले दयनीय स्थिति में है। अहिंदी भाषी क्षेत्रों की राजधानियों यथा गुवाहाटी भुवनेश्वर, अहमदाबाद, गांतोक इत्यादि में अंग्रेजी भाषा की खपत गिने चुने वर्गों तक सीमित है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि राजधानी में यह हालत है तो मुफसिल नगरों में अंग्रेजी अखबारों की क्या हालत होगी? इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। अंग्रेजी अखबार दिल्ली, चंडीगढ़, मुम्बई आदि उत्तर भारतीय नगरों के बलबूते पर खड़े हैं। इन अखबारों को दरअसल शासकीय सहायता और संरक्षण प्राप्त है। इसलिए इन्हें शासकीय प्रतिष्ठा प्राप्त है। ये प्रकृति में क्षेत्रिय हैं (टाइम्स ऑफ इंडिया के विभिन्न संस्करण इसके उदाहरण है।) मूल स्वभाव में भी ये समाचारोन्मुखी न होकर मनोरंजन करने में ही विश्वास करते हैं । लेकिन शासकीय व्यवस्था ने इनका नामकरण राष्ट्रीय किया हुआ है। जिस प्रकार अपने यहां गरीब आदमी का नाम कुबेरदास रखने की परंपरा है। जिसकी दोनों ऑंखें गायब हैं वह कमलनयन है। भारतीय भाषा का मीडिया जो सचमुच राष्ट्रीय है वह सरकारी रिकार्ड में क्षेत्रीय लिखा गया है। शायद इसलिए कि गोरे बच्चे को नजर न लग जाए माता पिता उसका नाम कालूराम रख देते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि इतिहास में क्रांतियाँ कालूरामों ने की हैं। गोरे लाल गोरों के पीछे ही भागते रहे हैं। अंग्रेजी मीडिया की नब्ज अब भी वहीं टिक-टिक कर रही है। रहा सवाल भारतीय पत्रकारिता के भविष्य का, उसका भविष्य तो भारत के भविष्य से ही जुड़ा हुआ है। भारत का भविष्य उज्जवल है तो भारतीय पत्रकारिता का भविष्य भी उज्ज्वल ही होगा। यहां भारतीय पत्रकारिता में हिंदी पत्रकारिता का समावेश भी हो जाता है।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

मदनी अब्दुल नसीर है कांग्रेस और सीपीएम के नये नायक

-डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री का व्यक्तित्व बहुआयामी हैं। वे वरिष्ठ पत्रकार हैं। राजनीतिक विश्लेषक हैं। लेखक हैं। सामाजिक कार्यकर्ता हैं। राष्ट्रवादी आंदोलन के सिपाही हैं। आप तिब्बत की स्वाधीनता के लिए देश भर में अलख जगा रहे हैं। आपकी लेखनी जहां सत्यम् शिवम् सुंदरम् के लिए समर्पित है वहीं छद्म धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़े नेताओं-तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं, आतंकवादियों पर कड़ा प्रहार करती है। डा. अग्निहोत्री ने निम्न लेख में बहुत ही कुशलतापूर्वक कांग्रेस-कम्युनिस्ट और आतंकवादियों के गठजोड़ को बेनकाब किया है और इसे देश के लिए खतरनाक बताया है।

कोयम्बटूर की एक विशेष अदालत ने अब्दुल नसीर मदनी को रिहा कर दिया है। उन पर 14 फरवरी 1998 में कोयम्बटूर में हुए बम धमाकों की साजिश का आरोप था। इन धमाकों में 58 लोगों की मौत हो गई थी। आरोप इतने गंभीर थे और मामला इतना संवेदनशील था कि पिछले 9 सालों से जेल में बंद मदनी अनेक अदालतों में जमानत की गुजार लगाते रहे। लेकिन 2005 में सर्वोच्च न्यायालय तक ने उसकी जमानत की अर्जी को खारिज कर दिया था। ऐसा प्राय: कम मामलों में ही होता है लेकिन जब सर्वोच्च न्यायाल भी लंबे अरसे से रिमांड पर ही जेल में रह रहे अपराधी की जमानत याचिका खारिज कर दे तो मान लेना चाहिए आरोप गंभीर भी है और तथ्यपरक भी।

लेकिन मदनी निर्दोष छूट गए है। इससे किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि इससे पहले भी जेसिका लाल हत्याकांड केस में मनु शर्मा निर्दोष करार दिए गए थे। प्रियदर्शनी मट्टू हत्याकांड में संतोष सिंह निर्दोष करार दिए गए थे। यदि मदनी इसी परंपरा मे निर्दोष पाए जाते तो शायद इसको लेकर किसी को आश्चर्य भी न होता लेकिन मदनी के निर्दोष पाए जाने का जो खुलासा केरल सीपीएम के सचिव ने किया है वह चौंकाने वाला है। कन्नूर में संवाददाताओं से मदनी के जेल से छूटने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए सीपीएम के सचिव विजयन ने रहस्योद्धाटन किया कि मदनी की रिहाई केरल और तमिलनाडु में सरकारों के बदलने के कारण ही संभव हो पाई है। इसका अर्थ यह हुआ कि तमिलनाडु सरकार और केरल सरकार ने न्यायालय के निर्णय को प्रभावित किया है। ऐसा नहीं है कि इस देश में राजनैतिक दल और राजनैतिक पुरुष न्यायालय के निर्णय को प्रभावित नहीं करते। मनु शर्मा और संतोष सिंह का किस्सा ऐसा ही है । लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है किसी राजनैतिक दल ने खुलेआम इस बात की घोषणा की हो कि सरकार के बदलने के कारण किसी अपराधी की रिहाई संभव हो पाई है। यह ठीक है कि केरल में कांग्रेस और सीपीएम दोनों ही एक लंबे अरसे से मदनी को छुड़ाने की जुगते बिठा रहे थे। जहां तक कि इन दोनों दलों ने मिलकर मदनी की रिहाई के लिए 2005 में विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव भी पारित किया था। विजयन कहते हैं कि रिमांड पर जेल पर रहने का मदनी का किस्सा करोड़ों में से एक है। लेकिन वे यह नहीं बताते कि विधानसभा द्वारा किसी अपराधी को मुक्त करवाने के लिए प्रस्ताव पारित करने का किस्सा भी करोड़ों में से एक ही है।

यदि इन बातों को गंभीरता से लिया जाए और इसे लेना भी चाहिए क्योंकि सीपीएम पार्टी केरल में राज्य कर रही है और केन्द्र में राज्य करने वालों को ऑक्सीजन मुहैया कर रही है। तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कडगम भी केन्द्र की यूपीए सरकार का हिस्सा है। इसका अर्थ यह हुआ कि मदनी की रिहाई में डीएमके सरकार और केरल की साम्यवादी सरकार ने पर्दे के पीछे से महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। जज को डराया धमकाया होगा ऐसा तो कोई नहीं कह सकता। क्योंकि न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास अभी भी अडिग है। लेकिन अब इतना तो मानना ही पड़ेगा कि डीएम सरकार ने मदनी का केस ही कचहरी में इस ढंग से प्रस्तुत किया होगा कि न्यायाधीश के पास उसको छोड़ने के अलावा और कोई चारा न रहे। कचहरियों में ऐसा पहले भी होता रहा है जब न्यायाधीश ने स्वयं ही कहा कि वे जानते हैं कि छूटने वाला अपराधी पाक साफ नहीं है लेकिन जांच करने वाली एजेंसी यदि उसके खिलाफ सबूत प्रस्तुत नहीं करेगी तो यह काम न्यायपालिका स्वयं तो नहीं कर सकती। तमिलनाडु के अध्यक्ष गणेशन ने ठीक ही कहा है, 'इस निर्णय के लिए न्यायापालिका को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। सरकार ने ही मदनी के खिलाफ कमजोर केस तैयार किया और उसके छूटने का रास्ता साफ कर दिया।

प्रश्न है मदनी केरल की राजनीति में इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए हैं? उसका प्रमुख कारण यह है कि उन्होंने केरल में कट्टरवादी मुस्लिम आतंकवाद को जन्म दिया है। उन्होंने 1980 में इस्लामी संघ की स्थापना की । जब सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया तो उसने उसके स्थान पर पीडीपी नामक राजनैतिक दल की स्थापना कर दी। वह मुसलमानों ने यह विश्वास दिलाने को कामयाब हो गया कि हिन्दुस्तान में दारूल हरब है। यानि उन लोगों का साम्राज्य जो ईश्वर की नजरों में अच्छे लोग नहीं है। इसलिए इस क्षेत्र में दारूल इस्लाम की स्थापना करना हर मोमिन का फर्ज है और यह ऐसा काम है जो उसे अल्लाह ने सौंपा है। इस फर्ज को अदा करने पर हर मोमिन जन्नत नसीब होगी और जन्नत में उसे क्या मिलेगा यह हर मोमिन पहले से ही जानता है। लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं है। इसके लिए हथियार उठाना पड़ता है और दुर्भाग्य से मदनी के कहने पर केरल में मोमिनों न हथियार उठा लिए। मदनी पर आरोप था कि कोयम्बटूर के जिस बम विस्फोट में 58 लोग मारे गए उसको अंजाम देने वाले अलउम्मा के सदर एस.ए. बाशा और उसके अनुयायियों के तार मदनी से जुड़े हुए थे और मदनी ने ही उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था की थी। यह प्रशिक्षण बौध्दिक भी था और हथियारों का भी। जाहिर है दारूल इस्लाम की खोज में मदनी के सैनिक तिरुवनंतपुरम की ओर से तमिल प्रदेश की ओर चल पड़े थे। न्यायालय में मदनी का दोष सिध्द नहीं हो पाया, यह अलग बात है, लेकिन इस पूरे आंदोलन में मदनी ने यह अरसा पहले ही सिध्द कर दिया था कि केरल के मुसलमानों के वोट उसकी झोली में है। वह जिसके पक्ष में चाहेगा उसके पक्ष में यह झोली उलटा सकता है। यह अलग बात है कि बंबों से खेलते खिलाते एक बम विस्फोट में उसकी अपनी एक टांग भी उड़ गई थी। परंतु मदनी जानता है कि भारत में दारूल इस्लाम की स्थापना के लिए खुदा के दरबार में यह भेंट तुच्छ ही मानी जाएगी। इसलिए वह दूसरे नायाब ताहफों की तलाश में रहता है। 1998 में जब केरल सरकार ने मदनी को राज्य में अशांति फैलाने के आरोप में गिरतार कर लिया तो मदनी ने चुनावों में अपनी शक्ति दिखा दी और अगले चुनावों में मुसलमानों के वोट न मिलने कारण कांग्रेस पिट गई। केरल में अब कांग्रेस और सीपीएम दोनों को ही मुसलमानों के वोटों की चिंता है। इसलिए मदनी को रिझाने में लगे हुए हैं। वैसे एक दृष्टि से देखा जाए तो कांग्रेस और सीपीएम मुस्लिम आतंकवादियों को रिझाने का प्रयोग पूरे देश में ही एक सोची समझी रणनीति के तहत कर रही है। कश्मीर से सेना वापिस बुलाई जा रही है। पाकिस्तान को आतंकवाद से लड़ने का सांझा साथी घोषित किया जा रहा है। अफजल गुरु को फांसी के फंदे से लगभग उतार ही दिया गया है उसके लिए जम्मू कश्मीर के कांग्रेसी मुख्यमंत्री की भूमिका काबिले गौर है। अलबत्ता मदनी की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी कि उसने स्वयं स्वीकार कर लिया है कि वह मुसलमानों की कट्टरपंथी नीति से जुड़ा रहा है और उससे गल्तियाँ भी हुई है। लेकिन उसे यह नहीं मालूम की उसकी इन गलतियों में 58 लोगों की जान चली गई है। कांग्रेस और सीपीएम के लिए इस देश के नायक अफज़ल गुरु है, सोहराबुद्दीन है, प्रो. गिलानी है और अब अब्दुल नसीर मदनी है। बाकी देश में तो ये दोनों दल यह रणनीति मानवाधिकारों के नीचे चला रहे हैं लेकिन केरल में दोनों ने वह लोक लाज भी त्याग दी है और सीधे-सीधे मदनी के पक्ष में उतर आए हैं। सीपीएम और कांग्रेस की दृष्टि में इस देश के दुश्मन वे सैनिक है, वे सिपाही है और वह जांबाज जनता है जो आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो रही है। जो कहीं बच भी जाते हैं तो वे आतंकवादियों के मानवाधिकार हनन केस में जेल भेज दिए जाते हैं। बन्दे मातरम कहने वाले जेल में है और मदनी जेल से बाहर है। केरल में कांग्रेस और सीपीएम मिलकर मदनी के लिए वंदनबार सजा रहे हैं। उसके आगे कोर्निश कर रहे हैं माथे पर कार्ल मार्क्स का चित्र लगाकर हाथ में लाल झंडा लेकर मदनी के विजयोत्सव में नाच-नाच कर पसीने से सराबोर हो रहे हैं। लेकिन देश के सामने एक बहुत बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या तमिलनाडु की सरकार मदनी को रिहा करने के विशेष न्यायालय के इस निर्णय के खिलाफ अगले न्यायालय में अपील दायर करेगी या नहीं? या फिर वह भी केरल के साम्यवादी और कांग्रेसियों की तरह मदनी के विजयोत्सव में हिजडों की तरह नाच-नाच कर अपनेर् कत्तव्य की इतिश्री मान लेगी। (हिन्दुस्थान समाचार)

Saturday, August 25, 2007

सीपीएम मुख्यालय- यहां झूठ के सौदागर बैठते हैं


- हरेन्द्र प्रताप


श्री हरेन्द्र प्रताप प्रखर राष्ट्रवादी कार्यकर्ता है। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय महामंत्री और राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री पदों को सुशोभित कर चुके है। सम्प्रति वे भारतीय जनता पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता है। श्री प्रताप संगठन शास्त्र में माहिर, वक्तृत्व कला में पारंगत व अध्ययन-वृति के धनी है। आपने नक्सलवाद और मार्क्सवाद का गहरा अध्ययन किया है। कम्युनिस्टों के प्रपंचों पर केन्द्रित श्री हरेन्द्र प्रताप का यह लेख हमारी आंखें खोलता है।

1962 ई. में भारत-चीन युध्द के समय बिहार के बक्सर जिला स्थित मेरे गांव से कुछ कम्युनिस्ट गिरफ्तार हुए थे। 12 वर्ष की आयु में उनकी गिरफ्तारी पर मुझे बहुत आक्रोश आया था। मैंने पिताजी से पूछा कि इन लोगों को क्यों गिरफ्तार किया गया है तो पिता जी ने उत्तार दिया कि चीन ने भारत पर आक्रमण किया है उसकी ये खुशी मना रहे थे। तभी से कम्युनिस्टों के बारे में मेरे मानस पटल पर यह बात बैठ गई कि इन्हें भारत पसंद नहीं है।

भारत में जन्म लेने के बाद कोई व्यक्ति भारत का अहित क्यों सोचता है, इसके मूल में वह व्यक्ति कम उस व्यक्ति की शिक्षा और संस्कार को दोषी मानना चाहिए। बाल्यकाल से जिसके मन मस्तिष्क पर भारत के बारे में भारत की एक नकारात्मक छवि प्रस्तुत की जाये तो स्वाभाविक है कि वह भारत विरोधी हो जायेगा। भारत विरोध के काम में सक्रिय इस्लामिक मौलवी, विदेशी पादरी एवं वामपंथी लेखक ही इस भारत विरोध की जड़ में बैठे हुए हैं।

''पटना से दिल्ली तक की यात्रा में एक मार्क्सवादी कार्यकर्ता के साथ कई विषयों पर जब मैं चर्चा कर रहा था तो वह बार-बार हमें यह समझाने की कोशिश कर रहा था कि मार्क्सवादी ही भारत की सत्य बातों को समाज के सामने लाते हैं। अत: उसने कहा कि आपको सीपीएम दफ्तर में जाकर सीपीएम द्वारा प्रकाशित और प्रचारित साहित्य को पढ़ना चाहिए और मैं दिल्ली स्थित सीपीएम कार्यालय गया और कुछ पुस्तकों को खरीद लिया। खरीदे गए पुस्तकों में से तीन पुस्तकों को मैं पढ़ चुका हूं- पहला, ''आरएसएस और उसकी विचारधारा'', दूसरा ''गोलवलकर या भगत सिंह'' एवं तीसरा, ''घृणा की राजनीति।''

''मदन दास देवी के अपने सहजादे का नाम भी कुख्यात पेट्रोल पम्प घोटाले में शामिल रहा है''- यह अपने आप में इतना बड़ा झूठ और चरित्रहनन की कोशिश थी जिसने मुझे कम्युनिस्टों को बेनकाब करने को प्रेरित किया क्योंकि मदन दास जी को पिछले 32 वर्षों से मैं जानता हूं। मदन दास जी अविवाहित हैं। ''गोलवलकर या भगत सिंह'' नामक पुस्तक के पृष्ठ-41 पर संघ के लोगों की चरित्र हत्या करते समय ''गोलवलकर या भगत सिंह'' के सम्पादक राजेन्द्र शर्मा के ऊपर न केवल गुस्सा आता है बल्कि ऐसे लेखकों के प्रति मन में घृणा का भाव भी उत्पन्न होता है।

कम्युनिस्टों ने अपने प्रत्येक लेख में यह लिखकर साबित करने की कोशिश की कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आजादी की लड़ाई में भाग नहीं लिया बल्कि उसने अंग्रेजों का साथ दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में लिखते समय इन तीनों पुस्तकों में कम्युनिस्टों ने अमेरिकी शोधकर्ता जे.ए. करान जूनियर के शोधग्रंथ ''मिलिटेन्ट हिन्दुज्म इन इंडियन पॉलिटिक्स स्टडी आफ द आरएसएस'' पुस्तक का बार-बार उल्लेख किया है। हंसी तब आती है जब सीताराम येचुरी के नाम से प्रकाशित घृणा की राजनीति पृष्ठ-17 पर प्रकाशित इस पुस्तक का वर्ष 1979 लिखा गया है जबकि आरएसएस और उसकी विचारधारा नामक पुस्तक जिसे अरूण माहेश्वरी ने लिखा है। इसमें इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 1951 दिखाया गया है। अब यह पाठकों को तय करना है कि जिस अमेरिका को कम्युनिस्ट दिन-रात गाली देते रहते हैं उसी अमेरिका के एक संस्था द्वारा कराये गये एक शोध को ये वामपंथी अपना बाइबल मानकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गाली देने का काम कर रहे हैं।

'गोलवलकर या भगत सिंह' सम्पादक राजेन्द्र शर्मा के पुस्तक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी द्वारा लिखित पुस्तक ''हम अथवा हमारे राष्ट्रीयत्व की परिभाषा'' (ये हिन्दी में अनुवादित) नामक पुस्तक को इन लोगों ने प्रकाशित किया है। वामपंथियों ने स्वयं स्वीकार किया है कि आरएसएस ने इस पुस्तक को बाद में वापस ले लिया था फिर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विचार अंग्रेजों के बारे में क्या था इनके अनुवादित पुस्तक से ही कुछ उदाहरण नीचे दिये जा रहे हैं:-

पृष्ठ-76- इसे भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए कि गोरे मनुष्य की श्रेष्ठता ग्रंथी उनकी दृष्टि को धुंधली कर देती है..... उनमें न तो ऐसी उदारता और न सत्य के लिए ऐसा प्रेम। अभी कल ही की तो बात है जब वे अपनी नंगी देह पर विचित्र गोद ने गुदवाये और रंग पोते जंगलों में आदिम अवस्था में भटकते फिरते थे।

पृष्ठ-79- लेकिन, इससे पहले की इस जीत के फल एकत्र किये जा सकते, इससे पहले की राष्ट्र को शक्ति अर्जित करने के लिए सांस लेने की मोहलत मिल पाती ताकि वह राज्य को संगठित कर पाता, एक पूरी तरह से अप्रत्याशित दिशा से एक नया शत्रु चोरी छिपे विश्वासघाती रूप से देश में घुस आया और मुसलमानों की मदद से तथा जयचन्द, राठौर, सुमेर सिंह जैसे विश्वासघाती शासकों के कबीले के जो लोग अब भी बने हुए थे उनकी मदद से उन्होंने तिकड़मबाजी की और भूमि पर कब्जा करना शुरू कर दिया.... उल्टे कमजोरी के बावजूद वह 1857 में एक बार फिर दुश्मन को खदेड़ने के लिए उठ खड़ा हुआ था।

पृष्ठ-80- बेशक हिन्दू राष्ट्र को जीता नहीं जा सका है वह लड़ाई जारी रखे हुए है.....लेकिन लड़ाई जारी है और अब तक उसका निर्णय नहीं हुआ है......शेर मरा नहीं था सिर्फ सो रहा था वह एक बार फिर जाग रहा है और दुनिया पुनर्जाग्रत हिन्दू राष्ट्र की शक्ति देखेगी वह अपने बलिष्ठ बाजू से कैसे शत्रु के शेखियों को ध्वस्त करता है।

अंग्रेजों के शासन में अंग्रेजों को असभ्य, शत्रु, विश्वासघाती शब्दों के माध्यम से इस देश को जगाने वाला गुरू जी का यह लेख (यदि सचमुच उनका ही लेख है) तो अपने आप में न केवल प्रशंसनीय है बल्कि इस बात को प्रमाणित करता है कि गुरू जी के मन में अंग्रेजों के प्रति यह जो आक्रोश था वह आक्रोश संघ की शाखाओं में तैयार होने वाले स्वयंसेवकों के मन में कितना असर करता होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कितना देशभक्त है इसका सर्टिफिकेट कम्युनिस्ट नहीं दे सकते। क्योंकि कम्युनिस्टों ने 1942 से लेकर आज तक देश के साथ गद्दारी ही की है।

कम्युनिस्टों के तथाकथित इन पुस्तकों में चरित्र हनन का भी पुरजोर प्रयास किया गया है। गोलवलकर या भगत सिंह नामक पुस्तक के पृष्ठ-42 और 43 पर संघ प्रचारक और भाजपा के बारे में जो चरित्र हत्या की गई है उसकी जितनी भी निन्दा की जाये वह कम है।

''किसी को चरित्र की शिक्षा कम्युनिस्टों से लेने की आवश्यकता नहीं है। चरित्र हनन करना यह हम लोगों का संस्कार नहीं है फिर भी मार्क्स-पुत्रों को इशारे में यह बता देना आवश्यक है कि माउत्सेतुंग (जिसने न केवल 5 शादियां की बल्कि प्रत्येक बुधवार को नाचघर में उसके लिए लड़कियां बुलाई जाती थी....) मन में घृणा के साथ-साथ आक्रोश भी पैदा करता है। चरित्र के धरातल पर ऐसे पतीत लोग ही मार्क्सवादियों के मसीहा बने हुए हैं।

मार्क्सवादी किताबों में भारत के प्रति इनकी भक्ति कैसी है उसके कुछ उदाहरण निम्न हैं तथा ये झूठ को कैसे सत्य साबित करते हैं इसके उदाहरणार्थ इनकी पुस्तकों को देखें:-

''एटम बम बनाने के नाम पर केसरिया पलटन जो घोर अंधराष्ट्रवादी रूख करती रही है''- घृणा की राजनीति, लेखक सीताराम येचुरी, पृष्ठ- 24

''उधर भाजपा सांसद मदन लाल खुराना बांग्लादेशी घुसपैठियों की राजधानी में मौजूदगी की अतिरंजि त तस्वीरों के जरिये मुस्लिम विरोधी उन्माद भड़काने में लगे हुए हैं'' घृणा की राजनीति, लेखक सीताराम येचुरी, पृष्ठ- 42

''1938 में ही सावरकर ने खुलेआम यह ऐलान किया था कि भारत में दो राष्ट्र, हिन्दू और मुसलमान बसते हैं। मुस्लिम लीग ने इस सिध्दांत को 1947 में अपनाया था''- घृणा की राजनीति, लेखक सीताराम येचुरी, पृष्ठ- 34

''सन् 1923 में नागपुर की पहली जीत के बाद से ही संघ की गतिविधियां उसी साम्प्रदायिकता भड़काने और मुसलमानों पर हमला करने की षडयंत्र का भी गतिविधियों के अलावा कुछ नहीं थी। तब से आज तक देशभर में संधियों के नियंत्रण की अनेक व्यायामशालाएं दंगाइयों के अड्डे के रूप में काम करते देखी जा सकती है''- आरएसएस और उसकी विचारधारा, पृष्ठ- 65

उपरोक्त वामपंथी शब्द इस बात को प्रमाणित करते हैं कि जब अमेरिका, चीन, सोवियत संघ और पाकिस्तान जैसे देश एटम बम बना सकते हैं तो रक्षार्थ भारत के एटम बम के खिलाफ प्रकट किया गया इनका विचार राष्ट्रद्रोह के सिवा और क्या कहलाएगा? इनके लेख में बंग्लादेशी घुसपैठ को नकारना या भारत एक राष्ट्र है इसका नकारना यह तो पहले से जगजाहिर है पर झूठ बोलने में माहिर मार्क्सवादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का काल 1923 से पहले दिखाकर खुद नंगा हो गये। क्योंकि सभी जानते हैं कि संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। मुस्लिम लीग को बचाने के लिए इन्होंने पूरी कोशिश की है और सावरकर को ''द्वि-राष्ट्रवाद'' का दोषी करार दिया है जबकि यह सर्वविदित है कि मुस्लिम लीग ने इस सिध्दांत को सबसे पहले प्रतिपादित किया था।

वामपंथियों के झूठ का दस्तावेज स्वयं इनके द्वारा प्रकाशित पुस्तक ही है। झूठ बोलते समय इन्हें जरा भी शर्म नहीं आती है। चलते-चलते एक उदाहरण पर्याप्त है- घृणा की राजनीति नामक पुस्तक जो सीताराम येचुरी के नाम से प्रकाशित है उस पुस्तक के पहले ही लेख में इनकी कथनी और चरित्र तार-तार हो जाता हैं इस पुस्तक के साम्प्रदायिक और फांसीवादी ताकतों की चुनौती शीर्षक के तहत पृष्ठ-29 पर ए.के. गोपालन व्याख्यानमाला में 13 अप्रैल, 1998 को भाषण देते हुए सीताराम येचुरी ने कहा था.....

''इसलिए भाजपा को शिकस्त देने के लिए कांग्रेस के साथ रणनीतिक रूप से हाथ मिलाने का अर्थ होगा जिस डाल पर बैठे हों उसी को काटना।''

माक्र्सवादी आज कहां खड़े हैं। उसी कांग्रेस की गोद मे बैठकर मलाई काटने वाले सीताराम येचुरी और उनके पिछलग्गू यह भी भूल गये कि 1998 में कांग्रेस के बारे में उन्होंने उपरोक्त बातें कही थी।
हे भगवान! इन्हें मुक्ति दो क्योंकि ये खुद स्वीकार कर रहे हैं कि जिस डाल पर ये बैठे हैं उस डाल को ही ये काट रहे हैं। भारत में बुरे से बुरे आदमी को भी मरने के बाद हर व्यक्ति भगवान से उसका मुक्ति देने की प्रार्थना करता है। 1990 में पूरी दुनिया में दफनाये गये कम्युनिज्म को भगवान मुक्ति प्रदान करें। भारत में बेचारे केरल और बंगाल समुद्र के किनारे दो प्रांतों में ही सिमटे हुए कांग्रेस की कमजोरियों के कारण राष्ट्रीय राजनीति पर हावी होने का जो असफल प्रयास कर रहे हैं पता नहीं कब इनके पांव फिसल जाएं और भारत में भी ये समुद्र की लहरों में विलीन हो जाएं। मैं अग्रिम रूप से भगवान से यह प्राथना करूंगा कि भारत के कम्युनिस्टों को भी (भले ही कितना ही इन्होंने राष्ट्रद्रोह का काम किया हो और झूठ बोला हो) हे भगवान मुक्ति प्रदान करना।

Wednesday, August 22, 2007

फिर अखण्ड होगा भारत- महर्षि अरविन्द


- ललित मोहन शर्मा
आज से ठीक साठ साल पहले भारत में एक नए युग की शुरूआत हुई। सैकड़ों सालों के संघर्ष तथा लाखों राष्ट्रभक्तों के बलिदान के बाद 14-15 अगस्त की अर्धरात्रि को हमारे देश को स्वाधीनता मिली। 15 अगस्त की सुबह जब देशवासी सोकर उठे तो स्वतंत्र देश में स्वतंत्रता की सुरभि बह रही थी। प्रत्येक देशवासी ने स्वतंत्रता प्राप्ति की खुशी मनाई और तब से लेकर आज तक हम प्रतिवर्ष 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं। देश को स्वतंत्रता मिलने के साथ ही विभाजन की त्रासदी से भी गुजरना पड़ा। लाखों निर्दोष देशवासियों के लिए यह आजादी अभिशाप सी बनकर आई। अंग्रेजों ने भारत को खण्डित कर उसके दो टुकड़े कर दिए।

क्यों हुआ विभाजन
भारत विभाजन की इस त्रासदी में तीन प्रमुख पात्र थे- अंग्रेज, मुस्लिम लीग और उस समय का देश का नेतृत्व।

सन् 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य समर में हिन्दू और मुसलमानों के संगठित प्रयास को देखकर, अंग्रेजों ने भारत में टिके रहने के लिए मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग करने तथा अपनी ओर मिलाने की रणनीति अपनाई।

इस नीति के तहत उन्होंने मुस्लिमों को भारत का शासक कहकर उकसाया तथा उन्हें अधिक सुविधाएं देकर तुष्टीकरण की नीति अपनाते हुए अपनी ओर मिलाने के प्रयास किए। अंग्रेजों ने 1904 में ही पूर्वी बंगाल को एक ''मुस्लिम प्रांत'' घोषित करते हुए 'मजहब' के नाम पर अलग देश के बीज बो दिए थे। इसी के परिणामस्वरूप 30 दिसम्बर 1906 को अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। मुस्लिम लीग की मांग पर पृथक निर्वाचन मण्डल तथा जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग स्वीकार कर अंग्रेजों ने अलगाववाद को हवा दी। मदनमोहन मालवीय ने इसकी आलोचना करते हुए असेम्बली में कहा था कि ''यह अंग्रेजों का भारतीयों में फूट डालने का षडयंत्र है, हम इसका समर्थन नहीं करते।''

स्वतंत्रता के लिए कोशिश कर रहे कांग्रेस के नेतृत्वकर्ताओं ने इस स्थिति का विरोध करने के स्थान पर मुस्लिमों को अपने पक्ष में करने के लिए तुष्टीकरण का ही रास्ता चुना।

स्वामी श्रध्दानन्द ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि ''कांग्रेस अधिवेशनों में भाग लेने वाले मुस्लिम प्रतिनिधियों को किराया तथा यात्रा-भत्ता तक दिया जाने लगा। उनसे भोजन शुल्क भी नहीं लिया जाता था। दस्तरखाने पर (भोजन की थाली में) उनके लिए अन्य प्रतिनिधियों से अलग भोजन परोसे जाते थे। अधिवेशनों में मुस्लिम प्रतिनिधि खूब मौज उड़ाते थे। कांग्रेस की ओर से मुस्लिम तुष्टिकरण का यह प्रारंभिक स्वरूप था।''

इस तुष्टीकरण का ही परिणाम था कि मुस्लिम लीग ने स्वतंत्र भारत में पहले प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी जताई, जिसे अंग्रेजों की सहमति प्राप्त थी लेकिन कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं को यह मान्य नहीं था। जिन्ना व नेहरू की महत्वाकांक्षाओं के बीच अंग्रेज अपनी चाल चलने में सफल हो गए और जाते-जाते देश के दो टुकड़े कर गए।

विभाजन की विभीषिका
भारत का जो हिस्सा अलग होकर पाकिस्तान बना, वहां के हिन्दुओं पर कहर टूट पड़ा। बहुसंख्यक मुसलमानों ने हिन्दुओं पर बर्बर अत्याचार किए, जिसमें सेना व पुलिस के मुस्लिम जवानों ने उनका खुलकर साथ दिया। लाखों हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया गया, अबलाओं (महिलाओं) के साथ अमानुषिक कृत्य किए गए। अनेक लोगों को जबरन मुसलमान बना लिया गया तथा जो नहीं बने उनका सब कुछ लूटकर भारत चले जाने को मजबूर किया गया। उस समय की घटनाओं को सुनकर आज भी रोंगटे खडे हो जाते हैं। कैसी थी वह पाकिस्तान की सप्रेम भेंट- 15 अगस्त 1987 को लाहौर से अमृतसर के लिए पहली गाड़ी में एक भी यात्री जिंदा नहीं था। छोटे बच्चों की लाशें उनकी माताओं के मतृ शरीरों पर चिपटी थीं। माताओं व बहिनों के अंग-भंग कर दिए थे। गाड़ी के सभी डिब्बे लाशों से भरे थे और अन्तिम डिब्बे पर लिखा था ''स्वतंत्र भारत को पाकिस्तान की सप्रेम भेंट।''

इस भीषण संकट में जहां कम्युनिस्टों ने पाकि