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Saturday 4 April 2009

'मुंह में मार्क्‍स, बगल में मदनी'

'मुंह में मार्क्‍स, बगल में मदनी।' देश के सभी दलों को धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाने वाली माकपा का यह नया दर्शन है। चुनावी मौसम में मुसिलम वोटों के लिए माकपा की बेताबी देखने लायक है और इसके लिए उसे सांप्रदायिक और आतंकवादी मुसिलम संगठनों से हाथ मिलाने से भी कोई परहेज नहीं रहा। केरल में अपने वाम सहयोगियों के विरोध के बावजूद वह कोयंबतूर बम कांड के आरोपी और आतंकवादियों से रिश्ते रखने वाले अब्दुल नासेर मदनी की पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) से गठबंधन कर रही है तो पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रिजवानुर हत्याकांड के बाद मुस्लिमों में बढ़ते असंतोष से पार पाने के लिए जमाते-इस्लामी-ए-हिंद और जमीअत-उलेमा-ए हिंद के साथ सहयोग की संभावनाएं तलाश रही है।

माकपा हमेशा से अल्पसंख्यकों की खास हितैषी होने का दावा करती रही है। पार्टी के मुताबिक वह अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और विकास पर विशेष ध्यान देती है। सच्चर कमेटी की सिफारिशों को अमली जामा पहनाने के लिए उसने यूपीए सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखा। माकपा शासित राज्यों केरल और पश्चिम बंगाल में उसकी सरकारों ने अल्पसंख्यकों के विकास के लिए हर संभव कदम उठाए। लेकिन मुस्लिम इन दावों से प्रभावित हुए बगैर उससे छिटकते जा रहे हैं। चुनाव से ठीक पहले उसे अपने दो मुस्लिम सांसदों केरल के अब्दुल्ला कुट्टी और पश्चिम बंगाल के अबू आयेश मंडल को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निष्कासित करना पड़ा। यह कहीं न कहीं मुसिलमों में पार्टी के प्रति बढ़ते असंतोष का परिचायक है। केरल में तो माकपा को मुसिलम वोट कम ही मिलते हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में अभी तक मुसिलम वोट माकपा के साथ थे। अब यहां भी नंदीग्राम और रिवानुर हत्याकांड के बाद मुसिलम वोटों के उससे छिटक कर तृणमूल के साथ जाने के आसार नजर आ रहे हैं।

भाजपा की केसरिया सांप्रदायिकता को लेकर नाक-भौं सिकोड़ने वाली माकपा को शायद इस्लामी सांप्रदायिकता और उग्रवाद से कोई परहेज नहीं है। केंद्रीय नेतृत्व के संकोच, बाकी वाम दलों के विरोध और पार्टी के मुख्यमंत्री धड़े के एतराज के बावजूद केरल माकपा पर हावी पिनराई विजयन गुट मदनी की पीडीपी से गठबंधन कर रहा है। मदनी राज्य की उग्रवादी मुसिलम राजनीति के सितारे हैं और संगीन आरोपों से घिरे रहे हैं। वे कोयंबतूर बमकांड के अभियुक्त रहे लेकिन सबूतों के अभाव में बरी हो गए। लेकिन हाल ही में पकड़े आतंकवादियों से पता चला कि मदनी और उनकी पत्नी सूफिया के आतंकवादियों से रिश्ते लगातार बने रहे हैं और वे उन्हें पनाह भी देते रहे हैं। इसके अलावा उन पर सांप्रदायिकता भड़काने सहित कई मामलों में बीस मुकदमें चल रहे हैं। एक समय मदनी ने इस्लामी सेवक संघ बनाया था लेकिन अब उसका नाम बदल की पीडीपी कर दिया है।

केरल की सबसे ताकतवर मुसिलम पार्टी मुसलिम लीग कांग्रेस की अगुआई वाले मोर्चे के साथ हैं। इसलिए माकपा पिछले कुछ अर्से से उसके गढ़ में सेंध लगाने के लिए मदनी की पीडीपी का इस्तेमाल कर रही है। लेकिन माकपा और मदनी का यह सहयोग पर्दे की ओट में चलता था। माकपा कहती थी पीडीपी उसका समर्थन कर रही है तो वह कैसे इंकार करे। लेकिन इस चुनाव में माकपा की कलई खुल गई है क्योंकि उसने पोन्नई की सीट भाकपा के घोर विरोध के बावजूद मदनी की पार्टी के उम्मीदवार को दी। इसके बाद माकपा ने वाम मोर्चे के कार्यकर्ता सम्ममेलनों में मदनी और उनकी पार्टी के नेताओं को बुलाना शुरू किया। इसका वाम मोर्चे के प्रमुख घटक भाकपा और आरएसपी ने विरोध किया। इन दोनों दलों की दलील है कि पीडीपी एक सांप्रदायिक पार्टी है। लेकिन माकपा उनके विरोध की जरा भी परवाह नहीं कर रही।

मदनी को लेकर वाम मोर्चे में ही नहीं तो माकपा के अंदर भी मतभेद है। खुद मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ही पीडीपी के साथ गठबंधन के खिलाफ हैं। उन्होंने हाल ही में यह बयान देकर अपनी नाराजगी साफ कर दी कि मदनी को क्लीन चिट नहीं दी जाएगी। यह भी बताया जाता है कि मुख्यमंत्री ने पार्टी की पोलित ब्यूरो से माकपा-पीडीपी गठबंधन के खिलाफ शिकायत की है। लेकिन राज्य माकपा सचिव विजयन पीडीपी को 'धर्मनिरपेक्ष' होने का प्रमाण पत्र बांटते फिर रहे हैं। पार्टी के सामने पशोपेश की स्थिति तब पैदा हो गई जब जमाते-इस्लामी-ए-हिंद और जमीअत-उलेमा-ए-हिंद ने भी पीडीपी को सांप्रदायिक संगठन करार दे दिया। मजेदार बात यह है कि माकपा का केंद्रीय नेतृत्व पार्टी के लिए इन दोनों संगठनों का समर्थन जुटाने में लगा हुआ है। इन संगठनों की जल्दी ही पश्चिम बंगाल वाम मोर्चे के अध्यक्ष विमान बोस के साथ बैठक होने वाली है। यह बात अलग है कि इन दोनों मुसिलम संगठनों का केंद्रीय नेतृत्व माकपा के साथ सहयोग के पक्ष में है लेकिन उनकी स्थानीय इकाइयां इसके खिलाफ है। पश्चिम बंगाल की इकाई नंदीग्राम के बाद माकपा के साथ किसी भी तरह के तालमेल के खिलाफ है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि माकपा के अभेद्य गढ़ों केरल और पश्चिम बंगाल में पार्टी के पैरों तले जमीन खिसकती जा रही है। इससे हताश माकपा मुसलिम सांप्रदायिक और उग्रवादी संठनों के साथ प्रेम की पींगें बढ़ाने के लिए मजबूर हो रही है। दरअसल माकपा मुसिलमों को रिझाने के लिए हर तह के तरीके इस्तेमाल करती रही है। उसने मुसलिमों के इराक और फिलिस्तीन जैसे वैश्विक इस्लामी मुद्दे बहुत जोर-शोर से उठाए। करेल में उसकी सभाओं में अक्सर सद्दाम हुसैन और यासिर अराफत की तस्वीरें तक लगाई जाती रहीं। मुसलिम समुदाय में व्याप्त पिछड़ेपन को दूर करने के लिए उसने सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू कराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। हाल ही में उसने अपने घोषणा पत्र में पार्टी ने मुसलिमों के लिए विशेष उपयोजना बनाने के अलावा उनके लिए समान अवसर आयोग गठित करने और बैंक कर्जों में से 15 फीसद कर्ज मुसलिमों को देने के लुभावने वायदे किए। गुरूवार की प्रेस कांफ्रेंस में करात ने माकपा शासित राज्यों में मुसिलमों के लिए किए गए विकास कार्यों के आंकड़ों का अंबार लगा दिया। लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है कि मुसलिम मतदाताओं पर न तो इन विकास कार्यों का असर हो रहा है और न चुनावी वायदों का। बड़ी तादाद में मुसलिमों को टिकट देना भी बहुत काम नहीं आता इसलिए चुनाव में ऐसे मुसलिम संगठनों का साथ लेना जरूरी हो गया है जिनका मुसलिमों पर अच्छा खास असर हो। मुसलिम वोटों की मृग मरीचिका उसे मुसलिम सांप्रदायिक ओर उग्रवादी मुसलिम संगठनों के साथ हाथ मिलाने के लिए मजबूर कर रही है।

-सतीश पेडणेकर
जनसत्ता(28 मार्च, 2009) से साभार

4 comments:

संजय बेंगाणी said...

साम्प्रदायिक सिर्फ हिन्दू ही होते है.

अनुनाद सिंह said...

वाह-वाह ! बहुत जोरदार शीर्षक है !

मैने कभी कम्युनिस्टों को दाउद के विरुद्ध कुछ बोलते हुए नहीं सुना। कभी पाकिस्तान की भारत-विरोधी गतिविधियों पर उन्हें कुछ बोलते हुए नहीं सुना।

निशाचर said...

'क' से कम्यूनिस्ट और 'क' से 'कु....' न न न......... यह तो उस वफादार की बेइज्जती है. कोई विशेषण सूझता ही नहीं इनके लिए क्या करें ?

SALEEM AKHTER SIDDIQUI said...

dekh kar pata chala ki waqye desh todak blog hai.