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Monday 30 September 2013

नमो-नमो.....आंखों ने जो देखा !

अपन गांधी, लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय को आदर्श राजनेता मानकर राजनीति में सक्रिय हैं। सादगी, शुचिता, विनम्रता, अध्ययनशीलता...ये सब गुण ऐसे हैं, जो ज्यादा आकर्षित करते हैं। ज्यादा तड़क-भड़क मुझे नहीं भाते। अटलजी-आडवाणीजी के भी इसलिए प्रशंसक हैं कि ये दोनों नेता छह दशकों से नैतिकता, शुचिता और प्रामाणिकता के पर्याय बने हुए हैं। 

मैं स्वेच्छा से स्वीकारी हुई गरीबी का जीवन जीता हूं और इसमें आनंदित रहता हूं, और जिनका जीवन इस तरह का है, उनसे प्रेरित होता हूं। यानी 'सादा जीवन – उच्च विचार' अपना पाथेय है। गत एक दशक से भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी जिस तरीके से लगातार आगे बढ़ रहे हैं वह आश्चर्यजनक है। गुजरात को उन्होंने समृद्धि की उस ऊंचाई पर पहुंचा दिया, जहां तक किसी भी मुख्यमंत्री के लिए अपने राज्य को पहुंचाना सपना जैसा है। तो मेरे मन में स्वेच्छा से स्वीकारी हुई गरीबी और चरम समृद्धि में द्वंद्व जैसा चला। बहुत ज्यादा मैं मोदी जी का प्रशंसक नहीं हो पाया। इसे लेकर लगातार मित्रों से बहस होती रही।



परसों मित्रवर नितिन शर्मा जी का कॉल आया कि कल यानी 29 सितम्बर को दिल्ली में आयोजित नरेंद्र मोदी जी की रैली में चलो। रैली के दिन सुबह-सुबह 9 बजे वो मित्र नीरज आर्य और विजय शर्मा के संग अपनी कार से मेरे निवास पहुंचे। हम भी उनके साथ हो लिए। होर्डिंग, बैनर, पार्टी के झंडे से पूरा रास्ता पटा पड़ा था। अधिकांश कारों, बसों और मिनी बसों में पार्टी के झंडे लगे थे और 'नरेंद्र मोदी जिन्दाबाद' के नारे से यात्रा-मार्ग गुंजायमान हो रहा था। 10 बजे के करीब हम रिठाला मेट्रो स्टेशन के आसपास पहुंचे। मित्र विजय शर्मा आइजीएल के अधिकारी थे तो उन्होंने जुगाड़ लगाई और हमने गाड़ी वहीं आईजील स्टेशन पर खड़ी कर दी। और वहीं से पैदल चल पड़े। चार-पांच किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। रास्ते भर में लोगों का रेला जारी था। ऐसा लग रहा था कि हम धार्मिक परिक्रमा कर रहे हों। नारे तो गूंज ही रहे थे, लोगों के वर्ग भी विविधता लिए हुए थे। युवाओं की फौज, 80 साल के वृद्ध, गांव के गरीब और किसान, कॉरपोरेट क्षेत्र की महिलाएं और पुरूष, सब पसीने से तर-बतर लेकिन उत्साह और उम्मीद के सहारे पैदल ही रैली स्थल की ओर चले जा रहे, स्वयं की प्रेरणा से जा रहे....अपने 36 साल के जीवन में किसी राजनीतिक रैली में ऐसा उत्साह अपनी आंखों से मैं पहली बार देख रहा था। साढ़े 10 बजे हम रैली स्थल यानी रोहिणी स्थित जैपनीज पार्क पहुंचे। पूरा पंडाल खचाखच भरा हुआ। लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा था। जब हम रैली से करीब सवा एक बजे विदा हुए तो भी रास्ते में लोगों का काफिला आता ही रहा। भारी भीड़। जितनी संख्या पंडाल में उतनी ही उसके बाहर, वह भी सतत्। 



एक कमरे में बंद होकर, एसी रूम में, लैपटॉप-डेस्कटॉप के सहारे मैं जो अपने मित्रों से बहस करता था, वह हकीकत से कोसों दूर था। आखिर जब राजनीति में विश्वसनीयता का संकट चरम पर हो, राजनीतिक रैलियों में दिहाड़ी पर भीड़ जुटाए जाते हों, आम आदमी सहज कहते पाएं जाते हों कि सब नेता चोर हैं.....ऐसे में नरेंद्र मोदी को लेकर जन-विश्वास का देशभर में जगह-जगह ऐसा व्यापक प्रकटीकरण होना, इसमें जरूर कुछ न कुछ विशेष बात है। नरेंद्र मोदी की चुस्त प्रशासनिक क्षमता, ईमानदार राजनेता और उनकी प्रखर राष्ट्ररवादी विचारधारा समकालीन भारतीय राजनीति में उन्हें विशिष्ट बनाता है, इसमें कोई दोमत नहीं है। 

जब भारत को भ्रष्टाचार का महारोग जर्जर किए जा रहा हो, जब देश के प्रधानमंत्री अपने पिलपिले व्यवहार से करोड़ों भारतीयों के साथ छल कर रहे हों, जब तुष्टिकरण की राजनीति देश में अलगाव पैदा कर रही हो तो ऐसे में नरेंद्र मोदी के पक्ष में खड़ा होना राष्‍ट्रीय कर्तव्य है और तटस्थ रहना राष्ट्रीय अपराध। 

(फोटो : विजय शर्मा)

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