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Monday, 5 November 2007

अंग्रेजी ने बनाए 'नए वंचित' 'नए ब्राह्मण'

-मधु पूर्णिमा किश्वर संपादक, मानुषी

असमानता, भेदभाव और पिछड़ेपन के हल के रूप में आरक्षण पर चल रही मौजूदा बहस कुल जमा एक बिन्दू पर सिमटा दी गई है-क्या शैक्षिक आरक्षण जाति आधारित होना चाहिए अथवा उसमें आर्थिक पक्ष भी शामिल किया जाना चाहिए? इन दोनों विकल्पों के पीछे एक गलत धारणा यह है कि भारत में किसी के लाभ से वंचित होने के दो ही आयाम हैं-एक, ऐसी जाति या जनजाति में पैदा होना जो सरकारी कागजों में पिछड़ी या वंचित, के रूप में दर्ज है, अथवा#और दूसरा एक गरीब परिवार में पैदा होना।

इस पूरे मामले में हम आधुनिक भारत में महत्वपूर्ण अवसरों से वंचित होने अथवा किए जाने के पीछे विशेष पहलू को अनदेखा कर रहे हैं। आज हमारे समाज में विशेष शैक्षिक संस्थानों तक किसी व्यक्ति की पहुंच को निर्धारित करने वाला, और इस तरह आर्थिक और सामाजिक उन्नति का महत्वपूर्ण रास्ता, एकमात्र प्रभावी आयाम है अंग्रेजी भाषा को सुगमता से प्रयोग कर पाने की उसकी काबिलियत। ऊंचे रसूख वाले सामाजिक-आर्थिक दायरों से जुड़ने का यही एक करिश्माई तरीका है।

केवल अंग्रेजी भाषा के जरिए ही भारत की आधुनिक अर्थव्यवस्था को चलाकर ब्रिटिश शासन में पनपे और आज सत्ता में बैठे मठाधीशों ने शेष समाज पर अपना सिक्का जमाए रखने कि लिए सुनिश्चित कर लिया है कि ज्यादातर भारतीय अंग्रेजी में महारथ हासिल न कर पाए जिसके परिणामस्वरूप फर्राटे से अंग्रेजी प्रयोग कर पाने वालों का हमेशा से अकाल ही रहा है। अंग्रेजी का थोड़े-बहुत ज्ञान होने पर भी कोई व्यक्ति रोजगार की प्रतियोगिता में खास लाभ पाता है जबकि वे चंद लोग जिनकी अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ है, वे शाही खानदान के लोगों जैसा बर्ताव करते हैं और उनके साथ भी शाही व्यवहार किया जाता है। उनके लिए निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में ऊंचे वेतन के पसंदीदा रोजगार उपलब्ध रहते हैं, चाहे उनकी कैसी भी योग्यता, जाति या वर्ग हो। बाकी सबब जिनके पास यह कौशल नहीं होता, उन्हें नाकारा महसूस कराया जाता है, तब वे अपने पर से भरोसा ही खो बैठते हैं। यह जादुई कौशल हासिल करने में असफल रहने वाले न तो किसी उच्च शिक्षण संस्थान की प्रवेश परीक्षा पास कर सकते हैं, न ही कोई इज्जतदार रोजगार पा सकते हैं। कोई लड़का या लड़की मराठी, हिन्दी या असमिया की अच्छी विद्वान ही क्यों न हो, उसे महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश या असम की भाषायी सीमाओं के भीतर भी चपरासी से बेहतर काम के लिए उपयुक्त नहीं माना जाएगा। कोई व्यक्ति भले वनस्पति विज्ञान या भारतीय शिल्पकला या खगोल विज्ञान का गहन जानकार हो सकता है पर इससे वह किसी बड़े कालेज, महाविद्यालय में इन्हीं विषयों में दाखिला नहीं पा सकता।

विशेषाधिकार का पासपोर्ट आखिर ऐसा क्यों है कि भेदभाव और खुद को कुछ खास मानने की सोच के इतने बेढब फैलाव को देखकर भी हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है जबकि इसके खिलाफ बढ़-चढ़कर भाषण देने वालों की बातों में हमेशा से ही, जाति और वर्ग प्रमुखता से सुनाई देते रहे हैं? जातिगत दुरावों के आम चलन के बावजूद हमें सरकारी और निजी क्षेत्र में ऊंचे पदों पर अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों के बैठे होने के अनेक उदाहरण दिख जाएंगे। लेकिन हमें यह कहीं सुनने को नहीं मिलेगा कि फलां फलां व्यक्ति ने अंग्रेजी में एक खास महारथ हासिल किए बिना किसी आई.आई.टी. या किसी अन्य ऊंचे दर्जे के मेडिकल, इंजीनियरिंग या प्रबंधन संस्थान में दाखिला पाया हो अथवा यह भी नहीं सुनाई देगा कि हमारी अर्थव्यवस्था के किसी आधुनिक क्षेत्र- सरकारी या निजी- में ऊंचा ओहदा पाया हो।

अगर आपको मेडिकल स्कूल में सफलता चाहिए तो आपको अंग्रेजी आनी ही चाहिए-चाहे आप गांव में डाक्टरी करना चाहें या शहरी भारत में, जहां आपके बहुत कम मरीज शायद अंग्रेजी बोल पाएं। अगर आप वास्तुकार का प्रशिक्षण चाहते हैं तो अंग्रेजी की जानकारी होनी जरूरी है, यहां तक कि स्कूल आफ आर्किटेक्चर में दाखिले की अर्जी भरने के लिए भी। जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते उन्हें ओछा माना जाता है जो आधुनिक समाज या अर्थव्यवस्था के खांचे में प्रवेश के लायक नहीं हैं।

एक शैतानी विभेद भारतभर में अंग्रेजी बोलने वाला यह विशिष्ट वर्ग नौकरशाही, राजनीति, सशस्त्र बलों, उद्योग-व्यवसायों और अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में ऊंचे ओहदों पर बैठा है। इसी कारण यह बहुत छोटा सा विशिष्ट वर्ग ही ज्यादातर मुद्दों पर, चाहे सामाजिक हों, विधायी, रक्षानीति, कृषि नीति, शैक्षिक हों या चुनाव सुधार से जुड़े, हर तरह की बौध्दिक चर्चा-वार्ता पर छाया रहता है। वे ऐसा दिखाते हैं मानो राष्ट्रीय महत्व के तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनका दृष्टिकोण ही समूचे देश की सोच की झलक है और क्षेत्रीय भाषाओं के विशिष्टजन एक संकुचित जातिगत और बांटने वाली सोच दर्शाते हैं। वे अंग्रेजी को आधुनिकता की भाषा के रूप में पेश करते हैं और जिनकी जड़ें स्थानीय भाषाओं में हैं उन्हें पूर्व-आधुनिक, परम्परावादी, प्रगतिविरोधी, यहां तक कि निराशावादी दृष्टिकोण के बचे-खुचे प्रतिनिधियों की तरह पेश किया जाता है। वे चाहे कितना ही खुद को राष्ट्रवादी दिखाते हों, भारत के आधुनिकीकरण के तमाम प्रकल्पों में उसी औपनिवेशिक भाषा के प्रयोग पर आमदा रहते हैं और खुद को राष्ट्रीय एकता और संस्कृति के रखवाले, और तो और, बौध्दिक प्रखरता और प्रगति के एकमात्र पुरोधा घोषित करते हैं। वे जनता के लिए एकमात्र भूमिका तय करते हैं कि वह प्रगति और आधुनिकता के उनके दृष्टिकोण को बिना चूं-चपड़ किए स्वीकार करे, जिसमें जनता की अपनी सांस्कृतिक विरासत का बड़ी मात्रा में क्षरण भी जुड़ा होता है।

अंग्रेजीदां वर्ग का प्रभुत्व चूंकि केन्द्रीकृत राज्य ढांचे को बनाए रखने पर आधारित है, अत: राजनीतिक विकेन्द्रीकरण के सभी अभियानों को राष्ट्रीय एकता पर खतरे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बहरहाल, चूंकि इस विशिष्ट वर्ग की भारतीय समाज में सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ें नहीं होतीं, उनकी जीवनशैली तथा इच्छाएं पश्चिमी दुनिया की तरफ झुकी रहती हैं, इस कारण हमारे जैसे विविध और जटिल समाज पर शासन करने की योग्यता उनमें नहीं होती। इसी वजह से जो कानून वे बनाते हैं, उनका पालन उल्लंघन करके होता है; जिस सरकार के तंत्र पर वे अधिष्ठित रहते हैं, वह भ्रष्टाचार, अयोग्यता और संकटों से भरा रहता है। चूंकि सामाजिक सुधार के उनके जुमले एक विदेशी भाषा में गुंथे रहते हैं और एक वैदेशिक ढांचे का प्रयोग करते हैं, सामाजिक सुधार के उनके सुझाए कदम आमतौर पर प्रतिरोध पैदा करते हैं या हद से हद कागज तक सीमति रहते हैं।

'नए ब्राह्मण' भारत की आजादी के बाद भी व्यावसायिक और सरकारी दफ्तरों की जरूरत के लिए विशिष्ट शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी को बरकरार रखकर हमने अपने औपनिवेशिक आकाओं द्वारा जान-बूझकर पैदा की गई अंग्रेजी पढ़े-लिखे और शेष समाज के बीच खाई को और बढ़ाने की पक्की व्यवस्था कर ली है। यह प्रवृत्ति आगे चलकर हमारे अधिकांश लोगों की बुध्दि, आत्मा और स्वाभिमान को नष्ट करने जैसे खतरनाक आयाम ले चुकी है। अंग्रेजी आधारित शिक्षा जो खासियत उपलब्ध कराती है वह अधिकांशत: जाति और वर्ग के परम्परागत भेदों को भी पीछे छोड़ जाती है।

पारम्परिक ब्राह्मण उच्च बौध्दिक ज्ञान के अर्जन में, देवी-देवताओं को समर्पित मंत्रोंच्चारण और कुछ धार्मिक अनुष्ठानों में मुख्यत: संस्कृत का प्रयोग करते थे। 'नए ब्राह्मण' अपने कुत्तों और नवजात शिशुओं से बात करते समय भी अंग्रेजी बोलते हैं। वे यही चाहते हैं कि उनके बच्चे अपनी नर्सरी की कविताएं अंग्रेजी में सीखें। स्थानीय भाषा का प्रयोग तो वे तभी करते हैं जब घर के नौकर-चाकरों को आदेश देना होता है। पुराने ब्राह्मण वर्ग की ताकत को प्रभावी रूप से उन महिलाओं और कथित छोटी जात के लोगों द्वारा चलाए विभिन्न भक्ति आंदोलनों से चुनौती मिली जो संस्कृतवादी वर्ग के प्रभुत्व को नकार कर अपने इष्ट से अपनी मातृभाषा में ही संवाद पर जोर देते हैं। आज उन्हीं जातियों के उत्तराधिकारी अंग्रेजी भाषा के प्रति इतना आकर्षण रखने लगे हैं कि उन्होंने भी इसके सामने दण्डवत करना सीख लिया है।

वे ऐसा इसलिए करते हैं क्यों कि वे देख रहे हैं कि अगर आप एक खास तरीके और अंदाज में अंग्रेजी बोल सकते हैं तो आपको विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक वर्ग के दायरे में तुरन्त प्रवेश मिलता है। दूसरी ओर भले ही आप किसी ऊंची जात से न आते हों, अगर अंग्रेजी नहीं बोल सकते तो आपके लिए सभी दरवाजे सदा बंद ही रहते हैं। उन्हें तो ओछे प्राणियों जैसा मान लिया जाता है।

बहुत कम ऐसा होता है कि लोग मुझसे मेरी जाति के बारे में पूछते हैं। वे सीधे-सीधे मानकर चलते है कि चूंकि मैं पब्लिक स्कूल के अंदाज में अंग्रेजी में बोलती हूं तो मैं ऊंची जाति से ही हूं। यह विडम्बना ही है कि अंग्रेजी के बढ़ते बोलबाले द्वारा हो जा रहे नुकसान की ओर ध्यान खींचने के लिए मुझे अंग्रेजी में लिखना पड़ रहा है। अगर मैं यही चीज किसी स्थानीय भाषा में लिखती और अंग्रेजी में एक खास स्तर की योग्यता नहीं रखती तो मेरी यह आलोचना किसी अयोग्य व्यक्ति कीर् ईष्या से उपजी अभिव्यक्ति कहकर नकार दी गई होती।

कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी जाति कितनी ऊंची है, कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके परिवार के पास जमीन कितनी है, अगर आपके गांव में पड़ोस में कहीं अंग्रेजी माध्यम स्कूल नहीं है, तो आपके बच्चे रोजगार के बाजार में सबसे पिछले छोर पर होंगे। यहीं कारण है कि पंजाब, उत्तर-प्रदेश और हरियाणा के जाटों के बेटे, जो बड़ी-बड़ी जमीनों के मालिक हैं और इन प्रदेशों की राजनीति में बड़े वर्गों से जुड़े हैं, अगर उनके परिवार गांव में ही रह रहे हैं और वहां अच्छे अंग्रेजी माध्यम स्कूल नहीं हैं तो वे बस-कंडक्टर या ड्राइवर बनकर रह जाते हैं। यही कारण है कि गरीबी के मारे अपने गांवों, जहां अच्छे अंग्रेजी माध्यम स्कूल नहीं हैं, से शहरों में आने के बाद कई ब्राह्मण गलियों में सामान बेचते, पान-बीड़ी की दुकान लगाते, सब्जी या और कोई छोटी-मोटी चीजें बेचते हुए मिल जाते हैं।

इससे उलट, रांची जैसे कुछ जिलों में, जहां मिशनरी गांव और शहरों में चलने वाले सरकारी स्कूलों से बेहतर स्कूल चलाते हैं, रहने वाले ईसाई लड़के-लड़कियों के पास उन ऊंची जात के युवा लड़के-लड़कियों की तुलना में बेहतर शिक्षा और बेहतर रोजगार के अवसर होते हैं। कोई व्यक्ति जो भले ही किसी जाति में जन्मा हो, अगर मॉडर्न स्कूल या सेंट स्टीफन्स कालेज में पढ़ा-लिखा है तो आसानी से ऑल इंडिया सुपर कास्ट के सदस्य के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है और इस तरह उसके पास केवल जन्म से अपनी ऊंची जात की मुख्य योग्यता रखने वालों की तुलना में कई अधिक अवसर रहते हैं।

ज्यादातर पढ़े-लिखे लोगों ने इस स्थिति को अब 'साधारण' मान लिया है और उनके लिए यह चिन्ता या चेतावनी जैसी बात नहीं है। बहरहाल, इस परिस्थिति की बुराई और अन्याय तब स्पष्ट दिखता है जब हम अपने आस-पास देखते हैं और पाते हैं कि दुनिया में ऐसे देश ज्यादा नहीं हैं जहां लोगों को एक विदेशी भाषा में शिक्षा न पाने के कारण अपनी ही मातृभूमि में इतने अधिक दुराव और अयोग्यता के आरोपों को झेलना पड़ता है। अगले अंक में जारी

Saturday, 3 November 2007

पश्चिम बंगाल में अब 'राशन दंगों' की बारी


-अनुराधा तलवार

सिंगुर और नंदीग्राम में किसानों व खेतिहर मजदूरों के संघर्ष को लेकर चर्चा में आए पश्चिम बंगाल में पिछले डेढ़ माह से जनता द्वारा राशन की दुकानों को लूट लेने का सिलसिला शुरू हुआ है। इसे 'राशन दंगा' कहा जा रहा है। प्रदेश के पिछड़े और गरीब जिले बांकुरा में 16 सितंबर को तीन राशन दुकानों को लूटने के साथ 'राशन दंगा' शुरू हुआ। अब तो ग्रामीणों द्वारा रोजाना कहीं न कहीं राशन लूटने की खबरें आने लगी हैं। उल्लेखनीय बात यह कि ये घटनाएं स्वस्फूर्त घट रही हैं। इनके आगे पीछे न तो कोई राजनीतिक दल है और न ही कोई संगठन। जन-जन तक राजनीति की घुसपैठ रखने वाले पश्चिम बंगाल में ऐसे हालात वाकई आश्यर्चजनक हैं।

आखिर ऐसी स्वस्फूर्त घटनाओं के पीछे क्या हो सकता है? पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात है लोगों की भूख जो तीन दशक के वामपंथी शसन में गरीब लोगों को झेलनी पड़ रही है। हाल ही में जारी किए गए राष्ट्रीय सांख्यिकी सर्वेक्षण का अध्ययन बताता है कि 'साल के कुछ महीनों में कई दिन भूखे सोने वाले परिवार', पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा (10.6 प्रतिशत) पाए गए। पश्चिम मिदनापुर के बेलपहारी, पुरुलिया के बाघमंडी, पुनचा और बलरामपुर ब्लाक जहां नदियों के कटाव से किसानों की काश्त की जमीन जज्ब होती जा रही है तथा सिंगुर जहां उद्योगों के लिए खेतों का जबरिया अधिग्रहण किया जा रहा है, वहां से कुपोषण से होने वाली मौतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों की खाद्यान्नों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। इस बढ़ोतरी का दोहरा असर पड़ा है। महंगाई की वजह से गरीबों को राशन की दुकानों से ज्यादा खाद्यान्न की आवश्यकता पड़ रही है, तो वहीं दूसरी ओर राशन विक्रेता अच्छी कीमत मिलने के लोभ में खुले बाजार में राशन का अनाज बेचने लगे हैं। इन्हीं स्थितियों के चलते राशन विक्रेताओं और जनता के बीच सघर्ष चरम पर पहुंच चुका है। दो अन्य कारण भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं। पूरे पश्चिम बंगाल में 'राशन दंगे' जबरिया भूमि अधिग्रहण के खिलाफ शुरू हुए किसानों के संघर्ष के बाद हुए। इन संघर्षों ने पश्चिम बंगाल सरकार और वामपंथी दलों को कठघरे में खड़ा कर दिया है कि गरीबों के नाम पर राजनीति करने वाले, गरीबों के कितने पक्षधर हैं।

लोग इस बात से आजिज आ चुके थे कि उनकी शिकायतें सुनी ही नहीं जा रही हैं। उदाहरण के लिए सितंबर 2003 में जब स्थानीय स्तर पर की गई शिकायतों का कोई नतीजा नहीं निकला तो खेतिहर मजदूरों के संगठन पीबीकेएमएस के कार्यकर्ताओं ने सात राशन विक्रेताओं के खिलाफ पश्चिम मिदनापुर के दातान ब्लाक में सबूतों के साथ शिकायतें दर्ज कराईं। जिले के अधिकारी रात दस बजे इन शिकायतों की जांच करने पहुंचे, लेकिन शिकायतकर्ताओं को इसकी सूचना नहीं दी। अधिकारियों ने आरोपी राशन विक्रेताओं से दस से बीस हजार रूपए तक वसूले और इस तरह शिकायतें रफा-दफा कर दी गईं। अनुभव बताते हैं कि अधिकारियों का यह कृत्य अपवाद नहीं अपितु दस्तूर बन चुका है। राशन विक्रेता, पंचायत प्रतिनिधि, पार्टी के कार्यकर्ताओं व अधिकारियों के बीच सांठ-गांठ जनता के सामने स्पष्ट हो गई, लिहाजा उसने कानून अपने हाथ में लेने का फैसला ले लिया, परिणामस्वरूप 'राशन दंगे' शुरू हो गए।

वाममोर्चा सरकार की ओर से जो प्रतिक्रिया प्रत्याशित थी, वही आई। कुछ दिन पहले सरकार ने एक विज्ञापन जारी करके यह बताने की कोशिश की कि केंद्र ने राज्य को खाद्यान्न का कोटा कम कर दिया है। 'कैग' की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल में राशन की दुकानों से खाद्यान्नों का उठाव दो से पचास प्रतिशत के आसपास है। जाहिर है कि शेष राशन का अन्न कालाबाजार की भेंट चढ़ जाता है और इसी की वजह से राज्य में सार्वजनिक वितरण प्रणाली ध्वस्त हुई है। सरकार की दूसरी प्रतिक्रिया यह हुई कि इस समस्या को उसने कानून व्यवस्था का मसला माना। राज्य के तमाम भ्रष्ट व कालाबजारी राशन विक्रेताओं की सुरक्षा के लिए पुलिस तैनात करवा दी। जबकि प्रशासन को चाहिए था कि आरोपी राशन विक्रेताओं के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कार्रवाई करता। ऐसे में लोगों का गुस्सा वाजिब है लेकिन सरकार उनकी भावनाओं की कद्र नहीं कर रही है। सार्वजनिक वितरण के तंत्र को भी सुधारने की जरूरत है। राशन विक्रेताओं के संगठन की बात सही मानी जाए तो एक राशन विक्रेता यदि ईमानदारी से काम करे तो हर महीेने वह मुश्किल से 562 रूपए ही बचा पाएगा। इसलिए यह भी जरूरी है कि राशन विक्रेताओं के हितों का ख्याल रखा जाए ताकि वे बाजार में राशन सामग्री बेचने को विवश न हों। पश्चिम बंगाल सरकार छत्तीसगढ़ से प्रेरणा ले सकती है। यहां भ्रष्ट राशन विक्रेताओं को हटाकर यह काम स्वसहायता समूहों को सौंपा गया है जिनकी जवाबदेही समाज के प्रति रहती है और वे इसका ध्यान रखते हुए काम कर रहे हैं। ( साभार : दैनिक भास्कर)


लेखिका सुप्रीम कोर्ट द्वारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तौर-तरीके जानने के लिए गठित आयोग की सलाहकार हैं।

करूणा के पात्र हैं करूणानिधि

लेखक-डा. दिलीप अग्निहोत्री

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पता चला कि करुणानिधि की पुत्री सेल्वी के घर पर पथराव हुआ है तो उनकी बेचैनी बढ़ गई। वह सरकार के स्वास्थ्य को लेकर परेशान थे। जिनके समर्थन पर सरकार टिकी है उन पर किसी प्रकार का प्रहार बेचैन करता है। मनमोहन सिंह ने इस घटना की घोर निंदा की और करुणानिधि को तत्काल फोन करके बताया कि सेल्वी के घर की सुरक्षा पर पूरा ध्यान दिया जाएगा। भीषण बम विस्फोटों के बाद भी बहुत सहज दिखने वाले गृहमंत्री शिवराज पाटिल भी सेल्वी के घर पर हुए पथराव से बेहद व्यथित हुए । उन्होंने भी करुणानिधि को विश्वास दिलाया कि सेल्वी के घर की सुरक्षा में कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने पथराव की घटना को निंदनीय बताया।

इसमें कोई शक नहीं है सेल्वी के घर पर पथराव अनुचित और असामाजिक घटना है, इसकी निंदा होनी चाहिए। मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल ने इसकी निंदा करके कुछ भी गलत नहीं किया। लेकिन करोड़ों लोगों की भावनाओं पर प्रहार के बाद भी इनका मौन रहना गलत था। केवल इसलिए कि सरकार चलती रहे। सच्चाई यह है कि मनमोहन सिंह, शिवराज पाटिल या सोनिया गांधी एक बार करुणानिधि द्वारा भगवान राम के बारे में की गई टिप्पणी की निंदा कर देते तब भी उनकी सरकार को खतरा नहीं होता। वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में करुणानिधि संप्रग से हटने के बारे सोच भी सकते। तमिलनाडु में ही लोकप्रियता के मामले में अद्रमुक नेता जयललिता उनके काफी बढ़त ले चुकी हैं। करुणानिधि की लोकप्रियता की तरह ही उनके स्वास्थ्य का ग्राफ भी नीचे की तरफ जा रहा है। सत्ता में बचे हुए सीमित समय में ही उन्हें बहुत कुछ करना है। अपनी पुत्री को केंद्र की राजनीति में स्थापित करना है और तमिलनाडु में पुत्र को उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाना है। यह करुणानिधि के शेष राजनीतिक जीवन का एकमात्र एजेण्डा है।

मुख्यमंत्री होने के बाद भी करूणानिधि की इतनी सीमित सोच क्यों है? क्यों वह अपनी बेटी और बेटों को राजनीति की बुलंदियों पर पहुँचा देना चाहते हैं? यह उनकी परिवार के प्रति परम आसक्ति का परिणाम है। इसके लिए वह कुछ भी करने को तत्पर है। बताया जाता है कि करुणानिधि नास्तिक है। फिर भी परिवार का मोह उनकी कमजोरी है, क्योंकि परिवार के प्रति वह आस्तिक है। ईश्वर और बहुत हद तक समाज के प्रति वह अवश्य नास्तिक माने जाते हैं। करुणानिधि के परिवार की महिलाओं को दयानिधि मारना की बढ़ती लोकप्रियता पसंद नहीं थी, इसलिए करुणानिधि ने उन्हें केंद्रीय मंत्रिमण्डल से हटवा दिया था। जबकि दयानिधि भी उनके करीबी रिश्तेदार है, समाज के अन्य लोगों की बात तो बहुत दूर है। यह करीबी रिश्तेदार के प्रति करुणानिधि का रवैया है। नास्तिक करुणानिधि अपने पुत्री व पुत्र के प्रति इतने क्यों परेशान है। क्योंकि वह उन्हें स्वभाविक रूप से बहुत चाहते हैं। इसे उन्होंने राजधर्म को छोड़कर पिता का कर्त्तव्य मान लिया हे। पुत्री के घर पर होने वाला पथराव उन्हें आहत करता है, मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल की बातें उन्हें राहत पहुँचाती है। चाहत और विश्वास पर मामूली प्रहार किस कदर आहत करता है, इसे करुणानिधि ने बेटी के घर पर हुए पथराव से समझा होगा। बताया जाता है कि इस संबंध में मनमोहन सिंह से वार्ता करते समय करुणानिधि बेहद भावुक हो गए थे।

करुणानिधि को यह समझना चाहिए कि उनकी बेटी के घर पर अराजक तत्वों ने पथराव किया था। उनकी बेटी पूरी तरह सुरक्षित थी। फिर भी बंगलौर की इस खबर से चेन्नई में बैठे करुणानिधि आहत हुए थे। करुणानिधि को अराजकतत्व कैसे कहें। वे तो मुख्यमंत्री है। लेकिन लोगों की भावनाओं पर किया गया उनका प्रहार अराजक तत्वों द्वारा किए गए पथराव के मुकाबले ज्यादा घातक और जानलेवा था। करोड़ों लोगों की आस्था को आहत करने वाले इस कृत्य की निंदा मनमोहन सिंह, शिवराज पाटिल, सोनिया गांधी व धर्मनिरपेक्षता के रहनुमाओ को करनी चाहिए थी। सेल्वी के घर पर हुए पथराव की निंदा की गई, अराजक तत्वों के साथ सख्ती से पेश आने का दम भरा गया, लेकिन एक साथ करोड़ों लोगों के दिलों पर पथराव करने वाले करुणानिधि अराजक नहीं बल्कि केंद्र सरकार के आधार है। इसलिए उनकी टिप्पणी की निंदा करने का साहस संप्रग के किसी भी नेता में नहीं था।

फिल्मों के पटकथा लेखक के रूप में अपना कैरियर शुरू करने वाले करुणानिधि रामकथा पर शास्त्रार्थ करने को तैयार है। उनके पास शास्त्रार्थ करने लायक ज्ञान है तब वह यह भी जानते होंगे कि विश्व में हिंदू धर्म ही ऐसा है जहाँ सगुण, निर्गुण यहाँ तक कि नास्तिक आदि को मान्यता मिली है। प्रगतिशील विचारधारा के महान साहित्यकार अज्ञेय ने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँचने पर लिखा कि दुनिया में केवल हिन्दू धर्म ने अपने अनुयायियों के लिए बाड़े का निर्माण नहीं किया। इसमें भगवान राम को मानने वाले निर्गुण और सगुण-निर्गुण किसी को न मानने वाले करुणानिधि जैसे नास्तिक भी है। इनमें से किसी के खिलाफ कोई फतवा जारी नहीं किया जा सकता। संपूर्ण समाज की बात अलग एक ही परिवार में इन विभिन्न उपासना पध्दति व विचार को मानने वाले लोगों का एक साथ रहना सामान्य बात हैं अपनी विचारधारा दूसरे पर न थोपने और दूसरे की आस्था का सम्मान करने के कारण ही यह विविधता लाखों वर्षों से अनवरत चल रही है।

क्या करुणानिधि जैसे लोग इस विविधता में खलनायक की भूमिका में नहीं है। फिल्मी पटकथा लिखते समय उन्होंने कितने खलनायक पात्र गढ़े होंगे, लेकिन आज उनकी भूमिका को क्या कहा जाए? करुणानिधि स्वयं भगवान राम पर विश्वास ना करें, इस पर आपत्ति नहीं हो सकती। नास्तिक होने के बाद भी वह हिंदू ही रहेंगे। लेकिन करोड़ों लोगों की आस्था को नकारने का उन्हें अधिकार नहीं है। बेहद सीमित सोच और मानसिकता के चलते उन्हें ऐसे बड़े मामलों पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए था। वह नास्तिक हैं। क्या नास्तिक रहते हुए वह किसी अन्य संप्रदाय मजहब के अनुयायी हो सकते है। क्या वह नास्तिक होने के कारण किसी अन्य मजहब की आस्थाओं को नकारने का साहस कर सकते हैं? ऐसी बातें हमेशा प्रमाण पर आधारित नहीं होती, यह लोगों का विश्वास होता है जिसमें तर्क की गुंजाइश नहीं रहती।

करुणानिधि को अपनी सीमित मानसिकता से बाहर निकलकर सोचने का प्रयास करना चाहिए। तब उन्हें दिखाई देगा कि कुछ विश्वास ऐसे होते हैं जिनके पक्ष में प्रमाण भी होते हैं। नासा के एक पूर्व उपनिदेशक जो ईसाई थे उन्होंने व्यापक अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला था कि उपग्रह से रामसेतु के चित्र बिल्कुल वैसे है जैसा कालिदास ने अपने ग्रंथ रघुवंशम में चित्रण किया है। कहाँ आधुनिक उपग्रह के चित्र कहाँ प्राचीन रघुवंशम का चित्रण फिर भी समानता है। पाँच-छह सदियाँ किसी मजहब के लिए बहुत बड़ी अवधि हो सकती है। लेकिन रामकथा के प्रसंग में यह अवधि ज्यादा नहीं कही जा सकती। इस बात के प्रमाण है कि करीब छ: शताब्दी पहले तक रामसेतु भारत व श्रीलंका के बीच आवागमन का सुगम साधन था। हाँ, उस पुल के निर्माताओं की इंजीनियरिंग डिग्रियाँ तलाशने का काम करुणानिधि जैसे विद्वान नहीं कर सकते हैं। करुणानिधि इस बात पर भी सिर खपा रहे होंगे कि तमिलनाडु के भव्य मंदिरों का निर्माण करने वालों को इंजीनियरिंग की डिग्रियाँ कहां से मिली होंगी? भगवान राम पर शास्त्रार्थ करने लायक बुध्दि करुणानिधि जैसे लोगों के पास नहीं है, वह अयोध्या से लंका तक की भगवान राम की यात्रा मार्ग का अध्ययन कर लें तो प्रमाणें से उनकी ऑंखें खुल जाएंगी। करुणानिधि का नास्तिक चिंतन उन्हें मुबारक लेकिन किसी अन्य की आस्था पर निचले स्तर की मानसिकता के चलते उन्होंने जो टिप्पणी की उसके लिए वह करुणा के पात्र हैं।(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)