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Saturday 3 November 2007

करूणा के पात्र हैं करूणानिधि

लेखक-डा. दिलीप अग्निहोत्री

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पता चला कि करुणानिधि की पुत्री सेल्वी के घर पर पथराव हुआ है तो उनकी बेचैनी बढ़ गई। वह सरकार के स्वास्थ्य को लेकर परेशान थे। जिनके समर्थन पर सरकार टिकी है उन पर किसी प्रकार का प्रहार बेचैन करता है। मनमोहन सिंह ने इस घटना की घोर निंदा की और करुणानिधि को तत्काल फोन करके बताया कि सेल्वी के घर की सुरक्षा पर पूरा ध्यान दिया जाएगा। भीषण बम विस्फोटों के बाद भी बहुत सहज दिखने वाले गृहमंत्री शिवराज पाटिल भी सेल्वी के घर पर हुए पथराव से बेहद व्यथित हुए । उन्होंने भी करुणानिधि को विश्वास दिलाया कि सेल्वी के घर की सुरक्षा में कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने पथराव की घटना को निंदनीय बताया।

इसमें कोई शक नहीं है सेल्वी के घर पर पथराव अनुचित और असामाजिक घटना है, इसकी निंदा होनी चाहिए। मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल ने इसकी निंदा करके कुछ भी गलत नहीं किया। लेकिन करोड़ों लोगों की भावनाओं पर प्रहार के बाद भी इनका मौन रहना गलत था। केवल इसलिए कि सरकार चलती रहे। सच्चाई यह है कि मनमोहन सिंह, शिवराज पाटिल या सोनिया गांधी एक बार करुणानिधि द्वारा भगवान राम के बारे में की गई टिप्पणी की निंदा कर देते तब भी उनकी सरकार को खतरा नहीं होता। वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में करुणानिधि संप्रग से हटने के बारे सोच भी सकते। तमिलनाडु में ही लोकप्रियता के मामले में अद्रमुक नेता जयललिता उनके काफी बढ़त ले चुकी हैं। करुणानिधि की लोकप्रियता की तरह ही उनके स्वास्थ्य का ग्राफ भी नीचे की तरफ जा रहा है। सत्ता में बचे हुए सीमित समय में ही उन्हें बहुत कुछ करना है। अपनी पुत्री को केंद्र की राजनीति में स्थापित करना है और तमिलनाडु में पुत्र को उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाना है। यह करुणानिधि के शेष राजनीतिक जीवन का एकमात्र एजेण्डा है।

मुख्यमंत्री होने के बाद भी करूणानिधि की इतनी सीमित सोच क्यों है? क्यों वह अपनी बेटी और बेटों को राजनीति की बुलंदियों पर पहुँचा देना चाहते हैं? यह उनकी परिवार के प्रति परम आसक्ति का परिणाम है। इसके लिए वह कुछ भी करने को तत्पर है। बताया जाता है कि करुणानिधि नास्तिक है। फिर भी परिवार का मोह उनकी कमजोरी है, क्योंकि परिवार के प्रति वह आस्तिक है। ईश्वर और बहुत हद तक समाज के प्रति वह अवश्य नास्तिक माने जाते हैं। करुणानिधि के परिवार की महिलाओं को दयानिधि मारना की बढ़ती लोकप्रियता पसंद नहीं थी, इसलिए करुणानिधि ने उन्हें केंद्रीय मंत्रिमण्डल से हटवा दिया था। जबकि दयानिधि भी उनके करीबी रिश्तेदार है, समाज के अन्य लोगों की बात तो बहुत दूर है। यह करीबी रिश्तेदार के प्रति करुणानिधि का रवैया है। नास्तिक करुणानिधि अपने पुत्री व पुत्र के प्रति इतने क्यों परेशान है। क्योंकि वह उन्हें स्वभाविक रूप से बहुत चाहते हैं। इसे उन्होंने राजधर्म को छोड़कर पिता का कर्त्तव्य मान लिया हे। पुत्री के घर पर होने वाला पथराव उन्हें आहत करता है, मनमोहन सिंह और शिवराज पाटिल की बातें उन्हें राहत पहुँचाती है। चाहत और विश्वास पर मामूली प्रहार किस कदर आहत करता है, इसे करुणानिधि ने बेटी के घर पर हुए पथराव से समझा होगा। बताया जाता है कि इस संबंध में मनमोहन सिंह से वार्ता करते समय करुणानिधि बेहद भावुक हो गए थे।

करुणानिधि को यह समझना चाहिए कि उनकी बेटी के घर पर अराजक तत्वों ने पथराव किया था। उनकी बेटी पूरी तरह सुरक्षित थी। फिर भी बंगलौर की इस खबर से चेन्नई में बैठे करुणानिधि आहत हुए थे। करुणानिधि को अराजकतत्व कैसे कहें। वे तो मुख्यमंत्री है। लेकिन लोगों की भावनाओं पर किया गया उनका प्रहार अराजक तत्वों द्वारा किए गए पथराव के मुकाबले ज्यादा घातक और जानलेवा था। करोड़ों लोगों की आस्था को आहत करने वाले इस कृत्य की निंदा मनमोहन सिंह, शिवराज पाटिल, सोनिया गांधी व धर्मनिरपेक्षता के रहनुमाओ को करनी चाहिए थी। सेल्वी के घर पर हुए पथराव की निंदा की गई, अराजक तत्वों के साथ सख्ती से पेश आने का दम भरा गया, लेकिन एक साथ करोड़ों लोगों के दिलों पर पथराव करने वाले करुणानिधि अराजक नहीं बल्कि केंद्र सरकार के आधार है। इसलिए उनकी टिप्पणी की निंदा करने का साहस संप्रग के किसी भी नेता में नहीं था।

फिल्मों के पटकथा लेखक के रूप में अपना कैरियर शुरू करने वाले करुणानिधि रामकथा पर शास्त्रार्थ करने को तैयार है। उनके पास शास्त्रार्थ करने लायक ज्ञान है तब वह यह भी जानते होंगे कि विश्व में हिंदू धर्म ही ऐसा है जहाँ सगुण, निर्गुण यहाँ तक कि नास्तिक आदि को मान्यता मिली है। प्रगतिशील विचारधारा के महान साहित्यकार अज्ञेय ने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँचने पर लिखा कि दुनिया में केवल हिन्दू धर्म ने अपने अनुयायियों के लिए बाड़े का निर्माण नहीं किया। इसमें भगवान राम को मानने वाले निर्गुण और सगुण-निर्गुण किसी को न मानने वाले करुणानिधि जैसे नास्तिक भी है। इनमें से किसी के खिलाफ कोई फतवा जारी नहीं किया जा सकता। संपूर्ण समाज की बात अलग एक ही परिवार में इन विभिन्न उपासना पध्दति व विचार को मानने वाले लोगों का एक साथ रहना सामान्य बात हैं अपनी विचारधारा दूसरे पर न थोपने और दूसरे की आस्था का सम्मान करने के कारण ही यह विविधता लाखों वर्षों से अनवरत चल रही है।

क्या करुणानिधि जैसे लोग इस विविधता में खलनायक की भूमिका में नहीं है। फिल्मी पटकथा लिखते समय उन्होंने कितने खलनायक पात्र गढ़े होंगे, लेकिन आज उनकी भूमिका को क्या कहा जाए? करुणानिधि स्वयं भगवान राम पर विश्वास ना करें, इस पर आपत्ति नहीं हो सकती। नास्तिक होने के बाद भी वह हिंदू ही रहेंगे। लेकिन करोड़ों लोगों की आस्था को नकारने का उन्हें अधिकार नहीं है। बेहद सीमित सोच और मानसिकता के चलते उन्हें ऐसे बड़े मामलों पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए था। वह नास्तिक हैं। क्या नास्तिक रहते हुए वह किसी अन्य संप्रदाय मजहब के अनुयायी हो सकते है। क्या वह नास्तिक होने के कारण किसी अन्य मजहब की आस्थाओं को नकारने का साहस कर सकते हैं? ऐसी बातें हमेशा प्रमाण पर आधारित नहीं होती, यह लोगों का विश्वास होता है जिसमें तर्क की गुंजाइश नहीं रहती।

करुणानिधि को अपनी सीमित मानसिकता से बाहर निकलकर सोचने का प्रयास करना चाहिए। तब उन्हें दिखाई देगा कि कुछ विश्वास ऐसे होते हैं जिनके पक्ष में प्रमाण भी होते हैं। नासा के एक पूर्व उपनिदेशक जो ईसाई थे उन्होंने व्यापक अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला था कि उपग्रह से रामसेतु के चित्र बिल्कुल वैसे है जैसा कालिदास ने अपने ग्रंथ रघुवंशम में चित्रण किया है। कहाँ आधुनिक उपग्रह के चित्र कहाँ प्राचीन रघुवंशम का चित्रण फिर भी समानता है। पाँच-छह सदियाँ किसी मजहब के लिए बहुत बड़ी अवधि हो सकती है। लेकिन रामकथा के प्रसंग में यह अवधि ज्यादा नहीं कही जा सकती। इस बात के प्रमाण है कि करीब छ: शताब्दी पहले तक रामसेतु भारत व श्रीलंका के बीच आवागमन का सुगम साधन था। हाँ, उस पुल के निर्माताओं की इंजीनियरिंग डिग्रियाँ तलाशने का काम करुणानिधि जैसे विद्वान नहीं कर सकते हैं। करुणानिधि इस बात पर भी सिर खपा रहे होंगे कि तमिलनाडु के भव्य मंदिरों का निर्माण करने वालों को इंजीनियरिंग की डिग्रियाँ कहां से मिली होंगी? भगवान राम पर शास्त्रार्थ करने लायक बुध्दि करुणानिधि जैसे लोगों के पास नहीं है, वह अयोध्या से लंका तक की भगवान राम की यात्रा मार्ग का अध्ययन कर लें तो प्रमाणें से उनकी ऑंखें खुल जाएंगी। करुणानिधि का नास्तिक चिंतन उन्हें मुबारक लेकिन किसी अन्य की आस्था पर निचले स्तर की मानसिकता के चलते उन्होंने जो टिप्पणी की उसके लिए वह करुणा के पात्र हैं।(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

1 comment:

परमजीत बाली said...

जब करुणा सरीखे नेता के ब्यान पर, नेताओं का अपने राजनैतिक फायदे को ध्यान मे रखते हुए..जिम्मेवार लोग चुप्पी साध लेगें...तो मेरा यह हिन्दू समाज का क्या हाल होगा भविष्य में राम जानें?