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Thursday 10 May 2007

1857 की क्रांति और सावरकर की किताब


-लालकृष्ण आडवाणी
वरिष्ठ भाजपा नेता व भारत के पूर्व उप प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी एक प्रभावशाली नेता और राष्ट्रवादी विचारक के तौर पर जाने जाते हैं। वे पत्रकार रहे हैं। लिखना -पढना उनकी रूचि हैं। १८५७ की क्रांति के १५० वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस क्रांति पर केंद्रित प्रखर क्रांतिकारी वीर सावरकर की बहुचर्चित पुस्तक '१८५७ स्वतंत्रता संग्राम' को याद करते हुए श्री आडवाणी ने बहुत ही विचारोत्तेजक लेख लिखा हैं। यह लेख आज के जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रैस और दैनिक जागरण में प्रकाशित हुआ है।

हमारी
मातृभूमि के सुदीर्घ इतिहास में आज का दिन एक पवित्र दिवस है। कोई भी दिवस तब पवित्र बनता है जब राष्ट्र के लिए समर्पित कोई असाधारण ऐतिहासिक व्यक्तित्व-एक नायक या शहीद अथवा कोई संत या कोई समाज सुधारक उससे जुड़ा हो। यह पवित्रता उस समय और कई गुना बढ़ जाती है जब समूचे राष्ट्र द्वारा विदेशी शासन से स्वतंत्र होने के लिए एकजुट होकर किए गए संघर्ष का नायकत्व और त्याग की भावना उसमें जुड़ जाए। भारत के हजारों वर्ष के इतिहास में दस मई एक ऐसा ही पुण्य पवित्र दिवस है, जिस दिन 150 वर्ष पूर्व भारत की स्वतंत्रता के पहले व्यापक युद्ध की शुरुआत मानी जाती है। मंगल पांडे, बहादुर शाह जफर, लक्ष्मी बाई, नानासाहब पेशवा, उनके खास सहयोगी अजीमुल्ला खान, तात्या टोपे, राजा कुंवर सिंह और मौलवी अहमद शाह सहित और भी बहुत से नाम ऐसे नायकों में शामिल है। इस अवसर पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1857 से पहले भी देशभक्तों द्वारा भारत के विभिन्न स्थानों पर स्वतंत्रता संघर्ष की ज्वाला प्रज्ज्वलित की गई।

ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारत के इस पहले राष्ट्रीय उभार से मेरा पहला परिचय संयोग से युवावस्था में हुआ-वह भी एक ऐसे क्रांतिकारी लेखक की क्रांतिकारी पुस्तक के माध्यम से जो 1857 की गाथा के अभिवाज्य अंग हैं। उस समय मैं 14 वर्ष का स्कूली विद्यार्थी था और सिंध के कराची में रहता था। सिंध में चल रहे स्वतंत्रता संघर्ष की हवाओं के झोंकों से मैं पहले ही जुड़ा था। मुझे विनायक दामोदर सावरकर की पुस्तक '1857 द वार ऑफ इंडिपेंडेंस' के बारे में पता चला। मैं सावरकर से सिर्फ एक बार-नवंबर 1947 में मिला। अपनी पहली बंबई यात्रा में मैं जिस व्यक्ति के साथ रुका था उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कौन से आकर्षक स्थल देखना चाहूंगा? मैंने कहा ''मुझे वीर सावरकर के घर ले चलिए।'' शिवाजी पार्क स्थित सावरकर के निवास पर उनकी चुंबकीय उपस्थिति में मैं बैठा था और उन्होंने मुझ से सिंध की स्थिति तथा विभाजन के बाद हिंदुओं की स्थिति के बारे में पूछा। सावरकर ने यह पुस्तक लंदन में लिखी, जहां वह कानून की पढ़ाई करने गए थे, लेकिन शीघ्र ही वह क्रांतिकारी गतिविधियों में लिप्त हो गए। उनकी उम्र केवल 25 वर्ष थी। 1857 की पचासवीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में मराठी में पुस्तक का मूल पाठ 1907 में तैयार हो गया था। इसे गुपचुप तरीके से भारत भेजा गया, लेकिन भारत में यह प्रकाशित नहीं हो सकती थी, क्योंकि ब्रिटिश सरकार को इसका पता चल गया और उसने इसका मुद्रण करने वाली प्रिंटिंग प्रेस पर छापे मारे। चमत्कारिक ढंग से यह पांडुलिपि सुरक्षित बच गई और इसे सावरकर के पास पेरिस में भेजा गया। उनके सहयोगी क्रांतिकारियों ने इसे अंग्रेजी में अनुदित किया, मगर इंग्लैंड और फ्रांस में कोई भी प्रकाशक इसे प्रकाशित करने को तैयार नहीं था। अंतत: 1909 में यह पुस्तक हालैंड में प्रकाशित हुई और इसकी प्रतियां भारत में गुपचुप तरीके से लाई गई। लेखक को 1910 में लंदन में देशद्रोह के आरोपों में गिरफ्तार कर भारत लाया गया, जहां उन्हे दो जन्मों के आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई और अंडमान और निकोबार द्वीप की भयावह सेलुलर जेल-'काला पानी' में भेज दिया गया।

सावरकर ने 11 वर्ष अंधेरी काल कोठरी में बिताए, जहां से फांसी में काम आने वाले फंदों को साफ देखा जा सकता था। इस प्रतिबंधित पुस्तक के अनेक संस्करण प्रकाशित हुए। मैडम कामा ने यूरोप में इसका दूसरा संस्करण निकाला। क्रांतिकारी गदर पार्टी के नेता लाला हरदयाल ने अमेरिका में इसका संस्करण निकाला। भारत में पहली बार 1928 में भगत सिंह और उनके साथियों ने इसका प्रकाशन किया। सुभाषचंद्र बोस और रासबिहारी बोस ने इसे 1944 में जापान में प्रकाशित किया और यह पुस्तक आजाद हिंद फौज के सिपाहियों के लिए लगभग एक पाठ्य पुस्तक के रूप में प्रचलित हो गई। 1947 में पुस्तक पर से प्रतिबंध हटने से पूर्व ही सावरकर की पुस्तक अनेक भारतीय भाषाओं में भूमिगत ठिकानों पर उपलब्ध होने लगी थी। यह एक ऐसे क्रांतिकारी द्वारा शब्दबद्ध रचना थी जिसे अपनी गतिविधियों के लिए अकल्पनीय यातनाएं सहनी पड़ीं और उसके बदले उसने अनेक असंख्य क्रांतिकारियों को भारत आजाद कराने के एकमात्र लक्ष्य के लिए प्रेरित किया। सावरकर की पुस्तक अपने उत्प्रेरक और विश्लेषणात्मक कथ्य में उल्लेखनीय है। इस उभार के ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों को विश्लेषित करते हुए उन्होंने ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा प्रचारित की गई धारणाओं का खंडन किया। आश्चर्यजनक रूप से इनमें से कुछ अभी भी बताई जाती है और प्रकाशित की जा रही है। वह पूछते हैं, ''पेशावर से कलकत्ता तक जो आंधी चली उसका उद्देश्य इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि उसे अपनी साम‌र्थ्य भर कुछ खास चीजों को नष्ट कर देना है।'' उन्होंने उन कारणों की खोज की जिनसे फौजी और सामान्य जन, राजा और रंक, हिंदू और मुसलमान-सभी की भावना जागृत हो गई थी। इसे उन्होंने दो शब्दों में वर्णित किया-स्वधर्म और स्वराज्य।

सावरकर के अनुसार स्वराज्य स्वधर्म के बिना तुच्छ है और स्वराज्य के बिना स्वधर्म बलहीन है। उन्होंने मध्यकालीन इतिहास में वर्णित हिंदू-मुसलिम कटु संबंधों के लंबे अध्याय को नजरअंदाज नहीं किया, बल्कि 1857 में दोनों समुदायों द्वारा मिलकर राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए कंधे से कंधे मिलाकर लड़े गए अध्याय को सुंदर ढंग से वर्णित किया है। उन्होंने वर्णन किया है कि कैसे दोनों समुदायों के नेता महसूस करते थे कि अब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच के मतभेद अतीत की बात बननी चाहिए, क्योंकि उनका वर्तमान संबंध शासक और शासित का न होकर सामान्य रूप से बंधुओं का है। सावरकर की पुस्तक जहां देशभक्तों की वीरता का उल्लेख करती है वहीं स्वतंत्रता के इस युद्ध के असफल होने के कारणों की भी जांच-पड़ताल करती है। उनके अनुसार इसके प्रमुख कारण थे-कमजोर केंद्रीय नेतृत्व, संगठन का अभाव और नाजुक मौकों पर गद्दारों द्वारा विश्वासघात। वह लिखते है, ''क्रांति की असफलता के लिए दोषी वे है जिन्होंने अपने आलस्य और प्रमाद के लिए इस पर मर्मांतक प्रहार किया। उन वीरों को इसकी असफलता के लिए दोषी सिद्ध करने का दुस्साहस किसी को नहीं करना चाहिए जिन्होंने अपना ही उष्ण रक्त प्रवाहित करने वाली तलवारों को उठाकर क्रांति के अग्निमय रंगमंच में प्रवेश किया और जो प्रत्यक्ष मृत्यु का भी आलिंगन कर आनंद से झूम उठते थे। वस्तुत: उन्हीं की पावन प्रेरणा से भारत माता की गहन निद्रा भंग हुई थी और पराधीनता की श्रृंखलाओं को तार-तार कर देने के लिए संपूर्ण हिंदुस्तान जाग्रत हो उठा था।''

सावरकर के 546 पृष्ठों के इस महान ग्रंथ की उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें कहीं भी लेश मात्र सांप्रदायिक पूर्वाग्रह या पक्षपात नहीं है। जहां उन्होंने मुसलिमों की गद्दारी का वर्णन किया है वहीं हिंदुओं की गद्दारी को भी नहीं बख्शा। ऐसे कारणों से ही अन्य भारतीयों के साथ मैं भी दंग रह गया और मुझे पीड़ा हुई जब दो वर्ष पूर्व कांग्रेस व कम्युनिस्टों ने सावरकर के विरुद्ध आपराधिक अभियान चलाया। उन्हें बदनाम करने से पहले उनके विरोधियों को 1857 पर उनकी पुस्तक पढ़नी चाहिए और देशभक्ति से परिपूर्ण उन गीतों को सुनना चाहिए जो उन्होंने दीवारों पर अंकित किए। तब उन्हे स्वयं से पूछना चाहिए कि 1857 की 150 वीं वर्षगांठ के समारोहों में सावरकर को उनके योगदान के अनुरूप महत्व न देने के मामले में क्या हम सही है?

6 comments:

Viduur said...

Kripya Yah bhee Padh lein:

‘Kayar Savarkar’ vs ‘Veer Godse’

Link:
http://www.sifyblogs.com/blogs_postcomment.php?blogid=382&art_id=1853#read

Dhanyavad

Shrish said...

अरे वाह संजीव जी आज ही अखबार में ये लेख पढ़ा था और मैंने संभाल कर रख लिया था कि इसे ब्लॉग पर लिखूँगा। आपने यह काम कर भी लिया, बधाई !

लेख बहुत ही शानदार था।

संजय बेंगाणी said...

सुन्दर लेख प्रकाशित करने के लिए साधूवाद.

Viduur said...

Aur 2007 mein hui UP Kranti mein Mayawati ne 'Kayar Savar' dwara sthapit 'Vish Vrikhsa' ko samool Ukhad kar phenk diya.

Jay Siya Ram Jee Ki

Manish said...

shukriya is lekh ko yahan prastut karne ke liye.

मोहिन्दर कुमार said...

बहुत सुन्दर लेख लिखा है आपने.. अखवार में पढने पर भी इतना मजा नही आया था.