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Thursday 24 May 2007

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मायने: अरूण जेटली


वडोदरा में एमएस विश्वविद्यालय में लगी एक विवादास्पद कला प्रदर्शनी से कई सवाल खड़े हो गए है और कला की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति को लेकर बहस जोरों पर है। हमने अपने पिछले 'पोस्ट' में श्री अम्बा चरण वशिष्ठ के लेख से इस मुद्दे पर बहस की शुरुआत की थी, जिसे काफी लोगों ने नोट किया है। और अब इसे आगे बढाते हुए भारत सरकार के पूर्व कानून मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव व सांसद श्री अरुण जेटली का लेख प्रस्तुत कर रहे हैं। अपनी ख्याति और स्वभाव के अनुरुप उन्होंने बिल्कुल नए तर्कों और नीर क्षीर विवेक के साथ छद्म सेकुलरिस्टों को बेनकाब कर दिया है। यह लेख गत 19 मई को 'इंडियन एक्सप्रैस' में प्रकाशित हुआ था। बौध्दिक जगत में इस पर काफी विचार-विमर्श हुए है। 'जनसत्ता' में श्री प्रभाष जोशी ने इस पर टिप्पणी की है, जिसे हिन्दी ब्लॉग पर भी प्रस्तुत किया गया था। पेश है श्री जेटली के लेख का हिन्दी अनुवाद:

वडोदरा में एमएस विश्वविद्यालय में एक कला प्रदर्शनी लगी, जिसका विरोध कुछ प्रदर्शनकारियों ने किया और यह बढ़ते-बढ़ते एक राजनैतिक विवाद में बदल गई। प्रदर्शनकारियों का निश्चित मानना था कि इस प्रदर्शनी में दिखाए गए कुछ कला-चित्र एक विशेष धार्मिक सम्प्रदाय के लोगों की धार्मिक भावना को आहत करने के उद्देश्य से रखी गई हैं। इसको लेकर कलाकारों ने कडा रूख अपनाया और जिसका समर्थन कुछ राजनैतिक दलों ने भी किया एवं मीडिया के एक वर्ग ने इसकी प्रशंसा भी की कि जिन दो कलाकृतियों का विरोध किया जा रहा है, वह तो एक प्रकार से नैतिक-नियंत्रण रखने जैसा है और यह कला की स्वतंत्रता का दमन करना है। यह बहस तब तक चलती रही जब तक कि इन चित्रों को बनाने वाले युवा कलाकारों को जमानत पर रिहा नहीं कर दिया गया।

सामान्य रूप से मैं कला प्रदर्शनियों पर सेंसर लगाने और उनमें व्यवधान पैदा करने के खिलाफ हूं। इस विवाद की जड़ में पैदा हुए वास्तविक मुद्दे का अध्ययन करने और विश्लेषण करने के उद्देश्य से मैंने जानने की कोशिश की कि आखिर इन संदिग्ध कलाकृतियों में ऐसा क्या था जिससे विवाद पैदा हुआ। मेरी उत्सुकता इस बात से और भी बढ़ गई कि इन मीडिया संगठनों ने जिस कला की अभिव्यक्ति का राग छेडा था उन्होंने इस मुद्दे को मात्र कल्पनात्मक रूप से रख दिया और दर्शकों एवं पाठकों को यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर कला की अभिव्यक्ति है क्या चीज? मुझे अपने प्रयासों से पता चला कि यह विरोध उन दो चित्रों के बारे में था जिनके विषय में मीडिया के कुछ जिम्मेदार वर्गों ने सेंसर कर दिया था। मैं नहीं जानता कि यह बात जानबूझ कर हुई या फिर जिम्मेदार जर्नलिज्म के कारण हुई ताकि लोगों को इस प्रकार की बेहुदा कलाकृतियों से देखने से रोका जा सके।

मेरी उत्सुकता से मुझे यह भी पता चला कि पहली कलाकृति एक 'क्रास' पर चित्रित थी जिस पर 'ईसा मसीह' को लटका कर सूली पर चढ़ाया गया था। उक्त 'क्रास' के नीचे इंग्लिश-स्टाइल डब्लू सी बनाई गई थी। इस कलाकृति में 'लिंग' दिखाया गया था, जिसमें से इस डब्ल्यू सी में कुछ द्रव्य के कतरे गिर रहे थे। दूसरे चित्र में, जो स्पष्ट ही हिन्दू देवी 'दूर्गा' का था, उन्हें नग्न रूप में दिखाया गया था, जिनकी योनि से एक पूर्ण विकसित शिशु निकल रहा था। स्पष्ट है कि युवा कलाकार ने अपनी कलात्मक स्वच्छन्दता से 'सेक्स' रूप में एक धार्मिक आकृति बनाकर उसे चित्र का रूप दे दिया। मुझे इसमें जरा भी सन्देह नहीं है कि कलाकार का इरादा कला की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति प्रस्तुत करने का नहीं था। क्योंकि इस प्रकार की भद्दी विद्रुपता किसी भी कलात्मक अभिव्यक्ति का साधन बन ही नहीं सकती है। मुझे लगता है कि युवा कलाकार को रातों-रात अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने में सबसे सफल होने का यही साधन आसान लगा।

आज भारतीय समाज के सामने प्रमुख प्रश्न यही है कि क्या किसी व्यक्ति के पास, जिसमें कलाकार भी शामिल है ऐसी कोई स्वतंत्रता प्राप्त है जिसमें उसे देवी देवताओं की निंदा का अधिकार मिल जाए? संविधान 19 (1) (ए) के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक को यही सर्वाधिक मूल अधिकार की गारण्टी है कि उसे भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है, परन्तु यह अधिकार कुछ प्रतिबंधों के अधीन रहता है, जिसमें अन्य बातों के अलावा सरकार जनहित, शालीनता अथवा नैतिकता के हित में इस अधिकार पर प्रतिबंध लगा सकती है। यह विषय शालीनता और नैतिकता का है, परन्तु, चलिए, थोड़ी देर के लिए हम इसे भूल जाते हैं। जनहित में व्यवस्था कायम रखने की जिम्मेदारी किसी भी व्यक्ति को इस बात से निषेध करती है कि वह ऐसी कोई गतिविधि न करे जिसे सार्वजनिक व्यवस्था पर आंच आती हो। डेनिश कार्टून विवाद से यह बात एकदम स्पष्ट है कि कार्टून मात्र हास्यास्पद ढंग से अभिव्यक्ति का साधन मात्र नहीं है जिसके कारण किसी प्रकार की अव्यवस्था फैल जाए। हालांकि कार्टून में कोई सैक्स सम्बन्धी सामग्री नहीं थी, फिर भी विश्व भर में उसके कारण गड़बड़ी फैली। धार्मिक संवेदनाओं की उपेक्षा हुई। वर्तमान मामले में तो यह भारतीय समाज की सहिष्णुता का गहरा प्रतीक है कि यहां केवल इस कला प्रदर्शनी में मात्र नारेबाजी तक ही सीमित रही। आपत्ति की बात इतनी ही नहीं है कि युवा कलाकार गलत ढंग से रोमानी बन गया, बल्कि समाज के इस वर्ग ने जिद ठान ली कि हमारी कला की स्वतंत्रता को तो देवी-देवताओं की निंदा करने का अधिकार प्राप्त है। हमने देखा है कि सिरसा में मात्र एक सिख गुरू की नकल उतारना ही सार्वजनिक अव्यवस्था फैलने का कारण बन गया है। क्या यह बात समझ में नहीं आ सकती है कि ईसा मसीह या देवी दुर्गा की ऐसी सेक्स-अभिव्यक्त चित्रों से समाज पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा?

भारत के दण्डविधान में यब बात बहुत स्पष्ट है। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153ए में ऐसे किसी भी व्यक्ति को दण्ड मिल सकता है जो अन्य बातों के अलावा किसी भी दृश्य-प्रस्तुति के माध्यम से धार्मिक असद्भावना, वैमनस्य अथवा घृणा की भावना को फैलाता हो। आईपीसी की धारा 295 में ऐसे किसी व्यक्ति को दण्ड का भागी बनना पड़ेगा, जो किसी भी व्यक्ति द्वारा पवित्र मानी जाने वाली किसी भी मूर्ति को विध्वंस, क्षतिग्रस्त या खराब करने का इस उद्देश्य से कार्य करता है कि ऐसा करने से किसी धर्म का अपमान हो। यदि इस प्रकार के दृश्य सिनेमाओं में दिखाए जाएं तो क्या सेंसर बोर्ड उन्हें कभी पास करता? इंग्लैण्ड में इसी टेस्ट के आधार पर सेंसर बोर्ड ने 'विजन आफ एक्सटेसी' नाम की वीडियो फिल्म पास नहीं की थी क्योंकि उसमें कहा था कि ''प्रश्न यह नहीं है कि अभिव्यक्त विषय क्या था, बल्कि देखना यह होगा कि उसे किस ढंग, किस लहजे, स्टाइल और भावना में पेश किया गया है। आपने जो वीडियो फिल्म पेश की है, उसमें धार्मिक उन्माद और सेक्स भावना का मिला-जुला रूप है, जो एक ऐसा विषय है जो भले ही कलाकार की वैध चिंता का विषय हो, परन्तु यह उस समय देवी-देवताओं की निंदा की कानून में आ जाता है, जब वह इस ढंग से पेश किया जाए, जिससे एक पावन विषय को लोग स्वीकार न कर उनकी नाराजगी का कारण बन जाए। क्योंकि सूली पर चढ़े ईसा के जख्मी शरीर को उस रूप में पेश किया गया है, जिसमें दर्शकों को भ्रम पैदा हो सकता है, इसलिए बोर्ड तथा इसके कानूनी सलाहकारों का विचार है कि इससे देवी-देवताओं की निंदा के कानून का उल्लंघन होता है।''

सेंसर बोर्ड को चुनौती दी गई और यह चुनौती 'यूरोपियन कोर्ट आफ ह्यूमेन राइट्स' तक गई, जहां निर्णय किया कि 'हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इस फिल्म में देवी-देवताओं की निंदा सम्बन्धी विषय है और यह नहीं कहा जा सकता है कि अथारिटीज ने इसमें कोई गलत कदम उठाया है।''

यह अलग बात है कि इंग्लैण्ड में ईश-नंदा का कानून केवल क्रिश्चियनिटी के प्रति अतिक्रमण और अपमान जैसी गतिविधियों में होता है। जब एक मजिस्ट्रेट ने सलमान रूश्दी और 'द सेटेनिक वर्सेज' के प्रकाशक के खिलाफ देवी-देवताओं की निंदा पर सम्मन जारी करने से इंकार किया तो लार्ड वाटकिंस का कहना था- ''इसमें कोई शक नहीं कि जो कानून इस समय है वह केवल क्रिश्चियनिटी के अलावा और किसी धर्म के लिए नहीं है।'' इंग्लैण्ड में इस कानून में संशोधन करने तथा क्रिश्चियनिटी के साथ अन्य धर्मों को एक जैसा बनाने का प्रयास सफल नहीं हुआ है।''

उदार विचार रखने वाले लोगों का तर्क है कलाकारों को स्वतंत्रता रहनी चाहिए कि वे अपनी अभिव्यक्ति को प्रस्तुत कर सके चाहे उसमें देवी-देवताओं की निंदा हो या किसी धर्म पर हमला हो। धर्म में आस्था रखने वाले लोग इससे सहमत नहीं होते हैं। सामान्यतया ऐसा ही होता भी है। थोड़े-बहुत विरोध के सिवाय भारत में वैसा कुछ देखने में नहीं आया जैसा हमने डेनिश कार्टून मामले में देखा है। यदि कोई भी नागरिक विरोध करता है तो उसे कानून को अपने हाथ में लेने की जरूरत नहीं है। साथ ही सेक्युलरिज्म की परिभाषा में जिस तरह की विकृति दिखाई पड़ती है, जो कि बहुसंख्यक लोगों पर प्रहार का पर्याय बन चुकी है, उसे भी समाप्त किया जाना चाहिए। यह विकृति वडोदरा घटना में दिखाई पड़ी। रणनीति यह रही कि लोगों को इस बात का पता ही न चले कि उन दो चित्रों का विषय क्या था? पूरी तरह से बहस को कला की स्वतंत्रता के नाम से चलाया जाए और नैतिक-नियंत्रण की पूरी अवधारणा की आलोचना की जाए। समाज को किसी नैतिकता पर नियंत्रण रखने वाले किसी पुलिसकर्मी की जरूरत नहीं है। जो लोग कला की स्वतंत्रता के नाम पर देवी-देवताओं की निंदा करने में लगे रहते हैं, वे समझ लें कि नैतिक-नियंत्रण समाज में फिर भी बना रह सकता है।

6 comments:

mahashakti said...

हाल के उत्‍तर प्रदेश चुनाव मे अरूण जी को काफी करीब से सुनने को मिला, सुनकर लगा कि सफलता पेड़ पर नही लटकती निश्चित रूप से उसके लिये प्रयास करना होता है। अरूण जी देश के प्रखर विद्वानों मे एक है। उनके लेख सार्थक है।

आदिविद्रोही said...

संजीव बबुआ
चेहरे से तो बबुआ ही लगते हो। संघी आपको खुब ज्ञान दे रहे हैँ. आपका पहला वाक्य ही गलत है, चन्द्रमोहन की कोई प्रदर्शनी नहीं लगी थी, केवल छात्रों और शिक्षकों ने अपनी परीक्षा की कापी रखी थी। जेटली के विचार क्या, पइसा फेंको तमाशा देखो, जेटली जी ने एक से एक भ्रष्ट लोगों का मुकदमा लड़ा और जोरदार बहस की है ,इसका ई मतलब नहीं है कि वह जो कह रहे था वह सहि भी था।

dhurvirodhi said...

धन्यवाद संजीव जी, काफी जानकारी परक लेख उपलब्ध कराया है.

संजीव कुमार सिन्हा said...

भैया आदिविद्रोही जी,
नमस्कार।
आपके आत्मीय संबोधन हेतु आपको धन्यवाद।
आपने फरमाया है कि जेटली जी ने एक से एक भ्रष्ट लोगों का मुकदमा लड़ा। बेहतर होता यदि आप कोई उदाहरण प्रस्तुत करते और इससे भी बेहतर होता यदि आप इस लेख पर कोई विचार प्रस्तुत करते। धन्यवाद।

विशेष said...

आदि विद्रोही जी,

चन्‍द्रमाहन प्रकरण पर भ्रम दूर कर लेना जरूरी है. परीक्षा के दौरान कृतियों का प्रदर्शन होता है, हालांकि वे सार्वजनिक अवलोकन के लिए नहीं होतीं. कई लोग इसे गलत तरीके से प्रचारित कर रहे हैं.

Atul Sharma said...

संजीवजी आपने तथ्यपरक जानकारी उपलब्ध कराई है।

आदिविद्रोही महोदय, मेरे शहर में कलाकार के सेशनल वर्क महाविद्यालय की गैलेरी में सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किए जाते हैं और अधिकांश जगह यदि परिपाटी है। आप जाकर किसी कला महाविद्यालय में पता कर सकते हैं।