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Sunday, 20 July, 2008

गैर कांग्रेसवाद का अलख, द्विध्रुवीय राजनीति भाजपा की देन



लेखक : भरतचन्द नायक

आज जब संसद से लेकर सड़कों तक पर साम्प्रदायिकता को कुचलने और जातिवाद का मुंहतोड जवाब देने की घोषणाएं दोहराई जाती है एक विभ्रम की स्थिति बनती दिखाई देती है। हमारे स्वनाम धन्य नेता विदेशों तक में अल्पसंख्यकों के साथ बेइन्साफी होने की बातें कहकर देश को लांछित करने मे भरपूर धर्म निरपेक्षता का अहसास करते है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हमें जोडने की कडी रही है। विदेशियों ने इसे कमजोर करके फूट डालो तथा राज करो की नीति अपनाकर भारत पर लंबे समय तक राज किया। फिर भी हमने उससे सबक नहीं लिया है। कांग्रेस और वामपंथियों ने सेकुलरवाद और साम्प्रदायिकता का जो विवाद पैदा किया है जनता की उसमें कोई रूचि नहीं रह गयी है। थामस फ्रेडमेन की पुस्तक ''द वर्ल्ड इज फ्लेट'' ने भारत में चल रहे इस वाद विवाद पर अच्छी व्याख्या दी है। थामस ने लिखा है कि भारत में अहिंसा की परंपरा हिन्दू सहिष्णुता की देन है। अमेरिका में हुई 11 सितंबर की आतंकवादी घटना ने इसका सबूत दिया है। भारत में मुसलमानों की संख्या मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान से कहीं अधिक है। लेकिन 11 सितंबर की घटना में जिस अलकायदा मुस्लिम आतंकवादी संगठन की संलग्नता है। भारत का कोई मुसलमान उससे प्रभावित अथवा संबंधित नहीं पाया गया। पन्द्रह करोड मुसलमान भारत में रहते है। उनमें पिछड़ापन भी है, उनकी अन्य समस्याएं भी है। लेकिन वे अलकायदा के रास्ते पर नहीं चले सकते। क्योंकि उनका मानस भारतीय है। हिन्दू सहिष्‍णुता वाले भारत में खुला सेकुलरवाद धरती की देन है। लोकतंत्र की हवा में वह रचा पका है। साम्प्रदायिकता और जातिवाद को कुचलने का आव्हान करने वाले भेड़िया आया पुकार पुकार कर अपनी हताशा बयान कर रहे है।

आजादी के बाद देश में अलगाववादी विचारधारा को मोड़ देकर एकता के सूत्र में बांधने के लिये समकालीन राजनीति में भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी ने जो भी योगदान दिया है उसके सुफल को आगामी पीढियां गर्व के साथ याद करेगी। लोकतंत्र में अवसरवादी राजनीति को लंबे समय तक संरक्षण नहीं मिल सकता है। सोमनाथ से अयोध्या तक जो राष्ट्रीय एकता यात्रा निकाली गयी और राम जन्मभूमि आंदोलन चला उसने जाति पांति के विवाद को दफन कर दिया। लोगों की समझ में आया कि श्रीराम धार्मिक प्रतीक भर नहीं है। वे भारतीय लोकाचार, संस्कृति और राष्ट्रीय भावनात्मक एकता के प्रतीक है। राष्ट्रीय अवधारणा के प्रतीक है। जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी ने देश में अल्पसंख्यकवाद और सेकुलरवाद के छद्म को जिस तरह बेनकाब किया है तथा सबके लिये न्याय समान अवसर और विकास को फोकस में लाया गया है विभाजनकारी विचारों की डुग्गी पीटने वाले बेपरदा हो गये है। भारतीय जनता पार्टी की इस सफलता को देश की जनता ने सराहा है और राजनीति को दो ध्रुवीय बनाने के प्रयास में दिल खोलकर समर्थन दिया है। गठबंधन राजनीति के शिल्प को जिस तरह भाजपा ने गढ़ा है। उससे क्षेत्रीय अस्मिता का सम्मान हुआ है। इसका स्पष्ट असर यह हुआ कि उत्तर दक्षिण, पूर्व पश्चिम का दुराव समाप्त हो गया है। क्षेत्रवादी दावे अतीत के अध्याय बनकर रह गये है। भाजपा की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता के झण्डे गढ़े है। क्षेत्रीय दलों ने भारतीय जनता पार्टी के साथ राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन में शिरकत कर अपने को गौरवान्वित महसूस किया है।

जम्मू कश्मीर का भारत का अभिन्न अंग बना रहना, नागरिकों की मौलिक आजादी, संपत्ति पर मौलिक अधिकार और सहकारी खेती से मुक्ति के लिये जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। जनसंघ की स्थापना ऐसे समय हुई थी जब विदेशी विचार राजनीति पर हावी हो चुके थे। जम्मू कश्मीर में अलग निशान, अलग संविधान और प्रथक प्रधान की व्यवस्था जारी रखी जा रही थी। भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 8 सितंबर 1951 को घोषणा पत्र जारी किया था।

पहले लोकसभा चुनाव में तीन सीटों पर विजय प्राप्त हुई। भारतीय जनसंघ ने गणतंत्र परिषद, हिन्दू महासभा, तमिलनाडू टायलर्स पार्टी, अकाली दल, कामनवील पार्टी, द्रविड कजगम, लोकसेवक संघ और निर्दलीयों को मिलाकर नेशनल डेमाक्रेटिक फ्रंट की संसद में स्थापना पर कांग्रेस को जबर्दस्त चुनौती दी गयी।

जनसंघ ने गौहत्या पर प्रतिबंध की मांग की और पूर्वी बंगाल में अल्पसंख्यकों को संरक्षण दिये जाने की मांग की। जम्मू कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय के लिये 6 मार्च 1953 को दिल्ली में सत्याग्रह किया और 11 मई को डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने बिना परमिट के जम्मू मे ंप्रवेश किया। जून में श्रीनगर जेल में डॉ मुखर्जी शहीद हो गये। देश की अखण्डता के लिये जनसंघ ने दादरा मुक्ति आंदोलन चलाया। जून 1955 में जनसंघ के जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में जेल भरो आंदोलन किया। मध्यप्रदेश से गये सत्याग्रहियों में से राजाभाउ महाकाल गोवा आंदोलन में शहीद हो गये। तिब्बत को लेकर सत्याग्रह किया गया। जनसंघ लगातार चीन की विस्तारवादी साजिशों से तत्कालीन पं. नेहरू सरकार को आगाह करता रहा। 1959 में अटलबिहारी वाजपेयी ने केन्द्र सरकार से चीन विवाद पर श्वेत पत्र जारी करने का आग्रह किया था जिससे चीन की सजिशें विश्व के सामने उजागर की जा सके। आज चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के जो विवाद चल रहे है उनके बारे में यही कहना अधिक सभी चीन होगा कि लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई।

बेरूवाडी के हस्तांतरण, कच्छ समझौता, ताशकंद समझौता का विरोध करके जनसंघ ने राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति कड़ा रूख अपनाया, लेकिन अपने संख्या बल पर गर्वित होकर कांग्रेस ने तात्कालिक लाभ को ही तरजी दी। देश में 18 वर्ष में वयस्क मताधिकार दिलाने की मांग जनसंघ ने 26 अगस्त 1968 को ही कर दी थी। आदिवासियों का मसीहा साबित करने वाली कांग्रेस के सामने जनसंघ ने बार बार ज्ञापन सौपे और भूमि सुधार करने की जरूरत रेखांकित की थी। साठ के दशक में राज्यों में जनसंघ ने संयुक्त विधायक दल सरकारों की कल्पना को साकार कर कांग्रेस के राजनैतिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया। कांग्रेस के बढते भ्रष्टाचार के खिलाफ जब देश में आवाज उठी 1973 में गुजरात में नवनिर्माण समिति के आंदोलन को जनसंघ ने शक्ति दी और संयुक्त संघर्ष मोर्चा में शामिल हो गया। तभी लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने जनसंघ को निकट से देखा परखा और कहा कि यदि जनसंघ साम्प्रदायिक फासिस्ट है तो लोकनायक भी फासिस्ट है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सत्ता खिसकती देखकर आपातकाल थोप दिया। तब देश काल कोठारी में बदल गया। जनसंघ ने उग्र तेवरों के साथ इंदिरा हटाओं देश बचाओ आंदोलन का झण्डा उठाया बाद में राष्ट्रहित में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया। कांग्रेस का पराभव होने के बाद केन्द्र में जो जनता पार्टी सरकार बनी उसमें अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवानी मंत्री बनाये गये। परंतु जनता पार्टी के घटक दलों की महत्वाकांक्षाएं टकराई। उन्होंने दोहरी सदस्यता का प्रश्न उठाकर जनसंघ को बाहर का रास्ता दिखा दिया। तभी कुछ राजनैतिक दलों ने इसे जनसंघ का राजनैतिक अवसान घोषित कर दिया। लेकिन जनता पार्टी संसदीय दल की बैठक में अटलबिहारी वाजपेयी ने दो टूक शब्दों में घोषणा की कि उन्हें बाहर जाना कबूल है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ मातृ संस्था है। उससे संबंध अटल रहेंगे।

भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ 6 अप्रेल 1980 को दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की अध्यक्षता स्वीकार करते हुए अटलबिहारी वाजपेयी ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की हुंकार भरी। भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पंच निष्ठा में गांधीवादी समाजवाद का समावेश कर लिया। लेकिन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सिमट कर दो सीटों पर रह गयी। मई 1984 में लालकृष्ण आडवानी ने पार्टी का अध्यक्ष पद स्वीकार किया। समग्र एकात्म मानववाद ग्राम राज्य अभियान को रचनात्मक गति दी गयी। लालकृष्ण आडवानी ने स्वर्ण जयंती यात्रा, स्वराज यात्रा, भारत उदय यात्राएं करके देश को पग पग नापा। नब्बे के दशक में कश्मीर से कन्याकुमारी तक डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने एकात्मता यात्रा करके राष्ट्रीय सुरक्षा और अखण्डता का शंखनाद किया।

1990 में हुए विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, हिमाचल में भाजपा की सरकारें बनी। लेकिन 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या विवादित में ढांचा गिरने के साथ ही उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने 2 अप्रेल 1993 को ऐतिहासिक फैसला दिया और मध्यप्रदेश विधानसभा पुन: प्र्रवत्तित करने का फैसला सुना दिया।

जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी का विस्तार जितने चमत्कारिक ढंग से हुआ है राजनैतिक दल ही नहीं सभी विस्मित है। 1984 में जहां भाजपा को 2 सीटों से संतोष करना पड़ा था। 1989 में हुए लोकसभा चुनाव में इसका संख्या बल 86 हो गया। बाद में 1991 में यह बढ़कर 119 हो गया। अगले लोकसभा चुनाव 1996 में 161, 1998 में 179 और 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा की शक्ति अंक बल के साथ 182 हो गयी। लेकिन 2004 में यही अंकबल घटकर 138 पर सिमट गया। अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केन्द्र में 6 वर्षो तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार सफलतापूर्वक चली और 24 राजनैतिक दल राजग तथा राजग सरकार के साक्षी बने। भारतीय जनता पार्टी पिछले 2004 से कई राज्यों में जहां सत्ता में है। स्वराज से सुराज्य की कल्पना साकार करने में लगी है। केन्द्र में भाजपा विपक्ष में है लेकिन उसके प्रखर विरोधी स्वर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को सतत निशाने पर लिये है। राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर देशव्यापी आंदोलन किया गया। आतंकवादी के विरोध में बनाई गयी मानव श्रृंखला ने 1 अरब जनता का आक्रोश मुखरित किया। महंगाई ने जहां गरीबों के मुंह से निवाला छीन लिया है देश की जनता भाजपा नीत एनडीए सरकार के कार्यकाल को स्वर्णिम काल के रूप में याद करती है। अटल बिहारी वाजपेयी ने पोखरण दो के सफल विस्फोट से जहां अभेद्य सुरक्षा दी वही देश में मूल्य पंक्ति पर लगाम और स्थिरता प्रदान कर अपने कार्यकाल को स्मरणीय बना दिया।

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