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Wednesday, 2 January, 2008

उड़ीसा से आ रहे संकेतों को सुनो

लेखक : कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

उड़ीसा देश का पहला ऐसा राज्य था जिसने 1956 में मजहब परिवर्तन पर रोक लगाने के लिए कानून पारित किया था। उड़ीसा का अनेक क्षेत्र जनजाति बहुल हैं और चर्च जनजातियों को ईसा की शरण में ले जाने के लिए अंग्रेजों के वक्त से ही प्रयास कर रहा है। ब्रिटिश काल में ईसा की शरण में लाने का अर्थ ब्रिटिश सत्ताधारियों की शरण में ही लाना था। इसलिए यह एक प्रकार से अंग्रेजी शासन के खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन को निष्क्रिय करने का अप्रत्यक्ष प्रयास भी था। चर्च के इस आक्रमण ने जनजातिय क्षेत्र के लोगों को अपनी अपनी भाषा, संस्कृति, विरासत और पूर्वजों के और नजदीक ही नहीं ला दिया बल्कि उससे भावात्मक लगाव को भी बढ़ाया। मनोवैज्ञानिक रूप से इसकी व्याख्या यूं की जा सकती है कि जब किसी संस्कृति का अस्तित्व खतरे में पड़ता है तो उससे जुड़े हुए लोग खतरे को सूँघकर इक्ट्ठे ही नहीं हो जाते बल्कि उनके अन्य छोटे-मोटे मतभेद इस आसान खतरे के कारण समाप्त हो जाते हैं। उड़ीसा के जनजाति क्षेत्रों में भी चर्च को लेकर ऐसा ही हो रहा है।

चर्च ने जनजातिय क्षेत्र के लोगों की इस एकता और प्रतिरोध से लड़ने के लिए जो रणनीति बनाई वह केवल उड़ीसा के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण भारत के लिए भी खतरनाक कही जा सकती है। सबसे पहले तो उन्होंने अपने विदेशी स्रोतों को सक्रिय करते हुए ज्यादा धन की माँग की और आशा के अनुरूप चर्च को विदेशों से अरबों रूपये की सहायता आनी शुरू हो गई। यदि भारत सरकार इस विषय पर कोई श्वेत पत्र प्रकाशित करें तो यह भयावह स्थिति और भी स्पष्ट हो जाएगी। द्वितीय चर्च ने दिल्ली में सरकार के भीतर और बाहर उस वर्ग को पकड़ा जिस वर्ग के लिए चर्च की अवैध गतिविधियों के विरोध का अर्थ ही हिन्दू सांप्रदायिकता है। उनके लिए आतंकवाद, चर्च और इस्लाम से जुड़ी हुई किसी भी गतिविधि का प्रयोग यदि कोई भारतीय या भारतीय संगठन करता है तो वह हिन्दू सांप्रदायिकता ही है। कांग्रेस और सीपीएम में इस अवधारणा को लेकर आश्चर्यजनक रूप से समानता देखी जा सकती है। गुजरात में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में लोकनिर्णय पर टिप्पणी करते हुए सीपीएम ने स्पष्ट ही कहाकि इस देश की मिट्टी में अभी भी भारतीय संप्रदाय की जड़ें गहरी जमी हुई है। उसे उखाड़ने के लिए नई रणनीति बनानी होगी। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने भी लगभग इसी प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त की। उनका कहना था कि अफजल गुरू के लिए फांसी की मांग करना हिन्दू आतंकवाद है। जाहिर है चर्च को सीपीएम की यह रणनीति बहुत ही ज्यादा अनुकूल पड़ती है। इसलिए तीनों आश्चर्यजनकर रूप से एक दूसरे के हितों की रक्षा करते हैं। उड़ीसा के मामले में ऐसा ही हो रहा है। अब जब उड़ीसा के लोग खासकर जनजाति क्षेत्रों के लोग चर्च की अभारतीयकरण की नीति के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं तो कांग्रेस और सीपीएम स्पष्ट ही अपने नकाब उतारकर चर्च के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हो गई है। इन दोनों के लिए उड़ीसा के जनजाति क्षेत्र के लोग हिन्दू आतंकवादी है और इस हिन्दू आतंकवाद से चर्च की रक्षा करना जरूरी हो गया है। चर्च इनके लिए पवित्रता का प्रतीक है। क्योंकि चर्च इनको ठोस रूप से वोटें मुहैय्या करवा सकता है।

उड़ीसा के कंधमाल जिला में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पर ईसाई एजेण्टों द्वारा किए गए आक्रमणों को इसी परिदृश्य में देखना होगा। लक्ष्मणानंद सरस्वती उड़ीसा की अस्मिता के प्रतीक है। वे ओडिया भाषा संस्कृति और परंपरा के संरक्षण की बात कहते हैं। उन्होंने इस कार्य के लिए अपना सारा जीवन होम दिया है। न उन्हें विधायक बनना है, न सांसद बनना है, न उन्हें रहने के लिए महलों की जरूरत है, न खाने के लिए छत्तीस प्रकार के व्यंजनों की । वे महात्मा गांधी की तरह उड़ीसा के ग्राम-ग्राम में झोंपड़ी में और जनजाति के लोगों के घरों में पिछले 45 वर्षों से घूम रहे हैं। स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती एक प्रकार से उड़ीसा का सांस्कृतिक प्रवाह है। वे मधुर ओडिया भाषा में कीर्तन करते हैं। उत्कल प्रदेश की मिट्टी के गीत गाते हैं । उनमें उत्कल प्रदेश की रंग-गंध बसी है। चर्च जानता है कि यह उत्कल अस्मिता और उत्कल गंध उसके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। इसलिए चर्च ने शायद भारत में निर्णायक लड़ाई करने का निर्णय कर लिया है। इसीलिए उसने स्वामी जी पर क्रिसमस के दिन ही प्रहार किया है। लेकिन यह लड़ाई लड़ने से पूर्व चर्च ने अपनी मोर्चा बंदी भी सख्त प्रकार से की हुई है। यह लड़ाई शुरू करने से पहले उसने सत्ता के केन्द्र पर सोनिया गांधी को स्थापित कर दिया है। सीपीएम को साथ ले लिया है और मीडिया के एक वर्ग को इस कार्य के लिए योजना पूर्वक प्रशिक्षित कर दिया। इस पूरी मोर्चाबंदी के बाद चर्च ने उड़ीसा से अपना नया अभियान शुरू किया है। मीडिया के लिए यह आक्रमण उत्कल अस्मिता के प्रतीक स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती पर न होकर हिन्दू गुण्डों द्वारा चर्च पर किजा जा रहा आक्रमण है। कांग्रेस, सीपीएम और मीडिया के लिए उड़िसा का जनजातिय समाज असामाजिक तत्व है जो चर्चों को जला रहा है। ब्रिटिश शासकों की दृष्टि में जनजातिय समाज असभ्य और बर्बर था। कांग्रेस और सीपीएम की दृष्टि में यह समाज हिन्दू गुंडागर्दी का प्रतीक है। यदि दिग्विजय सिंह की माने तो भारत में हिन्दू आतंकवाद प्रारंभ हो चुका है। आश्चर्य नहीं होगा यदि कल भारत सरकार स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती को हिन्दू आतंकवादी घोषित कर दे । जहां तक सीपीएम का प्रश्न है उसके लिए हर भगवाधारी सांप्रदायिक है और चर्च व अफजल गुरू धर्मनिरपेक्षता के उत्कृष्ट प्रतीक है। यह सब उस समय हो रहा है जब गुजरात में लोगों ने कांग्रेस और सीपीएम की इस संकीर्ण सांप्रदायिक दृष्टि का मुंहतोड़ उत्तर दिया है।

उड़ीसा से स्पष्ट संकेत आ रहे हैं। उड़ीसा के लोग अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो रहे हैं। इधर कांग्रेस और सीपीएम भी मोर्चा संभाल रही है। जैसे तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता ने कहा है कि गुजरात के लोक निर्णय से यह आशा फिर बंधी है कि भारत और भारतीयता की लड़ाई अभी पूरी तरह हारी नहीं है। वह फिर जीती जा सकती है इसकी संभावना बढ़ गई है। चर्च ने इस लड़ाई को अब उड़ीसा में लड़ने का निर्णय किया है। भारत के सब लोगों को उड़ीसा के लोगों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़ा होना होगा।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

2 comments:

हिन्दु चेतना said...

उस उड़ीसा में चर्च सर्मथक हिन्दुओ के धार्मीक गुरु श्री लक्ष्मणानंद सरस्वती को जान से मारने की कोशीश कर रहा था। इसका कारण सोनिया गाँधी का ईसाइ मूल का होना और धर्मान्तरण करने वाले और चर्च को आरोपियों को खुला राजनीतिक प्रश्रय का दिया जाना है। ईसाइयों के द्वारा कानून का खुलकर माखौल उडाया जाता है। प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं लेकिन चर्चों से गुप्त रूप से किसी भी खास पार्टी के लिए एकतरह से फतवा जारी होता है। ज्यादातर फायदा कांग्रेस के मोर्चे यूडीएफ यानी संयुक्त जनतांत्रिक मोर्चा को मिलता आया है। लेकिन अब इस दौर में वाम मोर्चा भी अब पीछे नहीं रही और इस समुदाय को अपना वोट बैंक बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है।भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह यहा तक कहते है कि ईसाइयों को सुरक्षा मिलनी चहीये। यह हिन्दुस्तान हि है जहा हमलावर को सुरक्षा मिलता है।

source :- www.ckshindu.blogspot.com

mahadev said...

धर्मांतरण वास्तव मे राष्ट्रांतरण है। भारत के अधिकांश मुसल्मानो के पुर्वज भारतीय थे। तथापी आज उनमे से बहुतो की आस्था भारत के प्रति न होकर साउदी अरेबिया के प्रति है। यह प्रभाव धर्मांतरण का ही है।

अगर ईसाइ स्वदेशी चर्च खडी कर के, प्रवचन द्वारा धर्म परिवर्तन कर सकते है तो करे। लेकिन विदेशी धन के उपयोग द्वारा प्रलोभन और सेवा के नाम पर जो धर्म परिवर्तन के प्रकल्प चल रहे है उन्हे रोकना भारत सरकार का दायित्व है ।