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Saturday, 7 February, 2009

क्या पोप को भी अब भारत रत्न मिलेगा ?- डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

भारत सरकार पिछले कई सालों से 26 जनवरी के दिन महत्वपूर्ण व्यक्तियों को सम्मान प्रदान करती है। यह सम्मान पद्म भूषण, पद्म विभूषण और पद्मश्री के नाम से दिया जाता है और जिसको आशातीत सम्मान देना है उसे कई बार भारत रत्न की उपाधि भी प्रदान की जाती है। सम्मान देने की यह परम्परा अंग्रेजों के वक्त में शुरू हुई थी लेकिन उन्होंने सम्मान देने के लिए उपाधियों के नाम अलग-अलग रखे हुए थे। सबसे बड़ी उपाधि तो सर की होती थी और जिसको यह उपाधि मिल जाती थी वह ब्रिटिश शासन का सूर्य कभी न डूबे ऐसी प्रार्थना दिन रात शुरू कर देता था। ऐसे किस्से भी हुए जब प्रार्थना करते-करते भगत को सचमुच का ज्ञान हो गया तो वह सर की उपाधि ब्रिटिश सरकार को वापिस कर गया। दूसरी उपाधियां राय बहादुर और राय साहिब की होती थी। जाहिर है यह उपाधियां उन लोगों को दी जाती थी जो ब्रिटिश शासन के साथ मिलकर भारतीयों का दमन करते थे और समय के अनुसार शासन की सलामती के लिए सरकार को सहयोग भी देते थे। शायद यही कारण था कि सरकार जिनको राय बहादुर और राय साहब बनाती थी, सामान्य जनता टोडी बच्चा हाय-हाय, के नारे लगाकर गलियों में उनको बेपर्दा करते थे।

ऐसा नहीं कि भारत सरकार ने यह पहली बार किया हो। न ही यह पुरस्कार अनजाने में और बिना किसी योजना के दिया गया इक्का दुक्का पुरस्कार है। वास्तव में चर्च को शह देने के लिए और मतातंरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार की सोची समझी लम्बी योजना की एक कड़ी है। यही कारण था कि कुछ साल पहले आस्ट्रेलिया की एक नागरिक श्रीमति ग्लेडेस स्टेन्स को भी पद्मश्री से सोनिया गांधी की सरकार ने सम्मानित किया था। आस्ट्रेलिया की यह नागरिक कुछ साल पहले हिन्दुस्तान में रही थी और उसके पति ग्राहम स्टेन्स उड़ीसा के जन-जाति समाज को मतातंरण के द्वारा इसाई बनाने के आपराधिक कर्म में जुटे हुए थे। इसी के चलते उड़ीसा के क्रुध्द जन-जाति समाज की एक भीड़ ने उन्हें जला दिया था। श्रीमती स्टेन्स उसके बाद आस्ट्रेलिया चली गई। भारत सरकार ने उनको पद्मश्री से सम्मानित किया। अब कोई भला मानुस पूछ सकता है कि श्रीमती स्टेन्स का किसी भी क्षेत्र में भारत को क्या योगदान है। लेकिन चर्च का दबाव था कि इसे पद्मश्री से सम्मानित किया जाये।

सरकार बदली तो जाहिर है उपाधियां भी बदल गई। इसके साथ ही उपाधि देने की कसौटी भी बदल गई। अब सरकार क्योंकि जनता की हो गई थी इसलिए नई उपाधियां भी उन्हीं लोगों को मिलने लगी जिन्होंने जन-कल्याण के लिए किसी न किसी क्षेत्र में बेहतर कार्य किया हो। परन्तु इतिहास बड़ा निर्मम है। वह बार-बार अपने को दोहराता रहता है। धीरे-धीरे इन उपाधियों की कसौटी जन-कल्याण से हटकर उसी मानसिकता में पहुंच गई जिससे गोरी सरकार उपाधियां बांटती थी। जाहिर है उपाधि देने के उद्देश्य भी बदल गये। शायद इसलिए जब किसी को उपाधि मिलती है तो नाम पढ़ कर आम आदमी की प्रतिक्रिया होती है, कम्बख्त बड़ा जुगाडू निकला। कहीं न कहीं से टांका भिड़ा ही दिया। यही कारण रहा होगा कि मोरार जी देसाई प्रधानमन्त्री बने थे तब ऐसा भी विचार होने लगा था कि इन उपाधियों का देना बंद कर दिया जाये। उपाधियां बंद तो नहीं हो सकी अलबत्ता बाद में यह फैसला जरूर हुआ कि इन उपाधियों को अपने नाम के आगे तमगे की तरह इस्तेमाल न किया जाये। परन्तु जिन उस्तादों ने मेहनत से उपाधि ली हो यदि वह उसका उपयोग नाम के आगे नहीं करेंगे तो उसका फायदा क्या?

अबकी बार निर्मला जोशी को सोनिया गांधी की सरकार ने पद्म विभूषण से नवाजा है। निर्मला जोशी नेपाली मूल की है और सुश्री टेरेसा के आंदोलन की अध्यक्षा है। सुश्री टेरेसा युगोस्लाविया की रहने वाली थी। लेकिन मतान्तरण के आंदोलन को बढ़ाने के लिए वह काफी अर्सा पहले भारत में ही आ गई थी। यहां आकर उन्होंने अनाथ बच्चों के लिए आश्रम खोले लेकिन इस बात का ध्यान रखा कि जो अनाथ बच्चे उनके अनाथ आश्रम में आ जाये उनकी सेवा करने से पहले उनके गले में यीशु मसीह के ताबीज लटका दिये जायें। वह सेवा भी करती थी लेकिन सेवा उसका ध्येय नहीं था, ध्येय की पूर्ति के लिए एक माध्यम था। सुश्री टेरेसा को यूरोप ने उसकी इन्ही मतातंरण सम्बन्धी गतिविधियों के कारण उसको नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया था। नोबेल पुरस्कार का लाभ यह रहा कि जो लोग सुश्री टेरेसा द्वारा मतातंरण आंदोलन व उसमें विदेशी शक्तियों के हाथ की जांच की मांग कर रहे थे, वे इस पुरस्कार के भारी भरकम पद से ही इतने भयभीत हो गए कि उन्होंने भी टेरेसा स्तुति ज्ञान प्रारम्भ कर दिया। टेरेसा मिथकों और प्रतीकों के महत्व को जानती थी, इसलिए उसने अपना आश्रम कोलकाता में काली मन्दिर के बिल्कुल पास ही खोला। लेकिन अब टेरेसा तो रही नहीं। नश्वर शरीर है। आखिर कभी न कभी तो नष्ट होगा ही। निर्मला जोशी उसी टेरेसा की वारिस है। अब यह आंदोलन क्या कर रहा है और इसको कहां से पैसा मिल रहा है। इसने मत परिवर्तन विधेयक के बावजूद अनेक स्थानों पर लोगों का मतातंरण कैसे करवाया है। इन सभी प्रश्नों पर हल्ला हो रहा था और जांच की मांग भी उठ रही थी। निर्मला जोशी मतातंरण के उस आंदोलन की अगुवा है जो सुरक्षात्मक शैली नहीं अपनाता बल्कि आक्रामक मुद्रा में ही रहता है। यही कारण है कि पिछले दिनों जब चर्च ने उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी की हत्या करवा दी और उसके बाद चर्च ने उड़ीसा के लोगों पर ही हिंसा फैलाने का आरोप लगाना शुरू कर दिया तो निर्मला जोशी आरोप लगाने वालों की कतार में सबसे आगे दिखाई दे रही थी। अतंतः उसे इसका पुरस्कार तो मिलना ही था क्योंकि भारत सरकार इस समय खुद सारी लाज, हया त्याग कर दृढ़ता से चर्च के आपराधिक कृत्यों के साथ खड़ी है। इसलिए निर्मला जोशी को भारत सरकार ने इस बार का पद्म विभूषण देकर उन लोगों को चेतावनी दी है जो भारत वर्ष में चर्च द्वारा विदेशी शक्तियों की सहायता से चलाए जा रहे मतातंरण आंदोलन का विरोध कर रहे हैं।

ऐसा नहीं कि भारत सरकार ने यह पहली बार किया हो। न ही यह पुरस्कार अनजाने में और बिना किसी योजना के दिया गया इक्का दुक्का पुरस्कार है। वास्तव में चर्च को शह देने के लिए और मतातंरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार की सोची समझी लम्बी योजना की एक कड़ी है। यही कारण था कि कुछ साल पहले आस्ट्रेलिया की एक नागरिक श्रीमति ग्लेडेस स्टेन्स को भी पद्मश्री से सोनिया गांधी की सरकार ने सम्मानित किया था। आस्ट्रेलिया की यह नागरिक कुछ साल पहले हिन्दुस्तान में रही थी और उसके पति ग्राहम स्टेन्स उड़ीसा के जन-जाति समाज को मतातंरण के द्वारा इसाई बनाने के आपराधिक कर्म में जुटे हुए थे। इसी के चलते उड़ीसा के क्रुध्द जन-जाति समाज की एक भीड़ ने उन्हें जला दिया था। श्रीमती स्टेन्स उसके बाद आस्ट्रेलिया चली गई। भारत सरकार ने उनको पद्मश्री से सम्मानित किया। अब कोई भला मानुस पूछ सकता है कि श्रीमती स्टेन्स का किसी भी क्षेत्र में भारत को क्या योगदान है। लेकिन चर्च का दबाव था कि इसे पद्मश्री से सम्मानित किया जाये। चर्च को इसका यह लाभ रहता है कि जन-जाति समाज में इन भारी भरकम उपाधियों के कारण चर्च का आंतक बना रहता है। और उसी आंतक के वातावरण में चर्च मतातंरण का आंदोलन सफलतापूर्वक चलाता है। फिर प्रशासन के छोटे अधिकारियों की हिम्मत नहीं होती कि चर्च के आपराधिक कृत्यों को किसी भी प्रकार रोका जाये।

इसी प्रकार कुछ साल पहले कोटा के अब्राहम थॉमस को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था। अब्राहम थॉमस राजस्थान के कोटा में इमानुएल मिशन के नाम से मतातंरण का बहुत बड़ा अड्डा चलाता है। देश के दूसरे हिस्सों से भी गरीब व असहाय बच्चों का मतातंरण किया जाता था। उस अड्डे पर भारत विरोधी साहित्य की बिक्री होती थी। विदेशों से बहुत सा पैसा इस अड्डे के नाम पर आता था। जब स्थानीय लोगों का विरोध अत्यंत उग्र हुआ और वहां कुछ आन्ध्रप्रदेश के छोटे बच्चों को मुक्त करवाया गया तो सरकार को अब्राहम थॉमस पर कानूनी कार्यवाही करनी पड़ी। वह अनेक महीनों जेल में बंद रहा और सरकार ने उस अड्डे की सम्पति की जांच के आदेश दिए। ऐसा अपराधी अब्राहम थॉमस भी भारत सरकार द्वारा दी गई पदम श्री की उपाधि को माथे पर ताज की तरह इस्तेमाल करके लोगों को डराता फिरता था।

जाहिर है कि यह सारी योजना उसी षडयंत्र का हिस्सा है जिसके अन्तर्गत चर्च को बढ़ावा देकर भारत की अस्मिता को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। चर्च और उसका मतातंरण आंदोलन इसमें अग्रणी भूमिका में दिखाई देते हैं। जब से सोनिया गांधी के हाथों में भारत की सत्ता के सूत्र आ गये हैं तब से चर्च का साहस और अपराध दोनों ही बढ़ गये हैं। निर्मला जोशी को पद्म श्री इसी योजना का हिस्सा है। आश्चर्य नहीं करना चाहिए यदि कल उड़ीसा के सांसद राधा कांत नायक और ऑल इंडिया क्रिश्चियन काऊंसिल के अध्यक्ष जॉन दयाल को अगली 26 जनवरी के दिन पर भारत सरकार विभूषण से सम्मानित कर दें। उड़ीसा पुलिस के सूत्रों के अनुसार कांग्रेस के सांसद राधा कांत नायक पर स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के सूत्रधार होने का संदेह व्यक्त किया जा रहा है। जॉन दयाल, राधा कांत नायक मतातंरण आंदोलन के दाहिने हाथ हैं। राधा कांत नायक उड़ीसा में उस वर्ल्ड विजन संस्था के अध्यक्ष है जो भारत में मतातंरण का आंदोलन तो चलाती ही है साथ ही जिसे अमेरिका की खुफिया संस्था सी.आई.ए. की फ्रंट ऑर्गेनाईजेशन माना जाता है। अब क्योकि राधा कांत नायक स्वामी जी की हत्या के आरोपों से घिरे हुए हैं तो उन्हें अभय दान देने का एक ही तरीका है कि उन्हें भी पदम श्री से सम्मानित कर दिया जाये। जो चर्च के मतातंरण आंदोलन के भीतरी गलियारों से परिचित हैं वे जानते है वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा अंसभव नहीं है।

कुछ साल पहले वेटिकन के राजा पोप दिल्ली आये थे। दिल्ली में उन्होंने बाकायदा प्रैस कान्फ्रैंस करके घोषणा की थी कि चर्च की आगे की रणनीति 21वीं शताब्दी में भारत को मतातंरित कर लेने की है। क्योंकि पिछले 2000 सालों में चर्च ने यूरोप व अफ्रीका को सफलतापूर्वक मतातंरित कर लिया है। सोनिया गांधी और उनके दरबारियों के लिए तो यही भारत की सबसे बड़ी सेवा होगी। वे पोप तो अल्लाह मियां को प्यारे हो चुके है लेकिन उनकी गद्दी पर अब जो पोप बैठे हैं, हो सकता है भारत सरकार उनको भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित कर दें क्योंकि सुश्री टेरेसा की वारिस निर्मला जोशी को सम्मानित करके उसने परम्परा तो बना ही दी है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या अब सम्मान एक बार फिर राय बहादुर और राय साहिबों की श्रेणी में आ जायेंगे। क्या भारत के लोगों को इन सूचियों में से एक बार फिर टोडी बच्चो की तलाश करनी होगी ? (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

2 comments:

दिल दुखता है... said...

इस लेख को यहाँ प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद्. इतना सब कुछ चोरी छिपे नहीं हो रहा है सब लोगों की आँखों के सामने हो रहा है, इसी बात से दिल दुखता है कि फिर लोग क्यों कुछ नहीं बोलते, कुछ तो और महान होते है उनसे बात करो तो उल्टे चलते है.... मैंने खुद पिछडी बस्तियों में काम किया है, मैं जानता हूँ, ईसाईयों कि सारी चालें. जो लोग हकीकत से भागना चाहते है, मैं उन्हीं लोगों को चुनोती देता हूँ चलो मैं दिखता हूँ चर्च का असली चेहरा.....

Kanha G said...

यह कोई नई बात नही राष्ट्र पर चंहु और से प्रहार का यह एक कृत्य है किंतु जब तक इस देश मैं राष्ट्रभक्त रहेंगे. ये उपाधियाँ मिटटी मैं मिल जायेगी आज हम देख सकते है. की प्रवीण भाई तोगडिया, श्री सुदर्शन जी, समेत लाखों देश भक्त बिना किसी उपाधि के राष्ट्र निर्माण में लगे है. अतः सदा चरैवेति की विचारधारा को लेकर सतत कर्म मैं लगना ही श्रेश्कर है. निर्माण