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Saturday 19 January 2008

रंगनाथ मिश्रा आयोग के पीछे का राजनैतिक षडयंत्र

लेखक: डा0 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

भारत सरकार भारतीय मजहबों को त्याग कर ईसाई और मुसलमान समाज में चले गए व्यक्तियों की जाति तलाशने के काम में जुटी हुई है। लेकिन समस्या यह है कि इस देश में जोर जबरदस्ती या लालच से भारतीय या हिन्दू समाज के लोगों को इस्लामी समाज के घेरे में लाने की कवायद काफी लंबे अरसे से हो रही है। इसकी शुरूआत मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमणों के पहले ही शुरू हो गई थी। ये लगभग सातवीं-आठवीं शताब्दी की घटनाएं हैं। उसके बाद लोदी, खिलजी, गुलाम, तुगलक और मुगल जैसी अनेक इस्लामी सल्तनतें इस देश में स्थापित हुईं और हिन्दू समाज से इस्लामी समाज की होर जाने का सिलसिला भी चलता रहा। इस्लामी समाज में जाति व्यवस्था नहीं है। इसलिए पंथ परिवर्तन के बाद उनकी जाति इस्लामी समाज में ही विलीन हो गई। यही प्रक्रिया बाद में भारत में पुर्तगाल, डच और अंग्रेजों के आने के बाद ईसाई समाज की स्थापना में हुई। हिन्दू समाज या भारतीय समाज के लोग ईसाई समाज में भी जाने लगे और वहां भी जाति व्यवस्था न होने के कारण उनकी पूर्व जाति ईसाई समाज में ही विलीन हो गई। यह तेरह शताब्दियों की कथा है और 13 शताब्दियों से निरंतर चल रही है।

21वीं शताब्दी में भारत सरकार भारतीय पंथ छोड़कर ईसाई या मुस्लिम समाज में चले गये लोगों की जाति की तलाश कर रही है। आठवीं शताब्दी में मुसलमान बन गए भारतीयों या हिन्दुओं को शायद अब अपनी उस जाति का पता भी नहीं होगा क्योंकि व्यवहार में वह लुप्त हो गई थी। परंतु भारत सरकार उनका पता लगाने के हठ पर अड़ी हुई है और यह हठ भी बड़ा अजीब है। सरकार उनकी जाति का पता लगाकर उनको सरकारी नौकरियों में और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण देने के लिए अड़ी हुई है और आश्चर्य की बात है कि जिन मौलवियों ने और पादरियों ने, इमामों ने और बिशपों ने कभी यह घोषणा की थी कि हमारे समाज में कोई जाति नहीं है। अब वही पादरी और बिशप अपने समाज में जाति तलाश रहे हैं और इतना ही नहीं, जाति है- इसके हठ पर भी अड़े हुए हैं।

इस पूरी रणनीति में सोनिया गांधी के नेतृत्व में भारत सरकार इमामों और बिशपों के साथ खड़ी हो गई हैं। उसने इसी रणनीति के अंतर्गत उडीसा के एक सज्जन रंगनाथ मिश्र, जो कभी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्यन्यायाधीश भी रह चुके हैं और बाद में कांग्रेस की कृपा से 6 साल राज्यसभा का सुख भी भोग चुके हैं, की अगुवाई में आयोग की स्थापना कर दी और जैसा कि आशंका थी आयोग ने भारत सरकार की मंशा के अनुरूप ही यह सिफारिश कर दी है कि भारतीय पंथों को त्यागकर इस्लामी या ईसाई समाज में गए लोगों को भी अनुसूचित जातियों के भारतीयों के समान ही आरक्षण मिलना चाहिए।

ऊपर से देखने पर यह लगता है कि ईसाई अथवा इस्लामी समाज की सारी कवायद सरकारी नौकरियों में कुछ चंद स्थान पाने की है या फिर कुछ शिक्षा संस्थानों में कुछ छात्रों के भर्ती हो जाने की है। लेकिन ऊपर से यह षडयंत्र जितना सतही दिखाई देता है भीतर से उतना ही गहरा है। यह एक प्रकार से भारत की राज्यसत्ता पर कब्जा करने के लिए ईसाई और इस्लामी समाज द्वारा रची गई संयुक्त रणनीति है। जिसका संचालन पर्दे के पीछे से सोनिया गांधी और उसके अदृश्य आका कर रहे लगते हैं। मुद्दा अत्यंत स्पष्ट है। एक बार यदि सिध्दांत रूप में इस बात को स्वीकार कर लिया जाता है कि ईसाई अथवा इस्लामी समाज में भी जातियां हैं और उन जातियों में से भी कुछ को अनुसूचित श्रेणी में स्वीकार किया जाता है तो आगे सत्ता पर कब्जा करने के रास्ते अपने आप खुलते जाएंगे। रिकार्ड के लिए रंगनाथ मिश्रा ने पहला अवरोध तो हटा ही दिया है। आयोग ने ईसाई और मुस्लिम समाज में अनुसूचित जातियों की कल्पना को यथार्थ मान लेने का आग्रह किया है।

भारतीय संविधान में, संसद में और प्रदेशों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों के लिए स्थान आरक्षित किए हैं। यदि ईसाई और मुस्लिम समाज में भी अनुसूचित जातियों की उपस्थिति को स्वीकार कर लिया जाता है तो जाहिर है कि दलित श्रेणियों के लिए आरक्षित लोकसभा और विधानसभा की इन सीटों पर ईसाई या मुसलमान पंथ के लोग भी चुनाव लड़ सकेंगे। ईसाई और मुस्लिम समाज को इससे दोहरा लाभ होगा। वे साधारण सीटों पर तो चुनाव लड़ ही सकेंगे इसके साथ ही वे आरक्षित सीटों पर भी चुनाव लड़ेंगे और जैसी भारत में राजनैतिक कारणों से मौलवी और पादरी की एकजुटता दिखाई दे रही है उसमें यह भी संभव है कि भविष्य में ये दोनों मिलकर एक रणनीति के अनुसार चुनाव लड़ें। केरल जैसे प्रदेश में जहां ईसाइयों और मुसलमानों की संख्या पर्याप्त है वहां इन पंथों के लोगों को यदि अनुसूचित जाति का लाभ भी दिया जाता है तो स्वाभाविक है कि यह मिलकर केरल में सत्ता संभालने की स्थिति में आ सकते हैं । ऐसा प्रयोग कमोवेश असम और पश्चिमी बंगाल में भी किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड भी इस प्रयोग के अनोखे परिणाम दे सकता है। जिन शक्तियों ने अब जब सोनिया गांधी को केन्द्र में स्थापित कर दिया है वही शक्तियां राज्यों में इस्लामी और ईसाई पंथियों को सत्ता केन्द्रों तक पहुंचाने में जुटी हैं। रंगनाथ मिश्र आयोग उसी लंबे षडयंत्र की पहली कड़ी है। यदि इसको प्रारंभ में ही न तोड़ा गया तो भविष्य में इसके भयावह परिणाम निकल सकते हैं।

इसका एक और साइडइफेक्ट भी होगा। भारतीय समाज की दलित जातियों में इससे निराशा उत्पन्न होगी। आज तक उन्होंने इन विदेशी पंथों का जिस साहस और उत्साह से सामना किया है। उसमें निश्चय ही गिरावट आएगी। यह ध्यान रखना होगा कि मुस्लिम आक्रांताओं के खिलाफ जो व्यापक संघर्ष हुए उनमें ज्यादा योगदान इन्हीं तथाकथित दलित जातियों का रहा है। इतने प्रलोभनों और भय के बावजूद दलित जातियों ने अपनी परंपरा और विरासत को नहीं त्यागा। वे व्यापक हिन्दू समाज के भीतर रहकर ही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती रही। संकट की इन घड़ियों में इन तथाकथित दलित जातियों के जो बंधु अपनी बिरादरी छोड़कर ईसाई समाज या मुस्लिम समाज में चले गए उन्हें बिरादरी ने हिकारत की नजर से ही देखा। मध्यकालीन युग में तो उनका सामाजिक बहिष्कार भी हुआ। लेकिन दुर्भाग्य से सरकार अब उन लोगों के साथ खड़ी नजर आ रही है जो संघर्ष काल में और संकट काल में अपनी बिरादरी को छोड़ गए थे।

जो संकट में और मुस्लिम आक्रांताओं के काल में और पादरियों के युग में भी अटल खड़े रहे उनके हितों पर सरकार कुठाराघात कर रही है। इससे संकट काल में लड़ने का भारतीय समाज का संकल्प टूटेगा और वह हतोत्साहित होगा। इसमें सोनिया गांधी को ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि शायद सोनिया गांधी की भारत में स्थापना ही उस संकल्प को तोड़ने के लिए हुई है जिसके बलबूते भारत आक्रमणों की इन अनेक शताब्दियों को सफलता पूर्वक झेल चुका है। परंतु पंडित रंगनाथ मिश्र को क्या कहा जाए?दुर्भाग्य से भारतीय इतिहास में रंगनाथ मिश्रों की भी परंपरा रही है। (नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

1 comment:

अरुण said...

रंगनथ मिश्र हो या सच्चर दोनो ही स्माज के जयचंद है..और काग्रेस इनका गढ रही है..जिन्होने परदे के सामने या पीछे अग्र्जो के चरण चाटे वही आज भी शीर्श पर है हिसाब लगा कर देखियेगा..:)