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Friday, 26 December, 2008

आतंकवाद के विरूध्द पूरा विपक्ष सरकार के साथ : लालकृष्ण आडवाणी

आतंकवाद भारत की प्रमुख समस्या हैं। भाजपा के नेतृत्ववाली राजग सरकार ने आतंकवाद को जड़ समेत खतम करने के लिए आतंकवाद विरोधी कानूनी 'पोटा' लागू किया था लेकिन संप्रग सरकार ने सत्तासीन होते ही सबसे पहले पोटा कानून को वापस ले लिया, जिसके चलते आतंकवादियों का दुस्साहस बढ़ता गया। आतंकवाद के मुद्दे पर केन्द्र सरकार पर भारी जनदबाव पड़ा और अंतत: उसने संसद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी विधेयक-2008 तथा गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम संशोधान विधेयक-2008प्रस्तुत किया।

लोकसभा में विपक्ष के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी ने दोनों विधेयकों का सिध्दांतत: समर्थन करते हुए कहा कि संप्रग सरकार ने पोटा कानून का विरोध करने की अपनी आठ दस वर्ष पुरानी गलती सुधार ली है लेकिन इस दौरान देश की जनता को आतंकवादियों के हाथों जान-माल की भारी तबाही का सामना करना पड़ा। हम यहां राष्ट्रीय जांच एजेंसी विधेयक-2008 तथा गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम संशोधन विधेयक-2008 पर संसद के दोनों सदनों में हुई चर्चा के दौरान श्री लालकृष्ण आडवाणी द्वारा दिए गए भाषण का संपादित पाठ प्रकाशित कर रहे हैं।


मैंने अपनी पार्टी की ओर से और एनडीए की ओर से जो कुछ कहा, उसे दोहराते हुए मैं अपनी बात शुरू कर रहा हूं। जहां तक इस आतंकवाद की चिंता का सवाल है, सरकार इस चिंता पर विजय पाने के लिए जो भी कदम उठाएगी, जो हमें सही लगते हैं, आवश्यक लगते हैं, तो मेरा दल और एनडीए उसका समर्थन करेंगे।
सभापति महोदय, इस बार का सत्र 10 दिसम्बर को शुरू हुआ। स्वाभाविक था कि 11 तारीख को सदन की कार्यवाही औपचारिक रूप से वास्तव में शुरू हुई, क्योंकि 10 तारीख को पूर्व प्रधान मंत्री को श्रध्दांजलि देने के बाद सदन स्थगित हो गया था। पहले दिन ही हमने मुम्बई की घटनाओं पर चर्चा की। पूरे सदन ने एक स्वर से सारी दुनिया को यह बताया कि जहां तक आतंकवाद की चिंता का सवाल है, यह सदन जो देश का प्रतिनिधि है, वह एक है। मैंने अपनी पार्टी की ओर से और एनडीए की ओर से जो कुछ कहा, उसे दोहराते हुए मैं अपनी बात शुरू कर रहा हूं। जहां तक इस आतंकवाद की चिंता का सवाल है, सरकार इस चिंता पर विजय पाने के लिए जो भी कदम उठाएगी, जो हमें सही लगते हैं, आवश्यक लगते हैं, तो मेरा दल और एनडीए उसका समर्थन करेंगे।

इसके कारण भी और आज जो दो विधेयक पेश किये गये हैं, जिनमें जो कमियां मुझे दिखाई देती हैं, उनका उल्लेख मैं करुंगा, लेकिन मैं आरम्भ में ही कहना चाहूंगा कि मैं सिध्दांतत: इन दोनों विधेयकों का समर्थन करता हूं। अभी मैंने माननीय गृह मंत्री जी को यह कहते हुए सुना कि हमारा अगला सत्र फरवरी में होगा, मुझे लगा कि क्या यह सरकार के लिए भी अच्छा नहीं होता कि जो अलग-अलग व्यू-पाइंटस हैं जिनका उल्लेख करके आपने यह बनाया है तथा सदन और देश के लिए अगर इस विधेयक को भी हम स्टेंडिंग कमेटी को भेजते, यह निर्देश देते हुए कि उनको फरवरी महीने से पहले सारी चर्चा और विचार-विमर्श, जिन-जिन लोगों से सलाह करनी है, उसको लेकर हमारे पास आयें। आपने स्वयं कहा कि यह महत्वपूर्ण विधेयक है और हमने जो स्टेंडिंग कमेटीज बनाई हैं वे इस उद्देश्य से बनाई हैं कि महत्वपूर्ण विधेयक स्टेंडिंग कमेटी के पास जाकर, ठीक प्रकार से उनके सब पहलुओं पर विचार करके और खासकर ऐसा विधेयक जिसमें शासन और प्रमुख विरोधी दल, दोनों सिध्दांतत: एकमत हैं तो इसमें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी। मैंने इसके बारे में पहले आग्रह नहीं किया क्योंकि मुझे कभी-कभी संदेह होता था कि यह सत्र अंतिम सत्र न हो जाए। लेकिन जब ऑफिशियली आज कहा गया कि नहीं फरवरी के माह में हम फिर मिलेंगे तो मुझे लगा कि अच्छा होगा अगर अभी भी शासन इस पर विचार कर सके और इस पूरे सदन को आज हम चार या छह घंटे में इसे पारित कर लें, उसकी बजाए स्थायी समिति के पास जाए और जिसमें अलग-अलग लोगों से विचार भी ले लें, चूंकि इस पर सिध्दांतत: हम सहमत हैं। एनडीए और आप सहमत हैं, कुछ रिजर्वेशन्स हो सकते हैं, उसके बारे में मुझे नहीं पता। मेरे जो रिजर्वेशन्स हैं मैं उनका उल्लेख करुंगा, वे इनएडीक्वेसीज के हैं, सिध्दांतत: आपत्ति नहीं है, न फैडरल एजेंसी पर और न ही आप जो एंटी टैरर कानून लाए हैं, उसके बारे में। लेकिन यह शासन का अधिकार है, शासन निर्णय करे, लेकिन मैं सुझाव के रूप में अपनी बात आपके सामने रखता हूं।

मुझे आज संतोष है और संतोष इस बात का है कि लगभग 10 साल तक जो स्टेंड सरकार ने लिया और जब विपक्ष में थे, तब भी उन्होंने वही स्टेंड लिया। यह आज की बात नहीं है। अचानक 10 साल के अंत में उन्होंने अपना स्टेंड मूलत: बदला है। मूलत: इस बात में बदला है कि जिस समय प्रीवेंशन ऑफ टैरेरिज्म एक्ट हम लाए थे, पहले आर्डिनेंस के रूप, फिर विधेयक के रूप में और जब विधेयक राज्य सभा में पास नहीं हुआ तो जाइंट सेशन के सामने, उस समय ऐसा नहीं है कि उस समय विपक्ष जो था वह आतंकवाद का मुकाबला करने के विरूध्द था। नहीं, हम आतंकवाद को खत्म करने के पक्ष में थे और आप पक्ष में नहीं थे, यह अंतर नहीं, दोनों आतंकवाद को समाप्त करना चाहते थे। लेकिन आपका मत था कि जो आज कानून है वह आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए पर्याप्त हैए जबकि हम इस मत के थे कि यह पर्याप्त नहीं है। हमने यह बात न केवल देश के भीतर कही बल्कि हमारे उस समय के प्रधान मंत्री जी ने अमरीका में भी जाकर वह बात अमरीका को 9/11 से भी पहले कही कि आप अगर समझते हैं कि आतंकवाद की जो विभीषिका है और उनको बताया कि हमें कितनी तकलीफ हुई है और हमको तकलीफ इसलिए हुई है कि हमारे लिए आतंकवाद एक वार का सब्सीटयूट हमारे पड़ोसी देश ने बना दिया।

अध्‍यक्ष महोदय, पड़ोसी देश ने हमारे साथ तीन-तीन युध्द किए। जब इन युध्दों में उसे सफलता नहीं मिली, तब उसने वर्ष 1971 के युध्द के बाद, जब वहां सैनिक शासन हुआ, उसके बाद योजनापूर्वक प्रोक्सी वार की नीति आतंकवाद के माध्‍यम से अपनाई। इस प्रयोग में सबसे पहले पाकिस्तान ने पंजाब को चुना और फिर जम्मू-कश्मीर तथा फिर सारे देश में आतंकवाद फैलाया। अस्सी के दशक के शुरूआत से ही हम इस समस्या का सामना कर रहे हैं। अमरीका में आतंकी हमला वर्ष 2001 में हुआ। हमारे प्रधानमंत्री ने अमरीका में अमरीकी कांग्रेस के सामने यह बात कही कि अमरीका यह न समझे कि वे चाहे विश्व के दूसरे देशों से दूर हैए इसलिए शायद आतंकवाद से बचा रहेगा। 9/11 की घटना हुई और शायद आतंकवाद के इतिहास में इस प्रकार का भयंकर कांड कभी नहीं हुआ तथा भगवान न करे कि ऐसा कभी दोबारा हो। उस भयंकर कांड में आतंकवादियों ने चार हवाई जहाज हाईजैक करके उनका मिसाइल्स के रूप में प्रयोग किया। उसके कारण अमरीका हिला, दुनिया के दूसरे देश भी हिल गए। यहां तक कि यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल ने 28 सितम्बर, 2001 को 1373 प्रस्ताव पारित किया, जिसमें उन्होंने दुनिया के सब देशों से कहा कि आतंकवाद भयंकर समस्या है और सामान्य अपराध के लिए जो कानून बने हुए हैं, वे उसके लिए पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए आतंकवाद के लिए विशेष कानून बनाएंगे। मैं इस बात का जिक्र इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि मुझे आपके द्वारा प्रस्तुत बिल, अन लॉ फुल एक्टीविटीज (प्रिवेंशन) अमेंडमेंट बिल, 2008 को देख कर आश्चर्य हुआ। वर्ष 2008 में आप अनलॉफुल एक्टीविटीज (प्रिवेंशन) बिल के एक्ट के प्रिएम्बल को अमेंड कर रहे हैं। मुझे याद नहीं कि पहले कभी किसी ने प्रिएम्बल को अमेंड किया हो। ऐसा हो भी सकता हैए लेकिन मुझे याद नहीं है। इतना मैं जरूर कहूंगा कि वर्ष 2001 में जो सलाह यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल ने दुनिया को दी और जिसका पालन दुनिया के प्राय: सभी देशों ने अमरीका ने, इंग्लैंड ने, जर्मनी ने आदि देशों ने किया। मेरा बहुत से देशों में जाना हुआ और सभी देशों ने कोई न कोई कानून बनाया और अगर मैं गलत नहीं हूं तो पाकिस्तान ने भी कानून बनाया था। हमने जब बनाया, उस समय आप विपक्ष में थे और आपने इस प्रकार से हम पर हमला किया मानो हमने कोई अपराध कर दिया हो। हमने अगर प्रिवेंशन आफ टेरोरिज्म एक्ट बनाया, तो क्या हमने अपराध किया था। यह जो रेयर प्रावधान भारत के संविधान में है कि अगर लोक सभा और राज्य सभा के सदस्यों के मत में अंतर हो तो निर्णय ज्वायंट सैशन बुलाकर किया जाएगा। भारत के इतिहास में ज्वायंट सैशन शायद दो बार या तीन बार बुलाया गया है। आज मैं देखता हूं कि अचानक सरकार को लगता है कि एक विशेष नए कानून की जरूरत है, जबकि पिछले आठ-दस साल इस कानून को बनाने की बात नहीं सोची। मैंने कहा कि मुझे संतोष है, लेकिन मैं खुशी प्रस्तुत नहीं कर सकता हूं। आखिर एक कहावत है कि सुबह का भूला शाम को घर आ जाए, तो उसे भूला नहीं कह सकते। लेकिन अगर सुबह का भूला शाम को घर आ जाए और सुबह तथा शाम के समय के बीच में अनर्थ हो जाए, उस भूल के कारण बहुत ज्यादा नुकसान हो जाए, तो मैं उस व्यक्ति को भूला जरूर कहूंगा। आपने एक प्रकार से इस बिल को प्रस्तुत करके और उसकी वकालत करके तथा यह कह कर कि आज ही इसे पास करना है, एक प्रकार से आपने अपनी गलती स्वीकार की है और आपको करना भी चाहिए कि आप दस साल गलत थे। आपको गलती स्वीकार करनी भी चाहिए। स्वयं आपने अनलॉफुल एक्टीविटीज (प्रिवेंशन) अमेंडमेंट बिल के क्लाज़-2 में यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी के बारे में लिखा है।

हमने नहीं किया था। हमने देश की आवश्यकताओं को ध्‍यान में रखते हुए पोटा पास किया था। आपने उसे मैंडेटिड माना। एक प्रकार से यूएन सिक्योरिटी काउंसिल का मैंडेट है।

“Whereas the Security Council of the United Nations in its 4,385th meeting adopted Resolution No…so and so, etc., etc.,.. and whereas.. so and so…and whereas the Central Government in exercise of its powers conferred by section 2 of the United Nations Security Council Act has made the prevention and suppression of terrorism implementation of Security Council Resolution Order.”
You have quoted all the Resolutions of the United Nations Security Council adopted in respect of terrorism. बहुत अच्छा किया है। मैंने कहा कि मुझे इससे संतोष है लेकिन मैं कहूंगा जैसे कुम्भकरण को लंबी-लंबी नींद आती थी वैसे ही आप 7.8 साल की नींद के बाद जगे हैं। कृमैं चाहता हूं कि आप स्वीकार करते कि इस बात में गलत थे। मैं टाइम्स ऑफ इंडिया देख रहा था जिस की कटिंग मुझे किसी ने दी है। “This is old wine in new bottle.” “UPA has returned to POTA.” These are the headings. आप चाहे कुछ भी इन्कार करें। मैं उस समय मानता था कि हम बिना स्पैशल कानून के टैररिज्म का सामना नहीं कर सकते थे। मैं नहीं जानता कि मेरे वामपंथी साथी इस पर क्या कहने वाले हैं। उन्हें भी समझना चाहिए। मुझे स्वयं अनुभव है कि आपके मुख्यमंत्री कई बार मुझे कहते थे कि जब तक इस मामले में देश कठोर नहीं होगा, तब तक समस्या बड़ी भयंकर रहेगी।
आजकल के अखबारों में छपेगा कि Left and BJP vote together. लेकिन हम उसकी परवाह नहीं करते। Now I do not believe in political untouchability as you believe. I do not. आप अगर सही बात करेंगे तो मैं उसका समर्थन करूंगा। आप गलत बात करेंगे तो चाहे आप मेरे साथ होंगे तो भी मैं विरोध करूंगा।

यह बात बार-बार कही जाती है कि इसका इसलिए विरोध किया गया कि उसका दुरुपयोग हो सकता है। क्या कोई कानून बना है जिस का दुरुपयोग न हो सके। बहुत सारे साधारण कानून हैं जिनका बहुत दुरुपयोग होता है। इस बात को लॉ कमिशन ने बड़े प्रभावी रूप से लिखा है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की जजमेंट राजस्थान वर्सिज यूनियन ऑफ इंडिया को कोट किया है। The Mohely Commission had quoted that as part of a Law Commission Report. Law Commission’s Report is there on Prevention of Terrorism Bill. जिस में उन्होंने कहा है “It must be remembered that nearly because power may sometimes be abused, it is not ground for denying the existence of power. The wisdom of man has not yet been able to conceive of a Government with power sufficient to answer all the legitimate needs and at the same time incapable of mischief. मतलब लैजिटिमेट नीड है कि टैररिज्म पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।

कोई ऐसी सरकार नहीं है और इसमें कोई बुध्दिमानी नहीं है कि सरकार को उसके खिलाफ अधिकार भी दे और साथ-साथ उसका दुरुपयोग न हो सके, इसका भी प्रबंधा करे। सेफगार्ड प्रोवाइड करने चाहिए। जब हमने प्रिवेंशन ऑफ टेरेरिज्म एक्ट बनाया था तब मैंने अपने सब अधिकारियों को कहा कि सुप्रीम कोर्ट में टाडा के बारे में जो आपत्तियां की गई हैं कि इस तरह से दुरुपयोग हो सकता है इसलिए सेफगार्ड इनकारपोरेट करो और वो किए गए क्योंकि यह टेरेरिज्म और डिसरप्टिव एक्टिविटी के खिलाफ था। आपने भी कुछ किए हैं, बहुत अच्छा किया है। मैं इससे इंकार नहीं करूंगा लेकिन बेसिकली यह सोचना कि क्योंकि किसी लॉ का दुरुपयोग हो सकता है इसलिए यह पास नहीं होना चाहिए, यह सरासर गलत है। आज आपने यह बिल लाकर स्वीकार किया है कि हां, हमसे यह गलती हुई है लेकिन कहने के लिए तैयार नहीं हैं। हिन्दुस्तान में टेरेरिज्म पर विजय प्राप्त करने के लिए स्पेशल लॉ जरूरी है। लेकिन स्पेशल लॉ में क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए, देखना होगा। आप जो बिल लाए हैं मैं उसमें इनएडीक्वेसिस और मेरी दृष्टि में जो होना चाहिए, बताऊंगा। उदाहरण के लिए मैं बताना चाहता हूं कि आपने कहा पुलिस अफसर के सामने कोई कन्फेशन हो तो उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए। यह एडमिसिबल नहीं है क्योंकि स्वीकार तो होगा नहीं। कोई अपराधी स्वयं कन्फेस करता है और कहता है कि मैंने मर्डर किया है, It is not conclusive evidence. यह कोर्ट को डिसाइड करना है कि उसके साथ कोरोबोरेटिव एविडेंस कितना है। यह भी अधिकार है कि कोई कहे कि मैं कन्फेस करता हूं तो रिट्रेक्ट करने का भी अधिकार है। वह कोर्ट के सामने कहे कि मैं रिट्रेक्ट करता हूं। आप स्वयं वकील हैं और आप यही सब बातें ज्यादा जानते हैं। मैंने वकालत पढ़ी तो है लेकिन कभी प्रेक्टिस नहीं की लेकिन इतना मैं जानता हूं कि पुलिस अफसर के सामने कन्फेशन को क्यों एडमिसिबल एविडेंस किया। अभी एक आतंकवादी पकड़ा गया है, क्या उसके लिए और एविडेंस लाएंगे? उसकी एविडेंस एडमिसिबल नहीं होगी क्योंकि पुलिस अफसर या ज्यूडिशिएल अफसर या ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने नहीं किया गया है? हां, यह प्रेस्क्राइब करना चाहिए कि इस लैवल का पुलिस अफसर होना चाहिए जिसके सामने हो तो वह एडमिसिबल एविडेंस होगी, it does not become conclusive evidence. यह कन्क्रीट केस है जो अभी आया है कि एक आतंकवादी पकड़ा गया। तुका राम ने बहादुरी की और उसे पकड़ा। वह सब कुछ बताने के लिए तैयार होगा तो भी साधारण लॉ के तहत एविडेंस एडमिसिबल नहीं है। इसलिए मैं लॉ कमीशन की ऑब्जर्वेशन कोट करना चाहूंगा। मैं इसे बहुत महत्वपूर्ण मानता हूं जिसमें 73 रिपोर्ट में कहा है।
Mr. Home Minister, I am sure you have read it. But even then I would like to draw your attention to it.
“The act of terrorism by its very nature generates terror and a psychosis of fear among the populace. It is difficult to get any witnesses because people are afraid of their own safety and safety of their families. It is well known that during the worst days in Punjab even the judges and prosecutors were gripped with such fear and terror that they were not prepared either to try or to prosecute the cases against the terrorists. That is also stated to be the position today in Jammu and Kashmir and this is one reason which is contributing to the enormous delay in going on with the trials against the terrorists. In such a situation, insisting upon independent evidence or applying the normal peacetime standards of criminal prosecution may be impractical.”

These provisions have been included in most laws prepared all over the world to deal with terrorists. यह सोचना कि यह लॉ इतना स्ट्रिंजेंट इसलिए बना रहे हैं क्योंकि माइनोरिटी इसके खिलाफ है। आप इस प्रकार से कह कर माइनोरिटी को बदनाम कर रहे हैं। This is a law against terror; this is a law against terrorists that we enacted and which you are also enacting today.
You cannot now claim कि वह जो था, वह कम्युनल लॉ था और यह सेक्युलर लॉ है, यह तो नहीं कहोगे, उम्मीद करता हूं। आपने देश का बहुत नुकसान किया है by trying to see laws against terror through the prism of majority and minority. I said it that day and I repeat it today. मैं फिर से रिपीट करता हूं कि हिंदुस्तान में यहां की कांस्टिटुंट असैम्बली, जो उस समय अपने संविधान पर विचार करने बैठी, जब हिंदुस्तान का विभाजन हुआ था। यह विभाजन कांग्रेस नहीं चाहती थी, देश नहीं चाहता था और वह विभाजन इस आधार पर हुआ कि कहां हिन्दू बहुमत है और कहां मुसलमान बहुमत है और उन परिस्थितियों में पाकिस्तान ने अपने को थियोक्रेटिक स्टेट डिक्लेयर किया। हिन्दुस्तान ने अगर सेक्युलरवाद अपनाया तो यह स्वयं में एक ऐसी बात है कि जिसे दुनिया का कोई देश भूल नहीं सकता और हिन्दुस्तान भी नहीं भूल सकता और बहुत उचित किया, उसके आधार पर हमने साठ साल देश को चलाया। लेकिन फिर भी इतनी देर हर चीज को इस चश्मे से देखना, इससे न देश का भला है और न अल्पसंख्यकों का भला है। आप उनका भी बहुत नुकसान कर रहे हैं। इसलिए इस चश्मे से मत देखो। इस चश्मे को एक तरफ रखकर इन्डिपैंडैन्टली देखो कि टैररिज्म का मुकाबला करने के लिए कैसे-कैसे कानून जरूरी हैं। साधारणत: कोई इंटरसैप्शन ऑफ मैसेज, टेलिफोन टॉक वह एडमिसिबल एविडैन्स नहीं है। हमने प्रावधान बनाये, जिसमें Interception of telephonic talks and messages coming from, say, abroad to here, to the terrorist concerned, that became an admissible evidence. दे सकते हैं, मैं चाहूंगा कि गृह मंत्री, जो ढेर सारे प्रावधान थे relating to interception of messages. उन्हें भी इस नये कानून में समाविष्ट करें। उसकी एडिमिसिबिलिटी को स्वीकार करें। उसमें प्रावधान था कि वह एडमिसिबल होगा, इंटरसैप्शन ऑफ कम्युनिकेशन। मैं चाहूंगा कि जिस प्रकार से कंफैशन रिपोर्ट पुलिस ऑफिसर्स एडमिसिबल एविडैन्स होना चाहिए, वैसे एडमिसिबिलिटी ऑफ इंटरसैप्टिव इंफॉर्मेशन भी आनी चाहिए।

अध्‍यक्ष जी, मैं जानता हूं कि कानून का दुरुपयोग होता था, टाडा का भी दुरुपयोग होता था। मैं इनकार नहीं करूंगा और एक स्टेज पर मुझे याद है, इस समय चिदम्बरम जी चले गये, चिदम्बरम जी टाडा लाये थे। वह उस समय भी मिनिस्टर ऑफ स्टेट, होम थे, जब टाडा आया था और मुझे याद है कि उसका दुरुपयोग कैसे-कैसे होता था। पुलिस वाले को सुविधाजनक लगता था कि इस अपराधी को इस एजिटेशन को, चाहे वह ट्रेड यूनियन का एजिटेशन हो, मैं गुजरात में गया था, जहां पर फारमर्स एजिटेशन के खिलाफ, यहां हमारे दोनों साथी बैठे हैं और पहली बार अगर मैं टाडा के खिलाफ बोला तो उस फारमर्स कांफ्रैन्स में बोला, जहां फारमर्स के एक एजिटेशन को सप्रैस करने के लिए वहां पर टाडा का उपयोग किया गया। लेकिन किसी स्टेज पर तभी हमने यह नहीं कहा कि टाडा को स्क्रैप करो, कभी नहीं कहा। टाडा का दुरुपयोग हो रहा है, इसलिए हमेशा हम इसका विरोध करते थे। लेकिन किसी स्टेज पर टाडा खत्म करो, यह हमने नहीं कहा। मैं उम्मीद करता था कि आप भी हमें यह कहेंगे कि ठीक है, पोटा बनाओ, कोई बात नहीं, लेकिन दुरुपयोग मत करना, ऐसा कहते और अगर कहीं दुरुपयोग होता है तो आप उसे रोकते, उसकी आलोचना करते। लेकिन आपने लगातार अपनी एक थ्योरी बनाई कि terrorism is a law and order issue. स्टेट को करने दो, केन्द्र की जरूरत नहीं है। I can quote Shrimati Sonia Gandhi on this and I can also quote the Home Minister, Shri Shivraj Patil, who is no longer there as Home Minister, on this. But everyone from Prime Minister to Home Minister to the Congress Party President has taken the stand that the present set of laws is totally adequate to deal with terrorism.

And let them deal with it as law and order is a State issue. ge mls iwjk liksVZ djsaxsA This is the basic flaw that has been your thinking till today. Today, suddenly when you have staged a 'U’ turn, मैं तो बहुत खुश हूं। नेचुरली खुश हूं क्योंकि मैं लगातार आरग्यू करता था क्योंकि कानून हमने बनाया था और जिस कानून को समाप्त करना यूपीए के कार्यक्रम में in respect of Terrorism, लगभग एकमात्र चीज थी कि पोटा को हम खत्म करेंगे। It was the only thing that finds mention in the UPA’s Common Programme. In fact, I have with me a quotation from the Prime Minister. On September 3, 2005, Prime Minister Mr. Manmohan Singh at Chennai had said that :
“His Government had fulfilled its promise to repeal the Prevention of Terrorism Act, which has caused unnecessary harassment to every section. Our Government had made a commitment to repeal POTA, and we have faithfully fulfilled the promise made at the time of last Lok Sabha elections.”
होम मिनिस्टर साहब, आपने प्रधान मंत्री की इतनी बड़ी गर्वोक्ति को बिल्कुल नकार दिया।

हमने इतना बड़ा वचन पूरा किया और आपने उनको एक प्रकार से उस सारे को निरस्त कर दिया। क्यों? आप इस बात पर सोचिए। Mr. Home Minister, it is not easy just to nod your head and get away with it. It is not only because of Mumbai. मुम्बई से पहले जो घटना थी, वह इतनी बड़ी नहीं थी। मैं उस पर कहना चाहूंगा। मैं मन में सोचने लगता हूं कि क्यों, आखिर मुम्बई में ही दो साल पहले लोकल ट्रेन्स पर हमला हुआ था। वह हमला भी कोई कम भयंकर नहीं था और इसके बाद जो पहला वक्तव्य बाहर से निकला था, वह यह था कि इसमें पाकिस्तान का हाथ है और उसके थोड़े ही समय बाद अचानक प्रधान मंत्री जी कहते हैं कि पाकिस्तान तो स्वयं ही आतंकवाद का शिकार है, victim of terrorism. पाकिस्तान में भी कुछ हमले हुए हैं, वहां के राष्ट्रपति पर तथा दूसरे लोगों पर हमले हुए हैं। But to describe Pakistan as a victim of terrorism, and that too by the Prime Minister and two days later to announce that a joint-mechanism between India and Pakistan be set up to fight terrorism, I was shocked and amazed. हमने कहा कि इतने साल हमको दुनियाभर को विश्वास दिलाने में लगे कि हमारे यहां जो आतंकवाद है, वह कोई होमग्रोन नहीं है, It is cross-border terrorism. और वे मानने लगे थे कि हां, यह सही है। अभी-अभी आकर दो दिन पहले यह कहा गया कि “Pakistan is the epicentre of terrorism.” ये जो इतने सारे परिवर्तन हुए हैं, मैं मानता हूं कि कुछ तो सच्चाई है जो किसी को भी देखने में आएगी और दूसरी बात है कि देश में जैसा वातावरण मुम्बई पर उस हमले के बाद पैदा हुआ, फर्क यह है कि इससे पहले के जो विस्फोट होते थे, वे दो-चार घंटों के लिए होते थे। लेकिन इस बार तीन दिन तक यह सब लगातार चलता रहा और उसमें टेलीविजन चैनल्स ने जिस प्रकार से उसे दिखाया, हालांकि वह एक अलग बात है कि उसमें क्या दिखाना चाहिए और क्या नहीं दिखाना चाहिए या कोई उसका कोड बनना चाहिए, मैं इससे सहमत होते हुए भी समझता हूं कि टेलीविजन ने एक प्रकार से बहुत बड़ी देश की सेवा की कि उनको स्वयं लगा कि एक-एक व्यक्ति, एक-एक नागरिक जो टेलीविजन देख सकता था, He failed outraged कि हमारे यहां क्या हो रहा है? यह कैसे हो रहा है और क्यों हो रहा है? टेलीविजन ने वह चिंता पैदा की और इसी के परिणामस्वरूप लोगों में गुस्सा पैदा हुआ। लोगों ने जाकर किसी एक पार्टी के खिलाफ, एक सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा ज़ाहिर नहीं किया बल्कि पूरी पोलिटिकल कम्युनिटी के खिलाफ अपना गुस्सा ज़ाहिर किया। यह इसीलिए क्योंकि आपने दस साल तक इस बात से इंकार किया कि कोई स्पेशल लॉ नहीं बनाएंगे।

और स्पेशल लॉ नहीं बनाना और अगर स्पेशल लॉ किसी ने बनाया है, तो उसे खत्म करना, एक प्रकार से सरकार ने आर्टिकल ऑफ फेथ बना दिया। इसका जो नुकसान हुआ, उसे हम लोगों को उस दिन भुगतना पड़ा। लोग यह समझने लगे कि ये सब लोग सुरक्षित हैं, किसी के साथ कमांडोज़ हैं, किसी के पास यह है, किसी के पास वह है, और आम नागरिक दुखी है। एक प्रकार से उनका गुस्सा जायज़ है। यह गुस्सा हमारी सरकार के स्टैंड के कारण है कि किसी कानून की जरूरत नहीं हैए आर्डिनरी लॉज़ पर्याप्त हैं, It is a State issue, essentially a law and order issue. It is not a law and order issue. it is a very special evil. और जिस इविल ने दुनिया भर को इफलिक्ट किया है और आज भी किया है। मैं आपको बताऊं कि कितने हमने कानून बनाने हैं? अमरीका ने कितने कानून बनाये हैं, अमरीकन पैट्रीयट एक्ट नहीं, अनेक बनाये हैं। होम सिक्यूरिटी डिपार्टमेंट बनाया है। मैं इन बातों में अभी नहीं जाना चाहता, जरूरत नहीं है कि जब हम बैठकर डिसकस करेंगे तो सोचेंगे कि क्या करना है? बेसिकली हम लोगों को इस बात को स्वीकार करना चाहिये कि आज अल कायदा जैसे टैरेरिस्ट आर्गनाइजेशन्स, उनका सब से बड़ा दुश्मन, अगर कोई है तो वह भारत नहीं है, उनकी नजरों में अमरीका है, दूसरे नम्बर का इजराइल है और शायद हमारा नम्बर तीन हो सकता है, बम नहीं जानते। उनकी नजरों में सब से बड़ा दुश्मन अमरीका है, भारत नहीं है। लेकिन अमरीका सब से बड़ा दुश्मन होते हुये भी 9/11 में उन्हें इतनी बड़ी सफलता मिली कि उसके बावजूद वहां कोई छोटी-मोटी घटना तक नहीं हुई जब कि यहां पर 2004 के बाद से न जाने कितनी ऐसी घटनायें हुई हैं। मैं अगर गिनाना चाहूं तो ढेर सारी गिना सकता हूं। मैं छोड़ देता हूं। I do not want to hammer the same point today.

I do not want to go into it. I would only like to say कि आतंकवाद का मुकाबला करने के लिये लीगल फ्रेमवर्क चाहिये जिसकी दिशा में एक कदम आज उठाया गया है। उसमें भी मैंने बताया कि इसमें मुझे जो इनएडीक्वेसीज़ लगती हैं, in respect of confession लगती हैं। मुझे यह लगता है कि इंटरसैप्टेड इनफार्मेशन के बारे में जो प्रावधान थे, पोटा में जो थे, आप देख लीजिये, वे अनेक और सब के सब हैं। और इसकी इंटरसैप्टेड इनफौर्मेशन एडमिजिब्लिटी और प्रीजम्पशन ऑफ आफिस के बारे में आपने जो कुछ कहा है ए मैं उससे ज्यादा डिसएग्री नहीं करता हूं। लेकिन मैं यह जरूर कहता हूं कि कुल मिलाकर अमरीका शासन और अमरीका समाज - दोनों का एटिटयूड बहुत इम्पार्टेंर्ट है। हिन्दुस्तान में भी सरकार और समाज तथा सरकार और देश के एटीटयूड की बहुत इम्पाटर्स है। मैं एटीटयूड की बात जब कहता हूं तो 2001 में जो घटना हुई थी लेकिन उसके परिणास्वरूप 2008 में आज भी अगर कोई अमरीका जाता है तो जो आदमी एअर ट्रेवल करता है, उसकी पूरी जांच होती है, अच्छी खासी जांच होती है कि जुर्राब खोलो, जूते खोलो, यह खोलो, वह खोलो। अगर ऐसी स्थिति यहां हो तो क्या हमारा देश इस बात को स्वीकार करेगा? दिक्कत करेगा, मैं देश की बात कर रहा हूं और मैं जानता हूं कि आज तक क्यों ऐसा हुआ? भारत की संसद पर 13 दिसम्बर, 2001 को हमला हुआ। मुकदमे का फैसला 2002.03 में पूरा हो गया। अपराधी पकड़े गये, सजा हो गई और जिसे फांसी की सजा हुई, उस ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, एंडोर्स किया लेकिन इम्पलीमेंट नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ, कोई लौजिक नहीं, कोई बात समझ में नहीं आती है। कुल मिलाकर ये बातें एक संदेश भेजती हैं कि सारे आतंकवादी समूह के खिलाफ कार्यवाही करने में देश ढीला-ढाला है You can get away with it. मैं एक प्रावधान और भी कहूंगा।

जिस प्रावधान का रिकमेंडेशन नेवी कमीशन ने किया था, उसका जिक्र भी आपने किया है। नेवी कमीशन ने यह रिकमंड किया कि जो बैनड ऑरगेनाइजेशंस हैं, नेवी कमीशन में पैटीशन है, लेकिन यह लॉ कमीशन का है। The Law Commission in its 173rd Report also recommended that memberships of banned organisations should be construed as a terrorist act. This is a very serious matter. Therefore, in our Prevention of Terrorist Activities Act we had incorporated that. It is a recommendation of the Law Commission.

Today, particularly before this Bombay incident, with regard to the various incidents that took place in Jaipur, in Delhi, in Ahmedabad, it was said that it is home-grown terrorism now because it is SIMI mainly. This SIMI is a banned organisation, which in a way got away for a brief while because the Home Ministry failed to give the necessary evidence to the Tribunal. Subsequently the Home Ministry got it stayed and the ban was re-imposed. Today SIMI is a banned organisation even though Members of the Cabinet itself keep on defending it all the while. It is a very strange situation. Therefore, I would recommend that this recommendation of the Law Commission also should be reconsidered when you are thinking of all the inadequacies and shortcomings in the law.

By and large, I would once again say, it is no different from a war. It is a war that we are facing. To succeed in this war there has to be unity. Above all, there has to be a will to win this war. That will has been lacking. Today, if your two laws are an index to show that you have decided to turn a new leaf, to take a U-turn, I would be very happy.

I started thinking as to why the Government has changed its tune somewhat immediately after the Mumbai incidents. Some of the reactions that came immediately after Mumbai and then in the form of these two Bills, and the statements that have been made from the Government side, are different from what was being said earlier. First I am happy that no longer is it being said that an anti-terror law would be an anti-minority law. That is perhaps because you think that you are in power, therefore, it cannot be anti-minority.

Secondly, these terrorists selected three places. Why did they do it? There is a dimension to the Bombay incidents which should be taken note of. The world must have taken note of it. They selected the Oberoi, they selected the Taj, they selected the Trident, which is adjoining the Oberoi. They were sure that in these five-star hotels there must be foreign nationals also. So, our attack should not be only on the Indians, it should identify foreign nationals also and attack them. Then they chose Nariman House. I do not know but I am told that one Minister of ours omitted to mention Nariman House. It was reported in the Press. I do not know. If it is so, it is unfortunate.

Nariman House was selected by them after having done surveillance that this is one place where people from Israel, or all Jews living in Bombay assemble. In fact, the Israeli Ambassador when he met me told me that it was a Wednesday; if it had been a Friday, on Friday night on the eve of Saturday, which is their Kosher Day, if all the families in Bombay had assembled there, the tragedy would have been much bigger, much larger.

Foreign nationals were being targeted; Indians, of course, were targeted. So many people on the Chhattrapati Shivaji Terminus, coming from trains from all parts of the country, two terrorists with AK47 in their hands, went on mowing them down, killing everyone. The whole thing was horrible. Is it that we have woken up because it is not merely the people in India who think that India has become unsafe because of this soft attitude to terrorism, but the whole world thinks that India is now unsafe to the attack of terrorists? Is it this that has made us react in the present manner? I would think that the Security Council Resolution of 2001 was a very sound Resolution and those who followed it, did something in the interests of their own country, in the interest of humanity and the right step against terrorism. I am sorry that we should have been criticized because of following this particular UN Security Council Resolution in letter and spirit and enacting a special law to deal with terrorism.

With these words, I am grateful to you, Sir, for allowing me to initiate this debate.

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