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Saturday, 22 December, 2007

तिब्बत की आजादी पर एकजुट हुए भारतीय


लेखक : डा. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

लगता है चीन को लेकर भारत सरकार बहुत कुछ छिपा रही है। उत्तरी सीमांत पर चीनी सेना की घुसपैठ निरंतर हो रही है। इसका रहस्य उद्धाटन कभी भारत-तिब्बत सुरक्षा बल के लोग करते हैं, कभी अरूणांचल प्रदेश के सांसद और कभी कभार सेना के लोग भी कर देते हैं। परंतु भारत सरकार सख्ती से इस घुसपैठ का खंडन करती है। कभी-कभी घुसपैठ इतनी स्पष्ट और प्रत्यक्ष होती है कि भारत सरकार के लिए खंडन करना भी मुश्किल हो जाता है। तब सरकार के पास दूसरा पक्का बहाना है कि भारत और तिब्बत को लेकर जो मैकमोहन रेखा कागज पर खींची हुई है वह नीचे धरती पर दिखाई नहीं देती। इसलिए अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि कहाँ से भारत शुरू होता है ? और कहां तिब्बत खत्म होता है? सीमा की इस अस्पष्टता के कारण कभी कभार चीनी सेना इधर आ भी जाती है। लेकिन उसको घुसपैठ नहीं माना जाना चाहिए। वैसे भी भारत सरकार का यह तर्क बहुत पुराना है, पंडित नेहरू के वक्त में भी चीन सरकार लद्दाख में सड़क बनाती रही। भारत सरकार को इसका पता था लेकिन वह उसे छिपाती रही और अंत में जब चीन ने खुद ही घोषणा कर दी कि उसने लद्दाख में सड़क बना ली है तो भारत सरकार के पास दिखावे के लिए भी कोई बहाना नहीं बचा था। अलबत्ता चीन ने इतना जरूर किया कि उसने सड़क निर्माण पूरा हो जाने की विज्ञप्ति जारी करते समय उसने यह भी कह दिया कि यह इलाका चीन का ही है। इसी प्रकार चीनी सेना अब जब भारतीय इलाके में घुसपैठ कर रही है तो वह उसे चीनी क्षेत्र ही बता रही है और भारत सरकार भी शायद उसी पुराने बहाने से अपना बचाव कर रही है।

देश भर में चीन के इन प्रयासों का जनस्तर पर विरोध होता रहता है। वास्तव में चीन की यह घुसपैठ तिब्बत की गुलामी से जुड़ी हुई है। तिब्बत यदि चीन के कब्जे में न आता तो जाहिर है भारत की सीमा पर चीनी सेना के आने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता था। इसलिए भारतीय सीमा में चीनी घुसपैठ को रोकने का एक और कारगर तरीका तिब्बत की आजादी का है। यदि तिब्बत आजाद हो जाए तो स्वाभाविक है कि भारत की सीमाओं से चीनी सेना पीछे हट जाएगी और फिर घुसपैठ का प्रश्न भी समाप्त हो जाएगा। परन्तु दुर्भाग्य से भारत सरकार डरती है।

लेकिन पिछले दिनों 10 दिसंबर को दिल्ली में संसद भवन के सामने जंतर मंतर पर तिब्बत की स्वतंत्रता को लेकर जो जन सैलाब उमड़ा वह दृश्य आश्चर्यचकित कर देने वाला था। 10 दिसंबर का दिन वैसे भी संयुक्त राष्ट्रसंघ दुनिया भर में मानवाधिकार दिवस के तौर पर मनाता है। संयुक्त राष्ट्रसंघ को विश्वभर में हो रहे मानवाधिकारों के हनन की कितनी चिंता है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यह संगठन अमेरिका के साए में ही काम करता है और अमेरिका का मानवाधिकारों से उसी प्रकार का रिश्ता है जिस प्रकार का रिश्ता किसी नागा व्यक्ति का कुत्ते से होता है। लेकिन 10 दिसंबर को दलाईलामा को शांति के लिए नोबल पुरस्कार भी मिला था इसलिए इस दिन की महत्ता तिब्बतियों और भारतीयों दोनों के लिए ही बढ़ जाती है। ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि इस बार 10 दिसंबर को दिल्ली में संसद भवन के सामने तिब्बत की स्वतंत्रता को लेकर पहली बार प्रदर्शन हो रहा था। तिब्बत के लोग प्राय: हर साल ऐसा प्रदर्शन करते ही है। लेकिन इस बार के प्रदर्शन की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि यह प्रदर्शन तिब्बती नहीं कर रहे थे बल्कि भारतीय कर रहे थे। तिब्बत के लोगों की संख्या उसमें आटे में नमक के बराबर ही थी। जब भारत सरकार एक बार पुन: हिन्दी चीनी भाई-भाई के रास्ते पर अग्रसर हो रही है तब दिल्ली में अलग-अलग स्थानों से तीन चार हजार भारतीयों का बिना किसी आह्वान के तिब्बत के समर्थन में और चीन की साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ स्वत: प्रेरणा से उमड़ पड़ना एक ऐतिहासिक घटना ही कही जाएगी। तिब्बत की आजादी के साथ कैलाश मानसरोवर की मुक्ति का प्रश्न जुड़ जाने के कारण तिब्बत समस्या में एक प्रकार से भावनात्मक स्तर पर भारतीय सरोकारों में वृध्दि हुई है। यह आयोजन वैसे तो भारत-तिब्बत सहयोग मंच ने किया था। जो पिछले कुछ सालों से तिब्बत के प्रश्न को लेकर जन जागरण अभियान चला रहा है। लेकिन इस प्रदर्शन में शामिल होने के लिए जिस प्रकार मुसलमान, दिल्ली और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र और नावबौध्द शामिल हुए उससे स्पष्ट पता चल रहा था कि भारत सरकार की चीन नीति का विरोध कहीं बहुत गहरे में भारतीय मानस में हो रहा है। जनभावना का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदर्शन की खबर सुनकर विख्यात पत्रकार कुलदीप नैय्यर समर्थन देने के लिए स्वयं ही इसमें पहुँचे। इसी प्रकार पूर्व उपराष्ट्रपति स्व. कृष्णकांत की धर्मपत्नी श्रीमती सुमन इसमें स्वत: प्रेरणा से आई । समाजवादी पार्टी के सांसद बृजभूषण तिवारी और जे.डी.(यू.) के सांसद वशिष्ठ नारायण सिंह भी तिब्बत को समर्थन देने के लिए उपस्थित थे। प्रदर्शन में भग लेने वाले निष्क्रिय दर्शक मात्र नहीं थे बल्कि वे सभी सक्रियतापूर्वक सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए लोग थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और संघ की केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इन्द्रेश कुमार, जो पिछले कुछ सालों से तिब्बत के प्रश्न पर जन समर्थन के लिए आंदोलन चला रहे हैं ने इस प्रदर्शन में कुछ खरी-खरी और बेलाग बातें कही । इन्द्रेश कुमार जी का कहना था कि कुछ लोग इस कारण निराश हो सकते हैं कि भारत सरकार तिब्बत के प्रश्न पर सक्रियता नहीं दिखा रही। उन्होंने कहा ऐसा जरूरी नहीं है कि इसी प्रश्न पर सरकार से ही जनमानस की अभिव्यक्ति ही करे। तिब्बत का प्रश्न भी ऐसा ही है। तिब्बत की स्वतंत्रता के प्रश्न पर भारतीय जनमानस एक ओर है और भारत की सरकार दूसरी ओर है। देशों के रिश्तें जनता के स्तर पर पक्के होते हैं और कई बार सरकारें इन प्रश्नों पर बुरी तरह असफल रहती है। उन्होंने कहा चीन सरकार भी इस बात को अच्छी तरह जानती है कि तिब्बत के प्रश्न पर भारत सरकार भारतीय जनमत का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इसलिए बीजिंग ने अब भारतीय पत्रकारों और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं को चीन में बुलाकर उनको तिब्बत के प्रश्न पर चीन समर्थन बनाने के प्रयास प्रारंभ किए हैं। लेकिन भारत और तिब्बत के हजारों साल के रिश्ते इतने परिपक्व हैं कि चीन के ये प्रयास प्राय: निष्फल सिध्द हो रहे है। इस आक्रोशपूर्ण प्रदर्शन को देखकर लगता था कि चीन के प्रति भारत सरकार ने जो नपुंसकता पूर्ण नीति तैयार कर रखी है उसका जवाब भारतीयों ने देना शुरू कर दिया है ऐसी भी खबरें मिल रही हैं कि इस प्रकार के प्रदर्शन कई प्रदेशों की राजधानियों में भी हुए हैं। तिब्बत के प्रश्न को लेकर निश्चय ही यह शुभ संदेश है।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

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