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Wednesday, 19 December, 2007

नारी का चित्र और मीडिया का चरित्र

लेखक- आशुतोष

24 नवंबर 2007। असम की राजधानी दिसपुर में जो हुआ वह सभ्यता को कलंकित करने वाला था। झारखंड से पीढ़ियों पहले चाय बागानों में मजदूरी करने के लिये आये जनजाति के लोग असम में भी जनजाति की सूची में शामिल किये जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शन समाप्त होते ही रैली में शामिल कुछ असामाजिक तत्वों ने अचानक तोड़-फोड़ शुरू कर दी। स्थानीय निवासियों ने भी हिंसक प्रतिक्रिया की, पुलिस तमाशबीन बनी रही।

यहां तक का घटनाक्रम तो वही है जो हम गाहे-बगाहे देखते रहते हैं। असामान्य घटना इसके बाद हुई। रैली में शामिल लोगों को स्थानीय लोगों ने घेरकर मारना शुरू कर दिया। दर्जन भर प्रदर्शनकारी इस घटना में मारे गये। महिलाओं के साथ अभद्रता हुई। हद तब हो गयी जब असामाजिक तत्वों ने एक आदिवासी लड़की को पूरी तरह निर्वस्त्र कर दिया, उसके गुप्तांग को जूते से कुचला। मौके पर मौजूद प्रैस फोटोग्राफरों ने उसे बचाने के बजाय इस वीभत्स घटना के दुर्लभ चित्र लिये। मुहल्ले के शोहदे भी पीछे नहीं थे। वे सड़क पर निर्वस्त्र दौड़ती हुई उस लड़की के अपने मोबाइल से चित्र ले रहे थे और चुहल कर रहे थे। पुलिस की चुप्पी इनका मौन समर्थन कर रही थी।

जब यह फोटो और फुटेज अखबार और चैनलों के दतर में पहुंचे तो पेशेवर पत्रकारों की आंखें चमक उठीं। फोटोग्राफ जोरदार थे। उनमें खबर भी थी और बिकाऊपन भी। बिक्री अथवा टीआरपी बढ़ाने वाले सभी तत्व उसमें विद्यमान थे। घटना की संवेदनशीलता को देखते हुए एन.ई.टी.वी. जिसके पास इस घटना के मूल फुटेज थे, उसने इनका प्रसारण नहीं किया लेकिन उसने इन्हें अन्य राष्ट्रीय समाचार चैनलों को उपलब्ध कराया। चैनलों पर बदलती शब्दावली के साथ उस लड़की के चित्र बार-बार दोहराये जाने लगे जिन पर छोटी काली पट्टी चिपका कर उसे प्रसारण योग्य बना दिया गया था। अगले दिन के समाचार पत्रों में भी इन चित्रों ने काफी जगह पाई।

पत्रकारों व छायाकारों को इस अवसर पर मानवीय दायित्वों का निर्वाह करते हुए इस वीभत्स घटना को रोकने का प्रयास करना चाहिये या मानवीय संवेदनाओं को किनारे रख वे पत्रकार के रूप में वे अपने व्यावसायिक दायित्वों का निर्वाह कर रहे थे, यह पृथक बहस का विषय है। आज पत्रकारिता उस मुकाम पर आ खड़ी हुई है जहां नैतिक मूल्य निरर्थक माने जाने लगे हैं और सनसनी और सेक्स का घालमेल बिकाऊपन की गारंटी है।

एक दशक पहले तक जहां पीडित लड़की का नाम भी बदल कर छापा जाता था वहीं इस घटना के फुटेज दिखाते समय उसका चेहरा भी छिपाना जरूरी नहीं समझा गया। सिर्फ उत्तर पूर्व के समाचार पत्रों में ही नहीं बल्कि झारखंड के समाचार पत्रों ने भी इस घटना को प्रथम पृष्ठ पर फोटो सहित छापा। इसके फॉलोअप समाचार भी छपे किंतु उनमें मूल समस्या के स्थान पर सतही चर्चा अधिक हुई। समाचार पत्रों और चैनलों द्वारा यह तर्क दिया जा सकता है कि उन्होंने घटना को यथारूप प्रस्तुत कर समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन किया है। यह भी कहा जा सकता है कि वह इन चित्रों को दिखा कर समाज की संवेदना को झकझोरने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन यह तर्क अपने आप में अधूरे और खोखलेपन को उजागर करने वाले हैं।

आरक्षण की मांग और स्थानीय और बाहरी की पहचान से उपजे सवाल के वल असम में ही नहीं अपितु देश के हर हिस्से में कभी धीमे और कभी तेज स्वर में उठते रहे हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों में यह संवेदनाएं बेहद गहरी हैं। जिस तरह इस घटना को मीडिया में दिखाया गया उससे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच की दूरी को पाटने के बजाये बढ़ाने में ही मदद मिलेगी।

असम की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा चाय बागानों से आता है और चाय बागानों का सारा काम-धाम बिहार, झारखंड, बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के श्रमिकों पर निर्भर है। असम की अर्थव्यवस्था और विकास की धुरी बन चुके ये बिहार और झारखंड के श्रमिक पीढ़ियों से इन बागानों में काम कर रहे हैं। स्थानीय समाज इनके श्रम को तो आवश्यक मानता है लेकिन उनके सामाजिक या राजनैतिक वजूद को स्वीकार करने को तैयार नहीं होता।

जब यह घटना हो रही थी, राज्य की पुलिस तमाशा देख रही थी। उसने न इन्हें रैली निकालने से रोका और न उन्हें पलटवार करने से । पुलिस की यह रहस्यमय चुप्पी बताती है कि घटना के राजनैतिक निहितार्थ भी हैं। राज्य में बड़ी संख्या में नागरिक अधिकार पा चुके बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरूध्द जब पिछले विधानसभा चुनावों के पहले स्थानीय लोगों का गुस्सा फूटा था तो सरकार द्वारा न केवल उन्हें संरक्षण दिया गया अपितु उन्हें योजनाबध्द ढंग से बसाया भी गया और राशनकार्ड भी जारी किये गये। अपने ही देश के नागरिक जब अपनी मांगों के समर्थन में रैली की इजाजत मांगते हैं तो इजाजत नहीं मिलती। जब वे जबरन सड़कों पर आकर तोड़फोड़ करने लगते हैं तो उन्हें रोका नहीं जाता, विरोध में जब लोग उन पर हमला करते हैं तब भी पुलिस खामोश रहती है और मीडिया इस समूचे परिदृश्य पर बहस खड़ी करने के बजाय एक भयभीत निर्वस्त्र लड़की के सड़क पर भागने के चित्र दिखाकर सनसनी बेचती है और टीआरपी वसूलती है।

पत्रकारिता के इतिहास पर जिन्होंने नजर डाली है उन्हें याद है कि 6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा की सड़क पर निर्वस्त्र भागती एक मासूम लड़की का चित्र एक छायाकार ने लिया था। अमेरिका के जिस लड़ाकू जहाज ने हिरोशिमा पर एटम बम गिराया था उसमें चार पत्रकार भी थे। उन्होंने तबाही के उस दृश्य को अपनी आंखों से देखा था और अमेरिकी अखबारों में उनके द्वारा दिये गये समाचार और छायाचित्र छपे भी थे। उनमें से एक पत्रकार को सर्वश्रेष्ठ रिपोर्टिंग के लिये पुरस्कृत भी किया गया था। वह पुरस्कृत किया जाने वाला पत्रकार भुलाया जा चुका है। किंतु एटम बम की आग से कपड़े जलने के बाद बदहवास हिरोशिमा की सड़क पर दौड़ रही उस लड़की का चित्र फोटो पत्रकारिता के जगत में आज भी 'यूनिक' है। उस चित्र के प्रकाशन के बाद न केवल उस चित्र को प्रतीक बनाकर विश्वशांति की चर्चा चली बल्कि आज भी वह लड़की संयुक्त राष्ट्र की आणविक हिंसा के विरूध्द 'शांति राजदूत' है।

मीडिया उच्च मानकों पर अमल करते हुए यदि ऐसे प्रतीक गढ़ता है तो निश्चय ही ऐसे किसी भी चित्र और छायाकार को पहचान मिलेगी। लेकिय यदि इन प्रयासों से नारी के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने के अतिरिक्त कुछ भी हासिल न हो तो केवल बाजार के हित के लिये नारी अस्मिता को दांव पर लगाना अस्वीकार्य ही नहीं निंदनीय भी है।

महिला स्वतंत्रता के समर्थक और मानवाधिकार के रखवाले भी इस घटना पर चुप्पी साधे हैं। सूचना प्रसारण मंत्रालय जानता है कि उमा खुराना के साथ हुई अभद्रता के प्रसारण पर उसे पत्रकार के साथ-साथ चैनल के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करनी होगी क्योंकि मामला दिल्ली का है। सुदूर असम के चायबागान में रहने वाली और वहां के लिये भी बाहरी लड़की के लिये चिंतित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। छोटी-छोटी बातों पर स्वत: संज्ञान लेने वाली न्यायपालिका के लिये भी यह महत्वपूर्ण नहीं है।

नक्कार खाने में तूती की आवाज की तरह कुछ लोग अथवा छोटे-मोटे संगठन, जो इस घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं विश्वास रखें कि यदि उन्होंने इस आग को जिंदा रखा तो एक न एक दिन उसकी तपिश दिल्ली तक जरूर पहुंचेगी।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

1 comment:

परमजीत बाली said...

आज के मीडिया का चरित्र यही है...और किसी भी सरकार के कामों के बारे में कुछ भी कहना बेकार है...यहाँ किसी को कोई फरक नही पड़ता...बस इसी लिए तो कहा है--मेरा भारत महान!!!