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Wednesday 12 December 2007

सोनिया गांधी के नाम खुला पत्र- भारत के ढाई लाख करोड़ रुपए कहां हैं?

यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को संबोधित इस खुले पत्र में कांग्रेस से जुड़े रहे राजनीतिक-आर्थिक मामलों के विश्लेषक नमित वर्मा ने कांग्रेस अध्यक्ष का ध्यान कायदे-कानून को ताक पर रखकर रिजर्व बैंक द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था को कम से कम ढाई लाख करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाने की ओर खींचा है। इस पत्र से भारत सरकार के कई दिग्गज संदेह के दायरे में आते हैं।

अमरीका में मंदी का दौर शुरू हो गया है। अमरीकी कांग्रेस की संयुक्त आर्थिक कमेटी बुश प्रशासन के निर्णयों पर सवालिया निशान लगाने लगी है। इराक पर कब्जा, खर्चों एवं विकास की गति में कमी लाने वाली अप्रत्यक्ष लागत जैसे चिंताजनक विषय उठाए जा रहे हैं। 14 नवम्बर, 2007 को एसोसिएटेड प्रेस ने यह खबर दी कि युध्द के खर्चे के लिए उधार लिए गए धन के ब्याज का भुगतान, गवाएं गए निवेश अवसर, घायक सेवानिवृत्त सिपाहियों के लिए दीर्घकालीन स्वास्थ्य सेवा खर्च तथा तेल के बाजार में आए उतार-चढ़ाव की लागत जैसे अप्रत्यक्ष खर्चे 16 खरब अमरीकी डालर तक जा पहुंचे हैं।

इस 16 खरब डालर के अलावा दूसरे खर्चे भी हैं जिनका बोझ भारत जैसे अन्य देशों पर डाला गया है। डालर की घटती कीमत को बचाने के लिए पचास अरब डालर भारतीय अर्थव्यवस्था से निकालकर अमरीका में झोंक दिए गए हैं। यह धनराशि रिजर्व बैंक ने भारतीय बाजर से ब्याज पर बटोरी है, फिर इससे चार प्रतिशत सस्ती ब्याज दर पर धनराशि अमरीकी अर्थव्यवस्था को उपलब्ध कराई गई है। ब्याज दरों के अंतर के कारण रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने 8 हजार करोड़ रुपए से अधिक घाटा सहकर इतनी धनराशि प्रभावी रूप से अनुदान स्वरूप अमरीका को दी है।

भारतीय हितों के खिलाफ चल रहे इस षडयंत्र का क्रियान्वयन अमरीका के राजदूत डेविड कैंपबेल मलफोर्ड की निगरानी में हो रहा है। याद रहे कि राजदूत मलफोर्ड क्रेडिट सूइज फर्स्ट बोस्टन (सीएसएफबी) के अन्तरराष्ट्रीय अध्यक्ष की हैसियत से भारतीय स्टाक एवं आईपीओ घोटाले से प्रमाणित तौर पर जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद कि केतन पारेख ने सीएसएफबी के फ्रैंक क्वात्रोन की पध्दति की पूरी तरह से नक्ल की थी, भारत सरकार ने उनके इस रिश्ते को पूर्णत: नजरअंदाज कर दिया। केतन पारेख को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर साजिश का 'सिरमौर' होने का आरोप लगाया गया, जबकि सीएसएफबी के अधिकारियों के खिलाफ गिरफ्तारी की कार्रवाई नहीं की गई। याद रहे कि सेबी ने जांच-पड़ताल के बाद केतन इंडिया सेक्यूरिटीज प्राइवेट लिमिटेड, दोनों को एक ही सजा दी-मर्चेंट बैंकर और स्टाक ब्रोकर के रूप में नए कारोबार करने पर पूरी तरह से रोक....।

आज के संदर्भ में डेविड मलपोर्ड और उनके निकट दोस्त डोमिंगो फेलीप कवालो का बहुचर्चित इतिहास चिह्नित करने लायक है। 1990 में मुद्रास्फीति को नियंत्रित करन के नाम पर अमरीका से प्रेरित होकर अर्जेंटीना में 'पेसो' का डालरीकरण किया गया तो उलटा उसके अर्थतंत्र का विध्वंस हो गया और उसकी कर्जदारी बढ़ती चली गई। तब अमरीका तथा विश्व बैंक-आईएमएफ की शह पर वहां डोमिंगो कवालो वित्तमंत्री थे। मंत्री बनते ही डोमिंगो ने पहला निर्णय लिया अपने मित्र सीएसएफपी के अध्यक्ष इंटरनेशनल डेविड कैंपबेल मलफोर्ड को 'डेब्ट-स्वाप' की व्यवस्था के लिए आमंत्रित करने का। आधे घंटे के अंदर ही मलफोर्ड ने 29.5 अरब डालर की 'महान अर्जेंटीनियन डेब्ट-स्वाप' की व्यवस्था कर दी। यह एक घोटला था, जिसकी जांच अब भी चल रही है। इस घोटाले में सीएसएफबी को ब्याज के अलावा साढ़े बारह करोड़ अमरीकी डालर की राशि का कमीशन मिला।

भारत में भी वैसी ही नीति अमरीका चलवा रहा है। रिजर्व बैंक के गवर्नर वाईवी रेड्डी अपनी नीति को डालरीकरण नहीं कहते हैं, पर उन्होंने प्रभावी रूप से रुपए को डालर के साथ नत्थी कर दिया है। उन्होंने कुल सकल उत्पाद का लगभग 6 फीसदी अमरीकी डालर की मदद में झोंक दिया है।

आज गर्वनर रेड्डी, वित्तमंत्री चिदंबरम् और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भोली-भाली जनता को यह कहकर गुमराह कर रहे हैं कि उनकी नीति का मकसद है मुद्रास्फीति को रोकना। इन तीनों दिग्गज अर्थशास्त्रियों की इस दोधारी मंशा को सरकार के खुले कैपिटल एकाउंट की नीति के संदर्भ में देखते हैं तो एक जबर्दस्त विरोधाभास सामने आता है।

ऐसा असंभव और आंतरिक रूप से परस्पर विरोधी एजेंडा सरकारी नीति में एक बहुत बड़ी गलती को उजागर करता है और जितनी बड़ी गलती होती है उसकी उतनी ही बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ती है। वित्तमंत्री चिदंबरम चाहते हैं कि आर्थिक सिध्दांत के मूल सत्य एवं पारिभाषिक सीमाओं को झुठलाते हुए जनता यह स्वीकार कर ले कि उन्होंने कमजोर रुपए, मुद्रास्फीति की कम दर और खुले कैपिटल एकाउंट की असंभव तिकड़ी को संभव बना दिया है। चिदंबरम मुद्रास्फीति की दर कम होने का दावा कर रहे हैं और मनगढ़ंत आंकड़े पेश कर रहे हैं।

सरकारी आंकड़े कम से कम 3 महीने विलंब से छपते हैं, सो आज की स्थिति जनवरी, 2008 में ही पूर्णत: उजागर होगी, परन्तु रूझान तो आ चुके हैं। खासकर जिन वेतनभोगियों को कृषि, वस्त्र-उद्योग, हथकरघा एवं बीपीओ क्षेत्र में नौकरी से बेदखल कर दिया गया है उनको तो अर्थव्यवस्था की असलियत का पता चल ही चुका है।

ऐसे दौर में जब भारी विदेशी निवेश भारत के विकास का कारक और साथी बनने का इच्छुक था, तब सरकार के गलत मौद्रिक नीतियों ने विकास को बढ़ाने के बदले घटा दिया। भारतीय बाजार में बहुत पैसा आया, परन्तु विरोधाभास देखिए कि ब्याज दर बढ़ गयी। यह तभी संभव है जबकि मुद्रास्फीति की स्थिति उत्पन्न हो चुकी हो। अर्थात् चिदंबरम् की 3 प्रतिशत मुद्रास्फीति दर एक झांसा है।

जैसे-जैसे बैंकों का ब्याज दर बढ़ रही है, छोटा निवेशक बाजार से बाहर हो रहा है। सस्ते ब्याज दर पर उपलब्ध विदेशी ऋण को भारत में प्रवेश करते ही, सरकार की गलत नीतियों के कारण देशी निवेशकों एवं उपभोक्ताओं के लिए महंगा बना दिया जाता है। इससे कर्ज की बनावटी अनुपलब्धता की परिस्थिति उत्पन्न होती है और विकास में बाधा आती है।

गलत मुद्रास्फीति के प्रभाव से बचकर सीधे विदेश से सस्ता ऋण लेने के बड़े उद्योगपतियों के रास्ते में भी सरकार अड़चनें खड़ी कर रही है, कारोबार के लिए विदेशी ऋण पर 2 करोड़ डालर की सीमा लगाकर। इससे भी विकास प्रभावित होता है और अर्थव्यवस्था की विकास दर घटती है। एक तरफ विकास को बढ़ावा देने वाले भारतीय निवेशक पर मात्रात्मक एवं बढ़ती ब्याज दर आधारित लगाम कसी जा रही है, तो दूसरी तरफ मुनाफाखोर विदेशी पूंजीपतियों को अर्थव्यवस्था को लूटने के लिए बेलगाम छोड़ दिया गया है। नतीजा यह हुआ है कि भारत सरकार की नीतियों के जरिए अमरीका का मंदी का माहौल भारत में आयोजित कर लिया गया है।

आखिरकार भारत सरकार अपने देश और देशवासियों की कीमत पर अमरीकी अर्थव्यवस्था की इतनी सेवा क्यों कर रही है? इस प्रश्न का जवाब हमें मनमोहन सिंह, चिदंबरम एवं रेड्डी के कथित आका डेविड मलफोर्ड के बयान से मिलता है। अमरीकी सीनेट के विदेश मामलों की समिति के समक्ष मलफोर्ड ने कहा था, 'जिस प्रकार अमरीका में भारतीय उत्पादन एवं सेवाओं का अच्छा बाजार रहा है, ठीक उसी प्रकार भारत के लगातार बढ़ते बाजार को भी अमरीकी उत्पाद एवं निवेश के प्रति चुंबकीय शक्ति प्रतीत होनी चाहिए। यह तभी हो सकता है जब भारत में आर्थिक उदारीकरण तेजी से कार्यान्वित होता है। इसके लिए भारत को तेजी से अपने बाजार को विदेशी उत्पाद और निवेश के लिए खोलना पड़ेगा।'

1 नवम्बर, 2007 को द इकोनामिक टाइम्स ने कहा, 'भारत में भारी मात्रा में विदेशी निवेश आ रहा है। इससे रुपए में 12 प्रतिशत की मूल्य वृध्दि हो चुकी है। रूपए में आगे तेजी रोकने के प्रयास के तहत रिजर्व बैंक उस डालर को स्वयं खरीद ले रहा है और सीधे विदेशी-मुद्रा बाजार में नहीं जाने दे रहा है।'

इस वर्ष रिजर्व बैंक ने जनवरी से अब तक 61 अरब डालर खुले बाजार से खरीदा है। अत: उसे भारी मात्रा में विसंक्रमण करना पड़ा।

भारत सरकार द्वारा विदेशी निवेश पर यह बेतुका 3 से 4 प्रतिशत अनुदान अमरीकी ट्रेजरी की मुद्रा पलायन की समस्या को हल करता है। साथ ही साथ यह अमरीकी निजी निवेशकों की जेब भी भरता है। मध्य जुलाई से सितम्बर तक विश्व भर के केन्द्रीय बैंकों ने 48 अरब डालर की अमरीकी ट्रेजरी सेक्युरिटी बेची। यह आंकड़ा और भयानक हो सकता था यदि इसी दौरान रिजर्व बैंक अमरीकी ट्रेजरी के सहायतार्थ घाटे को नजरअंदाज करते हुए उनकी सेक्यूरिटी खरीदने के लिए बाजार में नहीं उतरता। रिजर्व बैंक और भारत सरकार की इस नीति के तहत भारत के पिछले महीनों हुए विकास का फायदा अमरीका को हस्तांतरित कर दिया गया और अक्तूबर, 2007 में आश्चर्यजनक रूप से अमरीका में 1,66,000 नई नौकरियां उत्पन्न हो गईं।

भारत सरकार की बेतुकी नीति का एक और नतीजा रहा एक साथ मुद्रास्फीति तथा ऋण एवं क्रय-शक्ति का संक्रमण। परिणाम यह हुआ कि मुद्रास्फीति के दानव से जुझने की गुहार लगाने वाली मनमोहन सरकार ने और भी भयावह स्टैगफ्लेशन के ब्रह्मराक्षस को भारतीय अर्थव्यवस्था पर बेकाबू छोड़ दिया है।

गर्वनर रेड्डी और उनके सहयोगी ने अपने कार्यकारी समूह की बैठक में स्वीकार किया था कि उन्हें ब्याज आधारित जमा खाता चलाने की संवैधानिक छूट नहीं है। यह जानने के बाद भी रिजर्व बैंक ने एक ढकोसला मात्र करार-पत्र दस्तखत कर, अपने जन्मदाता कानून का उल्लंघन किया। यह स्पष्ट धोखाधड़ी है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त चिदंबरम, गर्वनर रेड्डी और उनके विदेशी आका डेविड मलफोर्ड और उनके सहयोगियों की इस मिलीभगत के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था से 2,00,000 करोड़ रुपए की निवेशयुक्त पूंजी को विदाकर हमारे देश में निवेश और विकास को गहरी चोट दी गई। साथ ही भारत के फायदेमंद बाजार से अमरीका के मंदीयुक्त बाजार की तरफ निवेश को मोड़ने की खातिर भारत सरकार ने घाटा उठाकर 8000 करोड़ रुपए का अनुदान भी दिया।

एक और विषय जो उभर कर आता है, वह यह है कि अमरीका की ओर मोड़ी गयी यह धनराशि किस प्रयोग में आयी? अमरीकी कांग्रेस की संयुक्त आर्थिक कमेटी में छिड़ी बहस से स्पष्ट हो गया है कि अमरीका के बढ़ते कर्ज का हर आखिरी डालर उसके द्वारा इराक में घुसपैठ पर खर्च हो रहा है। इसका अर्थ यह निकला कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने गुप-चुप तरीके से विगत एक वर्ष में 8000 करोड़ रुपए का अनुदान इराक में अमरीकी घुसपैठ कार्यक्रम को दिया। इस नीति का राजनीतिक परिणाम तो आम चुनाव के द्वारा ही प्रमाणित होगा।

इस खुले पत्र का उद्देश्य आम भारतीय को यह बताना है कि हम किस प्रकार से आर्थिक संकट में फंसते जा रहे हैं।

सरकार ने रिजर्व बैंक अधिनियम 1935 का स्पष्ट उल्लंखन किया है। इस प्रकार के उल्लंघन में स्पष्ट तौर से आपराधिक मामला बनता है, इस पर उचित कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। सर्वप्रथम बाजार संक्रमण योजना (एस एस एस) समाप्त करनी चाहिए। द्वितीय, इस धोखाधड़ी के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

राष्ट्र का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। जल्दी से जल्दी सुधार का कदम उठाना अनिवार्य है। कांग्रेस अध्यक्ष एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की नेता होने के नाते आप ही समय रहते सुधार कर सकती हैं। एक अरब भारतीयों की खातिर आपको यह जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी। यह आपका दायित्व है। कृपया भारतवर्ष और भारतीय अर्थव्यवस्था को बचा लें।

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