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Saturday 5 January 2008

मनमोहन सिंह युग प्रवर्तक अथवा विदेश नीति के विध्वंसक

लेखक : रामजी प्रसाद सिंह

अमेरिका के साथ आणविक संधि कर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक जुआ खेला है। अगर ये सफल हो गया तो वे एक युग प्रवर्तक माने जाएंगे अथवा भारत की विदेश नीति के विध्वसंक के रूप में उनकी निंदा की जाएगी। अमेरिका के साथ भारत का संबध कभी भी ज्यादा मधुर नहीं रहा। नेहरू युग में जब भारत नवनिर्माण की नींव डालने के महाअभियान का सूत्रपात कर रहा था, तब अमेरिका के साथ दो महत्वपूर्ण समझौते हुए थे, एक पीएल-480 के अंतर्गत खाद्यान्न की आपूर्ति का समझौता और दूसरा तारापुर परमाणु बिजली घर के लिए सवंर्धित यूरोनियम(ईंधन) देने का समझौता। खाद्ययान देने के समझौते को जिस तरह से लागू किया गया, उसके कारण भारत को 1964-67 के अकाल का सामना करने में मदद अवश्य मिली, लेकिन इससे अमेरिका को होने वाली आय का जिस प्रकार से उपयोग किया गया, उससे भारत को काफी नुकसान हुआ। उस धन का उपयोग कर अमेरिका ने भारत में कुछ राजनीतिक दलों की मदद कर अपने पक्ष में जनमत तैयार करने की चेष्टा की। ठेठ भाषा में कहा जाएगा कि इस धन का उपयोग कर अमेरिका ने भारत के राजनेताओं और जनमत बनाने वाले बुध्दिजीवियों को खरीदने की चेष्टा की। निश्चित रूप से अमेरिका भारत की विदेश नीति को प्रभावित करना चाहता था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की निर्गुटता की नीति को अमेरिका ध्वस्त करना चाहता था। उसे लगता था कि भारत की निर्गुटता की विदेश नीति का झुकाव सोवियत संघ की ओर है। यानि जो हमारा दोस्त नहीं, वो दुश्मन है। इसलिए उसने भारत की प्राकृतिक आपदाओं (सुखे और बाढ़) का फायदा उठा कर अत्यंत लोकप्रिय प्रधानंमत्री जवाहर लाल नेहरू को कमजोर करने की ठान ली।

नेहरू काल में भारत में अणु ऊर्जा आयोग की स्थापना हो चुकी थी। आणविक उर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग की दिशा में भी बहुविध प्रयास शुरू हो चुके थे। परमाणु विज्ञान के क्षेत्र में अनेक प्रकार के अनुसंधान शुरू हो चुके थे। डॉक्टर होमी जहांगीर भाभा के नेतृत्व में कृषि, औषधी-विज्ञान और उद्योग के विकास के लिए परमाणु उर्जा के उपयोग पर व्यापक कार्यक्रम शुरू हो चुके थे। 1956 में भारत की पहली परमाणु शोध भट्टी 'अप्सरा' चालू हो चुकी थी। इसमें प्राकृतिक यूरेनियम और भारी जल का उपयोग कर 40 मेगावाट बिजली का उत्पादन आरंभ हो गया था। देश की पहली परमाणु उर्जा भट्टी (संवर्धित यूरेनियम पर अधारित) की स्थापना तारापुर में की गई थी। इसके लिए 200 मेगावाट की दो परमाणु भट्टियां एक अमेरिकी फर्म से खरीदी गई थी। इसके लिए ईंधन की आपूर्ति अमेरिका करने के लिए वचनबध्द था। उसने ईंधन भेजना भी शरू कर दिया था, जिसके फलस्वरूप इसे रिएक्टर ने 1 अप्रैल 1969 से काम करना शुरू कर दिया था। किंतु दो साल के अंदर अमेरिका ने संवंर्धित यूरेनियम की सप्लाई की मात्रा में कमी कर दी। इसका नतीजा ये हुआ कि भारत को उस बिजली घर को चालू रखने के लिए उसकी विद्युत उत्पादन क्षमता बहुत घटानी पड़ गई।

इंदिरा सरकार में विदेशमंत्री के रूप में श्री नरसिम्हा राव इस विषय पर बात करने के लिए अमेरिका गए, किंतु इसका कोई लाभ नहीं हुआ। इस विषय पर उन्होंने बड़े ही कूटनीतिक भाषा में लोकसभा को बताया कि तारापुर बिजली घर को संर्विधत यूरेनियम देने के बारे में अमेरिका के साथ जो समझौता हुआ, था उसकी अकाल मृत्यु हो गई, किंतु तरीके से उसको दफन किया जाना बाकी है।

इसके बाद इंदिरा सरकार सावधान हो गई और अपने आतंरिक साधनों से परमाणु उर्जा की आवश्यकताओ को पूरा करने के लिए पूरी ताकत लगा दी। वैकल्पिक ईंधन की खोज शरू हो गई। तमिलनाडु के कल्पकम्म में 500 मेगावाट की क्षमता वाला प्रोटोटाइप फास्ट ब्रिडर रिएक्टर तैयार किया गया, जिसमें प्लूटोनियम यूरेनियम कार्बाइड ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने लगा। इसके बाद चौथा परमाणु उर्जा संयत्र उत्तर प्रदेश के नरौला में और पांचवा गुजरात के कतरापुर में स्थापित किया गया। साथ ही यूरेनियम का खनन और निस्कस्कण्र के अलावा भारत ने प्रयुक्त परमाणु कचरे को दोबारा इस्तेमाल में लाने की तकनीक भी प्राप्त कर ली। परमाणु रिएक्टरों के लिए ईंधन का पर्याप्त उत्पादन सुनिश्चित करने के बाद 11 मई 1974 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने राजस्थान के पोखरण की मरूभूमि में पहला परमाणु विस्फोट कर संसार को हैरान कर दिया। यद्यपि इस परीक्षण का उद्देश्य परमाणु हथियार बनाने का कदापि नहीं था, तथापि अमेरिका ने भारत पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए थे, इसके कारण परमाणु उपकरण बनाने वाले अन्य देशों ने भी भारत को मदद देना बंद कर दिया। किंतु भारत ने इन सभी बाधाओं को पार करते हुए अपने वैज्ञानिकों की बदौलत परमाणु हथियार बनाने की क्षमता प्राप्त कर ली।

1998 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने एक साथ पांच परमाणु विस्फोट कर दुनिया को बता दिया कि भारत संसार का छठा परमाणु शक्ति संपन्न देश हो गया है। अटल सरकार ने परमाणु विस्फोटों की शृंखला में पंद्रह टन की क्षमता के हाइड्रोजन बम का भी विस्फोट किया था। फिर भी अमेरिका या संसार की दुसरी महाशक्तियों ने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र की पंक्ति में शामिल नहीं किया है। यद्यपि भारत ने बार-बार संसार को आश्वस्त किया कि वो अपने परमाणु शक्ति का इस्तेमाल निर्माण, विकास और शांति के लिए करेगा। भारत का परमाणु कार्यक्रम किसी देश पर हमला करने के लिए आरंभ नहीं किया गया है। श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने यहां तक कहा कि भारत अपनी परमाणु शक्ति का इस्तेमाल केवल जवाबी हमले के तौर पर करेगा, किंतु भारत की इस सदाशयता की इस नीति पर अमेरिका या किसी अन्य महाशक्ति की ओर से कोई अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं हुई। उल्टे भारत पर आणविक अप्रसार संधि और सीटीबीटी पर हस्ताक्षर करने के लिए तरह-तरह के दवाब डालने की कोशिश जारी रही।

सन् 1977 के बाद भारत में कई बार अल्पजीवी सरकार बनी। परंतु किसी ने देश की विदेश नीति अथवा आणविक नीति में किसी प्रकार का परिर्वतन करना स्वीकार नहीं किया। महाशक्तियों के कड़े प्रतिबंध के बावजूद भारत अपनी नीति पर डटा रहा। इसी बीच अमेरिका पर अलकायदा के हमले के फलस्वरूप अमेरिका को अपनी नीति पर पुनर्विचार करना पड़ा और भारत को आतंकवाद विरोधी विश्व की लड़ाई में अपना भागीदार बनाने के सिवा उसे कोई और विकल्प दिखाई नहीं पड़ा। नतीजा उसे अपनी आर्थिक, राजनीतिक और विदेश नीति में परिवर्तन करना पड़ा और भारत के साथ विज्ञान और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी सहयोग का हाथ बढ़ाना पड़ा। भारत-अमेरिका परमाणु संधि इसी की ताजी कड़ी है। राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश इस पर आमादा हैं। किंतु अफगानिस्तान और इराक में मुंह की खाने के बाद उनका अमेरिका की राजनीति पर प्रभुत्व समाप्त प्राय हो गया है। अगले साल अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव होना है। उसमें निश्चित रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार सफल होता दिख रहा है। उसके बाद इस संधि का क्या रूप होगा, यह कहना मुश्किल है। किंतु हर सुबह रात की कहानी बता देता है। अमेरिका के डेमोक्रेटिक पार्टी के लोग जिनका संसद में बहुतम है, भारत अमेरिका आणविक संधि से असहमत हैं। इसलिए आज बुश के दवाब में आकर वे इस संधि पर अपनी मुहर लगा भी दें। तो भी यह पूरी तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति पद हासिल करने के बाद भी वे समझौते पर ईमानदारी से अमल करेंगे।

अगर अमेरिका पीछे हटने लगेगा तो आणविक उपकरणों की सप्लाई करने वाले 44 अन्य देशों के भी पैर लड़खड़ाने लगेंगे। ऐसी अवस्था में भारत को सतत् जागरूक रहना होगा और अमेरिका के भरोसे अपनी कोई योजना बनाने से पहले सौ बार सोचना पड़ेगा, और वैकल्पिक व्यवस्था तैयार रखना होगा।

अमेरिका ने अपनी आणविक नीति में भारत के लिए विशेष छूट दी है, ये सही है। किंतु इसके पीछे हो सकता है कि वह एशिया में अपनी शक्ति संचय करना चाहता है। ये भी संभव है कि वो चीन के मुकाबले भारत को खड़ा करने की कूटनीतिक चाल चल रहा हो। यह भी संभव है कि अफगानिस्तान मोर्चे पर पाकिस्तान से उसकी जो उम्मीदें थीं, वह पूरी नहीं हुईं, इसके कारण अब वो भारत को अपने आगोश में लेने की तैयारी कर रहा हो। यह भी हो सकता है कि वह एशिया में नया शक्ति संतुलन पैदा करना चाहता हो। यह भी संभव है वो कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान को लड़ा कर दोनों को बर्बाद करना चाहता हो।

अमेरिका यदि भारत के प्रति मैत्री और सहयोग का संबंध बढ़ाना चाहता, तो सबसे पहले उसे सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिलाने के लिए आगे बढ़कर भारत को उसका न्यायपूर्ण अधिकार दिलाने का प्रयास करता। क्योंकि ये सर्वविदित है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के पूनर्गठन की रिपोर्ट आई तो अमेरिका ने दो टूक कहा कि वो सुरक्षा परिषद के विस्तार की स्थिति में जर्मनी और जापान को इसकी सदस्यता दिलाने का प्रयास करेगा। यूएन के महासचिव के चुनाव के समय अमेरिका ने भारत के शशि थरूर की तुलना में दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री बान-की-मून का समर्थन किया।

इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए भारत को अमेरिका से सदैव सावधान रहना चाहिए। भारत को निर्गुटता की अपनी विदेश नीति को धारदार बनाकर महाशक्तियों की होड़ से अपने को दूर रखकर ही देश की आधारशिला को मजबूत करने के लिए सतत प्रयत्‍नशील रहना चाहिए।
(नवोत्थान लेख सेवा हिन्दुस्थान समाचार)

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