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Wednesday 9 January 2008

साध्वी ऋतंभरा की हुंकार


गत 30 दिसंबर को दिल्‍ली में आयोजित ऐतिहासिक रामसेतु रक्षा महासम्‍मेलन में साध्वी ऋतंभरा, प्रणेता, वात्सल्य ग्राम (वृंदावन) का उदबोधन-


इस देश का प्राणाधार हैं श्री राम। वे हमारी आस्थाओं और जन-जन की निष्ठाओं में बसते हैं। वे पंचवटी की छांव में मिलते हैं, अंगद के पांव में मिलते हैं, अनसुइया की मानवता में मिलते हैं और मां सीता की पावनता में दृष्टिगोचर होते हैं। राम मंदिर के फेरों में नहीं शबरी के झूठे बेरों में मिलते हैं। देख सकते हो तो देखो, सारा हिन्दू जनमानस भगवान राम से आलोकित और संचालित होता है।


अपने पुरखों और संस्कृति को नकारने से बड़ा दुर्भाग्य कुछ और नहीं हो सकता। आज जैसी स्थिति बनी है वैसी स्थिति पहले भी आई थी जब अयोध्या में प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर पराभवी युग का प्रतीक सबकी आस्थाओं को चुनौती दे रहा था। 6 दिसम्बर 1992 को हिन्दू समाज की शक्ति के आगे वह प्रतीक देखते ही देखते ओझल हो गया। लेकिन आज परिस्थितियां बड़ी विचित्र हैं। रामसेतु को तोड़ना निशाचरी चिंतन है, आसुरी प्रवृत्ति है। रामसेतु केवल एक सेतु नहीं हमारी आस्था का दर्पण है। इसे ध्वस्त करने वालों के विरुध्द संकल्पित होकर प्रतिकार का शंख गुंजाना होगा, राजकाज के लिए सभी को आगे आना होगा।


करुणा हमारा स्वभाव है लेकिन जब कोई हमारी आस्थाओं को चुनौती देता है तो हम षडंत्रों के संहारी बनकर मंत्रों का नवनिर्माण करते हैं, जो क्रांति का मार्ग प्रशस्त करता है। ये देश राम का है, परिवेश राम का है, हम सब राम के हैं। तुम हिन्दू हो, जिन्होंने नक्षत्रों को संज्ञा दी है, जिन्होंने दधीचि बनकर अपनी हड्डियां राष्ट्र को समर्पित की हैं। तुम हिन्दू हो, जिन्होंने सागर की छाती पर पाषाणों को तैराया था, जिन्होंने स्वाभिमान के लिए अपने पुत्रों को दीवार में चिनवाया था। तुम हिन्दू हो, जिन्होंने युध्दों की चुनौतियां भी स्वीकार कर ली थीं, फांसी को फंदे को चूमा था, लेकिन मां भारती के स्वाभिमान और अस्तित्व के लिए अपने यौवन को न्योछावर किया था। हिन्दुओ, तुमने अन्दमान की काली कोठरी में पत्थरों पर अपने रक्त के शौर्य की कहानियां लिखी थीं। हिन्दुओ, तुमने घास की रोटियां खाई थीं लेकिन अपने स्वाभिमान को नहीं बेचा था। हिन्दुओ, तुमने हरिश्चंद्र बनकर मणिकर्णिका घाट पर अपना कर्तव्य निभाया था, अपने सम्मुख अपने पुत्र की लाश लिए खड़ी पत्नी को देखकर भी तुम विचलित नहीं हुए थे। हिन्दुओ, तुमने अपना सर्वस्व न्योछावर किया राष्ट्र के लिए, समाज, धर्म, संस्कृति के लिए। हम अपने लिए जीना जानते ही नहीं, हम अपनों के लिए जीना जानते हैं। हमने कण-कण में राम का दर्शन किया है। हम सारी दुनिया में वात्सल्य लुटाने वाले हैं। लेकिन आज अपनी धरती पर अपनी सहिष्णुता के कारण अपमानित होने को विवश हुए हैं। अपनी धरती पर शरणार्थी बन जाने का दंश एक हिन्दू से ज्यादा कौन जानता है? अपने ही देश के अंदर केसर की क्यारियों में बारूद पैदा की गई, हमारे ही देश के टुकड़े-टुकड़े करके तुष्टीकरण की राजनीति को परवान चढ़ाया गया। हम देखते रहे। और आज स्थिति यह हो गई कि लोग हमारे राम को नकारने की धृष्टता करने लगे हैं। इस देश में जब तक आसुरी ताकतें रहेंगी वंदनीय का वंदन नहीं होगा, दण्डनीयों का दण्ड नहीं होगा। इसलिए हिन्दू समाज को संतों का आदेश है कि आने वाले समय में इस देश के अंदर ऐसे वातावरण का निर्माण करें जहां कातिलों की मुक्ति के विधान नहीं रचे जाएंगे, अपितु देश के अंदर आतंकवादियों को सूली पर चढ़ाया जाएगा।


कातिलों की मुक्ति का विधान हो गया यहां

आज देशद्रोही भी महान हो गया यहां।

इक रिवाल्वर ने देशभक्ति को डरा दिया,

कातिलों की टोलियों को रहनुमा बना दिया।

कल लिए हुए खड़ा था बम बनाती टोलियां,

जो उजाड़ता रहा है मेहंदी, मांग, रोलियां।

जो सदा वतन की लाज को उघाड़ता रहा,

और भारती का मानचित्र फाड़ता रहा।

जो नकारता रहा है देश के विधान को,

थूकने की चीज मानता था संविधान को।

इसके सर पे ताज धरके हो रही है आरती,

रो रहा है देशप्रेम, रो रही है भारती।

जो हमारी रोती मातृभूमि को सुकून दे,

और देश द्रोहियों को गोलियों से भून दे,

ऐसे सरफरोश का हमें प्रकाश चाहिए,

देश के लिए पटेल या सुभाष चाहिए।


महात्मा गांधी ने इस देश की बागडोर पं. नेहरू के हाथों में न सौंपकर यदि सरदार पटेल के हाथों में सौंपी होती तो भारत, भारत के रूप में भारतीयता के गीत गाता दिखाई देता। उस समय हम चूके। लेकिन आज पुन: देश हमसे कुछ मांग रहा है। राम से प्रेम रखने वाले धर्मयोध्दाओं रामद्रोहियों के प्रतिकार का संकल्प करो। उन पाषाणों का स्मरण करो जो 'राम' नाम अंकित कर सागर की छाती पर तैराए गए थे, उस गिलहरी का स्मरण करो जो सेतु निर्माण में अपना किंचित योगदान देने आई थी। प्रभु राम ने भी गिलहरी के उस प्रयास को देखकर प्रेम से उसके शरीर पर हाथ फेरा था। इसलिए हिन्दुओ, अपने छोटे-छोटे प्रयत्नों से बिखरी शक्ति को संगठित करो। क्रंदन नहीं, हुंकार भरो हिन्दुओ।


जो सनातन नहीं मिटा लंकेश की तलवार से,

जो सनातन नहीं मिटा कंस की हुंकार से,

वो सनातन क्या मिटेगा मनमोहन की सरकार से


इस सत्य सनातन संस्कृति की जड़ें गहरी हैं, जिन्हें हमने अपनी श्रध्दा से सींचा है। इसलिए हिन्दू समाज रामसेतु रक्षार्थ संकल्पित हो।

2 comments:

mahashakti said...

दीदी माँ की वाणी में जादू है जो भी सुनता है सुनता ही रहता है।

बधाई हो भाई :)

मिहिरभोज said...

संजीव जी मैं स्वयं वहां था ,और मैने कई लोगों को भाव विभोर होकर रोते देखा.सचमुच दीदी मां की ओजस्वी वाणी मैं जादु है.शत शत नमन