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Thursday, 16 October, 2008

हिंदुओं के दमन की विश्वव्यापी दास्तान


लेखक- उमाशंकर मिश्र

यह दास्तान है भारत समेत एशिया के अनेक देशों में हिन्दुओं के साथ होने वाले सौतेले व्यवहार की, जो बताती है कि अमरनाथ श्राईन बोर्ड की जमीन छीनकर हिन्दुओं की आस्था एवं उनके धार्मिक प्रतीकों पर पहली बार हमला नहीं हुआ है, इसकी जड़ें बहुत अधिक गहरी एवं विषैली हैं।
अमरनाथ श्राईन बोर्ड से जमीन वापस लिये जाने का मसला पर्याय है मुस्लिम तुष्टीकरण का जो हिन्दुओं की आस्था और उनसे जुड़े प्रतीकों के समक्ष एक चुनौती बनकर आ खड़ी हुई है।
आज कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, उसकी बुनियाद बहुत पहले रख दी गयी थी। 1989 में 3 लाख कश्मीरी पंडितों को घाटी से निकाला जाना इसी कड़ी का हिस्सा कहा जा सकता है। 1990 में आतंकवाद के कहर के बाद से लेकर आज तक लाखों कश्मीरी पंडितों को जम्मू तथा बाहर कैम्पों में रहना पड़ रहा है। अपने ही देश में इन लोगों की स्थिति शरणार्थी सी बनी हुई है और सियासत की फांस में जकड़े इन लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है।
हालांकि इस तरह से हिन्दुओं के साथ व्यवहार पहली बार किया गया हो ऐसा नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ भारत में ही इस तरह का जातीय भेदभाव हिन्दुओं को झेलना पड़ा है, बल्कि एशिया के अनेक देशों में वहां की सरकारों की शह पर हिन्दुओं पर न केवल अत्याचार किए गए बल्कि उनकी आस्था के प्रतीकों पर भी हमले हुए हैं।
अमरनाथ श्राईन बोर्ड से जमीन छीने जाने के खिलाफ हिन्दुओं का उग्र होना लाजमी था। जम्मू-कश्मीर के नये राज्यपाल श्री एन.एन. वोहरा ने पद संभालते ही अमरनाथ श्राईन बोर्ड से जमीन वापिस लेने के आदेश दे दिये। हिन्दुओं की भावनाओं पर मुस्लिम समाज की भावनाओं को तरजीह देते हुये आनन-फानन में श्राईन बोर्ड के सभी अधिकार प्रदेश की सरकार को सौंप कर एकतरफा तानाशाही फैसला थोप दिया गया। राज्यपाल ने श्राईन बोर्ड की बैठक नहीं बुलाई, हिन्दुओं के धार्मिक नेताओं से बात करना उचित नहीं समझा और न ही कश्मीरी नेताओं के राजनीतिक पैंतरों को भीतर से झांका।
आज कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, उसकी बुनियाद बहुत पहले रख दी गयी थी। 1989 में 3 लाख कश्मीरी पंडितों को घाटी से निकाला जाना इसी कड़ी का हिस्सा कहा जा सकता है। 1990 में आतंकवाद के कहर के बाद से लेकर आज तक लाखों कश्मीरी पंडितों को जम्मू तथा बाहर कैम्पों में रहना पड़ रहा है। अपने ही देश में इन लोगों की स्थिति शरणार्थी सी बनी हुई है और सियासत की फांस में जकड़े इन लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जम्मू में 55,476, दिल्ली में 34,088 और अन्य राज्यों में 19,338 रजिस्टर्ड कश्मीरी पंडितों के परिवारों को सरकारी राहत मिल रही है। सरकार की ओर से इन परिवारों को करीब तीन हजार रुपये और राशन प्रतिमाह दिया जाता है। लेकिन लोगों को उनकी जड़ों से उखाड़कर शरणार्थी कैम्पों में ठूंस देने की यह कीमत क्या जायज ठहरायी जा सकती है? क्या यह उन लोगों की पीड़ा और समस्या का अंतिम समाधान हो सकता है? इसमें भी देखने वाली बात होगी कि इस तरह की राहत क्या सभी परिवारों को मिल पा रही होगी? यह सोचने का विषय है।
हुर्रियत के नेता आज जिस तरह से फुंफकार रहे हैं उससे कट्टरपंथी अलगाववादियों द्वारा कश्मीर घाटी से हिन्दुओं को खदेड़े जाने का मकसद साफ हो जाता है। घाटी में अलगाववाद की जिस आग को हवा दी जा रही है क्या वह देश की संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं है? राष्ट्र की एकता अखंडता को तार-तार करने वाले कृत्य एवं बयानों के बावजूद क्या केन्द्र सरकार को इन विषैले नागों का फन नहीं कुचलना चाहिए था? लेकिन ऐसा नहीं हुआ! सबसे बड़ा दुख तो तब होता है जब खुद को जनता का रहनुमा बताने वाली महबूबा मुफ्ती जैसे लोग भी गीदड़ों की तरह हू-हू करने लगते हैं। इस तरह की घटनाओं के पीछे के निहितार्थों को समझने की भी जरूरत है। करीब से समझने के लिए इतिहास के पन्नों को थोड़ा सा पलटना पड़ेगा। आजादी के बाद हिन्दू मान्यताओं के उलट ढेर सारे कानून बनाये गये और बहुसंख्यकों ने उसे वक्त की नजाकत समझ, स्वीकार भी किया। लेकिन मुसलमानों की छह सौ साल पुरानी मान्यताओं में तनिक भी बदलाव नहीं कर उन्हें विशेष नागरिक की हैसियत प्रदान कर दी गयी। हालांकि इससे मुस्लिम समाज फायदे में रहा ऐसी बात नहीं लेकिन देश मेें विघटन के बीज तो पड़ ही गये। उसके बाद तो ऐसे उदाहरणों की लंबी शृंखला है। मुस्लिम पर्सनल ला से लेकर शाहबानो और अब अमरनाथ तक। बहुसंख्यक लोग यह पूछने को तो विवश हुए ही हैं कि जब दुनिया में इकलौते भारत में ही हज सब्सिडी दिये जाने पर किसी को आपत्ति नहीं, हज टर्मिनल बनाने, अल्पसंख्यकों के लिए दिये जाने वाले ढेर सारे अनुदानों पर कोई भी भारतीय विरोध दर्ज नहीं कराता तो करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ी अमरनाथ यात्रा को थोड़ा सा आसान बना देने में किसका क्या बिगड़ जाता?
हिन्दुओं के मानवाधिकारों के हनन की बात सिर्फ भारत तक सीमित हो ऐसा नहीं है। एशिया के अन्य कई देशों में हिन्दू नागरिकों के अधिकारों का हनन किया जाता रहा है। अफगानिस्तान, बांग्लादेश, फिजी, भूटान, कजाकिस्तान, मलेशिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब, श्रीलंका, त्रिनिडाड एंड टोबैगो में हिन्दू नागरिकों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए शायद ही कोई मानवाधिकारवादी आगे आता हो।
हिन्दुओं के मानवाधिकारों के हनन की बात सिर्फ भारत तक सीमित हो ऐसा नहीं है। एशिया के अन्य कई देशों में हिन्दू नागरिकों के अधिकारों का हनन किया जाता रहा है। अफगानिस्तान, बांग्लादेश, फिजी, भूटान, कजाकिस्तान, मलेशिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब, श्रीलंका, त्रिनिडाड एंड टोबैगो में हिन्दू नागरिकों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए शायद ही कोई मानवाधिकारवादी आगे आता हो।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो दुनिया भर में हिन्दुओं की आबादी एक अरब से भी अधिक है। एक जानकारी के मुताबिक इस समुदाय को विश्व का तीसरा सबसे बड़ा धार्मिक समूह बताया गया है। यही नहीं हिन्दू धर्म को दुनिया के सबसे फरातन धर्मों में माना जाता है। हिन्दू अपनी मान्यताओं को लेकर बहुलतावादी माने जाते हैं और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार की पूजा पध्दतियाें का प्रयोग करते हैं।
दक्षिण एशिया में और भारत के बाहर रह रहे करीब 2 करोड़ हिन्दुओं में से बहुसंख्य को भेदभाव, आतंक, हत्या, शारीरिक प्रताड़ना, जबरन धर्म परिवर्तन, मंदिरों को तोड़ना, सामाजिक एवं राजनीतिक बहिष्कार के अलावा धार्मिक, भाषाई एवं जातीय आधार पर निर्वासन का तो सामना करना ही पड़ता है, इसके साथ-साथ वोटिंग समेत तमाम नागरिक अधिकारों से भी उन्हें वंचित कर दिया जाता है। कई देशों में तो अन्य धर्मों के चरमपंथी भेदभाव की नीति अपनाते हुए राजनेताओं एवं सरकारी अधिकारियों की मार्फत प्रशासनिक स्तर पर भी धार्मिक उन्माद की जड़ों को सींचने का काम करते हैं।
अफगानिस्तान को ही लीजिए, जहां वैदिक काल के समय से ही हिन्दू सभ्यता का इतिहास मौजूद रहा है, वहां तालिबानियों द्वारा मंदिरों को सिलसिलेवार ढंग से ध्वस्त कर दिया गया। कुछेक मंदिरों पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने कब्जा कर लिया है। आज हालत यह है कि अफगानिस्तान में शायद ही हिन्दुओं की आस्था का कोई केन्द्र बचा होगा। क्या भारत में भी कश्मीरी अलगाववादी कुछ इसी तरह की बिसात नहीं बिछा रहे हैं? वहां हिन्दू अपने बच्चों को स्कूलों में इसलिए भेजने से डरते हैं कि उनके बच्चे अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण कहीं उपहास एवं भेदभाव का शिकार न बन जायें। हिन्दू नागरिकों के फनर्वास और नुकसान की भरपाई के लिए सरकार भी पहल नहीं करती। दूसरी ओर हिन्दू नागरिकों के हितों को तार-तार करने के लिए कट्टरपंथी हर समय तैयार बैठे रहते हैं।
1947 में बांग्लादेश में हिन्दुओं की आबादी कुल जनसंख्या के करीब 30 प्रतिशत के बराबर थी। लेकिन 1991 तक इस आबादी में बढ़ोतरी होने की बजाय ठीक उलटा देखने को मिलता है। तब तक करीब 2 करोड़ बांग्लादेशी हिन्दू पूर्ववत् जनसंख्या में से कहां लुप्त हो चुके थे, यह एक बहुत बड़ा सवाल है। यहां तो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं एवं पत्रकारों को भी नहीं बख्शा जाता। मानवाधिकार संस्था एच.ए.एफ. के आंकड़े के मुताबिक वर्ष 2007 में हिन्दुओं की हत्या, बलात्कार, अपहरण, मंदिरों का ध्वस्तीकरण और जमीन हड़पने संबंधी 270 से भी अधिक मामले सामने आए हैं। यही नहीं कुल जनसंख्या के करीब 44 प्रतिशत हिन्दू परिवार यहां ‘एनेमी प्रॉपर्टी एक्ट-1965′ का दंश झेलने को मजबूर हैं। इसके कारण हिन्दुओं की जमीन को जब्त कर लिया जाता है।
भूटान जैसे देश में भी हिन्दू भेदभाव के शिकार रहे हैं। 90 के दशक के शुरुआती दौर में भूटान में रह रहे 100,000 हिन्दू अल्पसंख्यकों समेत न्यींगमापा बौध्द समुदाय के नागरिक अधिकारों को छीन लिया गया और उन्हें धार्मिक एवं जातीय कारणों से जबरन देश से निकाल दिया गया। ये सभी लोग नेपाल में यूनाईटेड नेशन्स हाई कमीशन फार रिफ्यूजी द्वारा लगाए राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। जबकि करीब 20 हजार से अधिक लोगों के नेपाल तथा भारत के कई हिस्सों में बिखरे होने की बात कही जाती है।
ईसाई बहुल देश फिजी में हिन्दुओं की आबादी करीब 34 प्रतिशत है। हिन्दुओं के खिलाफ विषवमन और उनकी आस्था के प्रतीकों को ध्वस्त करना यहां आम बात है। वहां का मेथोडिस्ट चर्च फिजी को पूरी तरह से ईसाई राष्ट्र बनाने की इच्छा रखता है। ईसाई चरमपंथियों द्वारा हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों को वहां की सरकार का भी समर्थन प्राप्त होता है। यही नहीं हिन्दुओं से जुड़ी संस्थाओं का ईसाईकरण करके भी उनके अधिकारों का यहां हनन किया जाता हैं।
1947 में पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं की आबादी कुल जनसंख्या का करीब 25 फीसदी थी। लेकिन आज पाकिस्तान में कुल आबादी में मात्र 1.6 फीसदी हिन्दू रह गए हैं। पाकिस्तान में तो आधिकारिक तौर पर ही ईशनिन्दा जैसे कानूनों की आड़ में गैर इस्लामिक लोगों के साथ सौतेला व्यवहार किया जाता है। हालांकि यहां कानूनी तौर पर बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध है, लेकिन ऐसे अनेक मामले सामने आते रहे हैं, जिनमें हिन्दुओं से बंधुआ मजदूरों की तरह काम करवाया जाता है। स्कूलों की किताबों में भी इस्लाम को प्रोत्साहन दिया जाता है, जबकि हिन्दुओं समेत अन्य धर्मानुयायियों के खिलाफ घृणा फैलाने का काम किया जाता है। यही नहीं हिन्दू लड़कियों के अपहरण, बलात्कार और मदरसों में ले जाकर उनके धर्म परिवर्तन की बात भी सामने आती रहती है।दुनिया भर में महाशक्ति के रूप में अपनी पहचान बना चुका रूसी संघ भी हिन्दुओं को प्रताड़ित करने में शामिल रहा है। यहां के संविधान के मुताबिक सभी समुदायों को धार्मिक आजादी दी गई है और सभी धर्मों को समान माना गया है। यही नहीं चर्च को स्टेट से अलग रखने की बात भी कही गई है। लेकिन सरकार इन प्रावधानों का खुद ही सम्मान नहीं करती है। अभी हाल ही में इस्कान के सदस्यों को जिस प्रकार यहां प्रताड़ित किया गया, उससे रूसी सरकार का असली चरित्र सबके सामने आ गया है।
सऊदी अरब में तो कुरान के मुताबिक इस्लामिक कानून संविधान में शामिल हैं। यहां कानूनी धाराएं सुन्नी इस्लाम को ध्यान में रखते हुए बनाई गई हैं। हत्या, चोरी, दैहिक शोषण, समलैंगिकता और व्यभिचार जैसे अपराधों के लिए भीषण प्रताड़ना के साथ-साथ फांसी जैसी सजा देने का अधिकार जजों को प्राप्त है। मुतव्वा-ए-इन (सऊदी धार्मिक फलिसश् के दबाव के चलते यहां नागरिकों को मुस्लिम एवं गैर मुस्लिम की पहचान के लिए अलग से पहचान पत्र लेकर चलना पड़ता है। धार्मिक स्वतंत्रता का कोई प्रावधान यहां नहीं है। गैर मुस्लिमों को अपने धार्मिक प्रतीकों की पूजा अर्चना की इजाजत नहीं है। सार्वजनिक तो दूर निजी तौर पर भी किसी भगवान की उपासना को लेकर सजा दी जा सकती है। अन्य धर्मों के प्रति भेदभाव की बू शैक्षिक संस्थानों में भी साफ देखने को मिलती है। हिन्दुओं को तो यहां काला जादू करने वालों और भूत प्रेत में विश्वास करने वालों की श्रेणी में रखा जाता है।
दुनिया भर में क्यों कभी हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई जाती है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
संयुक्त राष्ट्र के ‘अंतरराष्ट्रीय रिलिजीयश प्रफीडम कमीशन’ ने सऊदी अरब को ‘कंट्री आफ पर्टिक्यूलर कन्सर्न्स’ की संज्ञा दी है। इसके बावजूद अपने सैन्य, तेल एवं अन्य आर्थिक हितों के चलते अमेरिका यहां किसी तरह के बदलाव की पहल करने से कतराता है। सऊदी अरब को इस्लामिक चरमपंथ का केन्द्र माना जाता है और यहां से दुनिया भर के इस्लामिक संस्थानों एवं चरमपंथी संस्थाओं को फंडिंग भी की जाती है।
इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए विचार करने की जरूरत है कि दुनिया भर में क्यों कभी हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई जाती है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
(लेखक सोपानस्टेप मासिक पत्रिका के संवाददाता हैं.)

7 comments:

Sanjeev said...

सही लिखा है पर सत्य कडवा है।

Sourabh Malviya said...

भाई उमाशंकर ने अदम्य साहस का कार्य किया हैं. यह जानते हुए भी कि मीडिया में हिंदू विरोधी होने पर ही प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता हैं, इसके बावजूद भी उन्होंने सत्य के साथ प्रतिबध्दता जाहिर की हैं. और गंभीर मुद्दों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया हैं.

विचार-मंथन said...

क्या मानवाधिकार आयोग केवल मुस्लिमों के लिए हैं. जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं की स्थिति चिंताजनक हैं लेकिन मानवाधिकार आयोग इस दिशा में कोई पहल नहीं करता हैं. हमारे देश के नेताओं को चाहिए कि वो दल से ऊपर उठकर देश की चिंता करें. इतनी अच्छी रपट के लिए उमाशंकरजी को साधुवाद.

Suresh Chandra Gupta said...

एक अच्छी और जानकारी से भरपूर पोस्ट के लिए वधाई और धन्यवाद.
कश्मीर से पंडितों का निष्काशन इस देश के माथे पर एक ऐसा कलंक है जिसे समय भी नहीं धो पायेगा. इस के लिए कांग्रेस और उसकी अल्पसंख्यक वोट की राजनीति जिम्मेदार है. स्वतंत्रता आन्दोलन में इस पार्टी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, पर आज़ादी की महक मिलते ही कुर्सी के लिए देश का विभाजन करवा दिया. उस के बाद से यह पार्टी केवल कुर्सी की राजनीति कर रही है.

sunil suyal said...
This comment has been removed by the author.
sunil suyal said...

महमूद एंड कम्पनी ,मरोल पाइप लाइन ,मुंबई द्वारा हिंदी में प्रकाशित कुरान मजीद से ऊदत } इस्लाम के अनुसार इस्लाम के प्रति इमान न रखने वाले ,व बुतपरस्त( देवी -देवताओ व गुरुओ को मानने वाले काफिर है ) 1................मुसलमानों को अल्लाह का आदेश है की काफिरों के सर काट कर उड़ा दो ,और उनके पोर -पोर मारकर तोड़ दो (कुरान मजीद ,पेज २८१ ,पारा ९ ,सूरा ८ की १२ वी आयत )! 2.....................जब इज्जत यानि , युद्द विराम के महीने निकल जाये ,जो की चार होते है [जिकागा ,जिल्हिज्या ,मोहरम ,और रजक] शेष रामजान समेत आठ महीने काफिरों से लड़ने के उन्हें समाप्त करने के है !(पेज २९५ ,पारा १० ,सूरा ९ की ५ वी आयत ) 3...................जब तुम काफिरों से भिड जाओ तो उनकी गर्दन काट दो ,और जब तुम उन्हें खूब कतल कर चुको तो जो उनमे से बच जाये उन्हें मजबूती से केद कर लो (पेज ८१७ ,पारा २६ ,सूरा ४७ की चोथी आयत ) 4............निश्चित रूप से काफिर मुसलमानों के खुले दुश्मन है (इस्लाम में भाई चारा केवल इस्लाम को माननेवालों के लिए है ) (पेज १४७ पारा ५ सूरा ४ की १०१वि आयत ) .........................क्या यही है अमन का सन्देश देने वाले देने वाले इस्लाम की तस्वीर इसी से प्रेरित होकर ७१२ में मोह्हम्मद बिन कासिम ,१३९८ में तेमूर लंग ने १७३९ में नादिर शाह ने १-१ दिन मै लाखो हिन्दुओ का कत्ल किया ,महमूद गजनवी ने १०००-१०२७ में हिन्दुस्तान मै किये अपने १७ आक्रमणों मै लाखो हिन्दुओ को मोट के घाट उतारा मंदिरों को तोड़ा,व साढ़े ४ लाख सुंदर हिन्दू लड़कियों ओरतो को अफगानिस्तान में गजनी के बाजार मै बेच दिया !गोरी ,गुलाम ,खिलजी ,तुगलक ,लोधी व मुग़ल वंश इसी प्रकार हिन्दुओ को काटते रहे और हिन्दू नारियो की छीना- झपटी करते रहे {द हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया एस टोल्ड बाय इट्स ओवन हिस्तोरिअन्स,लेखक अच् ,अच् एलियार्ड ,जान डावसन }यही स्थिति वर्तमान मै भी है सोमालिया ,सूडान,सर्बिया ,कजाकिस्तान ,अफगानिस्तान ,अल्जीरिया ,सर्बिया ,चेचनिया ,फिलिपींस ,लीबिया ,व अन्य अरब देश आतंकवाद के वर्तमान अड्डे है जिनका सरदार पाकिस्तान है क्या यह विचारणीय प्रश्न नहीं की किस प्रेरणा से इतिहास से वर्तमान तक इक मजहब आतंक का पर्याय बना है ???????????????

prakharhindutva said...

यदान्त्रेषु गवीन्योर्यद् वस्तावधि संश्रुतम्।
एका ते मूत्रम् मुच्यताम् बहिर्वालिति सर्वकम्।।
-अथर्व काण्ड १ सूक्त ३ मंत्र ६
अर्थात् जैसे कि आँतों में और नाड़ियों में और मूत्राशय के भीतर जमा मल मूत्र कष्ट देता है और उसको निकाल देने से चैन मिलता है वैसे ही मनुष्य को शारीरिक, आत्मिक और सामजिक शत्रुओं को निकाल देने से सुख प्राप्त करता है।
ये रक्तबीज मुसलमान भी ऐसे ही सामाजिक शत्रु हैं जिनके निकालने से हमारे देश को चैन मिलेगा। अभी भी इनको पालते रहे, इनके ज़ुल्मों के सहते रहे तो हमारा देश रोगी हो जाएगा। सोचो और विचारो।