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Tuesday, 14 October, 2008

कम्युनिस्टों, शर्म तुमको मगर नहीं आती!

''अपनी सम्पूर्ण जटिलताओं में वास्तविक जीवन लेनिन के लिए अनजान है, वह आम जनता को नहीं जानते, वह उसके साथ कभी रहे नहीं हैं; पर उन्होंने-किताबों से-यह जरूर सीख लिया है कि लोगों को (जानवरों की तरह) पिछले पाँवों पर कैसे खड़ा कर दिया जाए और कैसे-जो कि सबसे आसान है-उनकी पाशविक प्रवृत्तियों को उभारा जाए। मजदूर वर्ग लेनिन के लिए वही है जो एक लोहार के लिए लौह-अयस्क होता है। वर्तमान परिस्थितियों में क्या यह सम्भव है कि इस अयस्क से समाजवादी राज्य बनाया जा सके? स्पष्टत: यह असम्भव लगता है; पर कोशिश क्यों न करें? लेनिन का क्या जाएगा यदि आखिरकार यह प्रयोग विफल होता है?

बुध्ददेव भट्टाचार्य ने अपने आका स्तलिन के लेबर कैंपों की राह पर चलते हुए जो तानाशाही दिखाई है और दलाली की है वे भूल गये थे कि यह रूस नहीं भारत है। भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की दादागीरी नहीं चलती। तानाशाही और दादागीरी की मंशा रखनेवालों को बंगाल की जनता का यह करारा थप्पड़ है। इससे शायद बुध्दो बाबू और ज्योति बाबू को शर्म आ जाए। पर इनकी तो आदत है गलतियाँ करना और भूल जाना - शर्म मगर इनको नहीं आती! कम्युनिस्ट और आदमी में यही फर्क है कि आदमी अपने कुकर्म पर शर्माता है, कम्युनिस्ट अपनी शर्मिंदगी को भी बौध्दिकता का जामा पहना जस्टीफाई करता है।
वह प्रयोगशाला में रसायनशास्त्री की तरह प्रयोग कर रहे हैं, फर्क इतना है कि एक रसायनशास्त्री निर्जीव पदार्थों पर प्रयोग करता है और उसका प्रयोग जीवन के लिए मूल्यवान होता है; जबकि लेनिन जीवित प्राणियों पर प्रयोग कर रहे हैं जो ध्वंस की ओर ले जा रहा है। लेनिन के अनुयायी मजदूरों को यह समझ लेना चाहिए कि रूसी मजदूर वर्ग पर एक निर्दय प्रयोग किया जा रहा है, एक ऐसा प्रयोग जो मजदूरों के सर्वश्रेष्ठ हिस्से को नष्ट कर देगा और रूसी क्रान्ति के सामान्य विकास को बहुत लंबी अवधि के लिए अक्षम बनाकर रख देगा।'' - मैक्सिम गोर्की, नोवाया जीज्न, अंक 177, 10 (23) नवंबर 1917

जेएनयू में जारी विद्यार्थी परिषद का पर्चा 11.10.2008

मित्रों,

'कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास गलतियों का इतिहास है।' ये शब्द किसी दक्षिणीपंथी के नहीं वरन् प्रख्यात् वामपंथी राहुल सांकृत्यायन के हैं। जो वामपंथ को ठीक से नहीं जानते उन्हें आश्चर्य होता है कि अमुक मुद्दे पर वामपंथ ने ऐसा स्टैण्ड क्यों लिया? लेकिन जो वामपंथ का इतिहास थोड़े भी ठीक ढंग से जानते हैं उन्हें तनिक भी आश्चर्य नहीं होता। केवल सहजबोध से भारतीय वामपंथ के स्टैण्ड की भविष्यवाणी की जा सकती है। यह बात कला, साहित्य और राजनीति तीनों के बारे में उतनी ही सच है। बस, राष्ट्रविरोध और हिन्दू-विरोध यही दोनों ऐसे प्रतिमान हैं जिन पर वामपंथ के सारे निर्णय और स्टैण्ड निर्भर करते हैं। कम-से-कम कम्युनिस्ट पार्टी का अब तक का इतिहास इसका गवाह है। आगे सद्बुध्दि आ जाए तो बात कुछ और है, लेकिन इसकी संभावना नहीं दिखती। लेकिन प्रश्न उठता है इसके कारण क्या हैं? वस्तुत: इसके कारण कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में ही निहित हैं। जिस तरह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी आदि दल हैं उस तरह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी नहीं है। यह 'भारत की कम्युनिस्ट पार्टी' (Communist Party of India) है। इसका मतलब है कि यह कम्युनिस्ट पार्टी की भारत स्थित शाखा है। अत: इसके निर्णय स्वतंत्र हो ही नहीं सकते। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट पार्टी का 30 दिसम्बर 1927 को लिखा गया गुप्त पत्र इसका प्रमाण है - ''कम्युनिस्ट पार्टी को असंदिग्ध रूप से कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल का एक अंग होना चाहिए, अन्यथा उसे अपने आप को कम्युनिस्ट कहने का अधिकार भी नहीं है। जिन लोगों को विश्व भर में निरन्तर संघर्ष करनेवाली एक संस्था के इस संगठन-सिध्दांत में विदेशी नियंत्रण की बू आती है, वे कम्युनिस्ट नहीं हैं।'' (एम.आर. मसानी, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, पृ. 333)

लेकिन, कम्युनिस्ट इण्टरनेशनल का अंग होते हुए भी रूस और चीन की कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने निर्णय स्वतंत्र रखे। और तमाम किसान मजदूरों के आन्दोलनों से सम्बध्द होते हुए भी राष्ट्रवाद का समर्थन किया। चीन और रूस दोनों में मगर आपसी तनातनी बनी रही, तो इसके पीछे यही कारण है। इन दोनों देशों का राष्ट्रवाद कहीं-न-कहीं साम्राज्यवाद की ओर पर्यवसित होता है, पर दोनों में से किसी देश की कम्युनिस्ट पार्टी ने इसका विरोध नहीं किया, राष्ट्र-राज्य का विरोध तो और बात है। कम्युनिस्ट सोवियत संघ और चीनी गणतंत्र का संविधान इसके प्रमाण हैं। सोवियत संघ के 1977 का अनुच्छेद 62 स्पष्ट कहता है - ''रूस के प्रत्येक नागरिक का यह पुनीत कर्तव्य है कि वह समाजवादी मातृभूमि की रक्षा करे। मातृभूमि के द्रोह से अधिक गंभीर कोई अपराध नहीं है।

''चीनी गणतंत्र के 1982 के संविधान के अनुच्छेद 55 में वर्णित हैं : ''प्रत्येक नागरिक का यह पावन कर्तव्य है कि वह मातृभूमि की रक्षा करे और आक्रमण का प्रतिकार करे।

''बावजूद इसके भारतीय कम्युनिस्टों ने देशभक्ति नहीं सीखी और लगातार इन दोनों देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा बेवकूफ बनाये जाते रहे तथा अमरबेल की तरह भारत को चूसते रहे। आइसा के ब्रांड एम्बेसडर और हिन्दी साहित्य के टुटपुँजिया कवि गोरख पाण्डेय उर्फ राम सजीवन जिस 'बिरटेन हाथ बिकानी' का जिक्र करते हैं उसके हाथों भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कई बार बिकी है। भारत में 'श्रमिक और कृषक दल' स्थापित करनेवाले लोगों में पर्सी ई. ग्लैडिंग्स, फिलिप स्प्रैट, बैंजामिन फ्रांसिस ब्रैडले और लेस्टर हुचिंसन आदि अंग्रेज थे। 'प्रगतिशील लेखक संघ' की स्थापना में भी सारा योगदान इंग्लैण्ड की कम्युनिस्ट पार्टी का ही था। जब-जब जरूरत पड़ी इन लोगों ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को निर्देश दिया और स्वतंत्रता संग्राम को कमजोर किया। 1936 में स्थापित प्रगतिशील लेखक संघ के कितने कवियों-लेखकों ने सीधे-सीधे अंग्रेजी साम्राज्यवाद का विरोध किया? निस्संदेह ऐसा कोई कवि या लेखक शायद ही हो और कम-से-कम पार्टी या प्रलेस की अधिकारिक विचारधारा तो यह कदापि न थी। वास्तविकता तो यह है कि ब्रिटेन की साम्राज्यवादी नीति का विरोध करते हुए भी ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी ब्रिटेन के हितों की सुरक्षा करती थी और इसीलिए उसने 'प्रलेस' और अन्य श्रमिक संगठनों की नींव भारत में डाली थी। भारत के प्रगतिवादी कवि जो बिना किसी लाग-डाँट के 'लुच्चे टुच्चे उल्लू के बच्चे पूँजीपति' जैसी कविता लिख सकते थे वे क्या सीधे-सीधे अंग्रेजों के खिलाफ नहीं बोल सकते थे। लेकिन ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के इशारों पर चलने के कारण वे अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवाद विरोध के भुलावे में फँसे रहे।

साम्राज्यवाद का विरोध उस समय कहाँ चला गया था जब 1939 में स्तालिन ने हिटलर से समझौता किया था। किसी लेखक-कवि ने इसका विरोध नहीं किया। गौरतलब है कि जापान, इटली और जर्मनी द्वितीय विश्वयुध्द में एक तरफ थे और इंग्लैण्ड, अमेरिका और फ्रांस दूसरी तरफ। जब जर्मनी के साथ सोवियत रूस का समझौता हो गया, तो सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को स्वतंत्रता-संघर्ष के निर्देश दे सकती थी। लेकिन ब्रिटेन की कम्युनिस्ट पार्टी के लिए यह नागवार था। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ऐसे समय दो पाटों के बीच फँसी थी, वह स्वतंत्रता के लिए संघर्ष भी कर रही थी और ब्रिटेन का समर्थन भी कर रही थी। साँप-छछूँदर वाली स्थिति में वह क्या कर सकती थी? कम-से-कम इतना तो कर ही सकती थी कि ब्रिटिश 'फूट डालो और राज्य करो' की नीति के तहत पाकिस्तान का समर्थन कर सकती थी। 1940 में सज्जाद जहीर ने मुस्लिम लीग के पाकिस्तान की माँग का समर्थन करते हुए लिखा ''यह एक बड़ी अच्छी और बढ़िया बात हुई - भारतीय मुसलमानों के लिए, और कुल मिलाकर सम्पूर्ण भारत के लिए भी कि मुस्लिम लीग बढ़ती जा रही है और अपने साथ लाखों स्वाधीनता प्रेमी लोगों को एकत्र करती जा रही है।'' -कम्युनिज्म इन इंडिया, विंडमिलर, पृ. 214लेकिन अब जून 1941 में जर्मनी ने रूस पर आक्रमण किया तब रूस और इंग्लैण्ड दोनों एक ही खेमे में आ चुके थे और ऐसे में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी स्वाधीनता की बात नहीं कर सकती थी। ऐसे ही समय 1942 में 'भारत छोड़ो आन्दोलन' शुरू हुआ जिसका भारत की कम्युनिस्ट पार्टी केवल विरोध कर सकती थी और उसने ऐसा किया भी। इस पर विंडमिलर की टिप्पणी है ''यह कमाल था ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव हैरी पोलिट के जोरदार पत्र का, जो भारत सरकार के ब्रिटिश गृहमंत्री मि. मैक्सवेल के सौजन्य से ठीक हाथों में पहुँचा दिया गया। बस, फिर क्या था, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने तुरन्त कलाबाजी खायी और मोहरा ठीक उल्टा पलटकर अब 'जनयुध्द' का नारा लगा दिया। दूसरे शब्दों में, अब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अंग्रेजी साम्राज्यवाद की सहयोगी और सहयात्री बन गयी थी।'' वही, पृ. 377

इसी भारत छोड़ो आन्दोलन में डाँगे, नम्बूदरीपाद और पी.सी. जोशी जैसे कॉमरेड ब्रिटिश साम्राज्य के साथ मिलकर गुप्तचरी कर रहे थे और कांग्रेस के कार्यकत्तर्ााओं का पता बता रहे थे। 1962 में यही कॉमरेड चीन के भारत पर आक्रमण को साम्यवाद की विजय के रूप में देख रहे थे। बावजूद इसके कम्युनिस्ट 'राष्ट्रभक्ति' जैसे शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। कम-से-कम इतनी शर्म तो होनी चाहिए देशद्रोहियों को। बहरहाल ज्योति बाबू और बुध्दो बाबू के बाद कम्युनिस्ट पार्टी की नक्सल इकाई को भी अब सद्बुध्दि आ रही है। नक्सली आतंकी गिरोह के गाँजाधारी छात्र-संगठन आइसा ने अपनी कन्वेनर रिपोर्टों में इस बात से सहमति जताई है कि अब वह प्लेसमेंट सेल खोलेगी। लेकिन प्लेसमेंट सेल में नौकरी देगा कौन? इस पर वह मौन है। शायद कॉर्पोरेट के बदले आइसा अपने मातृसंगठन नक्सलवादी आन्दोलन के लिए 'एरिया कमाण्डर' की भर्ती करेगी। लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो हम आइसा का स्वागत करते हैं क्योंकि वह भी पूँजीवाद के दौर में दाखिल हो गयी है और उसकी विचारधारा का अंत हो गया है। शायद मानवाधिकार आयोग की रिपोर्टों से उन्हें सद्बुध्दि आ गयी हो और अब और आदिवासियों की हत्या वे नहीं करना चाहते हों। हमें कॉमरेड से मनुष्य हुए आइसा वालों से पूरी हमदर्दी है, अगर सही में वे मनुष्यत्व की तरफ कदम बढ़ा चुके हों तो। अगर उसकी लाली में कमी आ गयी हो तो डिस्सू-पिस्सूवाले इसकी चिंता किया करें। वैसे, बुध्दो बाबू भी भीतर-भतर मुस्करा रहे होंगे। रतन टाटा ने अगर दुलत्ती न जमाई होती, तो वे भी खुलकर हँस रहे होते। टाटा का बंगाल छोड़कर गुजरात जाना कॉर्पोरेट और किसान-मजदूरों का नरेन्द्र मोदी के प्रति विश्वसनीयता का प्रमाण है। वहीं बंगाल और कम्युनिज्म ने किसानों मजदूरों तथा कॉर्पोरेट की विश्वसनीयता खोयी है। किसानों और मजदूरों की बात करनेवाली पार्टी ने किसानों-मजदूरों की जहाँ हत्या करके ऊपर से कंक्रीट बिछाया है वहीं 'हिन्दुत्व' की बात करनेवाली सरकार में किसान-मजदूर और कॉर्पोरेट सब खुश हैं। वर्ग-संघर्ष को आधार माननेवाली पार्टी ने संघर्ष का उदाहरण प्रस्तुत किया है तो सहयोग को आधार माननेवाली पार्टी ने सहयोग का उदाहरण रखा है। यह माक्र्सवाद पर राष्ट्रवाद की जीत है। माक्र्स पर हेडगेवार और लेनिन पर गोलवलकर की विचारों की जीत है। हिन्दू जीवन दृष्टि ही वह पध्दति निर्मित कर सकती है जिसमें पूँजीपति और मजदूर दोनों के हित सुरक्षित रह सकते हैं। गुरूजी की स्पष्ट मान्यता है कि 'व्यक्तिगत अभिरूचि की जीवंतता' और 'उत्पादित संपत्तिा का विकेन्द्रीकरण' दोनों की आवश्यकता है और ''हिन्दू जीवन दृष्टि की पृष्ठभूमि में ही यह संतुलन बनाया जा सकता है।'' (श्री गुरु जी समग्र, खण्ड-11, पृ. 37) इसके विपरीत ''समाजवादी पध्दति दुनिया में कभी भी कहीं भी सर्वोत्ताम प्रणाली नहीं हुई है। यदि समाजवाद एक ही देश की, सीमा में सीमित रहता है तो वह हिटलर या मुसोलिनी का समाजवाद हो जाता है और जब सीमाएँ लाँघता है तो रूसी अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवाद बनता है। ये दोनों प्रकार क्या कहर ढाते हैं, हम देख चुके हैं। समाजवाद की आड़ में सत्तारूढ़ दल या सत्तारूढ़ नेता तानाशाही की ओर बढ़ रहे हैं। उत्पादन के सारे साधन अपने हाथ में ले रहे हैं।'' (श्री गुरुजी समग्र, खण्ड-3, पृ. 228-229)

बुध्ददेव भट्टाचार्य ने अपने आका स्तलिन के लेबर कैंपों की राह पर चलते हुए जो तानाशाही दिखाई है और दलाली की है वे भूल गये थे कि यह रूस नहीं भारत है। भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की दादागीरी नहीं चलती। तानाशाही और दादागीरी की मंशा रखनेवालों को बंगाल की जनता का यह करारा थप्पड़ है। इससे शायद बुध्दो बाबू और ज्योति बाबू को शर्म आ जाए। पर इनकी तो आदत है गलतियाँ करना और भूल जाना - शर्म मगर इनको नहीं आती! कम्युनिस्ट और आदमी में यही फर्क है कि आदमी अपने कुकर्म पर शर्माता है, कम्युनिस्ट अपनी शर्मिंदगी को भी बौध्दिकता का जामा पहना जस्टीफाई करता है।

3 comments:

विवेक सिंह said...

कम्युनिस्ट लगता है लोहे के बने होते होंगे .

sumansourabh said...

कम्युनिस्टो के पीछे क्यो पड़े हो भाई अब तो वे अपने अन्तिम सास के साथ जी रहे है.

Anonymous said...

कम्युनिस्ट लोहे के नहीं स्टील के बने होते है। इन मिथ्या पतंग प्रलाप से उन का क्या होना है?