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Monday 13 October 2008

कम्युनिस्टों का मैं जानी दुश्मन हूं- डॉ. भीमराव अंबेडकर

डॉ अंबेडकर उन राष्ट्रीय महान पुरूषों में से थे जिन्होंने राष्ट्रीय एकात्मता, भारतीयता, प्रखर राष्ट्रभक्ति तथा भारतीय जनमानस को आगे बढने की प्रेरणा दी।

कम्युनिस्टों ने अपने मकसद में डॉ अंबेडकर को अवरोध मानते हुए समय-समय पर उनके व्यक्तित्व पर तीखे प्रहार किए। पूना पैक्ट के बाद कम्युनिस्टों ने डा. अंबेडकर पर 'देशद्रोही', 'ब्रिटीश एजेंट', 'दलित हितों के प्रति गद्दारी करनेवाला', 'साम्राज्यवाद से गठजोड़ करनेवाला' आदि तर्कहीन तथा बेबुनियाद आक्षेप लगाए। इतना ही नहीं, डा. अंबेडकर को 'अवसरवादी', 'अलगाववादी' तथा 'ब्रिटीश समर्थक' बताया।

(गैइल ओंबवेडन, 'दलित एंड द डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशन: डॉ अंबेडकर एंड दी दलित मूवमेंट इन कॉलोनियल इंडिया')

कम्युनिज्म पर डॉ अंबेडकर के विचार-

'मेरे कम्युनिस्टों से मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता। अपने स्वार्थों के लिए मजदूरों का शोषण करनेवाले कम्युनिस्टों का मैं जानी दुश्मन हूं।'

'मार्क्सवाद तथा कम्युनिस्टों ने सभी देशों की धार्मिक व्यवस्थाओं को झकझोर दिया है।
'मेरे कम्युनिस्टों से मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता। अपने स्वार्थों के लिए मजदूरों का शोषण करनेवाले कम्युनिस्टों का मैं जानी दुश्मन हूं।'

मार्क्स और उसके कम्युनिस्ट का पूरा उत्तर बुध्द के विचारों में है। बौध्द धर्म को मानने वाले देश, जो कम्युनिज्म की बात कर रहे हैं, वे नहीं जानते कि कम्युनिज्म क्या है। रूस के प्रकार का जो कम्युनिज्म है, वह रक्त-क्रांति के बाद ही आता है। बुध्द का कम्युनिज्म रक्तहीन क्रांति से आता है। पूर्व के एशियाई देशों को रूस के जाल में फंसने से सावधान रहना चाहिए।'

'संविधान की भर्त्सना ज्यादातर दो हल्कों से है-कम्युनिस्ट पार्टी तथा समाजवादी पार्टी से। वे संविधान को क्यों बुरा कहते हैं। क्या इसलिए कि यह वास्तव में एक बुरा संविधान है। मैं कहना चाहता हूं-नहीं। कम्युनिस्ट चाहते है कि संविधान सर्वहारा की तानाशाही के सिध्दांतों पर आधारित होना चाहिए। वे संविधान की आलोचना इसलिए करते है कि क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है। समाजवादी दो चीजें चाहते है। प्रथम- यदि वे सत्ता में आएं तो संविधान को बिना किसी क्षतिपूर्ति के व्यक्ति संपत्ति के राष्ट्रीयकरण या समाजीकरण की स्वतंत्रता होनी चाहिए। दूसरे- समाजवादी चाहते है कि संविधान में वर्जित मूल अधिकार पूर्ववत् हों और बिना किसी नियंत्रण के हों, क्योंकि यदि उनकी पार्टी सत्ता में नहीं आई तो उन्हें केवल आलोचनाओं की नहीं, बल्कि राज्य को पलटने की भी हो।'

6 comments:

अमित अग्रवाल said...

very good, amazing!!!
I didnt know the views of Dr. Ambedkar on communism. This is very interesting.
Thanks for posting.

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

यदि यह सत्य है , तो कम्मुनिस्तों को अपने ऊपर पुनर्विचार करना ही चाहिए!

Anonymous said...

BJP neta aur varishth patrakaar Arun Shauri ne ambedkar ke bare men jo gali galoj bhari kitab likhi hai, jiske liye daliton ne shauri ka muh kaala kiya tha, uske baare men bhi kuchh bataaiye.

वेद प्रकाश said...

आप डॉ. अंबेडकर और कम्युनिस्टों की चिंता करना छोड़ें, ये दोनों तो समता वादी आधार पर समाज व्यवस्था का पुनर्गठन करना चाहते हैं और आप हिदू धर्म के आधार पर, यानी वर्ण व्यवस्था के आधार पर. और आपको यह भी नहीं भूलना चाहिए कि डॉ. अंबेडकर ने हिंदू धर्म के बारे में क्या कहा था-- 'मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ, यह मेरे बस में नहीं था, पर मैं एक हिंदू के रूप में मरूँगा नहीं.'
और यह भी कि 'जिस सभ्यता ने 5 करोड़ अछूत पैदा किए, क्या उसे सभ्यता कहा जा सकता है.'
आप चाहे कुछ भी कर लें यह देश 'हिंदू राष्ट्र' कभी नहीं बन सकता.

ताहम... said...

हितचिन्तक....... आंबेडकर,मार्क्स,बुद्ध के प्रति आप कितना पढ़ते जानते हैं मुझे नहीं पता...मगर आप उस अपूर्ण पुस्तक का ज़िक्र नहीं करते जिसे आम्बेडकर ने लिखा था " बुद्ध और मार्क्स".... सारी लड़ाई विचारधारा कम्यूनिस्टो तक सीमित कर देंगे.. कम्युनिज्म के सिद्धांत और उसके दर्शन पर आप क्यों कुछ नहीं कहते...क्यूंकि अखबारी खबरें...छिछोड़े जुमले तक सीमित रहकर अपनी समझ का प्रसर कर रहे हैं... इतिहास ना आपको पता है...न दूसरों को सही बता पाते हैं...

Nishant

चंदन कुमार मिश्र said...

भागो नहीं बदलो जैसी सरल-सहज किताब में भी इन बातों का जवाब अच्छे से मिल जाएगा। बुद्ध और मार्क्स की बात ताहम ने कर ही दी है।